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Full text of "Manak Hindi Kosh Vol 4 (1965) Ac 5050"

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इाडद-संख्या--२ १ ०८२ 


मानक हिन्दी कोश 


[ हिन्दी भाषा का अद्यतन, अर्थे-प्रधान और सर्वागपूर्ण शब्द-कोश ] 


चोथा खंड 


[ फ सेल ] 


प्रधान सम्पादक 
रामचन्द्र वर्म्मा 


सहायक सम्पादक 
बवरोनाथ कपूर, एस ए , पी-एच डी 





हिन्दी साहित्य सम्मेलन * प्रयाग 


प्रथम संस्करण 
शाकाछ्द श्८८७छ ४: सन्‌ १९६५ 


सल्य 
पच्चोस रुपया 


सुद्रक 
रामप्रताप त्रिपाठी, सम्मेलन मुद्रणालय, प्रयाग 


प्रकाशकीय 


हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने कुछ वर्ष पूर्व मानक हिन्दी कोश' को पाँच खडों में प्रकाशित करने की योजना कार्या- 
न्वित की थी। तीन खड प्रकाशित हो चुके हैं। यह चोथा खड हिन्दी माथा तथा साहित्य के अध्येताओ के हाथ मे प्रस्तुत 
करते हमे रवभावत हप हो रहा है। पाँचवे खड़ के प्रकाशन से भी हम यथासम्भव श्ीघ्रता कर रहे है। हमे आशा है कि 
इस कोझ के सभी खडो के प्रकाशन के बाद इसक दूसरे सस्करण के प्रकाशन का काम भी शुरू करने की तुरत आवश्यकता 
पड़ेगी, क्योकि हिन्दी में नये शब्दो की सख्या निरन्तर बढ रही है और हिन्दी बी नयी आवश्यकताओ के कारण कोश की माँग 
मी देश के विभिन्न क्षेत्रो म और विदेक्षो मे मी खूब बढ रही है। 


पाँचिये गड़ के अत में हम दो परिशिष्ट मी देगे। इनमें से पहला परिशिप्ट ऐसे छूटे हुए शब्दों और अर्थो का होगा 
जो इस कोश के मुद्रण काल के उपरान्त सपादको के ध्यान में आये है अथवा भिन्न-मिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होते हुए देखे गये 
है। दूसरे परिशिष्ट में अगरेजी हिन्दी शब्दावर्ा होगी जिसमे अनुमानत ७, ८ हजार ऐसे अँंगरेजी शब्द होगे जो भिन्न-भिन्न 
राजकीय, वैज्ञानिक, सामाजिक ओर साहित्यिक क्षेत्रों मे प्रचलित है और जिनके हिन्दी पर्याय प्राय लोग ढूँढा और पूछा 
करते है। इनमें से अधिकतर अँगरेजी शब्दों के हिन्दी पर्याय मारत सरकार की नयी वैज्ञानिक शब्दावली के अनु्टप ही होगे। 
सारांदय यह कि इस कोश को अद्यतन और परम उपयांगी बनाने मे हम अपनी ओर से कोई बात उठा नहीं रखेंगे। हमे आशा 
है कि इस कार्य में हम हिन्दी जगत से उत्तरोत्तर और भी अधिक प्रोत्साहन तथा सहायता मिलती रहेगी। 


पिछले प्रकाशित तीव खडों को मनीषियों, शब्द तत्त्ववेत्ताओं, साहित्यिकों और हिन्दी प्रेमियों ने हिन्दी का 
प्रतिनिधि कौश मानकर उसका जो स्वागत किया है, उसमे हमे यह विश्वास है कि यह खड भी उन्ही पूर्व विशेषताओं के कारण 
ग्राह्म और स्वागनाहें होगा। 


चिन्लनशोल समालोचको, कोशकारो तथा जागरूक पाठको से हमारा अनुरोध है कि इस ख्वड॒ की विशेषताओ और 
न्‍्यूनताओ की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कर हमे अनुगुहीत करे जिससे हम इस कोश के द्वारा हिन्दी के संबद्धेत के प्रति 
अपना कतेंब्य पालन करने में और अधिक समर्थ हो सके। 


हम इस 'मानक हिन्दी कोश ' के रचना सिद्धान्त तथा प्रकाशन के उद्देश्य से सबद्ध अपने सकल्प को यहाँ दोहराना 
चाहते है कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन अपने मुख्तर कतंब्य के प्रति निष्ठावान्‌ बनकर सतत जागरूक रहेगा। 


“मानक हिन्दी कोश' के प्रधान संपादक तथा उनके सहयोगियो एव उन सभी लोगो के प्रति हम कृतज्ञ हैं 
जिन्होंने इसके सम्पादन, मुद्रण तथा प्रकाशन मे पूर्ण सहयोग प्रदान किया है। 


मोहनलाल भट्ट 
सचिव 
प्रथम दासन-निकाय 
हिन्दी साहित्य सम्मेछस, प्रयाग 


संकेताक्षरों का स्पष्टीकरण 


अ०---अँगरेजी भाषा 

अ०--- ( कोष्ठक मे) अरबी माषा 
अ०---(कोष्ठक से पहले) अकमेंक क्रिया 
अजशेय---स ० ह० वात्स्यायन 
अनु ०--अनुकरणवाचक दाब्द 
अप ०---अप भ्रश 

अद्धं० मा०---अद्धं-मांग थी 
अल्पा०---अल्पार्थक 

अव्य ०---अग्यय 
आस्ट्रें०---आस्ट्रेछिया के मर भिवासियों की बोली 
एक ०---इब रानी मापा 

उम्र ०७--पाण्डेय बेचन द्वार्मा उग्र! 
उदा०---उदाहरण 
उप०--उपसर्गे 
उमय०--उमयलिग 

कबी र०----कबी रदास 

क्रशा ०---कश्मी री भाषा 

केशव ०---केशवदास 

फोक ०---कोकणी भाषा 

को ०---कोटिलीय अधेशारत्र 
क्रि०--क्रिया 

कि०प्र ०---किया प्रयोग 

किए वि०--क्रिया विशेषण 

बृव ०---क्व चित्‌ 
गुज०--गुजराती माषा 

चन्द्र ०---चन्द्रब रदाई 
जायसी---मलिक मुहम्मद जायसी 
जावा ०--जावाद्धीप की भाषा 
ज्यों ०---ज्योतिष 

लि०---डिगल भाषा 

ढी० मा०--ढोला मारू रा दूहा 
त०--तमिल माषा 
लि०---तिब्बती 

तु०---वुरकी माषा 

तुलसी ०--गोस्वामी तुलसीदास 


ते०--वैलूगु भाषा 


दादू--दादूदयाछ 
दिनकर---रामधारी सिह दिनकर' 
दीनदयाल---कवि दीनदयाल गिरि 
दे ०--देखें 

देख---देव कवि 

देदशा ०---देशज 
दिवेदी--महावीर प्रसाद ठिवेदी 
नपु०-नतपुसकलिंग 
नागरी--तागरीदास 
निराला--प० सुर्यकान्त त्रिपाठी 
ने०--नेपाली माषा 
पृ०--पजाबी भाषा 
पश्याकर--पप्माकर कवि 
पस्त---सुमित्रानन्दन पन्‍्त 

पर्या ०---पर्याय 

पा०--पाली भाषा 
पु०--पुलिंग 

पु० हि०---पुरानी हिन्दी 

पुते ०--पुतंगाली भाषा 

पू० हिं०--प्ूर्वी हिदी 
पेशा०--पैशाची माषा 

प्रत्य ०---प्रत्यय 
प्रसाद--जयणशकर 'प्रसाद' 
प्रा०--आ्राकृत भाषा 
प्रे>---प्रेरणार्थक क्रिया 
फा०--फारसी माषा 

फ्रा ०--फरासीसी माषा 

बग ०---बगाली भाषा 
बर०--बरमी भाषा 

बहु ०---बहुवचन 
विहारी---कवि बिहारीलारू 

बु० खें०---बुन्देऊखण्डी बोली 
मारतेन्दु--- मा रतेन्दु' हरिश्चन्द्र 
आभाव०---भाववाचक सज्ञा 


्् 


मू० कृ०---मृत कृदन्त 

मूषण---कवि मूषण त्रिपाठी 

मतिराम---कवि मतिराम ज़िपाठी 
मल०--मलयालऊम माषा 

मि०--मिलावे 

महा ०---मुहावरा 

यहू ०---यहूदी भाषा 

यू ०--यूनानी भाषा 

यौ०--समौगिक पद 

रघुराज---महाराज रघुराज सिंह, रीवा-नरेद् 
रसरान---सैयद इम्राहीम 'रसखान' 
रहीम---अब्दुरंहीम खानखानाँ 

राज० त०---राजतरगिणी 

लद्य ०----लशकरी बोली अर्थात्‌ हिन्दुस्तानी जद्ाजियों की बोन्डी 
लै०---लैटिन माषा 

य७० वि ० ---वर्ण-विपसय 

बि०---विशेषण 

बि० दे०--विशेष रूप से देखे 
विश्राम---विश्वामसागर 





खझ्या०--व्याकरण 
श्वु०--श्यूगार सतसई 
स०---सस्कृत भाषा 
सयो०---संयोजक अव्यय 
सयो० क्रि०---सयोज्य क्रिया 
स०---सकर्मक क्रिया 

सर्वे ०---सर्वनाम 
सि०--सिधी भाषा 

सिह ०---सिंहली माषा 
सूर---सू रुदास 

स्‍त्री ०--स्त्रीलिंग 

स्पे ०---रपेनी माषा 
हरिऔष---प ० अयोध्यासिह उपाध्याय 'हरिऔध' 
हि०-- हिन्दी माषा 


* यह चिक्नल इस बात का सूचक है कि यह दब्द केवल पढ. 
में प्रयुक्त होता है। 

| यह चिह्न इस बात का सूचक है कि इस दब्द का प्रयोग 
स्थानिक है। 


संस्कृत शब्दों की व्युत्पत्ति के संकेत 


अत्या० स०---अत्यादि तस्पुरुष समास (प्रा० स० के अन्तर्गत ) 
अव्य स०---अव्ययीमाव समास 

उप० स०--उपपद समापस 

उपमि० स०---उपसित कर्मधारय समास 
कर्म ० स०---कर्मंघारय समास 

ज० त०--चतुर्थी तस्पुरुष समास 

त्‌ृ० त०--ततीया तत्पुरछष समास 

हु स०--नन्द्र समास 

द्विगु० स०--द्विगु समास 

द्वि० त०--द्वितीया तत्पुरुष सास 

न० त०---नजूतस्पुरुष समास 

न० ब०--नजूबहुडीहि समास 
नि०--निपातनात्‌ सिद्धि 

प्‌ृ० त०--पचमी तत्पुयष समास 

पृषो ०--पृषोदरादित्वात्‌ू सिद्धि 

प्रा० ब० स०--प्रादि बहुत्रीहि समास 


प्रा० स०--प्रादि तत्पुरुष समास 
ब० स०---बहुब्रीहि समास 
घा०--बाहुलकात्‌ 
मयू० स०--मभमूरव्यसकादित्वात्‌ समास 
शक ०---झ्कन्ध्वादित्यात्‌ पररूप 
ब० त०--अघष्टी तस्पुरुष समास 
स० त०---सप्तमी तत्पुरुष समास 
/--अह घातु चिह्न है। 

विज्येष--पृपो ०,नि० और बा० ये तीनो पाणिनीय ब्याकरण 
के सकेत है। इनके अर्थ है, पृषोदर” आदि छाब्दो की भाँति, 
“निपातन' (बिना किसी सूत्र-सिद्धान्त) से और बाहुछूक' (जहाँ 
जैसी प्रवृत्ति देखी जाय वहाँ उस प्रकार) से शब्दों की सिद्धि । 
जिन क्षब्दी की सिद्धि पाणिनीय सूत्रो से सम्भव नहीं होती उनकी 
सिद्धि के लिए उपर्युक्त विधियों का प्रयोग किया जाता है। 
इस विधियों स किसी शब्द को सिद्ध करने के छिए वर्णों के 
आगम, ब्यत्यय, लोप आदि आवश्यकतानुसार किये जाते है। 


मानक हिन्दी कोश 


चतुर्य खण्ड 





फ्‌ 


फ--देवनागरी वर्णमाला का वाइसयाँ व्यजन जो पबगे के अन्तर्गत दूसरा 
बर्ण है तथा जो भाषा-विज्ञान और व्याकरण की दृष्टि से ओष्ट्य, अधोष, 
महाप्राण तथा स्पृष्ट वर्ण है। 

फंक--स्त्री ०१. फाँक। २. ः“फकी। 

फेकनी|--रत्री ० -- फकी । 

फंका--पु० [हिं० फॉकना ] [रत्री० अत्पा० फकी] ६. अजुलि या 
हथेली मे लिया हुआ खाद्य पदार्थ (विशेषत दाने या बुकनी ) फॉकने 
या झटके से मुंह भे डालने की क्रिया। २ खाद्य-पदार्थ की उतनी 
मात्रा जितनी एक बार उक्त ढंग रा मुंह में डाली जाती हो। 
क्रि। प०-- भारना लगाना । 
सुहा०-- (किसी चोज का) फका करना तनाश करना। नष्ट करना। 
फका सारना या रूगानान्‍-मुह गे रखकर फाँकना। 
३ किसी चीज वंग छोटा खड या टुकडा। 

फक्षी--स्त्री> [हिं० फका] १ कोई चीज फॉकने की क्रिया या भाव। 
२ वह चीज जो फॉककर खाई जाय। ३ किसी चीजे की उतनी 
मात्रा जितनी एक बार फॉकी जाय। (मुहा० के लिए दे० फका' के 
मुहा ०) ४ किसी चीज का बहुत छोटा दुकडा। 

फंग--पू० स० बंध] १ बधन। २ फदा। 
अनुराग या प्रेम का बन्धन | 

फंद[--पु०>फणि। 

फड--पु० [अ०] वह धन-राश्षि जो किसी विद्चिष्ट उद्देश्य से इकट्ठी 
की गई अथवा अल्‍ूग या सुरक्षित रखी गई हो। कीश। जैसे--चेरिटी 
फड, प्राविडेंट फड। 
पु० [स०] उदर। जठर। 

फंद--पु० [हि० फदा] १ फदा। २ जार। पाश। ३. किसी को 
फेंसाने के लिए उसके साथ किया जानेबारा छल या धोखा। ४ फढदे 
में फँसते पर हीनेवाला कष्ठ। ५ कष्ट। दुख। ६ मर्म। रहस्य। 
७ मनथ की काँठटी को फेसाने का फदा। गूँज। 

फंदसा--अ० [हिं० फदा] १ फंदे अर्थात्‌ जाल मे फैसना। २ किसी 
के धोखे मे आता। ३ मुग्ध होना। 
स० १. फदा या जाहू बिछाना। २ फदे में फेसाना। 

[स०>«फाँवना | 


३ अधीनता। ४५ 


फंफाना 


जि 





फंदरा (--पु०*फदा ! 

फंदवार--वि० [हिं? फदा+वार (प्रत्य०)] ६. फाँदते अर्थात्‌ 
फेंदे या जाल मे दूसरो को फेसानेवाला । २. फदा बिछानेवाला । 

फंदा--पु ० [स० पाश या बधत] १. रस्सी आदि मे एक विशेष प्रकार 
की गाँठ लगाकर बनाया जानेवाछा घेरा जो किसी चीज को फेसाकर 
रखने था बाँधने क काम आता है। जैसे---(क ) कूएँ से पानी निकालने 
के समय घडे के गले मे लगाया जानेबाला फदा। (ख) फाँसी पर 
छटकाने के लिए अभियुक्त के गले में डाला जानेवाला उक्त प्रकार का 
घेरा। 
क्रि० प्र०--देता ।--बअनाना । --लछगाना | 
पद--फंवेदार। (दे०) 
२ कोई ऐसी कपटपूर्ण बात या योजना जिसका मुख्य प्रयोजन किसी 
को फेसाना होता है। ३ रस्सियों आदि का बुना हुआ जाह़। 
मुहा०--- फंदा लगाना “किसी को फेंसाने के लिए छछपूर्ण आयोजन 
या यूक्ति करना । (किसी के) फंदे में पड़ना या फेंसना किसी के जाल 
या धोखे मे फंसना। 
४ कोई ऐसी बात जिसमे पश्कर मनुष्य विवश् हो जाता और कप्ट 
भोगता हूी। ५ क्रुछ खाने या पीने के समय, अचानक हँसने आदि के 
क्गरण खाद्य था पेय पदार्थ का गले में इस प्रकार अटक या रुक जाना 
कि आदमी बोल ने सके। उदा०--किसी ने रूमाल मे हँसी रोकी तो 
किसी के गले में चाय का फदा पड़ गया---अजीम बेग चगताई। 

फेंदाना--रा ० [हिं* फंदना ] ऐसा काम करना जिससे कोई पढे मे 
जा फँसे। 
स० [हि० फॉदता | किसी को फाँदने मे प्रवृत्त करना। 

फेंदाबना] ---स ०*>फंदाना । 

फंदेवार--वि० [हिं० +फा०] जिसमे फदा रूगा या बता हो। 
पू० अवन, सीयन आदि भे एसी रचना, जिसमे एक कड़ी या छड 
के अन्तिम सिरे से कुछ पहले ही दूसरी कडी या लड़ का पहला सिरा 
आरम्भ होता है। 

फ्ंदेत| ---पु० [हि० फेदा+ऐत (प्रत्य०)] १ वह जो फदा डालकर 
या जाल बिछाकर पशु-पक्षिप्रों को फँसाता हो। बहेलिया | व्याध। २ 
वह पालतू तथा सिखाया हुआ पशु जो अपनी जाति के अन्य पशुओं को 
जाल मे फेशाता है। 

फेंफाना--अ० [अनु० ] १ बोलने मे हृकछासा। २ दूधमे उबाल आना। 


फंसता 
फेंसना---अ० [स० पाण, हिं? फाँस] १ पा अर्थात्‌ फेदे मे पड़ना और 
फलत कसा जाना। २ किसी प्रकार के जाल मे इस प्रवार अटकता 
कि उससे छूटकारा था मुक्ति न हो सके। ३ किसी चीज में किसी 
दूसरी भीज वा इस प्रकार अन्दर चले जाना, अटकना था उलझना कि 
सहज मे वह बाहर न निकल सकती हो। जैसे--ब)तल में काग फेंसना । 
४ एक चीज में दूसरी चीज का उलझकर अटऊकू जाना। जैसे-- 
काटा में पल्‍्छा फेसना। ५ छाक्षणिक अर्थ मे, अधिक अथवा विकट 
कामों से इस प्रकार व्यस्त रहना कि उनसे अवकाश या छुटकारा मिलते 
की जल्दी आशा न हा। जैसे---झझट या मुकदम मे फंसना। ६ किसी 
की चिकती-चुपडी या छलपूर्ण बाता मे आना और छला जाना। ७ 
प्र-पुरुष या पर-स्त्री के प्रेम मे पडने के कारण उससे ऐसा अनुचित सबंध 
स्थिर होना जा जल्दी छूट न सके। 
फेंसनी--सत्री ० [हिं० फंसना] एक प्रकार की हथौड़ी जिससे कसेरे 
लोटे, गगरे आदि का गछा बनाते है। 
फेंसरी| -स्त्री० १ सूफाँसी। २ चस्‍फेंसौरी। 
फेंसवार| ---१०>फदा । 
फेसाना--स ० [हिं० फेसता] १ ऐसा काम करना जिससे कोई चीज 
फेसमती हो। बंधन, फदे या जाल मे लाना और जकडंकर रखना। 
२ कोई चीज़ इस प्रकार अठकाना या किसी दूसरी चीज में उलझाना 
कि वह जल्दी छूट न सके। जैसे--बीतल में काग फंसाना। ३ घन 
आदि किसी ऐसे व्यतित को देवा या ऐसी रिथति मे लगा रखना कि उससे 
या वहाँ से जल्दी वहू लछौटकर प्राप्त न हो सकता हो। ४ किसी चाल, 
युक्त आदि के द्वारा किसी को इस प्रकार अपने अधिकार में छाना कि 
उसे ठगा या धांखा देकर अपना स्वार्थ साधा जा सके। जैसे--असामी 
फेंसाना। ५ पर-पुरुष या पर-स्त्री को अपने प्रेम-पाण मे आवद्ध करके 
उससे जन चित सबंध स्थापित करना। 
फेंसाइ--पु ७ [हि फेसना -। आब (प्रत्य०)] १ फसने की क्रिया या 
भाव। २ ऐसी चीज या बात जो दूसरा को फेंसाने के लिए हो | 
फेंसिहारां --वि० [हि फाँस+हारा (प्रत्य०)] [स्त्री० फेसिहा- 
रिन] फंसानेबाला। 
फेसौरी| --स्त्री० [हि० फॉसना +औरी ([प्रत्य०)] १ फदा। पाश। 
२ वह रस्सी जिसके फद से अभियुवत का गला फंसाकर उसे फाँसी 
दी जाती है। 
फ--प१० [स०९/फवक्‌ (नीचे जाना) | ४] १ कदु वाक्य। रूखी बात। 
२ दृत्तार। ३ व्यर्थ की बातें। ४ यज्ञ करना। ५ अथड़ | 
आँधी। ६ जेभाई। ७ फल की प्राप्ति। 
फक--वि० [स० स्फटिक] १ स्वच्छ । साफ। २ खूब सपोद। 
बि० [ फा० फक | १ (व्यक्ति) भय, लूज्जा आदि के कारण जिसके 
चेहरे का रंग उच गया हो। 
क्रि० प्र ०--होना । --पडना । 
पद- -फक रेहन रेहन रखी हुई चीज का बबक से मुवत हांता। 
समुहा०---फक कराना *रेहन रखी हुई चीज धन देकर छुडाना | 
फकड़ा| --पु० [दि० फक्‍कड ] बहुत ही निम्न कोटि और व्यथे की 
फतिता था सुक-बदी । 
फकड्टी--रती० [हिल फक्‍फ्ड] १ फक्‍्कदपन। २ दुदंभा। दुर्गंति। 


२ 


फगुनहद 


फकत--अ० य० [अ० फकत] १ बस इतना ही। २ केबल | सिर्फ । 

फक्र*--पु० ूफखर (गे ) । 

फका[--पु०+-१ फका। २. न्‍फाँक। 

फक्कीर---१० [अ० फकीर ] [रश्री० फकीरन, फकीरनी, भाव० फकीरी ] 
१. भीख अथवा भीख के रूप मे कोई चीज मगनेवाला व्यक्ति। २ 
त्यागी। महात्मा । ३ सत। साथु। ४ बहुत ही निर्धन व्यवित । कगाल। 

फकीरी--स्त्री० [हि० फकीर+ई (प्रत्य०)] १ ऐसी अवस्था जिसमे 
कोई भीख मॉँगकर निर्वाह करता हो। फकीर होने की अवस्था या 
भाव। २ कगालपन। निर्षनता। 
वि० फकीर-सम्बन्धी। फकीर का। जैसे--फकीरी दवा। 
पु० एक प्रकार का अगूर। 

फक्कड़--पु० [हिं० फाकारू“उपवास] [भसाव० फककडपत] £ ऐसा 
निर्धन व्यक्तित जो फाका या उपवासों के बावजूद भी खुश और मस्त 
रहता हो। २ ऐसा व्यक्ति जो बहुत ही बुरी तरह रो था छापरबाह 
होकर घन उडाता हो और अपने भविष्य का कुछ भी ध्यान न रखता 
ही। ३ बहुत बड़ा उच्छुलछ और उद्धत व्यक्रिति। ४ फकीर। 
मभिखमगा। 
पु०[स० फविकका ] अश्लील बात और गाली-गलौज। कुवाच्य। 
क्रि० प्र०--बकऊना। 
मुहा०--फफ्कड़ तौलना-ज्गाली-गुपता बकना। जुवाच्य 

फकक्‍्कड़बाज--प० [हिं० | फा०] [भाव ० फक्‍्कडबाजी ] 
फक्‍्कड अर्थात्‌ गाली-गुफ्ता बकता या प्राय अबछील 
हो । 

फक्कडाना---वि० [हि० फक्‍कड़ | आना (प्रत्य०)] 
का। २ फक्कडो की तरह का। 

फरक्िकका--स्त्री० [स०९/फक्क | णूवुरू (भाव मे )--अक, “टाप, दत्व 
१ वह वात जो शञास्त्राथ में दुरूह स्थऊ को स्पप्ट करने के लिए पूर्व- 
पक्ष के रूप में कही जाया कूट-प्रशन। २ अनुचित व्यवहार। ३ 
धोखे-बाजी । 

फकक्‍्कुल्रेहन--पु० [अ०] बधक या रेहन रखी हुई चीज छूटठाना। 

फलर--पु० [फा० फखस्र] सात्तिक अभिमान। ग्रीरवजत्य गवं। 
जैसे---अपनी कौम या मुल्क का फखर। 

फश्व --पू ० >च्फख र । 

फ्गा--पु०-फग (बंधन) । 

फगथा--पु ० >फगुआ (फाग)। 

फ्गुआ--पु ० [हिं> फागुन] १ होलिकोत्सव का दिन। होछी। २ 
उक्त अवसर पर हानेबाला आमोद-प्रमोद। ३ उक्त अवसर पर 
गाये जानेवाले एक तरह के अश्लील गीत | फाग। ४ उक्त अवसर 
पर दिया जानेवाला उपहार, भेंट या र्याहारी। 

फ्गुआना--स ० [हि० फगुआ] फागुन के महीने में किसी के ऊपर रग 
छोडना या उसे सुनाकर अइलील गीत गाना । 
अ०» फागुन के महीने मे इतना अधिक उच्छुखल तथा मरत होना कि 
सम्पता का ध्यान न रह जाय | 

फगुनहुट--स्त्री० [हिं० फागुन +हूट ([प्रत्य०) ] 
तेज हवा। 


4हना । 
वह जो बहुत 
बाते करता 


१ फवकड़ों 


१ फागुन मास की 


फपुनिया 
क्रि० प्र---चलना | 
२. फागुन में होनेवाली वर्षा। 

फ्गुनिया---पृ० [हिं० फागुन+इया (प्रत्य०)] त्रिसधि नामक फूल। 
वजि० है फागुन-सबंधी। फागुन का। २ फागुन मास मे होनेघाला। 

फगृहरा]---प१ ० >फंगुड़ारा। 

फ्गहारा--7० [हि० फ्गुआ+हारा (प्रत्य०)] १ वह जो फांय॑ 
खेलता हो। विशेषत ऐसा व्यक्तित जो दूसरों के यहाँ फाग खेलने के 
लिए जाय। २ फाग नामक गीत गानेवाला व्यक्ति । 

फजर--स्त्री० [अ०फ़्ज] १ प्रात्तकाल। सबेरा। २ प्रात काल के 
समय पढ़ी जानेवाली नम्ताण। 

फजल--१० [अ6 फउछ | अनुग्नह। कृपा। मेहरबानी। 

फरञ्ञा--स्त्री० [अ० फज्ञा | [वि० फजाई] १ खुला हुआ मेंदान। 
विस्तृत क्षेत्र। २ शोभा। ३ मनोरजक और सुन्दर वातावरण। 
४ वातावरण। 

फजिअता--रत्री ०-+फजीहत । 

फजिर--स्त्री ० >फजर। 

फजिल[--प्‌ ० -5फजलछ | 

फर्जिहतिताई*--स्त्री० [अ० फजीहत] १ 
करानेवाली बात। 

फरा्लीसा।--पु ० 5फर्जीहत । 

फजीती [---स्त्री० -फर्जीहत । 

फरजीसृत--रत्री ०[ अ० फज़ीलत ] १ उत्कृष्टता। श्रेष्ठता | २ प्रधानता। 
पद--फजीलत की पगडी-- (क) विद्वता-सूचक पगडी। (ख) विद्गवत्ता 
सूचक कोई चिह्न। (मुसलमानों मे एक प्रथा है जिसमे वे गुणी और 
विद्वान्‌ व्यक्ति को सम्मानित करने के लिए उसके सिर पर पगड़ी 
बॉधते है।) 

फजीहत--स्त्री० [अ० फजीहत] १ पूरी या बहुत अधिक दुर्देशा। 
कलककारी तथा घृणित रूप में होनेवाली खराबी। २ बहुत ही 
घृणित और टेय रूप मे होनेवाला झगड़ा या तकगार। 
पद--थुक्का-फजीहल । (दे० ) 

फजीहतो | --सत्री ०- -फजीहत । 

फरजूल---वि० अ० फज्ूछ] जो किसी काम का न हो। निरथेंक। 
अन्य ० व्यर्थ। जे-फायदा। 

फजूलख्च --वि० [अ)-फा०] अधिक खर्च करनेवाला। अपव्ययी। 
पु० व्यथ का व्यय। अपव्यय। 

फर्जूलखर्चो--रत्री ० [ब+फा० ] व्यर्थ बहुत अधिक व्यय करना। 
अपव्यय। फजूलखच्च । 

फकल--प ० >>फजल | 

फट--स्त्री ० [अनु०] १ फटने की क्रिया या भाव। २ किसी चीज 
के फटने से होनेवाला शब्द। ३ मोटर, मशीन आदि के चलने अथवा 
चिपटी हलकी चीज के आघात से होनेवाला शब्द । 
पद--फट से या फटाफट--बहुत जल्दी। तुरन्त। 
(स्त्री० >फटकार। 

फटक--स्त्री० [हि० फटकना ] १ फटकने की क्रिया या भाव। २. अन्न 
को फटकते पर उसमे से निकलनेवाला रही अदय | फटकन। 


फजीहत। २. फजीहत 





[१०-5स्‍फटिक | 
पु०-फाटक। 
[अव्य० [हि० फट] फट से। तत्काल। तुरन्त। 

फटकल--स्त्री ० [हि० फटकना] १. फटकने की किया या भाव। २ 
फटकने, झाडने आदि पर निकलनेवाली धूछ, मिट्टी आदि। दे अनाज 
फटकने पर निकलनेवाला निरथ्थंक या रही अश। 

फटकना--स० [अनु० फट] १ फट-फट दाब्द करना। २ कपडे 
को इस प्रकार झटके से झाड़ना कि उसमे छगी हुई धूल तथा 
पड़ी हुई सिलवटें लिकल जायें। हे पटकना। ४ अस्त्र आदि 
चलाना या फेंकना। ५ सूप में अनाज रखकर उसे इस प्रकार बार 
बार उछालना कि उसमे मिला हुआ कूड़ा-करकट छोंटकर अरूग 
हो जाय। 
सुहा ०--फटकमा-पछोड़मा ८ ( क) सूप या छाज पर रखा हुआ अध्न 
हिलाकर साफ करना। (ख) अच्छी तरह देख-भालकर पता छगाना 
कि कही कोई त्रृष्टि या दोष तो नहीं है। 
६ रूई आदि फटके या धुनकी से धुनना। 
अ० १ किसी का इस प्रकार कही जा या पहुँचकर उपस्थित होना कि 
लोग उसकी उपस्थिति का अनुभव करने लगे। 
बिशेष--इस अथं में इसका प्रयोग अधिकतर नहिंक रूप मे होता है। 
जैसे--वहाँ कोई फटक नहीं सकता (या फटकने नही पाता )। पर कुछ 
उर्दू कवियों ने इसका प्रयोग सहिक रूप में भी किया है। जैसे---अक्सर 
ओऔकात आ फटकते है। 
२ अलग या दूर होना। न रह जाना। ३ विवशता की दशा में हाथ- 
पैर पटकना। फ़टफटाना। ४ कुछ करने के लिए हाथ-पैर हिलाना। 
प्रयत्तवशील होना। 
पु० गुछेल का फीता जिसमे गुल्ला रखकर फेकते है। 

फटकनी--स्त्री० [हि फटकना] १ फटकने की क्रिया या भाव। 
२ अनाज फटकने का सूप। 

फटकरना--अ० [हि फटकारना का अ०] फटकारा जाना । 

स०-फटकना। 

फटकरी--स्त्री ०- फिटकरी | 

फटकबाना--स ० [हि० फटकना का प्रे०] फटकने में प्रवत्त करना। 
फटकने का काम किसी से कराना | 

फटका--पृ० [अनृ०] १ फटफटाने अर्थात्‌ विवश होकर हाथ-पैर 
पटकने की क्रिया या भाव। २ धुनिये की धनकी जिससे वह रूई 
आदि धुनता है। 
क्रि० प्र०--खाना। 
३ फले हुए पेडो मे बँधी हुई वह लकडी जिसके साथ बेंधी हुई रस्सी 
हिछाने से उससे फट-फट झाब्द होता है। (इससे फू खानेवाली 
चिड़ियाँ वहाँ से उद जाती या पास नहीं आती।) ४ काव्य के रस 
आदि गणों से हीन ऐसी कविता जिसमें बहुत सी साधारण तुकबन्दी 
के सिवाय कुछ भी न हो। 
क्रि० प्र«--जोडना। 
पुं० [हिं० फटकन] एक प्रकार की बलुई भूमि जिसमे पत्थर के टुकड़े 
अधिक होते हैं। इसी कारण यह उपजाऊ नही होती। 





कटकाना 
पु०+फाटक | 

फटकाना--स ० [हिं० फटकता ] १ किसी को कुछ फटकने में प्रवृत्त 
करना। फटकवाना। २. अछग करना। ३ फेंकना। 

फटकार--स्त्री० [हि० फटकारनता] ६ फटकारने की किया या भाव। 
२ ऐसी कठोर बात जिससे किसी की भत्संना की जाय। फटकार 
कर कही हुई बात। झिडकी। दुतृकार। 
क्रि० प्र०>-पडना |--बेताना ।--सुनना ।---सुनाना । 
३ शाप। (क्व०) ४ बहू कोडा या चाबुक जो घोडो की सधाने- 
सिखाने के समय जोर की आवाज करने के लिए चलाते या 
फटकारते है। 

फटक्रारना---स० [अनु०] १ कोई चीज इस प्रकार वेगपूर्वक और 
झटके से हिलाना कि उसमे से फट शब्द हो। जैसे--कोडा या चाबुक 
फटकारना। २ एक में मिली हुई बहुत सी चीजे इस प्रकार हिलाना 
या झटका मारना जिसमे वे छितरा जायें। जैसे--जटा या दाढी फंट- 
कारना। ३ इस प्रकार झटके से हिलाना कि कोई चीज़ दूर जा पडे | 
झटकारना। ४ शस्त्र आदि का प्रहार करने के लिए इधर-उधर 
हिलाना। जैसे---गदा फटकारना। ५ कपड़े को पत्थर आदि पर 
पटक कर धोना । ६ क्रुद्ध होकर किसी से ऐसी कडी बातें कहना जिससे 
बहू चुप हो जाय या लज्जित होकर दूर हट जाय। खरी और कडी बाते 
कहकर चुप कराना। जैसे---आप जब तक उन्हें फटकारेगे नही, तब 
तक वे नहीं मानेंगे। 
सयो० क्रि०--दैना। 
७ बहुत शान से या ऐंठ दिखाते हुए घन अजित या प्राप्त करना । जैसे-- 
दस-पाँच रुपए रोज तो बह बात की बात में फटकार लेता है। 
सयो०क्रि०--लेना । 

फटकिया--पु ० [देश०] मीठा नामक विप का एक भेद जो गोबरिया 
से कम विषला होता है। 

फटकी---स्त्री० [हिं० फंटक] १ वह झाबा जिसमे बहेलिया पकड़ी 
हुई चिडियाँ रखते है। २ दे० फटका'। 

फटकेबाज--पु० [हिं० फटका | फा० बाज्ञ]) [भाव० फटकेबाजी] 
बह जो बहुत ही निम्न कोटि और बाजारू कविताएँ करता हो। 

फटन--स्त्री० [ह० फटना |] १ फटने की क्रिया या भाव। फटने 
के कारण किसी चीज में पड़नेवाली दरार या बननेवाला रेखाकार 
चिह्न्‌। ३ भूगोल में, चट्टानों आदि पर दबाव पडने के कारण होने- 
वाली दरार। (क्ल्वीवेज् ) 

फटना---अ० [हिं० फाड़ना का अ० रूप) १ आधात छूगने के कारण 
या यो ही किसी चीज़ का बीच में से इस प्रकार खडित होना या उसमे 
दरार पड जाना कि अन्दर की चीजें बाहर निकल पड़े या बाहर से 
दिखाई द॑ने छगे। जैसे---जमीन या दीवार फटना। 
सुहा ०--फट पड़ता->अचानक बहुत अधिक मात्रा में आ पहुँचना। 
सहसा आ पड़ना। जैसे--(क) दौलत तो उनके घर मानों फट पड़ी 
है। (ख) आफत तो उनके सिर मानों फट पडी है। फटा पढ़ना रू 
इतनी अधिकता होना कि अपने आधार या आधान में समा न सकें। 
जसे---उसका रूप तो मानो फटा पड़ता था। 
२. किशी पदार्थ का बीच से कटकर अछग या दो टुकड़े हो जाता। 


फठिका 


जैसे---कपडा फटना। ३ बीच या सीध में से निकछकर किसी ओर 
असगत रूप से बढ़ना या अरूग होकर दूर निकल जाना। 
सुहा ०--फट जाना या पड़ना--बीच या सीध में से अचानक निकलूकर 
इधर या उधर हो जाता। जैसे--यह घोड़ा चलते चरूते रास्ते मे फट 
पडता है , अर्थात्‌ अचानक सीधा रास्ता छोडकर दाहिनी या बाई 
ओर बढ जाता है। 
४. किसी गाढे द्रव पदार्थ मे ऐसा विकार होना जिससे उसका 
पानी अलग और सार भाग अलूग हो जाय। जैसे--- खून फटना, 
दूध फटना। ५ रोग, विकार आदि के कारण शरीर के किसी अग 
में ऐसी पीडा या वेदना होना कि मानों वह अग फट जायगा। 
जैसे---दरद के मारे आंख यथा सिर फटना, बहुत अधिक थकाबट के 
कारण पेर फटता, हो-हल्ले से कान फटना। ६ छाक्षणिक रूप मे, 
मन या हृदय पर ऐसा आधात लछगना कि उसकी पहलेवाली साधारण 
अवस्था न रह जाय। जैसे--किसी के दुष्ग्रबह्दार से चित्त (मनया 
हृदय ) फटना, शोक से छाती फटना! ७ किसी चीज या बात का 
अपनी साधारण या प्रसम अवस्था म॑ न रहकर चिक्रत अवस्था से आना 
या होना। जेंसे--चिल्लाते-चिल्खाते आवाज (या गला) फटना। 
८ किसी पर विपत्ति के रूप मे आकर गिरना! उदा०--सीता 
असगून को कटाई नाक बार, सोई अब कृपा करि राधिका! पै फेर 
फाटी है ।--रत्ता० । 

फट-फट--स्त्री ० [ अनु०] १ फट-फट शब्द। जैसे-- (क) चप्पल या 
जूते की फट-फट। (ख) मोटर की फट-फट। २ व्यर्थ की बकवाद | 
३ कहा-सुनी। तकरार! 

फटफटाना---स ० [अनु ०] फट-फट डाब्द उपन्न करना! 
अ० १. फट-फट दाब्द करते हुए इधर-उधर व्यर्थ घृमणा। मारा-मारा 
फिरना। २ विवश होने पर कुछ चिसन्तित या विकल होना। हे 
व्यर्थ का प्रछाप या बकवाद करना। 

फटहा]--वि० [हिं० फटना] १ फटा हुआ। २ अड-बड और जदइलील 
बातें बकनेवाला। 

फटा--वि० [ हि फटना] १ जो फट गया हो। जैसे--फटा कपडा। 
मुहा ०--किसी के फटे में पंर देना-- दूसरे की विपत्ति अपने सिर लेना। 
२ जो बहुत ही बुरी या हीन अवस्था मे आ गया हो। 
पद--फदे हाल (या हालो) -बहुत ही दुर्देशाग्रस्त रूप भे। जैसे--- 
महीने भर में ही भागा हुआ लडका फटेहाल (या हालो) घर आा 
पहुँचा । 
३ जो बहुत ही विकृत अवस्था में हो। जैमे---फटी आवाज़ | 
पु० किसी चीज के फटने से बना हुआ गइढ़ा या दरार । 
स्त्री०[स० फट+टाप्‌] १ साँप का फन। ९ अभिमान। घमड़। 
३ छल। घोखा। ४ छिद्र। छेद । 

फटाका--प ० [अनु ०] फट की तरह होनेवाला जोर का शब्द । 

फटादोप--पु ० [स० ष० त०] साँप का फैला हुआ फन। 

फटाना--स्त्री० [ हि० फटना] १ फटन। २ वक्ष का खोडर | 

फटिक---पु० [सत० स्फटिक, पा० फटिक] १ स्फटिक। बिल्लौर। २. 
सग-मरमर। 

फ़टिका-ल्‍स्त्री० [स० स्फटिक] १ एक प्रकार की छशराब जो 


फटीचर 





जौ आदि रो खमीर उठाकर बिना चुवाए बनाई जाती है। २. गुछेल 
की डोरी के बीचो-बीच रस्सी से बुनकर बनाया हुआ वह चौकोर हिस्सा 
जिसमे मिट्टी की गोली रखकर चलाई जाती है। उदा०---बीच परे 
भौंर फटिका से सुधरत है।---सेनापति। 
फटीचर--वि० [ हिं० फटा ++चीर ? ] १ (व्यक्ति) जो फढे-पुराने कपडे 
पहनता हो या पहने रहता हो। २ बहुत ही तुच्छ या हेय । 
फटेहाल--क्रि० वि०[हिं०+अ०] बहुत ही दीन या बुरी अवस्था में। 
दुर्दशाप्रस्त रूप में। 
कट्टा--पु० [हिं० फटना | [स्त्री० अल्पा० फट्टी] १ रूकडी आदि को 
चीरकर निकाला हुआ छोटा तख्ता। २ बाँस आदि को चीरकर 
निकाला हुआ पतला खड या छडष। 
पु०[स० पट] टाट। 
मुहा०--फट्टा उल्टसानच्टाठ उलटना। दिवाल्य निकालना। 
फट्टी--स्त्री ० [ हि? फट्टा ] १ छोटा तख्ता। २ बाँस की चिरी हुई पतली 
छडी। ३ बच्चों के लिखने की पटिया। पट्टी। (पश्चिम ) 
फइ--पु ० [स० पण] १ बहू कपडा जो छोटे दुकानदार जमीन पर बिक्री 
की चीज़ें सजाकर रखने के लिए बिछाते है। < कोडी, दुकान आदि 
का वह भाग जहाँ बैठकर चीजें खरीदी और बेची जाती है। 
पद--फड पर “मुकाबले भे। सामने । उदा ०--भगे बलीमुख महाबली 
लखि फिरे त फट (फड ) पर हे रे ।---रघुराज । 
३ बिछावन। बिछौना। उदा०-सूल से फूलन के फर (फड) 
पैतिय फुल-छरी सी परी मुरझ्ानी। ४ जूएखाने मे, वह 
स्थान जहाँ जुआरी बैठकर जूआ खेलते है। ५ दल। 
समूह। 
किए प्र०-बधिना । 
पु० [स० पटल पा फल] १ गाड़ी का हरसा। २ वह गाडी जिस 
पर तोप रखकर ले चलते हैं। चरख। 
$ पु०>फल। 
फड़क--स्त्री ० [ हिं० फड़कना ] फड़कने की क्रिया था भाव। फंडकन। 
फड़कन---स्त्री० [हिं० फडकना |] १ फडकने की क्रिया या भाव। 
फड़क। फंड़फडाहट। २ घडकन। ३ उत्सुकता। 
वि० १ भडकनेवाला। जैसे--फडकन बैल। २ चचल। ३ तेज । 
फड़कना---अ० [अनु०] १ इस प्रकार बार बार नीचे-ऊ१र या इधर- 
उधर हिलना कि फड़-फड दाब्द हो। २. दरीर के किसी अग मे स्फु्रण 
होना । अग का वायु-विकार आदि के कारण रह-रहकर थोडा उभरना 
और दबना। जैसे---आँख या कॉधा फडकना। 
भुहा ०-- (किसी की) बोटी-बोटी फड़कना-- (किसी का) बहुत 
अधिक चल होना। 
३. कोई बहुत बढ़िया या विलक्षण चीज देखकर या बात सुनकर मन 
में उकत प्रकार का स्फुरण होता जो उस चीज या बात के विशेष 
प्रशसक होने का सूचक होता है। 
सयो० क्रि०--उठना |--जाना। 
४. पक्षियों के पर हिलना। फड़फड़ाना। 
 अ०फटकना | 
फड़फाना--स० [हिं० फड़कना का प्रे०] १ किसी को फड़कने में 


फर्णि-चऋर 

प्रवृूत करतना। २ उत्तेजित करना। भड़काना। ३. विचलित 
करना। ४ हिलाना-छुलाना। 

फड़का-पेलन--पु० [देश०] एक प्रकार का बैल जिसका एक सीग सीधा 
ऊपर को उठा और दूसरा नीचे को झुका होता है। 

फड़तवोस--पु० [फा० फर्दनवीस] मराठों के राजत्वकाल का एक 
राजपद । 
विशेष--मूलत यह पद राजसभा के साधारण लेखका को दिया जाता 
था। पर बाद में यह दीवानी या माल विभाग के ऐसे कर्मचारियों को 
भी दिया जाने छगा था जो बढ-बडे इनाम या जागीरे देने की व्यवस्था 
करते थे। 

फड़फड़ाना--अ० [अनु ०] १. फइ-फड छब्द होना। २ पक्षियों 
आदि का पकडे जाने पर बधन से निकल भागने के लिए जोरों से पर 
मारते हुए फड-फड शब्द करता। ३ छाक्षणिक अर्थ मे घोर कष्ट, 
विपत्ति, सकट आदि से अत्यधिक सतप्त होना और उससे छुटकारा 
पाने के लिए प्रयत्त करना। ४ विशेष उत्सुकता के कारण चचकछ 
होना । 
स० १ कोई चीज बार-बार हिलाकर फड-फड दब्द उत्पन्न करता। 
जैगे--पर फडफडाना। २ दे० 'फटफटाना'। 

फड़बाज--प्‌ ० [हि० फड+फा० बाज़ (प्रत्य०) ] [भाव० फडबाजी ] 
वह जो अपने यहाँ जूआ खेलने के लिए बुछझाता हो। अपने यहाँ छोगो को 
जूआ खे लानेवाला व्यक्ति । 

फड़िया--पु० [हि० फंड दुकान-+इया (प्रत्य०)]) १ वह बनिया 
जो फुटकर अन्न बेचता हो । २ वह जो अपने यहाँ जूए का फड रखकर 
लोगो को जुआ खेलाता हो। फडबाज। 

फड़ी--स्त्री ० [हि० फड ] ईंटो, पत्थरों आदि का परिमाण स्थिर करने 
के लिए लगाया जानेवाला वह ढेर जो तीस गज लम्बा, एक गज चौड़ा 
और एक गज ऊँचा हो। 

फडइुआं --पु० [स्व्री० फडही] >फावडा। 

फड़ई, फड़ही-- रत्री० १ फरुही। २ छोटा फावडा। 

फड़ोलना| --स० [स० स्फ्रण] किसी चीज को उलटना-पलटना। 
इधर-उधर या ऊपर-तीचे करना। 

फण--पु० [स०९/फण्‌ (विस्तृत होना )+अच्‌ ] १ साँप के सिर का वह 
रूप जब वह अपनी गर्दन के दोनों ओर की नलियों में बाषु भरकर 
उसे फुलाकर छत्राकार बना लेता है। फन। २ रस्सी का गाँठदार 
फदा। मुद्धी। ३ नावे का ऊपरी अगला भाग। 

फणकर--पु ० [स० ब० स० ] >फणपधर। 

फणघर--पृ० [स० ष० त०] साँप। 

फणा--स्त्री० [स० फण+ठाप्‌ ]->फण | 

फरणाकृति---वि० [से ० फणा-आक्ृति, ब० स० ] साँप के फन के आकार का । 
गोलाकार छितराया या फंला हुआ। 

फरणि-कन्या--स्त्री ० [सं० ष० त०] नागकन्या। 

फर्णि-केसर--पु ० [ब० स०] नागकेसर। 

फर्णि-चक्र--प्‌ ० [स० मध्य० स०] फलित ज्योतिष में नाडीचकर जो 
सर्पाकार होता है और जिससे विवाह मे वर-कन्या का नाड़ी मिलान 
किया जाता है। नाड्रीनक्षत्र । (दे० ) 





फणिणिद्दा 
फरण्णिजिद्टा, फणिलिद्दिका--स्त्री० [7० ष० त०] १ महाशताबरी। 
बडी सलावर। २ कघी नाम का पौधा। 
फणित--भ ० क़० [स०९/फण्‌ | कक्‍त| १ गया हुआ। गत। २ तररूू 
किया हुआ। 
फणि-तत्पग--प्‌० [स० फणि-तल्प, उपमि० स०, “गम ड] विष्णु। 
फर्णि-नायक--प ०» [से प० त०] वासुकि । 
फणि-पत्ति--पु ० [स० प० त०] १ वासूकि। २ प्रतजलि। 
फरणि-प्रिय--प्‌ ० [स० धर त० ] वायू। हवा। 
फणि-फेंन--पू० [स० घ० त०] अफीम । 
कणि-भाष्य--प्‌ ० [स० मध्य स० ] पाणिनी के सूत्रा पर लिखा हुआ 
प्रतजलि कृत मटाभाप्य नामक ज्याकरण ग्रथ। 
फणि-भुजू--प० [सर फणिन्‌/मज (खाना) +विंवप्‌] वह जो साँपो 
का भक्षण करता हो। जैसे--गरूड, मार आदि। 
फणि-मुक्ता--स्त्री ० [स० ष० त० | साँप की मणि। 
फरणि-मुख--म्‌० [स० ब०स ०6] साप के मुख के आकार का एक तरह का 
पुरानी चाल का औजार जिससे चोर गकानो मे सेश्र लगाते थे। 
फणि-लछता---स्त्री ० [ उपमि० स० | नागवलल्‍लीं। पान की लता। 
फणि-बल्ली--रत्री ० -फणिलता । 
फर्णीध्र--पु० [स० फणिन 5द्र, प० त०] १ छेपनाग। २ बासुक्ति। 
३ फनबाला सा१। 
फणी (णिन्‌ )--प ० [सर फण | इनि] १ सांप। २ केतुग्रह। ३ 
सीसा। ४ मरहुआ नामफ पौधा। ५ सपिणी नामक ओषधि | 
कणीश--प० [स० फणिन्‌-ईदा पघ७० त० |] १ दोषनाग। २ बासुकि। 
३ पतजलि। 
फणीववर---प ० [मं० फणिन-ईश्वर, प० त०] >फणीण | 
फ्ीइवर-सलक--प० [सू० संध्य० स०] शरनि की नक्षत्र-स्थिति के 
आधार पर जब, प्लक्ष आदि सात द्वीपो का शभाशभ फल जानने का 
एक चक्र। (ज्यो०) 
फतबा--म ० [अ० फल्वा | सर्म गेझ विशेषत किसी मुसछमान धर्म-मगुर 
द्वारा धर्म-मवध्री किसी विवादास्पद बात के सबंध में दिया हुआ शास्त्रीय 
लिखित जादेश। व्यवस्था। 
फतह--स्त्री० [अ० फछ&] १ यद्ध में हानेबाली विजय | जीत। २ 
किसी काम में हीनेवाली महत्त्वपूर्ण सफलता। कामयाबी। 
फतह-पेंच--प० [० फक् ' हि० पेच] १ पगड़ी बॉधने का एक 
विशिष्ट ढंग गा प्रतार। २ स्थ्रियों वे बाछ गूंधथने और चोटी बाँवने 
फा एक विशिष्ट ढग या प्रदार। ३ हुक्‍्के का एक प्रकार का नैचा । 
फतहमद--वि० [ज० ।फा०] [भाव० फतहमदी] १ विजयी। 
२ गफल। 
फतहयाब--वि० [अ० ; फा०] [भाव० फतहयाबी ] >>फतहमद । 
फतिगा--प्‌ृ० [स० पतंग] [रत्री> फतिंगी] £ पौवोवाला कोई छोटा 
कीडा। २ पाँवावारा वढ़ छाटा कीड। जो आग की लपट या दीए 
की लो के चारो आर घूमता रहना है और अत में जल मरता है । 
फतीर--म ० [अ> फतीर ] अपातियाँ आदि पकाने के लिए गूंथा तथा 
सेंबारा हुआ ताजा आटा। ('खमीर इसी का विपर्थाय है। ) 
फतोल--पु० [अ० फतील | १ दीए की बत्ती। २ वह बत्ती जो भूत- 


जज ऑजनज++>+ “४>«> 


६ 


फनमा 


नल लत + तन 5 न 3-33 नर से: चल रेकरपेसन तरल >न्‍ने कलम लनन्‍म का, 


प्रेत आदि की बाधा दूर करने के लिए जलाई तथा प्रेत-बाघा से ग्रस्त 
व्यक्ति को दिखलाई जाती है। पलीता। 

फतीलसोज--पु० [फा० फतीलसोज़ | १ भातु की वह चौ-मुली दीअट 
जिसमे नीचे-ऊपर कई दीये जलाये जाते है। २ दीअट। 

फतीला--7१० [अ० फ्तील ] १ दीये की बत्ती। २ बत्ती। ३ 
जरदोजी का काम करनेबालों की लकडी की वह तीली जिस पर 
बेलबूटे और फूलो की डालियाँ बनाने के लिए कारीगर तार को लपेटते 
हैं। दे” पलीता। 
पु०-पतीला (बरतन)। 

फलुही[--स्त्री ० --फर्तृही । 

फत्र--पु० [अ० फुतूर] १ दोष। विकार। २ उत्पात! उपद्रव। 
३ बाधा। विषध्न। ४ शरारत। 

फत्रिया--वि०[ हि? फत्र-। इया (भ्रत्य०) ] १ उपद्रवी। २ शरारती। 

फसूह--स्त्री० [अ० फत्ह के बहुबचन रूप फतृह से| १ विजय। २ 
विजय के उपरात छट-पाठ मे मिला हुआ धन या सम्पति। ३ प्राप्ति। 
लाभ । ४ समृद्धि। ५ ऊपर से होनेवाली आय। 

फलुही--स्त्री ०[ अ० फतूही ] बिता बाहो की एक तरह की कु रती या बडी | 
स्त्री० [अ० फ्तुह] लूट-पाट मे प्राप्त किया हुआ धन । 

फते[---स्त्री ० फतह । 

कफतेह--स्त्री ० +फतह । 

फदकना--अ० [अनु ०] १ फद- द शब्द होता। २ भात, रस आदि 

का पकते समय फद-फद शब्द करके उछलना। खद-बंद करना। 
अ०फदकना। 

फदका[--पु? [हिं० फदकना | गूड का वह पाग जो बहुत अधिक गाढ़ा न 
हुआ हो। 

फदफदाला--अ० [अन्‌ ०] १ फदफद झषब्द होना। २ वक्ष में नई 
कापले या पत्तियाँ निकलना । दे शरीर में बहुत सी फुर्सियाँ या गरमी 
के दाने निकल आना। ४ फदकना। 
स० फद-फद शब्द उत्पन्न करता। 

फदिया[--स्त्री० त्फरिया (एक नरह का लहेंगा) । 

फदुक्‍का[--१.० [हिँ० फूदकना ] टिडडी का छोटा बच्चा । 

फस--पु० [स० फण ] साँप के सिर के आसपास का वह भाग जिसे साँप 
आवेदश अथवा मरती में हवा भरकर फला और फैला लेता हे। 
मुहा०--फन मारना >त्आवेश में आकर विशेष प्रयत्त करना। 
पु० [फा० फन] १ गण। खूबी। २ विद्या। ३ बला। ४ 
दस्तवागरी। ५ चालबाजी। धूर्तता। ६ कीशल। 
पद--हरफन मोला--बहुत ही कुशल व्यक्ति । हर काम मे होशियार। 

फकता--अ० [अनु ०] १ फनफन शब्द करता । जैसे--बैल या साँप 
का फनकना। २ इस प्रकार तेजी से बलना कि हवा से बस्तर फनफन 
करने लगे। 

फनकार[--स्त्री ० [अनु०] १ फन-फन होतेवाला शब्द । २ वह फन- 
फन शब्द जो साँप के फुकने या बैठ आदि के साँस लेने से होता है। 

फनगना---अ० [हि फूनगा ] १, वृक्षों आदि का फुनगियों अर्थात्‌ अकुरो 
से युक्त होना। २ अच्छी यरह उन्नति करना । 

फलगा--पू ० [स० पतग | फर्तिगा। 





पानना र फर्क 


न त++ज-नलनल लत. ३त+०+>०+  ्+ ं++++ घ+ ५४ कर 
नन>+>-+----००+-५५ १० *+ अब नल ५ मनन वजअनानिनागाएण परणाचणणए 


[पु ०७४फुनगा । फरफुदी--स्त्री ० [ हिं० फूबती ] रित्रियों के पेड़, पर धोती, लहँगी आदि मे 
फनना--अ० [हिं० फाँदना] १ फदा बनना या रूगना। २ काम का लगाई जानेवाली गांठ । ह विशेष दे० 'नीवी' हे 
आरध्म होना। ठनना। रत्री० [? ] बरसात के दिना में वनस्पतियों आदि पर जमनेवाल्ी एक 
फनफताना--अ० [अनु०] १ मुँहसे हवा छोड़कर फन फन शब्द उत्पन्न तरह की सर्फंद रंग की काई। भुकडी। 
करना। जैसे--साँप का फनफनाना। २ चचलतापूर्वक इधर-उधर | फफोर[--१० [स०] एक प्रकार का जगली प्याज । 
हिलना । (प०फफीला। 
फनस---प्‌ ० [स० पमस, प्रा० फनस] कटहूल। फफोला--पु० [स० प्रस्फोट ] १ त्वचा के जलने पर पडनेवाला बह छाला 
फता--स्त्री० [अ० फ़ना] १ पूरा विनाश । बरबादी | २ मृत्यु मौत। जिसमे पानी भरा ह्वीता है और जा सर्फेद झिल्ली से युवत होता है। 
३ सूफी मत मे, मकत का परमात्मा में लीन होना । (ब्लिस्टर) २ शारीरिक विकार के कारण हाववाजा उतत प्रकार का 
वि० नप्ट। बरबाद। छाला। 
फमाना--स० [हिं? फौँदना ] १ फदा बनाता। २ काम शुरू करना। क्रि० प्र ०--डालना। --पडना। 


ठानना । मुहा०---दिल के फफोले फोड़ना अपने दिल की जलन या रोप प्रकट 
फर्निग[--प्‌ ० - फंणीद्र (साँप) क्रना। दिल का बुखार निकालना। 
कनिद--पु० नफरणीद्र (सॉप) ३ पानी का बुलबुला। 


फनि[--पु० १ #फणी। २ “फन। 
फनिका---१० >फणिक । 
फनिय--पु ० [हिं० फतिगा] फतिगा। 


| फबकना|[---अ ० ->फफदना । 

| फबतो--स्त्रो० [हिए फबना | रेसी व्यग्यात्मक वथ। हाश्यपूर्ण बात जो 

। किसी व्यक्ति की तात्कालिक स्थिति के अनुसार बहुत ही उपयुक्‍त रूप 
पू [स० फणिक] साँप। | से फबती जवति ठीक बैठती हो। (रंछूरी) 

फरनिधर [--१० [स« फणिधर] साँप । |. क्रि० प्र०--उडाना ।-कसना। 

फनिफति|--प ० >फणिपति । फबन--रंत्री ० [टि० फबना ] १ फजने अथवा फबे हुए होने की अवस्था 

फनियर[--पुृ० [स० फणिधर] १ फनवाला। २ अजगर। या भाव। उदा०--अगोछ की अब तुम फबन देखना ।--बालमुकुद 

फनियाला -पु० द० तूर। गृप्त। २ सुदरता। 


पु ०>फनियर (साप) । फबना--अ० [स० प्रभवन] १ उपयक्त प्रकार से अथव। उपयुवत स्थान 
फनिराज--प्‌ ० €फरणीद्र (साँप) । पर रखे जान पर किसी चीज का शासन तथा सुदर लगना । जै3---लालू 
फसी---प ०+>फर्णी । साडी पर कही गांट का फब्रता। २. बात आदि का ठीक मोके पर 
स्त्री ०-फन (साँप का) ! उपयुक्त और शान लूगना। जैस--नुम्दारे मुंह पर गाली नहीं 
पु०--फनियर। | फबती। ३ व्यवित का बिया कपई आदि पहुन होने परस॒दर 
वि० [फा० फन्नी] १ फन-सबंधी । २ फन या हुनर जाननेवाला। लगना। 
३ चालाक। धू्त। फबाना--स ० [हिं० फबना] १ इस प्रकार किसी चीज को उपयुक्त 
फनूस[--पु०--फानूस। स्थान पर रखना कि वह शोसन या सुदर जान पजन छगे। २ अच्छे 
फश्नी--रत्री० [स० फण] १ छकड़ी का वह टुकड़ा जो छेद आदि बद | वस्त्र आदि पहनाकर किपी को सुदर बनासा। 


करने के लिए किसी चीज म॑ ठोका जाता है। पच्चर। २ वास्तुकला | फ्बि|--रंत्री ०->फबन। 

में, लोहे का वह मोटा पत्तर या कोनिया जो बाहर निकले हुए बोक्ष को | फबीडा--वि० [हि० फबि | ईछा (प्रत्य०)] [सत्री० फबीली] जो 
सेमाछने के लिए उसके नीचे लगाई जाती है। ३ फंघी की तरह का | फब रहा हो। फवता हुजा। 

जुलाहो का एक औजार जो बाँस की तीलियो का बना होता है और | फरंगिस्तान--पु० [फा०] इग्लैड। 


जिससे बुना हुआ बाना दबाकर ठीक किया जाता है। फरगी--वि० [फा०] अग्रेजा का। 
फफका।---प्‌ ० 'ूरूफफोला । पु० अग्रेज जाति का व्यवित। फिरगी। 
फफ्फ्स---वि० [अनु ० ] स्थूल कितु बलहीन या शिथिल काया वाला । फरअन--पु ० [अ० फिरअन |] १ भिन्न के प्राचीन राजाओं की उपाधि ॥ 
फफकना---अ० [अनु ० ] रक-हक कर और फफ-फफ शब्द करते हुए (फरो, फराओ) २ लोक-व्यवह्ार में ऐसा व्यवित जो बहुत ही 
रोता । अत्याचारी, अभिमानी तथा उहूड हो। 
फफका|--प० [अनु ०] फफोला। छाला। फरक--पु० [अ० फर्क] १ अछगाव। पार्थकय। २ ऐसा भेद जो 


फफदना---अ० [? ] अधिक विस्तृत होना। इधर-उधर फैलना | पार्थक्य के कारण हो जथवा पार्थक्य का सूचक हो। ३ दो विभिन्न 
फफसा--पु० [स० फ्प्फूस] फेफडा। वस्‍्तुओ, व्यक्तियों आएि से हॉनेबाली विषमता | ४ हराय-किताब 
वि० १, फूला हुआ और पोला। २ जिसमे रस या स्वाद न हो। आदि में भूल-तुटि आदि के कारण पडनवाला अतर। ५ एक रकम 
फीका। ३ (फल) जिसका स्वाद बिगड़ यया हो। या सख्या को दूसरी रकम या सख्या से से घटाने पर निकलनेवाला 


फरकन 


शेपार | बाकी। ६ दो विदुओ या स्थानों में होनेवाली दूरी या 
फासठा। ७ भेद-भाव। दुराव। 
[क्रि०ए वि० अलग। पृथक्‌। 
[स्त्री०->फइक | 
फरकन--रसत्री ० [दि० फरकना ] फडकने की क्रिया या भाव। फड़क। 
फरकना--अ० [ज० फर्क तअतर] १ अलग या दूर होना। २ 
कृटकर निकल जाना। 
अ०>>फडकना | 
फरका--पु० [स० फलक] १ ऐसा छप्पर जो अलूम से बनाकर बँडेर 
पर चढ़ाया या रखा जाता हैं। २ बॉडर मे एक ओर की छाजन। 
पल्ठा। ३ झापडिया, दरवाजों आदि के आगे छूगाया जानेबाला 
ट्ड्र। 
पु० द० 'फिरका । 
फरकाना]--ग० [टि० फरक--अछलछग | १ अलग या दूर करना। २. 
फरक मा अन्तर निकालना या स्थिर करना। 
पसण फाकाना। 
फरशिलला--प० [हिं० फार | कील] गाडी आदि में लूगाया जानेवाला 
बह लूटा जिसके सहारे ऊपर का ढाँचा खड़ा रहता है। 
फरकी[--२भ्री० [ठि० फरक ] १ चिडीमारों की छासे से युबत वह रूकडी 
जिस पर चिटडियों के वैंठन पर उनके पै २, पख आदि चिपक जाते है। 
२ दीवार की चुनाई में खरे बल में रूगाया जानेवाला पत्थर । 
फरकीहा --वि० [हिं० फरकना | आंहाँ (प्रत्य०) | १. फडकनेवाला । 
२ फइकता हुआ। 
फरवक | >-पु ० >+फरक । 
फरगान--पु० [तु० फर्गाना] तुर्की के फरगाना नामक प्रदेश का 
निवासी । 
फरप़ाना--पु ० तुर्की के अन्तर्गत एक प्रदेश, जहाँ बाबर का पैतृक राज्य था। | 
फरजला--वि० [स० रस्पृण्य, प्रा० फरस्स |] [भाव० फरचाई खाद्य | 
पदार्व ) जो किसी ने जुठा न किया ही। २ शुद्ध, साफ या स्वच्छे। 
फरचाई'--स्त्री ० [6िं०फरचा | ई (प्रत्य०) ] फरचा' होने की अवस्था 
या भाव । शुद्धता। 
फरचाना--स ० [हिं० फरचा ] १ बर्तन आदि धोकर साफ करना। | 
फरवा करना। २ पत्रित्र या शुद्ध करना। | 
फरजंद--पु० [फा० फर्जद ] पुत्र। बेटा। | 
फरमदी--रती० [फा० फर्जदी ] पृत्र-भाव। बाप-बेटे का नाता। | 
मुहा ०-- (किसी को) फरजंदी में लेनाउ+ (क) पुत्र या बेटा बनाना। | 
(ल) दामाद अवीत्‌ पुत्र-तुत्य बनाना। 
फर्राजव | --पु०-फरजद (बेटा) । 
फ्रज--पु०--फर्ज (कर्तव्य )। 
स्नी ० >फर्ज (भग) । 
फरजाना--ति ० [फा० फरजान ] [भाव० फरजानगी ] ब्द्धिमान्‌। 
फरजाम--पु० [फा० फर्जाम]| १ अत। समाप्ति। २ परिणाम। 
फल । 
फरजी--पु ० [फा० फर्जी | ग़तरज का क मोहरा जिसे रानी या वजीर 
भी कहते है। 


फरमा 


जजज--++> न्ज+ 


वि० [फा० फर्जी) १ कल्पना में होतेवाका। कात्पनिक। २ 
जो फर्ज किया या मान लिया गया हो। ३ नकझी। 

फरजोबंब--पु० [फा०] शतरज के खेल में वह स्थिति जिसमे फरजी 
अर्थात्‌ वजीर किसी प्यादे के जोर पर बादशाह को ऐसी शह देता है 
कि विपक्षी की हार हो जाती है। 

फरतूत--वि० [फा० फर्तूत] अति वृद्ध। बहुत बूढा। 

फरव--स्त्री० ([अ० फर्द ] १ वह बही जिसमे हिसाब-किताब लिखा 
होता है। २ सूची। तालिका। 
पु० [जअ० फर्द] १ एक या अकेला आदमी। एक व्यक्ति। २ एक 
ही तरह की और एक साथ बननेवाली अथवा एक साथ काम में आने- 
वाली चीजो के डोडहे मे से हर एक | जैसे--एक फरद घोती, एक फरद 
चादर आदि। ३. दुलाई, रजाई आदि का वह ऊपरी पल्लछा जिसके 
नीच अस्तर लगाया जाता है। ४ दो चरणों या पदा की कविता । 
विशेष--यह्‌ शब्द उक्त अर्थों मे लोक मे प्राय स्त्री रूप मे प्रयुक्त होता 
है। 
५. वह पश्चु या पक्षी जो जोड़े के साथ नही, बल्कि अकेला और अलग 
रहता हो । ६ एक प्रकार का पक्षी जो बरफीले पहादा पर होता है, 
और जिसके विषय मे वैसी ही बातें प्रसिद्ध है, जैसी चकवा और चकई 
के विपय में है। ७ एक प्रकार का लक्‍का कबतर जिसके गिर पर टीका 
होता है। 
वि० १ अकेला। २ ब्ेजोडह। 

फरना[--अ०--फलना । 

फरफव--पु० [हि० फर |- अनु० फद (जाल) ] १ दांक-पैच। छल- 
कपट। २ केवल दूसरा को दिखाने और धोखे में डालने के लिए किया 
जानेवाला झूठा आचरण। ३ नखरा। चोचछा। 
क्रि० प्र०--खेलना ।--दिखाना ।+-रचना । 

फरफवी--वि० [हि० फरफद] १ फरफद करनेबाला। छल-कपट 
या दाँव-पेच करनेवाछा। घूतं। चालबाज। फरेबी। २ नखर- 
बाज । नखरीणशा। 

फरफर--पु० [अनु०] किसी पदार्थ के उड़ने, फडकने था टहिलने रो 
उत्पन्न होनवाला फरफर शब्द । 
क्रि० वि० फरफर झब्द करते हुए। 

फरफराना--स० [अनु० ] फरफर, शब्द उत्पन्न करना। 
अ० फरफर शब्द करते हुए हिलना। जैरे--झडा फरफराना | 
|अ०, स० + फडफड़ाता। 

फरफुदा--१० +फर्तिगा । 

फरमावरदार--वि० [फा० 
आज्ञाकारी। 

फरमा--पु० [अ० फ्रेम] १ वह ढाँचा जिसमे रखकर उसी के अनुरूप 
कोई दूसरी चीज ढाली या बनाई जाती हो। डौछ। साँचा। २. 
लकडी आदि का बना हुआ वह ढांचा या साँचा जिसपर रखकर चमार 
जूता बनाते है। कालबूत। 
पु० [अ० फार्म | १ कागज का पूरा तखता या ताव जो एक बार 
मे प्रेस मे जाता है। जुज। २ पुस्तकों आदि का उतना अंश जितना 
उक्त प्रकार के कागज पर एक साथ छपता है। जैसे--इस पुस्तक के 


फर्माबरदार] [भाव० फरमाबरदारी ] 


फरमाइश 





१० फरमे छप गये हैं, अभी पाँच फरमे और बाकी हैं। ३ छापेखाने 
मे, ढाँचे भे कसी हुई छपनेवाली सामग्री । 

फरमाइश---स्त्री ० [फा० फ़र्माइश] १ वहू चीज जिसके लिए किसी 
ने अनुरोध किया हो। २ किसी काम या बात के लिए दी जानेवाली 
आज्ञा विशेषत प्रेमपुर्वेंक दिया हुआ आदेश। 

फरमाइशी--वि० [फा०] १ जो फरमाइश करके बनवाया यथा मंगाया 
गया हो। जैसे--फरमाइशी जूता । २ फरमाइश के रूप मे होनेवाला । 

फ्रमान--यु ० [फा० फर्मान] १. कोई आधिकारिक विशेषत राजकीय 
आदेश। २. वह पत्र जिसमे उक्त आदेश लिखा हो। 

फरमाना--स ० [फा० फर्मान] कोई बात कहना। (बडो के सबंध से 
सम्मान-सूचक रूप में प्रयुकत) जैसे--आपका फरमाना बिलकुल 
दुरुस्त है । 

फरयाव[---स्त्री० -फरियाद। 

फरयाशी[---रत्री ० [ हि० फाल ] हल मे की वहू लकडी जिसमे फाल (फल ) 
लगा रहता है। खापी। 

फरराना(--अ०, स०--फहेराना | 

फरलाग--पु० [ अ० फरलाग |] भूमि की दूरी नापने का एक मान जो २२० 
ग़ज के बराबर होता है। 

फरलो--स्त्री० (अ० फरलाग ] सरकारी नौकरों को आबे वेतन पर 
मिलनेवाली लबी छुट्टी । 

फरवरी--पु० [अ० फ्रेम्रुअरी | अँगरेजी सन्‌ का दूसरा महीना जो अद्ठा- 
इस दिन। का, परन्तु ऊौद के वर्ष, उन्‍्तीस दिनों का होता है। 

फरवार[--१ु० --खलिहान | 

फरवारी | --रत्री० [हिं० फरवार+-ई (प्रत्य०)] उपजे हुए अन्न या 
फसल का वह भाग जो किसान खलिहान मे से राशि उठाने के समय 
ब्राह्मण, बढई, नाई आवबि को देते है। 

फरबवी--रतरी ० [स० स्फुरण | १. एक प्रकार का भूना हुआ चावल जो भुनने 
पर अन्दर से पोला हा जाता है। मुरमुरा। २ द० 'लाई'। फरुही । 

फरश---पु० [अ० फर्श ] १ बेंढने के लिए बिछाने का कपड़ा। बिछा- 
बन। २ कमर आदि की पक्‍की और समतल भूमि जिस पर लोग बैठते 
है। ३ समतल प्रसार या फेछाव। जैसे--फूछो का फरश। 

फरदाबद--पु० [फा०| वह ऊंचा और समतलरू स्थान जहाँ गच का 
फरण बना ही। 

फरशी--वि० [अ०» फ़र्शी] १ फरदश-सबधी। फरश का । 
पव--फरकशी सलाम - बादशाहोी आदि को किया जानेबाला वहु सलाम 
जिसमे आदमी को इस प्रकार झुकना पड़ता था कि उसका सिर लगभग 
फरणश तक पहुँच जाता था। 
२. जो फर्श पर रखा जाता या काम में छाया जाता हो। जैसे-- 
फरश्ीी जुता, फरशी झाड़, फरशी हुब्का आदि। 
प्रब--फरक्षी गोला _-आतिशबाजी मे वह गोला जो फरश पर पटकने 
पर आवाज देता है। 
स्त्री० १ कुछ खुले मुँह का बातु का वह आधान या पात्र जिस पर नैचा 
और सटक लगाकर तमाक्‌ पीते है। २ उक्त पात्र और नैचे, सटक 
भादि से युक्त हुकका | गुड़गुडी। ३. पुरानी चाल की बदूक का वह 
अंग जिसमे गज रखा जाता था। 

४-२ 





फराक॑ 





फरसग--पु० [फा० फर्संग] ४००० गज या सवा दो मील की दूरी का 
एक नाप । 

फरस---पु० १ दे० 'फरसा'। २ दे० 'फरश'। 

फरसा--पु० [स० परशु] १ पैनी और चौडी घार की एक प्रकार 
की कुल्हाडी, जो प्राचीन काल मे युद्ध के काम आती थी। २. फावबडा। 

फरसी-- वि ०, स्त्री० ->फरशी। 

फरहूंग--स्त्री० [फा० फरहग] शब्द-कोश। 

फरहूटा। --पु० [हि फाल| [स्त्री० अल्पा० फरहटी ] बाँस, छकडी 
आदि की पतली, लबी पढ्टी । 

फरहत--स्त्री० [अ० फहुत] 
प्रफुल्लता 

फरहद---पु० [स० पारिभद्व , पा० परिमद ; प्रा० पारिहह | एक प्रकार का 
वृक्ष जो बगाल में समुद्र के किनारे बहुत होता है। वहाँ के छोग इसे 
पालितेमदार कहते हैं। 

फरहर|--वि० [स० स्फार;प्रा० फार-अलूग-अलग, अथवा फरहरा] 
१ जौ एक में लिपटा या मिला हुआ न हो, अलग-अलग हो। जैसे-- 
फरहर भात। २ साफ। स्पष्ट। दे निर्मल। शुद्ध। ४ (मन) 
जिसमे उदासीनता, खेद आदि न हो। प्रफुह्लित। प्रसन्न। ५: 
चालाक। होशियार। 

फरहरना--अ०, स०, [अनु० फरफर] (१.>फरफराना। २. #फह- 
राना। 

फरहरा--पु० [ हि? फहराना] १ कपड़े आदि का वह तलिकीना या 
चौकोना टुकड़ा जिसे छड के सिरे पर लगाकर झडी बनाते है और जो 
हवा के झांके से उड़ता रहता है। २ झड़ा। पताका। 

वि०->फरहर। (देखें) 

फरहराना---अ०, स०>फरहरना | 

फरहरी[ --स्त्री० [हिं० फल +हरा (प्रत्य०)] वृक्षों के फल या उन्हीं 
के वर्ग की और चीजे जो खाई जाती हो। फलहरी। 
[वि०, स्त्री० फलाहारी। उदा०--सुख करिआर फरहरी खाना। 
--जायसी । 

फरहा। --पु० [ हि० फल | धुनियों की कमान का वह चौषठा भाग जिस 
पर से होकर ताँत दीनो सिरो तक जाती है। 

फरहाव--पु० [फा० फहाद ] इतिहास-प्रसिद्ध एक प्रेमी जिसने अपनी 
प्रेमिका शीरी के आदेश पर पहाड़ काटकर तहर बनाई थी। कहते 
है कि किसी कुटनी के धोखा देने पर वह अपना सिर फोडकर मर गया। 

फरही| --स्त्री० [हि० फरहा ] छकडी का वह चौडा टुकड़ा जिस पर 
ठठेर बरतन रखकर रेती से रेतते हैं। 

फरण --पु० [देश०] एक प्रकार का व्यजन जो चावल के आठे को 
गरम पानी मे गूँथकर और पतली बत्तियाँ बनाकर पानी की भाष में 
उबालने से बनता है। 

फराका ---पु० [फा० फराख] १ मैदान। २. आयताकार रथान। 
वि० लबा-चौडा। विस्तृत। 
पु० [अ० फ्राक] छोटी लडकियों के पहिनने का अँगरेजी ढंग का एक 
तरह का लबा पहनावा। 

फराक्त--वि०-“फराख | 


१ आनद। प्रसन्नता। २. मन की 


फरास 


स्त्री० -फरागत। 

फराख--वि० [फा० फराख ] लम्बा-चौडा। विस्तत। 

फराखदिल--वि० [फा० फराख दिल] [भाव० 
उदार ह्ृदयवाला। 

फराखो--स्त्री० [फा० फराखी] १ फराख अर्थात्‌ विस्तृत होने की 
अवर्था या भाव। विस्तार। २ धन-घान्य आदि की उचित सप- 
पता। ३ वह तस्मा या चौड़ा फीता जो घोड़े की पीठ पर बाँधकर 
कसा जाता हैं। तग। 

फरागत--रत्री ० [अ० फरागत] १ छुटकारा। मुक्ति। 
क्रि० प्र ०->पाना ।--मिलना । 
२ वार्य आदि की समाप्ति पर होनेवाली निश्चितता । ३ मरू-त्याग, 
शौच आदि की क्रिया। जैसे--आप भी फरागत हो आदवदवें। 
क्रि० प्र ०--जाना | 
३ दौलतमदी। धन-सपन्नता। ४ सुख। 
वि० जिस किसी काम, बंधन आदि से छुटकारा मिल गया हो। 

फराज--वि० [फा० फराज़] ऊँचा। 
पद--न शेब व फराज -किसी बात का ऊँच-नीच या भला-बुरा (पक्ष )। 
पृ० ऊँचाई। 

फरामुश--वि ० “+फरामोद । 

फरामोश--वि० [फा० फरामोश] [भाव० फरामोशी) १ भूलने- 
बाला। २ (व्यक्षित) जो कसी काम या बात का वादा करके भी 
उसे भूछ जाय जौर फडत वादे के अनुसार काम न करे। 
घृ० छटका का एव खेल जिसमे वे आपस में एक-दूसरे को कोई चीज 
देते ह, और यदि पानेवा डा तुरन्त 'फरामोश' कह देता है तो उसकी 
जीत समझी जाती है नहीं तो बह हार जाता है। 
क्रि० प्र०--बदना। 

फरामीशी--स्त्री० [फा० फरामोशी ] भूलने की अवस्था या भाव। 
विस्मति। 

फरार-- 4० [अ० फरार] (अपराधी) जो शासन की हिरासत में 
आये थे ययने + डिए सही भाग अथवा छिप गया हां। पलछायित। 
पु० द० फिाब' (विस्तार)। 

फरारी--सत्री० [फा० फरार] फरार होने की अवस्था, क्रिया या भाव। 
(बि० फरार! 

फराछना---स० --फैणना । 

फराश--प० [?] झाऊ की जाति का एक प्रकार का बड़ा वृक्ष जो 
पंजाब, सिंध और फारस में अधिकता से द्वोता है। 
पृ० ५ फरशि। २ >पलाश। 

फरास--पु०- फर्राश। 

फरासीस--प० [अ०» फ्राम] १. फ्रास देश। २ उक्त देश का निवासी। 
स्त्री पुरानी चाल की एक प्रकार की लाल छीट। 

फरासीसी--वि० [हि० फरासीस] फ्रास देद का। 
स्त्री० फ्राग देश की भाषा! 
प०७ फ्रास देश का निवासी। 

फराहम--वि० [फा०] [ भाव० फराहमी] इकट्ठा किया हुआ। 

फरिकां --पु० नफरका । 


फराखदिली ] 


१० 


लनी--++«+न...ल..................००.-००-००_.ल०.---०५०--+-++-न+-----+-+---++++ +++++:5++++४:४+++++++++++++भपघ55 


फरिया--स्त्री० [हि० फेरना]१ वह लहंगा जो सामने की ओर सिला 
नही रहता। २ वह ओइडनी जो स्त्रियाँ लहँगा पहनने पर ऊपर से 
ओढती है। 
पृ० [हि० फिरना ] रहट के चरखे के चक्र भें लगी हुई वे छकडियाँ 
जिन पर मिट्टी की हँडिया की माला लटकती है। 
पु० [हिं० परील-मिट्टी का कटोरा] मिट्टी की नदि जो चीनी के 
कारखानों मे पाग छोड़कर चीनी बनाने के लिए रखी जाती 
है। होद। 

फरियाब--स्त्री० [फा० फर्याद] १ विपत्ति, सकद आदि में पड़ने पर 
सहायतार्थ की जानेवाली पुकार। २ विशेषत दूसरा द्वारा सताये 
जाने आदि पर प्रमुख अधिकारी या शासक के समक्ष न्याय पान के लिए 
की जानेवाली प्रार्थना। हे न्याय की याचना के लिए न्‍्यायादूय में 
दिया जानेवाला प्रार्थना-पत्र। 

फरियादी--वि० [फा० फर्यादी] १ फरियाद-सबंधी। २. फरियाद 
के रूप में होनेवाला। ३े फरियाद करनबाला। ४ अभियोग 
उपस्थित करनेवाला। अभियोवतता। 

फरियाना--स० [स० फलन या फलीकरण | १ साफ या रच्छ 
करना। २ अनाज फटककर उसकी भूसी आदि अछग करके उसे 
साफ करना। ३ विवाद का इस प्रकार अन्त करना कि दाना पक्षा 
की भूले स्पष्ट हो जायों और दोता का न्याय से सतोय हो जाय। विप- 
टाना। 
[अ० १ साफया रवच्छे हाता। २ अनाज का भूससी आदि से अलग 
होता। ३ विबाद का निर्णय होना। 

फरिक्ता--पु० [फा० फरिश्त ] ह मुसलमानी धमग्रन्वा के अनुसार 
ईइवर का वह दूत जो उसकी आज्ञानसार कान करती है। जैश-- 
मौत का फरिश्ता। २ देवनदून। ३ दवला। ४ वाह लाका१- 
कारी तथा गात्विक वृत्तिवाला व्यक्त । 

फरिएइतानी--स्त्री० फारथी फरिइता का स्व्री७। (परि/शिस और व्यग्य) 

फरो--स्त्रो० [स० फल] १ हल की फाठ। कुणों। २ गाशे का 
हरसा | फड। ३ गतके का वार राक के चमड़े की हाड। 

फरीक-- प्‌ ० [ अ० फरीक | १ दा परस्पर विशात्रो पश्षा या व्यतितियां 
में से हर एक पक्ष या ब्यक्ति। 
पद--फ रीके सानी विरुद्ध पक्ष | मुखालिफ द८। 
२ वादी अथवा प्रतिवादी। ३ शत्र। बरी। 

फरीकेन--पु० [ अ० फरीकीन] पररपर विरायो दोना पश्षा की सामू- 
हिक सज्ञा। उमयपक्ष । 

फरोज्धा--प्‌ ० [अ० फरीज |] खुदा का हुबम जिसका पाछन करना बन्‍्दा 
के लिए कतंव्य होता है। जंस--नमाज़, राजा, एज, आदि। २. 
पुनीत कलंव्य। 

फरीद-बूटी --रत्री ० [ अ० फरीद | हि बूटी | एक प्रबधर की वनस्पति 
जिसकी पत्तियों बरियारे की तरह हांती है। 

फरदआग--पु० [7 ] छकडी का वह बरतन जिसमे भिक्षुक भीख लेते है। 

फरई! --स्त्री० १ >फरवी। २ ““फरुदही। 

फशहरी| --स्त्री ०--फ्रहरी । 

फरहा| --पु ० <+फावडा। 





फर्ही 


फवही!--स्त्री० [हिं० फाबडा] १ छोटा फावड़ा। २ फावड्ड 
के आकार का लकड़ी का बना हुआ एक औजार जिससे खेत मे क्यारी 
बनाने के दिए मिट्टी हटाई जाती है। ३ मथानी। 
(स्त्री० >फरवी (भुते हुए कावल)। 

फरेंव, फरेदा--पु० [स० फलेन्द्र, भ्रा० फरलेंद | जामुन की एक जाति 
जिसके फल बड़े और गदेदार होते है। फलेदा। 

फरे-ता-- वि० [फा० फिरेफ्त ] १ लुभायगा हुआ। आसकत। मुग्ध । 
२ धोखा खाया हुआ। 

फरेब--स.० [फा० फिरेब ] १ प्राय सत्य बात को छिपाने तथा अपने 
को दोप-मृक्‍त सिद्ध करने अथवा दूसरे को धोखा देने तथा अपना 
काम निकालने के लिए कही जानेवाली झूठी या बनावटी बात। 
२ छड-कपट। 

फरेबिया।-- वि >फरेबी ! 

फरेबी--वि० [फ्ा० फिरेब] १ फरेब-सबधी। २ फरेब था छल- 
कपट करनंवारा। धोखेबाज। कपटी। 

फरेरा।--प ० >फरदरा। 

फरेरी--स्त्री ० -फरटहरी (फल) ! 

फरैदा--प्‌ृ० [फा० फरिद | एक प्रकार का तोता । 
पृ०--फेदा। 

फरो[२--वि० [?] £ दबा हुआ। २ जिसका अस्तित्व न रह गया 
हों। ३ जो दूर हो गया हो। 

फरोस्त--स्त्री 2 | फा० फिरोसुत | बेचने या बिकने की क्रिया या भाव। 
विक्रप। बिक्री। जैसे--खरीद-फरोख्त । 
लि० [फा० फिरोख्त ] बिका या बेचा हुआ। 

फरोड्तयी--स्त्री ० [फा० फिरोस्तगी ] फरोख्त करने अर्थात्‌ बेचने का 
काम | विक्रय । 

फरोग--१० [फा० फ्रोग] १ 
४ उत्कप। उन्नति। 

फरोदस्त---१ ० [फा० फरोदस्त ] १ सगीत में एक प्रकार का सकर राग जो 
गौरी, कान्ट दा और पूरबी के मेल से बना होता है। २ १४ मात्राओ 
का एक ताल जिसमे ५ आधात २ खाली होते है। (संगीत ) 

फरोश---वि० [ फा० फरोश ] [ भाव० फरोशी | समस्त पदों के अन्त में , 
बिक्री करने या बे वनेवाला। जैसे---दिलफरोश, मेवाफरोश। 

फरोशी--लत्री? [फा० फरोशी] £१ बेचने की क्रिया या भाव। २ 
वह माल जो बिक चुका है।। ३ बिके हुए माल से प्राप्त हुआ घन । 
बिक्री । 

फर्क--पु ०-5फरक । 

फर्चे--वि० -तफरच | 

फर्चा--वि ० <नफरचा । 

फज्जद--पु ० *फरजद। (वेटा)। 

फर्जे--प्‌ू० [अ० फर्ज] १ मुसलमानी धर्मानुसार वे आवश्यक कर्म 
जिसे न करने से मनृष्य धार्भिक दृष्टि से दोषी और पतित होता है। 
आवश्यक धामिक कृत्य । जैसे--नमाज, रोजा आदि कर्म हर मुसलमान 
के लिए फर्ज हैं। २ आवश्यक और कर्तव्य कर्म । जैसे--मा लिक की 
खिदमत करना नौकर का फर्ज है। 





है; 
म् 


रोशनी। २ रोनक। ख्याति । 


३ से अनिननओ-3..-.व२ऋ.«.न«+-तत-कनननन-+-मथभननन+न-ननननन मनन न-झऊनन-3- 3५-3५: निननननयनमननननीन जिननीननीनननकन*-न०+५०ी+त५+- 3५ मीना मनन लि नना-+- क्‍विनननी लि खण 


क़ि० प्र०--अदा करना। 
४३ तकं-वितक के प्रसग मे, वह तथ्य था बात जो वास्तविक न होने 
पर कुछ समय के लिए यो ही कल्पित कर ली या मान की जाय। अनु- 
मानित बात । जैसे--फर्ज कीजिए कि आप वहाँ चले गये, तो क्‍या 
होगा। 

फर्जो--वि० [फा० फर्जी] १ जो फर्ज कर लिया अर्थात्‌ तके-वितकं 
के लिए मान लिया गया हो। २ कल्पना के आधार पर प्रस्तुत किया 
हुआ। कल्पित। ३ जिसकी कोई वास्तविक या विशिष्ट सला न 
हो। 
पु० [फा० फर्जी) शतरज की फरजी नाम की गोदी। 

फर्द--स्त्री० [फा० फदे] १ कागज, कपडे आदि का वह टुकड़ा जो किसी 
के साथ जुड़ा या लगा न हो। २ वह कागज जिस पर कोई लेखा, 
विवरण या वस्तुओ की सूची लिखी हो। फरद। 
पद--फर्दे-जुर्म >ःकिसी के अपराधों या अभियागों की सूचीवाला पत्र। 
फर्वेसजा--अपराधी को दिये हुए दडो आदि का लेखा या विवरण । 
पु० [अ०] १ बहू जो अकेला हो या अकेला रहता हो। २ दे० 
'फरद। 

फर्दनफर्दनू--अव्य ० [अ० फर्दन फर्दंन] १ 
हर एक को। ३ अलूग-अरूग | 

फर्स--पु० [आं० फ़मे ] कोई व्यापारिक बड़ी सस्था। 

फर्माना--स ० “फरमाना । 

फर्याद--स्त्री ० <+फरियाद । 

फर्रा--१० [अनु०] १ गेहें और धान की फसल का एक रोग जो 
उसके फूलने के समय तेज हवा चलने पर पैदा होता है। २ मोटी ईंट । 

फर्राटा--१० [अनु०) वेग। तेजी। क्षिप्रता। जैसे--फर्राटे से सबक 
सुनाना । 
मुहा०--फर्राठा भरता या मारना नचबहुत तेजी से दौडना। 
अव्य० खूब तेजी से। वेगपूर्वक। 
पु०«खर्राटा । 

फर्शश--१० [अ० फर्राश| [भाव० फर्राशी] १ प्राचीन काल में 
वह नौकर जिसका मुख्य काम जमीन पर दरी, चाँदनी आदि बिछाना 
होता था। २ खिदमतगार। सेवक। 

फर्राधशी--वि० [फा० फर्राशी] १ फर्श-सबधी। जैसे--फर्राशी प्षाउु 
छत में लगाया जानेवाला पखा। २ फर्श पर बिछाया जानेबाला। 
३ दे० 'फर्श्षी। 
सत्री० फर्राश का काम और पद । 

फर्श--पु० [अ० फर्श ] १ कमरे, घर आदि की पक्की तथा समतल जमीन 
जिस पर बैठते हैं। फरश। २ उक्त पर बिछाने की कोई चीज । 

फर्शी---वि ०, स्त्री० दे० 'फरशी | 

फलंक--पुं ० “नफलक (आकाश) । 

स्त्री०८फर्लांग । 

फर्लेंग[--स्त्री ०-|फरलाँग । 

फलंगना[---अ ० --फलाँगना । 

फलत--स्त्री ० [हि०फलता +अत (प्रत्य० ) | पौधो, वृक्षों आदि के फलने 
की क्रिया या भाव। 


एक एक करके। २ 


फल 


फछ--पु ० [सं०५/फल +अच ] १ वनस्पतियो, वुक्षो आदि मे विशिष्ट 
ऋतुओ मे लगनेवाला वह प्रसिद्ध अग जो उनमे फूल आने के बाद लगता 
है, जो प्राय खाया जाता है तथा जिसके अदर प्राय. उस वनस्पति या 
वृक्ष के बीज और कुछ अवस्थाओं में गूदा और रस भी होता 
है । 
विशेष--वनस्पति विज्ञान मे अनाज के दानो (गेहें, चावल, दाल आदि ) 
और वृक्षों के फलो (अनार, आम, नारगी, सेब आदि) मे कोई अन्तर 
नही माना जाता पर लोक-व्यवहार मे ये दोनों अलग-अलग चीजें 
मानी जाती हैं। 
२. किसी प्रकार की क्रिया,धटना,प्रयत्त आदि के परिणाम के रूप में 
होनेवाली कोई बात। नतीजा। जैसे--परीक्षा-फल। ३ घामिक 
क्षेत्र मे, किये हुए कर्मों का वह परिणाम जो दु ख-सुख आदि के रूप मे 
मिलता है। ४ जीवन में किये जानेवाले कार्यों के वे चार शुभ परिणाम, 
जो मनुष्य के लिए अभीष्ट या उदहिष्ट कहे गये हैं। यथा--घर्म, अर्थ, 
काम और मोक्ष | ५. किये हुए कामो का प्रतिफल । बदला । उदा ०-- 
सबकी न कहे, तुलसी के मते इतनो जग जीवन को फलु है । --तुलसी। 
६ किसी प्रकार की प्राप्तिया छाभ | ७ अको आदि के रूप मे वह 
परिणाम जिसकी प्राप्ति के लिए गणित की कोई क्रिया की जाती है। 
जैसे--क्षेत्रफल, गुणन-फल, योग-फल। ८ गणित में चैराशिक की 
सीसरी राशि या निष्पत्ति में का दूसरा पद । ९ फलित ज्योतिष मे, 
ग्रहों की स्थिति और योग के परिणाम के रूप में होनेवाले दु व, सुख 
आदि। १० न्याय-शास्त्र मे, दोष या प्रवृत्ति के कारण उत्पन्न होने या 
निकलनेवाला अर्थ जिसे गौतम ने प्रमेय के अन्तर्गत माना है। 
११ किसी प्रकार के विस्तार का क्षेत्रफल | १२ छरी, तलवार, तीर, 
भाले आदि की वह तेज घारवाला या नुकीला अग जिससे उक्त चीजें 
आधात या काट करती है। १३ फलक। १४ ढाल।१५ पासे 
पर का चिह्न या बिंदी। १६ व्याज। सूद। १७ जायफल। १८ 
ककोल। १९ कोरीया वृक्ष । 

फल-कटक--१० [स० ब० स०] १ कटहकू। २ रुवेत-पापड़ा। 

फल-कंटकी--रजी ० [स० फलकटक-+-डीप्‌ ] इृदीवरा। 

फलक--पु०; [स० फल | कन्‌] १ तखता। पट्टी। पटछ। २ वहू 
लबा-चौठा कागज जिस पर कोई कोप्ठक, मानत-चित्र या विवरण 
अकित हो। फरद। (शीट) जैसे--दुर्वृतत फलक । (देखे) ३ 
चादर। ४ तबक। वरक। ५ पुस्तक का पन्ना। पृष्ठ) ६ 
हथेली। ७ चोकी। ८ खाट या चारपाई का बुनावटवाला वह 
अंश जिस पर छोग लेटते हैं। 
पु० [अ० फलक ] १ आकाश । आसमान। २ ऊपरवाला छोक जो 
मुसलमानों में भाग्य का विधाता और सुख-दू ख का दाता माना 
जाता है। 
सत्री० [अ० फलक ] सबेरे का उजाला। उषा। 

फलकना--अ० [अनु ०] १ छल़कना। २ उमगना । ३ दे० 'फडकना'। 

फुलक-पंत्र--पु० [स० मध्य ०स० ] ज्योतिष मे एक प्रकार का यत्र जिसकी 
सहायता से जया आदि का निर्णय किया जाता है। 

फल-कर---पुं० [स० ष० त०] वृक्षों के फलो पर छूगरनेबाला कर | 

फरूका---१० [अ० फरूक ] १. दो या अधिक खंडोबाली नाव में का वह 








श्र 


फलन 


दरवाजा जिसमे से होकर लोग ऊपर नीचे आते-जाते है। २ मुलायम 

मिट्टी। ३ अखाडा (पहलवानों का) । 
[प० फफोला। 

फल-काम--वि० [स० फल+/कम्‌-|णिडू+अणू, उपपद स०] किसी 
विशिष्ट फल की प्राप्ति के लिए किया जानेवाला काम | 

फल-काल--पुं० [स०्ष०त० ] वह ऋतु या मौसिम जिसमे कुछ विशिष्ट 
वक्ष फल देते हो। जैसे---आमो का फल-काल गरमी और बरसात 
है। 

फल-कृंच्छ--पु० [स० मध्य० स०] एक प्रकार का कृच्छ ब्रत जिसमे फलो 
का क्वाथ मात्र पीकर एक मास बिताया जाता है। 

फल-क्ृष्ण--पुं० [स० स० त०] १ जल आँवला। २ 

फल-केसर--पु० [स० ब० स०] नारियल का वृक्ष । 

फल-कोष---पु० [स० ष० त०] १ पुरुष की इं्रिय। लिग। २ अड- 
कोद। 

फल-प्रह---वि ० >फलग्राही । 

फलग्राही (हिनु)--पु० [स० फर/ग्रह + णिनि] वृक्ष । पेड। 
वि० फल ग्रहण करनेवाला । 

फल-खमस--पु ० [स० ] एक प्रकार का पुराना व्यजन जो बड की छाल को 
कूटक्र दही में मिलाकर बनाया जाता था। 

फलचारक--पु० [स०] १ प्रात्नीन काल का एक राजकीय अधिकारी | 
२ बौद्ध विहार का एक अधिकारी । 

फलचोरक--पु० [स० ब० स०, ] घोरक या चोर नाम का गरभद्रतग्य। 

फलड़ा [--पु ० --फल (हथियारों का) । 

फलत,.--अव्य० [स० फल | तस्‌ [उक्त बात के फल के रूप मे। परि- 
णामत । इसलिए। जैसे--लोगो ने धन देना बद कर दिया, फलत 
चिकित्सालय बद हो गया। 

फछत--स्त्री ० [हिं० फलना ] १. वृक्षों के फलने की क्रिया या भाव । २ 
वह जो कुछ फलछा हो। बीजो, फलो आदि के रूप मे होनेवाली उपज । 
३ कुल उपज। 

फलजअय--पु० [स० प० त०] १ वैद्यक मे, द्वाक्षा, पएध और काश्मीरी 
इत तीनो फल़ो का समाहार। २ त्रिफला । 

फलू-त्रिक--पु० [स० प०त० |] १ भाव प्रकाश के अनुसार सोठ, पीपल 
भऔर काली मिच। २ जिफला। 

फलछव--वि० [स० फल३/दा +क] १ 
देनेवाला। 
पु० पेड। वृक्ष । 

फलदाता (त्‌)--वि० [स० ष० त०] फल देनेवाला। 

फल-वान--पु० [सं०घ० त०] १ हिंदुओं की एक रीति जो विवाह के 
पहले बरवरण के रूप में होती है। इसे वरक्षा भी कहते है। २. 
विवाह के पूर्व होनेवाली टीके की रसम। 

फलवार--वि० [हि० फल+फा० दार (प्रत्य०)] १ (वृक्ष)जिसमे 
फल लगे हो। २. (अस्त्र) जिसके आगे धारदार फल लगा हो। 

फलबू--पु० [ स० फलद्गुम ] एक प्रकार का वृक्ष जिसे धौली भी कहते हैं। 
वि० दे० 'घौली' । 

फलन--पु० [स०१/फल |ल्युटू--अन] [भू०क० फलित] १. वृक्षों 


करज। 


फलनेवाला (चृक्ष ) । २. फल 


फ़्ना 


में फल उत्पन्न होता या छगना। २. किसी काम या बात का परिणाम 
निकलना । 

फलना---अ० [स० फलन] ६. वृक्ष का फलो से यूुवत होना। फल 
लगाना। २. स्त्रियों का उत्पत्ति, प्रसव आदि करना। ३. गृहस्थों का 
सतान आदि से युक्त होता। जैसे--सदाचारी गृहस्थ का फलना- 
फूलता । ४ किसी काम या बात का शुभ फल या परिणाम प्रकट होना । 
उपयोगी और लाभदायक सिद्ध होना | जैसे--तया मकान उन्हें खूब 
फला है। उदा ०--इतने पर भी कितु न उसका भाग्य फलछा ।--मैथिली 
शरण। ५. इच्छा या कामना का पूर्ण हीना। सफल मनोरशण होना। 
पद---फलना-फूलना ++ ( क) धन-धान्य, सतान आदि से अच्छी तरह 
युक्त और सुखी होना । (ख) उपद्श या गरमी नामक रोग के क्रारण 
सारे शरीर में छोटे-छोटे घाव होना। (परिहास और व्यग्य ) 
६ शरीर के किसी भाग पर बहुत से छोटे-छोटे दानों का एक साथ 
निकल आना जिससे पीडा होती है। जैसे--गरमी से सारी कमर 
(या जीभ) फल गई है। 
)१० [हि० फाल] सगतराशो की एक तरह की छेती। 

फल-परिरक्षण---पुं० [स० ष० त०] फलो को इस प्रकार रखना कि वे 
सडते-गलने न पावें। फलो को क्षतिग्ररत होने से बबाना। (प्रिजर्वेशन 
आफ फ़ट्स) 

फल-पाक--प्‌ ० [स० ब० स०] १ करींदा। २ जलू-आँवला। 

फलू-पुरछ--पु० [स० ब० स० ] वह वनस्पति शिसकी जड में गाँठ पड़ती 

हो। जैसे--प्याज, शलूजम आदि। 

फल-पुष्प--पु० [सं० ब० स०] [स्त्री० फल-पुष्पा ] वह पौधा या वृक्ष 
जिसमे फल और फूल दोनो हो। 

फल-पुर--पु० [स० फल4/पुरू+क ] दाडिम। अनार। 

फल-प्रिय--प० [स० ब० स० | द्रोण काक। डोम कौवा। 
वि० जिसे खाने मे फल अच्छे लगते हो। 

फरूफब--यु ० रूफरफद। 

फल-फूल--१० [हि०] १ फल और फूल। 
वाली वस्तु। 

फल-भरता--स्त्री० [स० फल +हिं० भरना ] फछो से भरे अर्थात्‌ लदे 
होने की अवस्था या माव। उदा०--झुक जाती है मन की डाली अपनी 
फल-भरता के डर मे । --प्रसाद । 

फरू-भूसि--स्त्री० [स० च० त०] रथान जहाँ कर्मों के फल भोगने पडते 
हू।। जैसे--पृथ्वी, नरक, स्वर्ग आदि। 

फल-भोजी (जिन्‌)--वि० [स० फल३/मुज्‌ (खाना) | णिनि] १ फल 
खानेबाला । २ केवल फलो पर निर्वाह करनेवाला। 

फल-मंजरी--स्त्री० [स० ष० त०] सगीत मे, कर्नाठकी पद्धति की एक 
रागिनी । 

फल-मुल्या--स्त्री० [सं० तृ० त०] मजमोदा | 

फरलू-मुरदरिका--रुत्री० [ स० स० त०] पिंड खजूर | 

फरू-पोग---पु० [स० ष० त० ] नाटक में वह स्थिति जिसमे फल की प्राप्ति 
या नायक के उहेश्य की सिद्धि होती है। फलागम। 

फल-राज--पु० [सं० ष० त०] १ फलछो का राजा। श्रेष्ठ फल। २. 
तरबूज। ३ खरबूजा। ४. आम। 


भेंट के रूप में दी जाने- 


हरे 


फल-लक्षणा--स्त्री ० [स० मध्य० स० ] साहित्य मे एक प्रकार की लक्षणा | 

फलबरति--स्त्री० [स०] घाव में भरी जानेवाली बत्ती । 

फल-वल्ति--स्त्री० [सं०] वैद्यक मे एक प्रकार का वरित्त कर्म जिसमे 
अँगूठे के बराबर मोटी और बारह अगुल लम्बी पिचकारी गुदा मे दी 
जाती है। 

फरूवानू--वि० [स० फल | मतृपू, म | व, फलवत्‌ ] [सत्री०फऊूवती ] 
(वृक्ष आदि) जिसमे फल लग हा। 
पु० फलदार वक्ष । 

फलबिष--पु० [स० प० त०] वह वृक्ष जिसके फल विषट होते है। 
जैसमे--करभ । 

फलश--पु ० फल-शाक । 

फल-शर्करा--स्त्री० [स० ष० त७ या मध्य० स० ] फलो में रहनेवाली 
शर्करा या चीनी जो ओषधि आदि के कार्यों के लिए विशिष्ट प्रक्रिया से 
निकाली या बनाई जाती है। (फ्रूट-शूगर ) 

फलू-शाक--पु० [स० मयू ० स०] तरकारी बनाकर खाया जानेवाला 
फल। 

फर-भुति--स्त्री० [स० घ० त०] १ ऐसा कथन जिसमे किसी कर्म के 
फठ का वर्णन होता है और जिसे सुनकर लोगों की वह कर्म करने की 
प्रवृत्ति होती है। जैसे--दान करने से अक्षय पुण्य होता है। २ उबत 
प्रकार का वर्णन सुनना । 

फल-श्रेष्ठ---प्‌० [स० प० त० वा स० त०] आम। 

फल-सस्कार--पु ० [ स० ष० त० ] ज्योतिष में, आकाश के किसी ग्रह के 
केद्र का समीकरण या मद-फल-निरूपण । 

फरूसफा--पु० [अ० फल्‍सफ ] १ ज्ञान। २ विद्या ३ 
शास्त्र। ४ तकं-शास्त्र। ५ तक॑। दलील! 

फलसा[--पू० [स० पाली] १ मुहल्छा। २ दरवाजा। 
पु०ज/फालसा । 

फल-स्थापन--पु० [स० ब० स०] फलीकरण या मीमन्तोन्नयन 
सस्कार। 

फलहरी--स्त्री ० [हि० फल | हरी (प्रत्य०) | १ बन के वृक्षों के फल । 
घन-फल । २ सब प्रकार के फल । 
वि०८”फलट्ारी । 

फलहार--पु० [स० फलाहार] १ फलो का भक्षण। २ ब्रत आदि के 
दिन खाये जानेवाले फल अथवा कुछ विशिष्ट फलो का बनाया जाने 
वाला व्यजन। 


५ 


दशन- 


फलहारी--स्त्री० [स० फरू/हू | अगू, फलट्वार+डीपू, ब> स०] 
कालिका देवी। 
वि० [हिं० फलहार] १ फलहार-सवधी। २ फलहार के रूप मे 
होनेवाला । 


फलाँ--वि० [फा० फरलाँ] कोई अनिश्चित। अमुक। 

फर्लाग--स्त्री० | ? ] १ एक स्थान से उछलकर दूसरे स्थान पर 
जाने की क्रिया या भाव। कुदान। चौकडी! छलाँग। कि० प्रे०-- 
भरना मारना । 
२. उतनी दूरी जो फर्लॉँग से पार की जाय। ३ मालखभ की एक 
कसरत | 


फर्लाँगना 

फर्छाँगना--अ० [हि० फरलांगि+ ना (प्रत्य०)] एक रथान से उछलकर 
दूसरे स्थान पर जाता या गिरना। फरल्ॉंग भरना । फाँदना । 

फरलांश--पु० [स० फल-अजश, मयू० स०] १ तात्पर्य । १ साराश। 

फला--स्त्री: [स० ५ फल | अच्‌ +टापू | १ छमी। २ प्रियगु। ३ 
सिसमिरीट | 

फराकता|---स ० --फलाँगना । 

फलाकाक्षा--स्त्री ० [स० फल-आकाक्षा, ष० त० ] फल-प्राप्ति की 
आकाक्षा या कामना । 

फलागम--प० [सण्फल-आगम, ष७ त० ]१ वृक्षों मे फलो के आने का 
काड। फछ लगन की ऋतु या मौसिम। २ वक्षों में फल आना या 
छगना। ३ शरद-ऋतु । ४ साहित्य में, रपक की पाँच अवस्थाओं 
में से पांचवी और अतिम अवस्था, जिसमे नायक आदि के अभीष्ट 
की सिद्धि होती है। 

फलाइय--वि० [स० फल-आदूय] फलो से छदा या भरा हुआ। 

फलादइन--प० [स० फल-अदल, ब० स०] १ वह जो फल खाता हो। 
२ तोता। 

फरूादेश--पु० [स० फल-आदेश, प० त० ] १ किसी बात का फल या 
परिणाम बताना । फल कहना। २ ज्योतिष से, वे बाते जो ग्रहो के 
प्रभाव या फल के रूप में बतल्याई जाती है। 

फलाध्यक्ष--पु० [स० फल-जअध्यक्ष, प० त०] १ फको का मालिक या 
स्वामी। २ ईश्वर जो सव प्रकार के फल देता है। ३ खिरती 
का पेह। 

फलान।--रत्री ० [अ० फर्ला ] स्त्री की भग। योनि। (बाजारू ) 

फलाना->स« [हि० फलना का प्रे०] १ किसी को फलन मे प्रवृत्त 
करना। फलने का काम कराना। २ फला से युक्रत करना। 
वि० [अ० फर्ा] [स्त्री० फलानी] (वह) जिसका नाम न लिया 
गया हो। अमक | 

फलानुमैय--वि० [स० फल-अनमेय, तृ०त० ] जिसका अनुमान फल या 
परिणाम दखने से ही किया जाय। 

फलापेक्षा--स्त्री० [स० फल-अपेक्षा, प० त०] फल की अपेक्षा या 
कामना। 

फलाफल--प्‌० [ स० फल-अफल, द्व ० म०] किसी कर्म या कार्य के शुभ- 
अशूभ या इप्ट-अनिष्ट फल। फल और अफल। 

फखासल--प० [स० फल-अम्छ, ब० स०] १ खट्टे रसवाला या खट्टा 
फल। २ अम्ठवेलश। ३ विषावलछी। विपाविल। 

फलाम्ल-पच्चक--पु० [स० प० त०] बेर, अनार, विधाविल, अम्लबेत 
ओर बिजीरा ये पाँच खट्टे फल। 

फलार [---प्‌ ०-फलाहार । 

फलाराम-- पृ० [स० फल-आराम, प० त०] फलदार वक्षों का बाग | 

फलारी [--वि० - फलाहारी ! 

फलार्थी (बिनु)--पु० |स० फल%/अर्थ्‌ | णिनि] वह जो फलछ की 
कामना करें। फलूकामी। 

फलालीन--तत्री ० - फलालेन । 

फलालेन--रत्री० [अ० फ्डानेल] एक प्रकार का ऊनी वस्त्र जो बहुत 
कोमठ और ढीली-ढाली बुनावट का होता है। 





श्ड फलिनी 








निभाने जव3--+०न्‍न्औनन+ जन +>-++- ्ल्बक >>०>मे 3 -अूके।+अररसी “के वेब» 


फलावरण--पु० [स० फल-आवरण, ष० त०] फलतनेवाले पेड़-पौधो 
के फलो का वह ऊपरी आवरण जिसके अदर बीज रहते है। (पेरिकोर्प ) 

फलादन--पु० [स० फल-अशन, ब०स०] १ बहज़ों फल खाता हो। 
फल खानेबवाला। २ तोता। 

फरलाशी (शिन)--पु० [स०५/फल अशू +णिनि] वह जो फल खाता 
हो। फल खानेवाला। 

फलासग--पु० [फल-आसग, स० त० ] किसी कर्म के फल के प्रति होने- 
बाला आसग या आसक्ति | 

फलासब--पु० [स० फल-आमसब, घ०त० ] चरक के अनगार दाख, खजूर 
आदि फला के आरव जो २६ प्रकार के होते है। 

फलाहत--स्त्री ० [हिं० फलाना >फलो से युक्त करना ] १ वृक्षों, आदि 
से फल उत्पन्न करने की क्रिया, भाव या व्यवसाय | २ कृषि-कर्म । 
खेती-बारी। (पश्चिम) 

फलाहार--पु० [स० फल-आहार, ष० त०] फछा का आहार। 
स्त्री ०[सण०्फलाहार ] अन्नन्‍्वर्ग के खाद्यान्नों से मिन्न, कुछ विशिष्ट फलो 
से बनाये जानेवाले व्यजन जो हिंदुओ में क्षत के दिन खाये जाते है। 
जैसे--एक्ादशी का स्त्रियां फलाहार करती है। 

फरलाहारी (रिन्‌)--पु० [स० फलाहार +इनि] [स्त्री० फछाहारिणी ] 
बह जो फड साकर निर्वाह करता हो। 
वि० १ फलाहार-सबंधी। २ (खाद्य पदाथ) जिसकी गिनती 
फलाहार में होती हा । (फलाहारी चीज में अन्न का मठ नहीं होता।) 
जैसे--फ ठाहारी मिठाई। 

फलि--पु० [स०९/फल | इनू |]! एक प्रकार की मछली। २ प्याछा। 

फलिक--वि० [स०्फल | ठज्‌ू--इक ] १ फल का उपभाग करनेबाला। 
२ किसी कार्य, घटना या बात के उपरात उसके फल या परिणाम 
के रूप में होनिवाला। (रिजल्‍्टन्ट) 
पु० पर्वंत। पहाड। 

फलिका--स्त्री० [स० फलिक +टापू] १ एक प्रकार का बोड़ा जी 
हरे रग का होता है। २ किसी चीज के आगे का नुकीला भाग। 

फलित--भू० कृ० [स० फल इतचू] १ फडा हुलआ। २ पूरा या 
संपन्न किया हुआ। ३ जिसमे कुछ विशिष्ट स्थितिया जादि के परि- 
णामो के सबंध मे विचार हुआ हा जैसे--फलित उ्योतिष | (दे० ) 
पु० १ पेड़। वृक्ष। २ पत्थर-फोड। छरीडा। 

फलित ज्योतिष--पु० [स० कमे० स० वा प० त०]ज्योतिष की दो 
शाखाओं मे से एक जिसमे ग्रह, नक्षत्रों आदि के मनृषप्य जाति तथा 
सृष्टि के अन्य अग्रा पर पडनेबाले शुभाशुभ फलो का विचार हाता है। 
(एस्ट्रालोजी) ज्योतिष की दूसरी शाखा गणित ज्योतिष है। 

फलितव्य--वि० [स०९/फल्‌ , तब्य] जो फलने को हो अथवा फलने के 
योग्य हो । 

फलिता--स्त्री ० [स० फलित+-टठाप्‌ |] रजस्वछा स्त्री। 

फलितार्थ--पु० [स० फलित-अर्थ कर्म० स०] १ तात्यये। २. 
निचोड । 

फलिन--वि० [स० फल+दनच्‌ | (वक्ष) जिसमे फल छगते हा । 
पु० १ कटहल। २ इ्योनाक। ३ रीठा। 

फलिनी--स्त्री० [स० फल | इनि+डीपू | १ भ्रियगु। २ अग्नि-शिखा 


साराण। 


फ़सी 


नामक ब॒क्ष। ३ मूसली। ४ इलायची। ५ मेहदी। ६ सोना- 
पाढा। ७ भावमाणा लता। ८ जलू-पीपछ। ९ दुद्धी घास। 
१० दाख से बनाया हुआ आसव या मद्य । 

कल्ली--पु० [स० फल-+-अच | छीष | १. सोनापाढा। २ कठहूू। 
३ प्रियग। ४ मृसछी। ५ आमडा। 
वि० [स० फल +इनि] १ फला से युक्त। फलवाला। २ जिसमे 
फुल लगते हों। ३ लाभदायक। 
स्त्री० [हि० फल | ई (प्रत्य०) | १ पेड-पौधो का फल के रूप मे 
हँनिवाला वह लबोतरा अग जिसके अदर केवल बीज रहते है। गूदा 
या रक्ष नही रहता। (पॉड) २ उक्त प्रकार का कोई चिपटा, छोटा, 
लबोनतरा तथा हरा फल जो तरकारी आदि के रूप में खाया जाता 
हो। छीवी। (बीन) जैसे--सेम की फली। 

फलीकरण--पु० [स० फल |-च्वि, इत्व, दीघ॑,२/क- ल्युटू---अन | | भू० 
कृ० फलीकृत ] १ अनाज को भूसे या भूसी से अलग करना । मॉडना | 
फटकना। २ भूसी। 

फ्लीता--पुृ० [अ० फतील ] १ पलीता। 
क्रि०७ ४१ ०--दिखाला । 
ए बत्ती। ३ कपडदा में शोभा के लिए गोट के साथ टोकी जाने- 
बालों डोरी। ४ ताबीज। 
मुहा ०->फलीता सुघाना-- तावीज या यत्र की धूनी देना। 

फलोदार--वि० [हि०+फा०] (पौधा या फसलछ) जिसमे फलियाँ 
लगती हो। (छग्यमिनस ) 

फलीभूव--भू ७ क़० [स० फल | ज्वि, इत्व, दीर्ष,,/म्‌-बत] जिसका 
फल या परिणाम प्रत्यक्ष हो चुका या निकल चुका हो। 

फर्लेंदा--पु० [स० फलेंद्र | एक प्रकार का जामुन जिसका फल बड़ा, 
गदेदार और मीठा हीता है। फरेद । 

फर्ले--प० [स० फल-इद्र, सुप्सुपा स०] 
जामन | 

फलोीत्तम्ता--सत्री० [स० फल-उत्तमा, शू० त०] १ काकलीदाख। २ 
दृद्दी या दृधिया घास। ३ त्रिफला। 

फलोत्पत्ति- सत्री० [स० फज-उत्पत्ति, प७ त०] १ फल की उत्पत्ति। 
फल का प्रवाट या प्रत्यक्ष होता। २ न्‍्यापार आदि में होनवाला 
आथिक लाभ। 
पृ० आम (वृक्ष) । 

फलोदय--पु० [स० फठ-उदय, ष० ल०] १ फल का प्रत्यक्ष होना! 
२ हपे। ३ दड। ४ स्वर्ग। 

फलोदहेश--१० [स० फल-उद्देश, प० त०] दे० 'फलापेक्षा'। 

फर्वोद्यव-ववि० [स० फल-उद्भव, ब० स०] फरू में से उपजने या 
जनमने बाला । 
पु० फल का उद्भव या उत्पत्ति। 

फलोपजीदी (विन्‌)--वि० [स०फल-उप)/जी | णिनि] जिसकी जीविका 
फलो के व्यवसाय मे चछती हो। 

फलक--वि० [स०६/फल ! क] जो फैला हुआ हो अथवा जिसने अपने अग 
फंलाये हा। 

फल्गु--वि० [स० १/फल | ड, गुगागम] १ जिसमें कुछ तत्त्व न हो। 





फरेदा या बडा 


श्ष्‌ 


फसली बीमारी 
निस्सार। २ निर्थक। व्यर्थ। ३ छोटा। ४ क्षुद्र। तुच्छ। 
५ साधारण। सामान्य। 
स्त्री०[स०] बिहार की एक छोटी नदी जिसके तट पर गया नगरी 
बसी हुई है। २ बसत काछ। मे मिथ्या वचन। ४ कठगूलर। 

फल्गुंन---पु० [ स० 4/फल |-उनन्‌, गुगागम] १ अर्जुन। २ फागुन का 
महीना । 
वि०१ फाल्मुनी नक्षत्रन्सबधी। २ जिसका जन्म फाल्गुनी नक्षत्र 
में हुआ हों। ३ लाल। 

फल्गुनाल--पु ० [ स० फल्गुन/अलू 4 अच्‌ | फाल्गुन मास | 

फल्गुसी--स्त्री ० फाल्गुनी । 

फल्गुनीमब--पु ० [स० फल्गुनी /मू | अप्‌ ] बृहस्पति। 

फल्गुबादिका--रत्री ० [स० फल्गू | वाटी, प० त०, +कन्‌, टापू, छस्व ] 
कठगूलर। 

फल्प--बि ० [स० फल +यत | १ फूछ। २ कली। 

फलला--पु ० [ देश ० ] एक प्रकार का रेशम जो बंगाल मे आता है। 

फसकड़ा--पु० [ अनु ० ] टांगे फैकाकर तथा चूत के बल बैठने का ढग या 
मुद्रा। 
क्रि० प्र०--मारना । 

फसकना--अ० | अनु ० ] १ घिसने, खिचने, दबने आदि के फलस्वरूप 
कगड़े का कही से कुछ फट जाना। मसकना। २ नीचे बैंठना। 
धेंसना। हे तड़कना। फटना। ४ स्त्री या मादा पशु का गर्भवती 
होना। 
वि०१ (पदार्थ) जो जल्दी फसक या मसक जाता हों। २ जा जन्दी 
धेस या बेठ जाय । 

फसकाना--स ० [ हि. फसकाता का शा०]१ कपदे का मसकना या 
दबाकर कुछ फाइना । २ धंसाता। ३ गर्भवती करना। 

फसद--स्त्री ०[ अ० फरद | यूनानी या हकीमी चिकित्सा बारत्र भें, नसों 
या रगो में से विकारभ्रत रक्त निकाछने की क्रिया या माव। 
मुहा ०--फसब खुलबाना या लेना "(क) शरीर का दृपषित रक्त निकछ- 
बाना। (ख) मूर्खना या पागूपन का इलाज करना। (व्यग्य) 

फसल--स्त्री ० [अ० फरल] १ ऋतु। मोसम। २ उपयुक्त काछ या 
समय। जैसे--गेहँ या चना बोने की फसछ। ३ खत से बीये हुए 
अनाजों आदि की पैदावार । (साधारणत वर्ष मे दो फसले होती 
हैं-“रबी और खरीफ ।) ४ खेत में खड़े हुए अनाजा आदि के पौधे । 
(काप) ५ दाने आदि निकालने के लिए उक्त के काटे हुए अशया 
बाले। (हार्वस्ट) ६ अध्याय। प्रजरण। 

फसली--वि० [हि० फसल] १ फसक-सम्बन्धी। फयलछ का। २ 
किसी विशिष्ट फसल या ऋतु मे होनेवाला। जैगे--फगली बीमारी, 
फसली बुखार। 
स्त्री० हैजा नामक रोग। 

फसली कौआ--पु ० [अ० फस्ल [-हि० कौआ] १ पहाड़ी कौआ जो शीत 
ऋतु में पहाड़ से उतरकर मैदान मे चलछा आता है। २ वहज। कबल 
अच्छे समय मे अपना स्वार्थ साधन करने के लिए किसी के साथ लगा 
रहे और उसकी विपत्ति के समय काम न आवे। स्वार्थी। मतस््बी। 

फसलो बीमारी --स्त्री ० हिं० ] हैजा नामक रोग। 


फंसलो बुखार 


फसली बुखार--पु ० [अ० फसल +बुखार | १ दो ऋतुआ के सधिकाल के 
समय होनेवाझा ज्वर। २ वर्षा ऋतु में, जाडा देकर आनंवाला 
बुखार। जूड़ी। (मलेरिया) 

फसली सन्‌--१० | ? | एक प्रकार का सन्‌ या सवत्‌ । सम्राद अकबर द्वारा 
घलाया गया ए + सन्‌ जिसका उपयोग आजकल जमीन, लछगान, माल- 
गुजारी आदि का हिसाब रखने के कामों में होता है। इसका आरम्भ 
भाद्रपद्व ऊष्ण प्रतिपदा से होता है। 

फसाद--प्‌ ० [ अ० फसाद ] [वि० फसादी ]१ बिगाइ। विकार। खराबी। 
२ उत्पात। उपद्रत। ३ दगा। बलवा। ४ लडाई। झगडा। 

फसादी--वि०  फा० फरादी |] १ फसाद खड़ा करनेवाला । २ विकार 
उत्पन्न करनेबाणा। ३ उपद्रवी। पाजी। 

फसाना---१० [फा० फ़सान ] १ कोई कल्पित तथा साहित्यिक रचना। 
२ उपन्यास | 
पव--फर्सानानवीस था फसानानिगार >कहानियाँ लिखनेवाला या 
उपस्यासकार । 

फसाहत--रती ० [ ज० फसाहत] १ कहने, लिखने आदि की वह शली 
जिसमे दैनिक बोलचाल के शब्दों तथा प्रयोगों की बहुलता हों और 
इसी डिए जिसमे स्वाभाविकता तथा प्रसाद गुण हो। २ भाषणया 
साहित्यिक रचना में होनेवाले उक्त गुण। 

फंसिल--स्त्री ० +फंसल | 

फसील --स्त्र। ० | अ० फसील ] चहारदीवारी। परकांटा। 

फस्तोह--- व ० [ अ० फसीह | [ भाव०फसाहत | (रचना ) जिसभे फयाहुत 
अर्वात्‌ बालचाल के णब्दो और प्रयोगो की बहुझता हो और फलूत 
जिसमे रजाभाविकता, प्रसाद गुण तथा प्रवाहशीलता हो। 

फस्त)--रर्म) ० -फरद । 

फरदे “-+वी०<न्फसंद । 

फसल--रत्री ० [ अ० | +फसल। 

फसली--वि० , पु० [अ०] -फसली। 

फहम--स्पी०[ अ० फद्म]१ ज्ञान। २ बुद्धि। समझ। हे तमीज। 

फहुमाइश--स्त्री ०[फा० फह्माइश ] ! शिक्षा। सीख। २ आना। हुकुम । 
३ बेतावनी। 

फदट्रन--स्त्री ७  हिं० फहरना ] फहरने की अवस्था, क्रिया या भाव। 

फहुरना--अ० [स० प्रमरण] खुछे या फैले हुए वस्त्र आदि का हवा में 
फरफर शब्द करते हुए उठना । 

फहरान--रची ० [दि फह्राना |१ फहराने की क्रिया या भाव। २. 
दे० फहरन । 

फहराना--ग ० [ हि? फहरना | वरत्र आदि को इस प्रकार एक तरफ से 
खुरा छोड़ना कि वह हवा मे फर-फर शब्द करते हुए उड़ने, उहराने या 
हिलने छगे। जैसे--झडा या दुपट्टा लहराना | 
अ० हवा के कारण इधर-उधर हिलना। 

फहरिस्त--स्त्री ०--फेहरिस्त (सूची )। 

फहश--ति० [अ० फुटेश | फूहाग। अइलील। 

फॉक- -स्त्री० [ स०> फलक ] १ फल आदि वा कटा हुआ लबोत्तरा टुकडा। 
(विशेयत लबाई के बल कटा हुआ टुकड़ा ।) जैसे---आम या संघ की 
फॉक। २ नारंगी, मुराम्मी आदि फलछो के अन्दर उक्त प्रकार का 


१६ 


फाँदना 


3९-०८ लि न्डे कह जमे ७++पकन्‍ं+े आज पल्नत अं <अंन्ज के 3 मो अल 


हँ।नियाला भग जो ऐसे ही अन्य अगेों से जुड़ा रहता है। ३ खरबूजे 
आदि फलछा पर बने हुए उन प्रकृति चिह्नो मे से हर एक जहाँ पर से 
काटकर फां्क बनाई जाती है । 

फॉकड़ा--वि० [देश०] १ बाँका। तिरछा। २ हुष्ट-पुप्ट। तगडा। 

फॉकना--स० [ हि० फकी )! चूर्ण के रूप मे कोई ओप।धि या अन्य पदार्थ 
अजलि में लेकर झटके से मूँह मे डालना । जैसे--यत्तू फॉकता, सुर्ती 
फाॉँकना। ५ भने हुए दाने खाना। जैसे--चने फाँकना। 
भुहा ०--धूल फाँकनास्ल्‍्व्यर्थ मे चारो ओर घूमना तथा मारा-मारा 
फिरना। 

फाँका|--पु० -फका । 

फाँकी--रत्री ० [स० फक्किया ] १. घोखा देते हुए किसी को किसी काम 
या बात से अलग रखता। बचित रखना। २ छलऊ। धोखा । 
क्रि७ प्र०--देना । 
|स्त्री० >फाक । 

फाग्रों--स्त्री० [?] एक प्रकार का साग। 

फाॉँयी --स्त्री ० -नफाँग। 

फॉटि--रजी ० | दि० फाटना, फटना ] १ यथा-क्रम कई भागों में बॉटने की 
क्रिया या भाव। 
क्रि० प्र“--बाधना ।--छगाना | 
पव--फाँट बदीचज्चबह कागज जिसमे जमीदारी के हिस्सा का ब्योरा 
लिखा रहता है। 
२ उक्त प्रकार से किये हुए विभाग। ३ किसी चीज की दर आदि 
का बैठाया जानेवाला पठता | 
वबि० जो आसानी से तैयार किया गया हो। 
पु० [ ? ] ओपवियों को उबालकर निकाछा जानेबाला रस। 
काड़ा। बवाथ। 

फॉटना--स० [हिं० बोटना ]१ किसी वस्तु को कई भागों में बॉटना। 
विभाग करता। २ ओषधियों का रस निकालने के लिए उन्हे 
उबालना | 

फाँटा--पु० [ हिं० फांटना | १ लोहे या छूकड़ी का वह झुका हुआ या कोणा- 
कार टुकड़ा जा दो वस्तुओं को परस्पर जकडे रखने के लिए जोह पर 
जडा जाता हैं। कोनिया। 
]पु०5/फ्रा। 

फॉड--पु ० --फाँडा । 

फाॉड़ा--प्‌० [रा० फाड़ जन्येट | धोती के लबाई के बल का उतना अझ 
जितना कमर में छपेटा जाता है। फेंटा। 
क्रि० प्र०--कसना ।--बाधना । 
मुहा०-- (किसी का ) फाँड़ा पकड़सा किसी से कुछ पाने या छेने के लिए 
इस प्रकार उसे पकड़ता कि वह भागने न पावे। 

फाँव --रत्री० [ हिं० फोंदना ] फाँदने की क्रिया, ढग या भाव। 

पु०्चन्फ,ा। 

फॉदना---अ० [ स० फणन, हि०फानना ] झोक से शरीर को ऊपर उठाकर 
एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा पडता। कूदना। उछछना। 
स० १ कोई स्थान कूदकर छाँघना। जैमे--नाला फाँदला। २ नर- 
पक्ष का मादा-पश्ु से समोग करना। 


कांदां १७ कफाटका 


[अ्यिललक 





«>> >+० हू). "कक परनलक न ननिकनानली अभनगनन अबन--नाओ नननोनिनन+-त-ीी3त3-त-+-+- 33 ननन-++->>> तब +3> >नओओ ,ऑजओण ----- - ---.-. अऑजजकन+->>->>ज++++-- 


स० [हि० फदा ]१ किसी को फदे या जाल में फैलाना । ९ काई कार्य | फाइल--स्त्री० [अ० फाइल] १ कार्यालयों आदि में एक ही प्रकार या 





आरम्भ करना। ठानना। विषय के आवश्यक कागज-पत्रा की नत्थी । मिसिल । २ मोटे कागज, 
फॉवा[--प ० >|फदा । दफ्ती आदि का एक तरह का खोल जिसमे उक्त कागज रखे जाते है। रे 
फॉदी--स्त्री० [हिए फदा]१ बह रस्पी जिससे कई वस्तुओं को एक तार, दफर्ती आदि का बना हुआ वह उपकरण जिसमे उक्त प्रकार के 
साथ रखकर बावते है। गठठा बॉँघने की रस्सी। २ उबत कागज-पत्र एक साथ रखे जाते है। नत्थी। ८ पत्र, पत्रिका आदि के 
प्रकार से बाँवी हुई चीज। गठठा। ग्रथा का समृह। 
फॉफ [--रस्त्री ० [देश० ] दरज। सचि। फाका--सु २ [ अ०फाक ] निराहार रहते की अवस्था या भाव उपवास । 
फॉफी--रत्री० [स० पर्बंटी |१ बहुत महीत सझ्चिली। बारीक तह। २ पद--फाका कश्ी, फाकामस्त। 
दूध के ऊपर की मलाई की हलकी तह या परत। ३ आंख के ढेले मुह।०--फाको मरना-+उपवास का कष्ट भोगते हुए दिन बिताना। 
पर पडनेबाला ज।ला। माडा। कई वाई दिन तक भूखे रहकर कष्ट भोगना। 
फाँस--स्त्रो० [स० पा] १ रस्सी में बनाया हुआ वह फदा जिनमें पशु- | फाकाकश--वि०[अ० +फा०] [माव० फाकाकशी ]भोजन न मिलने के 
पक्षियों का फेसाया जाता है। २ वह रसी जिराम उक्त दृष्टि से कारण फाके या उपवास करनेवाला। 
फदा डाऊा या बनाया गया हो। फाॉसा। फाकामस्त--वि० [फा०] [भाव० फाकामस्ती] जो भूखा रहकर भी 
सत्री०[ स० पनस |! बसि, सूसी लकड़ी आदि का सूक्ष्म विच्तु बडा आवष्ति तथा प्रसन्न रहता हो। 
ततु जो त्वचा में चभ जाता है। उदा०-जैसे मिसिरिह्र में मिली | फाका-मस्तो--स्त्री ० [अ० [फा०]१ बुरे दिनों मे भी प्रसन्न रहने की 
निरस बास की फांस ।---रहीग । व॒त्ति। 
क्रि० प्र ०--गडना ।--पमना ।--निकलना (--लगना । फाफे-मरत--वि ० >-फाका-मरत | 


२ लाक्षणिक रूप में, कई ऐसी अप्रिय बात जो मन मे बढ़त अधिक 
खटकती रह। गाँस। ३ बोस, बेत आदि का चीरकर बनाई हुई 
पतली तीली। पतली कमाची | 
मुह ०--फाँस निकलना >मन में होनेवाली खटक दूर होना । 

फॉसना--स 5 [स० पाण, प्रा० फास](१ फस अर्थात्‌ फद में किसी पश्नु 
या पक्षी को फसाता । २ छल, ढग, युक्ति आदि से किसी को इस प्रकार 
अपने अधिकार या वश में करना कि उससे लाभ उठाया या स्वार्थ सिद्ध 
किया जा सके। ३ वोलचाल मे, किसी को फूसडाकर उससे अनुचित 
सबंध स्थापित करना । 

फासा--पु ० [ हि० फॉसना |] वह हूम्बा रस्सा (या रस्सी) जिसके 
एफ सिर पर फदा बना होता है, और जिसकी सहायता से पशुओं का 
गला यापर फेंसाकर उन्‍हें पवडा अथवा झत्रु के गले मे फेंसाकर उन्हें 
पकड़ा या मारा जाता है। (लैस्सो) 

फाँसी--रत्री ० [रा० पाशी] १ फसान का फदा। पाश। २ ररसी 
आदि का बह फदा जिस छोग अपने गल में फेंसा कर आत्म-हत्या करने के 
लिए झूछ या लटक जाते है। 
कि० प्र ०--लगाना। 


फाक्षे-मस्ती--स्त्री ०--फाका-मस्ती । 

फाखतई--वि० | हि० फाखता |पडुक के रंग का। भूरापन लिये हुए लाछ। 
पु उबत प्रकार का रंग । 

फास्ता--रत्री ० [० फार्त ] [वथि० फाखतई] पडुके नाम का 
पक्षी । 

फाग---प१०[ हि? फागुन] १ फागुन के महीने में होनवाला उत्सव जिसमे 
लोग एक दूसरे पर रंग या गुछाल डालते और बरात ऋतु के गीत गाते है। 
कि० प्र ०--खैलना । 
२ उक्त अवसर पर गाये जानेवाल ग्रीत जो प्राय अश्छील होते 

है। 

फागन--पु० [स० फारगुन] शिशिर ऋतु का दूसरा महीना । माघ के बाद 
का मास । फाल्गुन। विक्रमी सबत्‌ का बारहवाँ महीना। 

फागुनी--वि० [ हि? फागुन | फागुत-सबवंधी। फागुन का । 

फाजिल--वि० [ अ० फाज़िल]! आवश्यकता से अधिक। जरूरत से 
ज्यादा। २ बचा हुआ। अवशिप्ट। ३. किसी विपय का बहुत बडा 
ज्ञाता या विद्वानू। स्नातक। 

फाजिल बाकी--स्त्री० [अ०] लेने-देन का हिसाब सिकालने १२ बची 


2 आज कक 


३, आज-कल देश-द्रो हियों, हत्यारों आदि को वड देगे का एक प्रकार हुई वह रकम जो दी या ली जाने को हो । 

जिसमे दो खम्मो के बीच में एक ऊबा रस्सा बेंधा रहता है और रग्से के क्रि० प्र ०--निकलना ।--निकालना । 

दूसरे निचले सिरे के फदे मे अपराधी का गला फेसाकर इस प्रकार झटके | काटक--प० [स० कपाटक] १ कारखाना, बाडो, बड़े मकानों, महला 
से उसे नीचे गिरा दिया जाता है कि गला घुटने से वह मर जाता है। आदि का बड़ा और मख्य द्वार। बडा दरवाजा। तोरण। 

मुहा०-- (किसी के लिए ) फाँसी खड़ी होना-- (क) किसी को फॉसी मुहा ०-- ( किसी व्यक्ति की ) फाटक्ष में देना हकारागार या जेल में बंद 
दिये जान के लिए उसकी तेयारी होना । (ख ) प्राणो का सकट उपस्थित करना। (किस पशु को) फाटक में देना -+का जीहौस या मवेशो गाने 
होना। जान-जोखिम होता। फाँधों बढ़ना, लटकाना या देना--उक्‍्त में बद करना । 

प्रकार का दड देकर मार डालता। २ गान की चहारदीवारी में लगा हुआ दरवाजा । 

४ अपराधियों को उबत प्रकार से दिया जानेवाला प्राण-दड | ५ कोई चु्‌० [ हिै० फटकन ] अनाज फटकने पर निकलनेवाला फालतू या र्द्दी 
ऐसा सकटपूर्ण बधन जिसमे प्राण जाने का भय हो अथवा प्राण अद्य। पछोडन । फटठकन। 

निकलने का सा कष्ट हो। जैसे--प्रेम की फाँसी। फाटका---पु ० [ हि०फाटक ] चीजो की दर की केवल तेजी-मदी के विचार 


४--३ 


फाहकी १८ 


से किया जानेवाला वह क्रय-विक्रय का निश्चय जिसकी गिनती एक 
प्रकार के जूए में होती है। खेला। सट्टा। (स्पेक्युलेशन ) 
विशेष--सम्भवत यह पहले बडे-बड़े बाड़ो में फाटक के अन्दर होता 
था, इसी से इसका यह नाम पडा होगा । 

फाहको--रत्री ० [स०५/२फुट्‌ + णवुल, पृषो ० सिद्धि, डीपू,] फिटकरी। 

फाटना[|--अ० सफटना। 

फाइ-लाऊ--वि० [हिं० फाड । खाना] १. फाड खानेवाला। कट- 
खन्ना। ९ बहुत बडा क्रोषी। ३ भीषण। 

फाइलन--स्त्री० [हिं० फाड़ना] १ फाडने की क्रिया या भाव। 
२ कागज, कपडे आदि का ट्कडा जो फाइने से निकले। ३ मक्खन 
को तपाकर घी बताने के समय उसमे से निकलनेवाली छाँछ। 

फाइना--स० [ स० स्फाटन, हि० फाटना ] १ कागण, वस्त्र भादि विस्तार- 
वाले किसी पदार्थ का कोई अश बलपूवक इस प्रकार खीचना या तानना 
कि वहू बीच में दूर तक अपने मूछ से अरूग हो जाय। जैसे-- 
(क) कपड़ा या कागज फाडना। (ख) गृबारा फाडना | 
सयो० क्रि०--डालना |--देना ।--लेना । 
२ तेज अस्त्र से किसी चीज पर आघात करके उसे कई अगो मे विभकत 
करना। जैसे--कुलहाडी से ककडी फाडना। ३ किसी नुकीली या 
पनी चीज से किसी वरतु का कोई अग काटकर अछूग करना या निका- 
छना। जैसे--शेर का अपने पजा से किसी का पेट फाडना। 
विशेष--- तो टना' और 'फाइना' में मुझ्य अन्तर यह है कि 'तोडना' 
में तो किसी वरतु का कोई खड बलपूर्वक अऊूग कर लेने का भाव प्रधान 
है परतु 'फाडना' में किसी विस्तार मे दूर तक वस्तु को बीच से अलग 
करने का भाव मुख्य है। इसके अतिरिकत कोई चीज पटककर तोड़ी 
हो जा सकती है परतु फाडी नही जा सकती | 
४ किसी गोलाकार वस्तु का मुँह साधारण से अधिक और दूर तक 
फैलाना या बढ़ाना। जैसे--आँखे फाडकर देखना, मुँह फाडकर उसमे 
कोई चीज़ डालना। ५ किसी गाढ़ें द्रव पदार्थ के सबंध में ऐसी क्रिया 
करना कि उसका जलीय अश अलग तथा ठोस अश मलग हो जाय। 
जैसे---खटाई डालकर दूध फाडना । 

फातिहा--पु० [अ० फातिह ] १ आरभ। २ प्रार्थंना। ३ कुरान की 
पहली आयत, जो प्राय मृत व्यक्तियों की मात्मा की घणाति और सदगति 
की कामना से उनकी बदन या सजार पर पढ़ी जाती है। 
क्रि० प्र ०--पढना । 

फानना[--स ० [ स० फारण | रूई या धुनता। 
स० [हिं० फाँदना] १ कायये आरभ करना। ठानना। २ दे० 
'फाँदना। 

फानी---वि० [ अ० फानी ] नष्ट ही जानेवालछा । नष्वर। 

फानूस--प० [अ० फानूस ] १. शीशे की चिमली जिसमे से रोशनी छत 
कर चारो ओर फैलती है। २ उबत आकार-प्रकार का छीशे का वह 
आधान जो प्राय छतो में कटकाया जाता है और जिसमे लगे हुए 
गिलासा आदि में अनेक मोमबत्तियाँ जलाई जाती है। ३ एक प्रकार 
का दीपाधार जिसके चारो ओर महीन कपडे या कागज वा घेरा बना 
होता है। कपडई या कागज से मढी हुई पिजर॑ की शकल की एक प्रकार 
की बड़ी कदील। ४ समुद्र के किनारे का वह ऊँचा स्थान जहाँ रात , 








फारम 





नल अजित सिख त.  ननीजननन-+ 5 बढ जन >> 720 रकम 


को प्रकाश होता है और उसे देखकर जहाज बदरगाहू पर पहुँचता है। 
कदीलिया। 
पु० [अ० फरनेस ] ईटो आदि की भट्टी जिसमे छोहा आदि गलाते हैं। 

फाफर--प्‌ ० [ स० पप॑ं2 ]। दे० कट । 

फाफा--स्त्री० [अनु०] दात गिर जाने से फा फा करके बॉलनेबाली 
बुढिया। पोपली बुढ़िया। 
पद--फाफ़े कुटनी---वह बुढिया (या स्त्री) जो इधर की बाते उधर 
छगाकर दो पक्षों मे झगड़ा कराती हो। 

फाफुंदा--पु ० <फतिगा । 

फाब--स्त्री० [स० प्रभा] फबने की क्रिया या भाव। फबन। 

फाबना[---अ ० फबना ! 

फामदा--१० [अ० फ़ायद ] १ किसी काम या बात में होनेवाला किसी 
प्रकार का छाभ। जैसे--यह्‌ दवा बुखार मे बहुत फ़ायदा करती है। 
२ बा्थिक क्षेत्र मे होनेवाली किसी प्रकार की प्राप्ति। जैसे-- 
इस साल उन्हे रोजगार में दस हजार रुपयो का फायदा हुआ है। 
३ किसी काम या बात से होनेवाला वह इप्ट या शुभ परिणाम जो 
किसी रूप मे लाभदायक गा हितकर हो। किसी तरह का अच्छा 
असर या प्रभाव। जैसे--ध्यर्थं झगडा बढाने से कोई फायदा नहीं 
होगा। 

फायवेमद--वि ० [ फा०] लाभदायक । उपकारक। 

फायर--पु ० [ अ० फायर] १ आग। २ तोप, बदूक आदि दागने की किया 
या भाव। फर। 

फायर प्रिगेड--पु० [अ०] पुलिस विभाग के अतर्भत वह दल या वर्ग 
जिसका काम आग बुझाना, अकस्मात्‌ जमीन के नीचे दब जानेवाले 
लोगो को निकालना तथा इसी प्रकार के दूसरे काम करना होता 
है। 

फाया(---१० >+फाहा । 

फार--पु० [स० स्फार] १ खड। टुकडा। २ किसी प्रकार का चौड़ा, 
पतला भय का विस्तार। ३ वृक्षों के पत्ता का वह मुख्य, पतछा और 
चौड़ा अग जो इठल के आगे निकला रहता है। (लैमिना ) 
पु०-+फाल | 

फारखती--स्त्री ०[ अ० फारिग | फा० खती] १ रुपया अदा होने की 
रसीद | ऋण-मुक्ति का सूचक पत्र । २ वह कागज या लेख्य जिस पर यह 
लिखा हो कि अमुक व्यक्ति अपने अधिकार या उत्तरदायित्व आदि से 
पूर्णत मुक्त ही गया है और प्रस्तुत विषय से उसका कोई सबंध नहीं 
रह गया है। जैसे--बाप ने बंटे से फारखती लिखा छी है, भर्थात्‌ 
यह लिखा लिया है कि हमारी सम्पत्ति पर उसका कोई अधिकार नही 
है। 
क्रि० प्र०--लिखना ।--लिखाना । 

फारना--स ० >फाइना। 

फारस--पु० [० फार्म |] १ प्रार्थना, विवरण आदि से सबत्र रखनेवाले 
पत्रो आदि का वह निश्चित और विहित रूप जिनमे भिन्न-भिन्न शातव्य 
बातो का उल्लेख करने के लिए अछूग अलग कौष्ठक, स्तभ या स्थान 
बने होते है। रूपक। २ इस प्रकार का बना अथवा छा हुआ कोई 
कागज। ३ खेलों आदि भे, खिलाड़ी की वह शारीरिक और मानसिक 


फारस 


स्वस्थ स्थिति जो उन्हें अच्छी तरह से क्लेलने मे समर्थ करती है। 
जैसे--क्रिकेट का अमुक खिलाडी फारम में नहीं है। 
पु० [अं० फार्म ] खेती-वारी की जमीन का वह बढ़ा खड या टुकड़ा जिसमें 
कुछ विशिष्ट रीतियों से अधिक मात्रा में चीजें बोई जाती हो अथवा 
पशु-पक्षी आदि पालन और वर्घन के लिए रखे जाते हो। (फार्म) 

फारस--पु० [स० पारस्य; फा० फ़ास] अफगानिस्तान के पद्चिचम का एक 
प्रसिद्ध देश जिसे आज-कल ईरान कहते हैं तथा जिसमे वैदिक युग मे 
आये छोग रहते थे, जहाँ कुछ दिनों बाद फारसी धर्म और अत्त मे 
इस्लाम का प्रचार हुआ था। 

फाश्सो---थि ० [ फा० फार्सी ] फारस या ईरान देश मे होने अथवा उससे 
सबंध रखनेवाला। फारस का। 
स्‍त्री० फारसी अर्थात्‌ आधुनिक ईरान की भाषा जो वस्तुत आय॑- 
परिवार की ही है। 

फारा--पु० १ >फार (फाल)। २.>-फरा (व्यजन ) | 

फारिग--विं० [अ० फारिय] १ जो अपना कोई काम करके निधिचन्त 
हो गया हो। जिसने किसी काम से छुट्टी पा छी हो। बे-फिक्र। २ 
जिसे क्रिसी प्रकार के बधन से छूटका रा मिल गया हो। मुक्त। स्वतत्र। 
आज्ञाद। ३ काम से फ्रसत पाया हुआ। सावकाश। अवकाश-प्राप्त। 

फारिग-खती--- स्त्री ० दे० 'फारखती' | 

फारिगुलबाल--वि० |अ० फारिग-उलूबाल] [भाव० फारिगुलबाली ] 
१. जिस पर बाल बराबर भी भार न रह गया हो। फलत सब प्रकार 
से बेफिक्र या तिरश्चित। २ जो सब प्रकार से सपन्न और सुखी हो। 

फारी--सरत्री ०->फरिया (ओढनी)। उदा०---चनौटा खीरोद फारी। 
-“जायसी । 

फार्स--पु० दे० 'फारम!। 

फाल--प० [स० फल |-अण्‌ वा4/फल +पज्‌] १ महादेव। २ बलदेव। 
३ कुछ विशिष्ट पौधों या फला के रेशों से बुना हुआ कपडा । 
विशेष---मध्य युग में रूई से बुना हुआ कपड़ा भी इसी के अन्तर्गत 
माना जाता थ।। 
४ रूई का पोषा। ५ फरसा। फावडा। 
पु० नी प्रकार की देवी परीक्षाओं या दिव्यों मे से एक जिसमे लोहे की 
तपाई हुई फाल अपराधी को चटाते थे और जीम के जलने पर उसे 
दोषी और ने जलने पर निर्दोष समझते थे । 
स्‍्त्री० छोड़े का ऊबा, चौकोर छड॒ जिसका सिरा नुकीला और पैना 
होता है और जो हठ की रूकडी के नीचे रूगा रहता है। कुस। कुसी । 
प्‌ृ०[स० प्लव ] १ चलने मे एक स्थान से उठाकर आगे के स्थान मे 
पैर डालना | डग। २ कूदने में उक्त प्रकार से एक के बाद रखा जाने- 
वाला दूसरा पर। फर्लाग। ३ उतनी दूरी जितनी उक्त क्रियाओ के 
समय एक के बाद दूसरा पैर रखने में पार की जाती है। 
करि० प्र ०--भरता --रखना। 
सुहा०--फाल बॉबना>-फर्लांग मारता। कूदकर एक स्थान से दूसरे 
स्थान पर जाना। उछलकर लाँघना । 
स्त्री०| स० फलक या हि० फाडना] १ किसी ठोस चीज का काटा या 
कतरा हुआ पतले दल का दुकड़ा। जैसे--सुपारी की फाल। २ सुपारी 
के कटे हुए टुकडं। छालिया। 








फावड़ी 





स्त्री ०[अ० फ्राल] रमल मे, पाँसा आदि फेंककर शुभ-अशुभ बतलाने 
की क्रिया | 
कि० प्र ०--देखना निकालना । 

फाल-कृष्ट--भू० ० [सं०तृ० त०] १ (खेत) जो जोता जा चुका दी। 
२ (अन्न) जो हल से जोते हुए खेत मे उपजा हो। ३ कृषि या खेती 
से प्राप्त होनेवाला । 

फालहु--वि०[?] १. (पदार्थ) जो उपयोग मे न आ रहा हो और या- 
ही पड़ा या रखा हुआ दहो। २ जो किसी काम का न ही। जिससे 
किसी प्रकार का काम न सरता हो। निरर्थक। रदी। जैमे--फालतू 
भादमी | 

फाल-मासा--१ ० [ म० +फा० ) वह ग़थ जिसे देखकर फाल की सहायता 
से शकुनों या शुभा-शुभ का विचार किया जाता है। 

फालसई--वि० [हि०फालसा+ ई (प्रत्य०) ] फालसे के रंग का। लूलाई 
लिये हुए कुछ कुछ नीला । 
पु० उक्त प्रकार का रग। 

फालसा--पु० [स० परुषक, पुरुष, प्रा० फरूस] १ एक प्रकार का छोटा 
पेड़ जिसमे छड़ी के आकार की सीधी डालियाँ चारो ओर निकलती 
हैं और उनमे दोनो ओर सात-आठ अगृल भर के गोल खुरदरे पत्ते तथा 
मटर के आकार के फल लगते हैं। २ उक्त वृक्ष का छोटा गोौलाकार 
फल जो वैद्यक मे, ज्वर, क्षय तथा वात को नष्ट करनेवाला माना गया 
है। 
पुं०/[? ] मंदानो में मागकर आया हुआा जगली पशु। 

फालिज--पु० [ अ० फालिज] अधंग या पक्षाघात नामक रोग। रूकवा | 
क्रि० प्र०--गिरना ।--मरना। 

फालदा--प्‌ ० [फा० फालद ] १ गेहूं के सत्त से बननेवाला एक प्रकार 
का पेय पदार्थ। २ निशास्ते, मैदे आदि का बना हुआ एक प्रकार का 
व्यजन जो सेवई की सरह का होता है और जो दरबत, कुलफी आवि 
के साथ खाया जाता है। 

फाल्गुन--पुं ० [सं०९५/फल+उनन्‌, गुक,+अण्‌] १. चांद्र वर्ष का अतिम 
महीना जो माघ के बाद और चंत के पहले पड़ता है। फागन। २, दूर्वा 
नामक सोम छता। ३ अर्जुन का एक नाम। ४. अर्जुन वृक्ष। ५ एक 
प्राचीन तीथं। ६ वृहस्पति का एक वर्ष जिसमे उसका उदय फास्गुनी 
नक्षत्र में होता है। 

फाल्युनिक--वि० [स० फल्गुनी या फाल्गुनी+ठक--इक ] १. फल्गुनीं 
नक्षेत्र-सबधी। २ फाल्गुनी की पूर्णिमा से सनध रखनेवाला। 
पु० फाब्युन मास। 

फाल्युनी--स्त्री० [स० फाल्गुत-+डीप] १ फाल्गुन मास की पूणिमा । 
२ पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र । 

फावडा--पु ० [ स० फाल; प्रा० फाड] [स्त्री० अल्पा० फावड़ी] मिट्टी 
खोदने का प्रसिद्ध उपकरण। फरसा। 
क्रि० प्र०--चलाना। 
मुहा०--फावड़ा बजना “खुदाई का काम आरभ होना । 

फावड़ोी--स्त्री० [हि० फावडा] १. छोटा फावडा । २, फावड़े के 
आकार का काठ का एक उपकरण जिससे घास, लीद, मैछा आदि हटाया 
जाता है । 





फादा 





फाद--वि० [फा० फाश] १ खुला हुआ। प्रवाट। स्पष्ट । 
मुहा०--परदा फाश होना- भेद या रहस्य खुलना। (प्राय बुरे 
प्रसगो मे) 

२ जिसके आगे या ऊपर का आवरण हट गया हो। अनावृत | 

फासला--पु० [अ० फासिल ] अवकाश सबधी दूरी। अतर। जैसे--दो 
मील का फासला । 

फासिज्म---१० -फैसिज्म । 

फासिस्ट--पु ० -- फैसिरट 

फासिद--वि० [अ० फासिद ] १ फसाद या उपद्रव खड़ा करनेबाला । 
२ खराबी या विकार पैदा करनेवाला । ३ बुरा। खोटा । 

फासिला--प्‌ ० --फासलछा । 

फास्फोरस--पु० [यूना०, अ०] एक ज्वलनशील अधातविफ तत्व जो 
अपने विशद्ध रूप मे नही परन्तु आक्सीजन, कैलसियम और मगनेशियम 
के साथ मिला हुआ पाया जाता है । 

फाहा--पु० [स० फाल- रूई, या स० पोत--कपड़ा, प्रा पोथ , हि० 
फोया | १ वैल, धी आदि में तर की हुई कपड़े की पट्टी या रूए का छच्छा। 
जैसे---अत र का फाहा। २ घाव, फोड़े आदि पर चिप्काया आनवाला 
कपड़े का वह टुकागा जिसमें मरहम लगी रहती है। 

फाहिशहा--वि० [अ० फाहिश] १ अत्यन्त दुषित। बहुत बरा। २ हेय। 

फाहिशा--सत्री ० [अ० फाहिशा | कुलटा । पुशचली। 

फाहुरा--पृ० फाबदा । 

फिफरना]---अ ०--फैव रना । 

फिकबाना]--स ० +“फेकेवाना । 

फिगक--पु० [स० कॉलिंग +पृषरो ०] -फिगा। 

फिगा >मु० [स० फिगक | छाल पजो, भूरे परो तथा पीली चोचवाला एक 
तरह बा पक्षी । फेगा । 

फिकई --स्त्री ० [? ] चने की तरह का एक माटा अन्च। (बदेल 

फिकर--स्त्री० - फिक्र । 

फिकरा--प्‌ ० | अ6 फिक्र ) / वाक्य। २ 
कही जानेवाली बाव। 
पद--फिकरेबाज । 
क्रि० प्र०--दैता ।+--बेताना । 
समुहा०--- (किसों का) फिकरा खलना धोखा देने के लिए किसी 
की बाही हुई बात का अभीष्ट परिणाम या फल हैं 


खंड ) 


दूसरों को धोखा दने के लिए 


होता । फिकरा 
बनाना या तराशना बोखा देने के लिए काई बात गठकर कहना । 
३ व्यगपूर्ण बात। 
मुहा ०--फिकरे ढालना या सुनाता>-व्यग्यपूर्ण बातें कहना । आवाजा 
फंसना । (किसी को) फिकरा देना या अताना - किसी का झठी आशा 
मे रखन या टालने के लिए इधर-उधर की बातें बनाना या बहानेवा जी 
करना ! 

फिकरेबाज--पु० [ अ० फिक्र | फा० बाज ] [भाव० फिकरेबाजी | 
१ वह जो लोगो को धोखा देने के लिए बातें गढ-गढकर कहता हो। 
आंसा-पट्टी दनेवाला। २. वह जो व्ययपूर्ण बातें कहने अथवा फबतियाँ 
कसने में अग्रणी या दक्ष हो। 

फिकवाना[--स ० फेकवाना । 


२० 











फिटक्तिरी 
फिकार|--प्‌० -फिकई (कदन्न) । 
फिकिर|--स्त्री ० -फिक्र । 
फिकेत--पु० [हिं० फेकना] [भाव० फिकेती] १ गतका-फरी, 


पटा-बनेदी आदि का खिलाडी । पटेबाज | २ बरछा या भाला 
फंक्कर चलानेवाला योद्धा। 

फिकती--स्त्री ० [ हि० फिकेती | ई (अत्य०) ] १ पटा-बनेठी चलाने का 
काम या विद्या। पटेबाजी। २ भारछा आदि फेककर चलाने की कला 
या तिद्या । 

फिक्र- स्त्री० [अ० फिक्र] १ वह मानसिक अवस्था जिसमे मन विक्षुब्ध 
होकर किसी हानेवाली अथवा बीती हुई बात या उसके परिणाम के सबंध 
म॑ बिक भाव से बार बार विचार करता रहता है और साथ ही 
भप्रभीन होता तथा दु खी रहता है। चिता । 
क्रि० प्र «--लगना । 
२ किसी बात के निवर्ह, पालन आदि के सबंध में होनेबाठा ध्यान। 

जैगे--उस रोगी को अपने बच्चों की चिता थी। 
कि० प्र ०-+हाना । 

३. कोर्द काम करने के लिए मन में किया जाने या हॉनेवाला विचार। 
ध्यान। उदा०--अब मौत नकारा आन बजा चलने की फिक्र करो 
बाबा ।--नजी र। ४ उपाय की उद्धावना या विचार । यल्त। 
तदब्रीर। जैसे--अब तुम हमे छाड दो और अपनी फिक्र करो। ५ 
साहित्य भे, काव्य-रचना के लिए किया जानेवाला पितन या विचार । 

फिक्रमद--वि० [फा० फिक्रमद] जिसे फिक्र या चिता छगी हुई हो। 

फिचकुर--पु० [स० पिछ --लार | मूच्छा के समय मुँह में से निकलनेवाली 
झाग या फेनत । 
क्ि० प्र०--निकलना ।-“बहेना । 

फिट--वि० [अ० फिट ] १ उपयुक्त | ठीक। मुनासिय। २ जिसके 
राब अग-उपाण या कल-युरजे बिलकुल ठीक या दुरुग्त हो। हर तरह 
से तैयार । 
सुहा०--- (कल या मशीन) फिट करता -्येत्न वे पृरजे आदि यथा- 
स्थान वैठाकर उसे दीक तरह से काम करने के योग्य बनाता । 
३ जोनाप आदि के विचार से ठीक या पूरा हो। अपने स्थान पर ठीक 
बैठनेवाला । उपयक्‍त । जैरे--उन्हें यह जता फिद आशेगा । 
पु० मिर्गी आदि रागो का वह दौरा जिसमे आदमी बेहाश हो जाता है 
और उसके मुँह से ज्ञाग आदि निकलने लगती है। 
स्त्री ० -फिटफार । 

फिटकार--रत्री ० [हि० फिट (अनु०) कार [प्रत्य०)] १ विक्‍कार। 
लानत। 
क्रि० प०--खाना ।-दैता ।--पड़ता ।-सुनतना । 
मुहा०--मुंह पर फिटकार बरसना>-चेहरा बहुत ही फीका या उतरा 
हुआ होना। मुंख की काति न रहना । आहत दोना। (किसी की) 
फिटकार लगना -किसी के फिटकारने का परिणाम दिखाई देना । 
२ हककी मिलावट | 

फिटकिरी--स्त्री ० [स० स्फटिवा ] सफेद रग का एक प्रसिद्ध खनिज पदार्थ 
जो पत्थर के डे की तरह होता और प्राय औपध के काम आता है। 
(एलम) 


फिटकी 


फिटकी--स्त्री० [अनु०] १ सूत के छोटे-छोटे फूचरे जो कपडे की 
बुनाबट में निकले रहते हैं। २. छीटा | ३. फटकी। 
स्त्री०5८फिटकिरी। 

फिटन--स्त्री० [अ०] पुरानी चाल की एव. तरह की चार पहियोवाली 
बड़ी घोडा-गाड़ी जिरामे एक या दो घोड़े जोते जाते थे । 

फिटर--पु० [अ० | १९, कलो के पुरजे दुस्स्त करने और यत्रों में उन्हें 
यथास्थान बैठानेवाला मिस्तरी । २ वह दरजी जो सिले हुए कपडो 
को किसी की नाप-जोख के बराबर करता हो । 

फिट्सन--प० [देश० ] कठसेमल का छोटा ब॒क्ष जिसकी पत्तियाँ चारे के 
काम में आती है। 

फिट्टा--वि० [हि० फिट] जो फटकार खा-खा कर निर्लेज्ज हो गया हो। 
फंटकार खाने का अभ्यस्त | जैस---फिट्टे मूह । 
पद--फिट़ें मुंह -तुम्हारे मुँह पर फिटकार पड़े। तुम्हे ध्रिक्कार है । 

फितना--पृ०  [अ० फिल'] १ अकस्मात्‌ होनेवाला उपद्रव॥। २ 
उस्पात। उपद्रव। ३ देगा-फसाद । लडाई-झगड़ा। ४ बगावत ! 
विद्रोह । 
कि० प्र०--उठना ।--उठाना।--खडा करना । 
५ ऐसा व्यक्ति जो बहुत ही दुष्ट प्रकृति का हो तथा दूगरो से छडाई- 
झगरणा करता रहता हो। ६ एक प्रकार का पौधा और उसका फूछ। 
७ एक प्रकार का इतर । 

फितरत--रत्नी ० [अ० फित्रत] १ स्वभाव। प्रकृति; २ सृष्टि । ३ 
चालाकी। चालबाजी। ४ शरारत | 

फितरती--वि० [अ० फिसती ] १ चतुर। होशियार। २ 
धर्त । ३ शरारत बरनेवाला । 

फितरी--वि० [अ० फिल्नी] १ प्राकृतिक । २ जन्म-जात। सहज । 

फितूर--पु० >फलूर । 

फित्रिया--वि ० फतूरिया । 

फिदबी--वि० [अ० फिदवी] १ रवामी-गक्त । आज्ञाबारी। २ 
किसी के लिए जान तक निछावर करनेवाला । ३ निवेदक । 
पु० दास । सेवक) (स्वयं अपने सम्बन्ध में, नम्नतासूचक ) 

फिदा--प ० [ अ० फिदा | १ किसी पर कुछ ल्यौछायर या बलिदान करना । 
२ किसी के लिए आत्म-बलिदान करना। ३ आसकक्‍त होने की अवस्था 
या भातर । 
वि० १ दूसरे के लिए आत्म-बलिदान करनेवाला । २ अपने आप को 
किसी पर निछाबर करनेवाछा । ३ पूर्णूप रो आसकक्‍त । 

फिदाई--वि० [अ० फिदाई] १ प्राण निछावर करनेवाझा। आत्म- 
बलिदान करनेबाला । २ जा किसी के प्रेम में पूर्ण तरह से पागल हो 
रहा हो। 
पु० १ भक्‍ल। २ 

फिद्दा|--पु ० 5 पिहा। 

फिनगा]--प्‌ ० > भुनगा । 

फिनिया--स्त्री ० [ देश० ] कानो मे पहनने का एक आभूषण । 

फिनीज--स्त्री ० [स्पे० पिनद्ध] एक प्रकार की छोटी ताव जिस पर दो 
मस्तूल होते है। 

फिफरी]--स्त्री ०>पपडी। 





चालाक । 


आदएिक | 


श्रै 





फिपफ--पु०5-फेफड़ा। (राज०) 

फिया--स्त्री ० [स० प्लीहा] प्लीहा | तित्ली। 

फिरंग--पु० [अ० फ्राक] १ यूरोप का देश। गोरो का भुल्फ । फिरगि- 
सस्‍्तान । २ आतशक या गरमी नामक रोग | 

फिरंगिस्तान--प१० [अ० फ्राक+फा० स्तान] फिरगियो के रहने का देश । 
गोरों का देश, यरोप। 

फिरंगी--वि० [हि० फिरग ] १ फिरग देश में उत्पन्न । २ फिरग देश 
से सबंध रखनेबाला। ३. फिरग रोग से सबंध रखनेवाला । 
पु० फिरंग देश अर्थात यूरोप का निवासी। (उपेक्षा सूचक ) 
सत्री० विलायती तलवार । 

फिरंंट--वि० [अ० फ्रन्ट] प्रतिकक। विरुद्ध । (केवल व्यतितियों के सर्व 
में प्रशकत ) जैमे--आज-कल वह हमसे फिर्ट हो गया है। 

फिरदर--वि० [हि० फिरना >घमना ] १ बराबर इधर-उधर घमता- 
फिरता रहनेवाला । २ बराबर इधर-उधर घृमते-फिरते रहने या 
उससे सबंध रखनेवाला। जैसे--फिरदर अवस्था में रहनेताली जंगली 
जातियाँ । 

फिर--अव्य० [हि० फिरना] १ जैसा एकबार हो सका हा, बैगा ही 
दूसरी बार भी। एक बार और । दोबारा | पुन । जेगे--(क) इस 
बार तो छोड देता हैं, फिर कभी ऐसा काम मत करता। (ख) उनके 
मकान के बाद फिर एक बगीचा पश्ता है । 
पव--फिर फिर एक से अधिक बार। बार बार । 
२ भविष्य में क्रमी या किसी समय । जैसे--फिर आना तो बाते 
होगी। ३ कोई बात हो चुकने पर। पीछे। अनतर। उपरात। बाद । 
जैंे---अरा उससे बाते शुरू करो, फिर देखों कि वह क्‍या क्या 
करता है। 
पव---फिर क्या है | >-तब क्या पूछना है | तब तो कोर्ट अडचन ही 
नही है। जेसे--अगर आप वहाँ चले जायें ता फिर क्‍या है ? 
५ इसके अतिरिक्त । इसक्रेशिवाय। जैसे--फिर यह भी तो है कि बहु 
कहाँ जाकर बैठ रहे । 

फिरक--सरत्री ० [6ि० फिरना ] एक प्रकार की छोटी गाड़ी जिस पर देहाती 
लोग चीजो को लछादकर इपर-उधर के जाते है (रटेल्खण्ड ) 

फिरकना---अ० [हिं० फिरना] १ फिरकी की तरह घमना । 
किसी अक्ष पर घूमता या चक्‍कर लगाना। २ विरना । 
नानना । 

फिरका--प्‌ृ० [अ० फिके ] १ जाति। २ बग्गं। ३ गिरोह। जन्था। 
४ पथ। सप्रदाय । ५ अफरीदियों, पर्तूनी आदि में कोई विशिष्ट 
बर्ग जा अलग जाति के रूप मे रहता हो। 

फिरकी--स्त्री ० [हिं० फिरकना] १ चमडे, दफ्ती, धातु आदि का बह 
गोछरूया चक्राकार टकडा जो बीच की कीलो को एक स्थान पर टिकाकर 
उसके ज्ारों ओर घूमता हो। २ छड़कों का एक प्रकार का छोटा 
खिलौना जो घुमाने से अपनी घुरी पर जोरों से घुमता हुआ चवकर 
लगाता है । फिरहरी । भेंभीरी। ३ चकई या खकरो नाम का 
खिलौना । ४ धातु, लकडी या और किसी चीज का बढ़ गाल टुकड़ 
जो चरखे, तकले आदि मे लूगा रहता है। ५ मालखभ की एक कस्त रत 
जिसमे जिधर के हाथ से मालखभ लपटते हैं उसी ओर गद्देन झुकाकर 


न पीली -+ ० तल ++न 5 


फिरकी दंड 
फुरती से हुसरे हाथ के कधे पर मालखभ को छेते हुए उड़ान करते हैं। 
६ कुश्ती का एक दाँव या पेंच । 

फिरफी दंड---१० [हि० ] एक प्रकार की कसरत या दड जिसमे दड करते 
समय दोनों हाथी को जमीन पर जमाकर उनके बीच में से सिर देकर 
चारो ओर चक्‍कर लगाते है। 

फिरकेबदी-- स्त्री ० [फा० फिके बदी] दलबदी। 

फिरकंया- -स्त्री० [हिं० फिरना ] १ घृमने या चक्कर लगाने की क्रिया 
या भाव। उदा०--फिरकैया ले निर्ने अठायन, बिच बिच तान रसीली | 
“+ललित किशोरी । २ दे० फिरकी। 

फिरगाना --प्‌ ० --फिरगी। 

फिरता--वि० [हिं० फिरना या फेरना] १ जो जाकर फिर आया हो। 
लौटा हुआ । ९ जो फेर दिया गया हो। छीटाया या वापस किया हुआ। 
जैसे---फिरता माल । ३ जा घूृम-फिर रहा हो अथवा घूम-फिर कर 
कोई काम कारता हो। 
पु० १ फिरने, लौटने या वापस होने की अवस्था क्रिया या भाव । 
२ फेरने, लौटने या बापस करने की क्रिया या भाव । ३. दलाली 
के रूप में मिलनेवाला धन । (दलाल) 

फिरवोौस--पु० [अ० फिदौंस] १ वाटिका। 
बहिश्त । 

फिरदौसी- - वि? | ज० फिल्देंगी ] स्पर्ग मे रहनवाला । 
प० फारसी भाषा का एक महान कवि जिसकी प्रसिद्ध रचना 'शाहनामा' 
महाका-य है । 

फिरना--अ 6 [हि० फेरना बा अ०] १ किसी चीज का ऐसी स्थिति में 
आना, होना या छाया जाना कि वह किसी अक्ष या धरी पर अथवा किसी 
विशिप्ट प्र मे या मार्ग पर घूमने या चक्कर याने लगे। जैसे--(क) 
चवकी वा पहिया फिरता। (स्प) सनका या माला फिरना। २ किसी 
दिश मे घृमना या मुउना अधवा घुमाया या मांडा जाना | सुझना । 
जैसे-- (+%) ताले गे ताड़ी फिरना । (ख) यह गली आगे चलकर 
दाहिती आर फिर गई है। ३ किसी मार्ग या पथ पर किसी का घृमना, 
विशेष बार बार चक्कर लगाना | जैम--गली मे नोरा या शहर 
में सिपाहिया का फिरना । ४ जहाँ से कोई चला हो उसका छौटकर 
फिर बरी आना या पहुब्राना । वापस लौटना । जैसे--साजन अब 
क्या फिरेगे । ५ जो चीज जहाँ से आई हो उसका वही वापस भेजा 
जाता। जैगे--बिका हुआ माल फिरना । ६ सूचना आदि के रूप मे 
सब के सामने घुमाया जाना | जैसे--(क) ड्॒ग्गी या डोगी फिरना । 
(सा) टुट्राईफिर्ता। ७ घूम, मुठ या पलटकर विरुद्ध दिशा मे आना । 
जगे--पीछे की ओर मुँह फिरना । 
महा ०--जी फिरता->चित्त विरक्‍्त होना । 
८ उत्मग होना | जैसे--श्यान फिरना । 
मुह ०--किसो और फिरना-प्रवृत्त होना । 
९ लाक्षणिक अर्थ में, पहले से बिलकुल विपरीत स्थिति मे आना । 
दशा बदलना । जैगे--- (क) किस्मत फिरना। (ख) दिन फिरना। 
१० सामान्य या साधारण अवस्था की अपेक्षा हीन अवस्था को प्राप्त 
होना । जैसे---(क) बुद्धि फिरनसा । (ख) आंखें फिरना । (सर 
जाना) 


बाग । २ रवर्ग। 


१२ 





फिर्का 


न ऑअओ अिथ जनजिनलनण नूतआा ऑन 





मुहा०--सिर फिरना >-बुद्धि भ्रष्ट होना । हर बात उलटी समझ में 
आता। 
११ कही हुई बात या दिये हुए वचन पर दृढ़ न रहना । मुकरना । 
१२ किसी तरल पदार्थ का पोता जाना । जैसे--कमरे में चूना या 
दरवाजो पर रंग फिरना। १३. धीरे से मला जाना। जैसे--सिर पर 
हाथ फिरना। १४ गुदा से गृह या विष्टा का त्यागा जाना । जैसे-- 
झाडा या टट्टी फिरना । 

फिरनी--स्त्री० [?] चीनी, मेवे आदि से यूकत एक प्रकार का 
खाद्य जो दूध मे चौरठे को उबाल तथा जमाकर तैयार किया जाता है । 

फिरवा--१० [हि फिरना] १ गले मे पहनने का एक आशभूषण। 
२ सोने के तार में कई फेरे डाछकर बनाई जानेवाली अँगृठी। 

फिरवाना--स० [हिं० फेरना का प्रे०] फेरने का काम दूसरे से कराता । 

फिराई--स्त्री ० [ हि० फिराना ] फिराने या फेंरने की क्रिया, भाव या 
मजदूरी। 

फिराऊ --वि० [हि० फिरना] १ जो लौट रहा हो। वापस आने या 
लौटनेवाला। जैसे--फिराऊ मेला। २. जिसके सबंध मे यह निरुचय 
हो कि कोई छर्त पूरी होने या न होने की दशा में फेरा या लौटाया जा 
सकेगा। जैगे---फिराऊ रेहन। ३ दे० 'जाक। 

फिराक--प१० [ अ० फिराक] १ वियोग । बिछोह। २ किसी बाल की 
अपेक्षा या आवश्यकता होने पर उसके सबंध की चिता या सोच | जैसे-- 
नौकरी के फिराक मे इध२-उधर घृमना । 
+सत्री० -फ्राक। 

फिराद (4ि)--स्त्री ०>फरियाद। 

फिराना--स० [ हिं० फिरता] १ फिरने मे प्रवुत करता। ऐसा काम 
करना जिससे कोई या कुछ फिरने छगे। २ घुमाता, टहलाता या सैर 
कराना। हे चारों ओर चबक्‍कर देना। घुमाना। ४ ऐडना। 
मरोडना। ५ वापस करना। लौटाना। ६ दे० फंरना । 

फिरारौ--वि० फरार | 

फिरारी--सत्री ० देश० ] ताश के खेल मे उतनी जीत जितनी एक हाथ 
चलने मे होती है। एक चाल की जीत। 
बवि० “फरार (भागा हुआ ) | 

फिरि--क्रि० वि०८"फिर। 

फिरियाद-- स्त्री ० >फरियाद । 

फिरियादी--वि ० --फरियादी । 

फिरिश्ता--पु ० रूफरिष्ता । 

फिरिहरा--पृ० [ हिए फिरना ] एक प्रकार की चिड़िया जिसकी छाती 
लाल और पीठ काल रग की होती है। 

फिरिहरो--स्त्री० [हिं० फिरना +हारा (प्रत्य०)] फिरकी नाम का 
खिलौना । 

फिरोती--रत्री ० [ हि? फेरना ] १ फिराने या फेरने की क्रिया, भाव या 
मजदूरी । २ वह धन जो दुकानदार किसी बेची हुई वस्तु को वापस 
लेते वक्‍त विक्रय-मल्य मे से काट लेते है। २ वापण आन या लौटने 
का भाव। 
पद--फिरौती में-म्आती या लौटती बार। वापसी मे। 

फिका[--पु ० फिरका । 





फिलहुकीकत २३ 


फ़िल्हकीकत---अव्य ० [ अ० फिलहकीकत | हकीकत से | सचमुच | वस्तुत । 

फिलहाल---जव्य० [ अ०फिलहाल | इस समय। अभी | 

फिल्म--स्त्री० [अं० फिल्‍म] [वि० फिल्‍मी] १. फोटो या छाया-चित्र 
उतारने के ठिए रासायनिक क्रिया से बनाई हुई एक प्रकार की लबी 
पट्टी । २ उबत प्रकार की वह पट्टी जिस पर चल-चित्र या सिनेमा 
के चित्र अक्ित होते है। २. उक्त की सहायता से दिखाया जानेबाला 
चल-चित्र । 

फिल्मी--वि० [अ० फ़िल्म+हि ० ई (प्रत्य०)] १ फिल्म-सबधी। फिल्म 
का। ५ चल-चित्र या सिनेमा सबधी। जैसे--फिल्मी गाने । 

फिलली--स्बी ० | देश० | १. लोहे की छड का एक टुकड़ा जो जुलाहों के 
करणे मे तूर मे लगाया जाता है। 
स्त्री० --पिंडली। 

फिस--अव्य ० [ अनु० ] कुछ भी नहीं। (व्यग्य) जैसे--टाँय टाँय फिस। 

फिसड़्डी--वि० [अनु० फिस] [भाव० फिसट्डीपन] १ जो किसी 
प्रकार की प्रतियोगिता मे सबसे पीछे रह गया हो या हार गया हो । 
२ सबसे पिछडा हुआ। ३. जिससे कुछ करते-धरते न बनता हो। 
अकर्मण्य । निकम्मा। 

फिसफिसाना--अ० [ अनु ० फिस ] ढीला, मद या शिथिल पडना या होना । 

फिसलन--स्त्री ० [ हि० फिसलना ] १. फिसलने की क्रिया या भाव। 
२ एसा स्थान जहाँ से अथवा जहाँ पर कोई फिसलता हो। ३ ऐसा 
स्थान जहाँ कोई चिकताई आदि के कारण पर फिसलता हो । 

फिसलना---अ० [स० प्रसरण] १ किसी स्थान पर काई, चिकनाहूट, 
ढाल आदि के कारण पैरो, हाथो भादि का ठीक तरह से जमकर न बैठना 
और फरूुत उस पर रगड खाते हुए कुछ दूर आगे बढ जाना। रपटना। 
जैसे-- (क) सीढ़ियों पर पेर फिसलने के कारण नीचे आ मिरना। 
(बे) शीशे पर हाथ फिसलना। २ छाक्षणिक रूप मे किसी प्रकार 
का आकर्षक या लाभदायक तत्त्व देखकर उचित मार्ग से भ्रष्ट होते 
हैए सहसा उस ओर प्रवृत होना। जैसे--तुम तो कोई अच्छी चीज 
देखकर तुरत फिसल पडते हो। 
सय)० %०--जाना ।--पड़ना । 
वि० जिसपर सहज में कुछ या कोई फिसछ सकता है। फिसलनवाला। 
जैसे--फिसलना पत्थर। 

फिसराना--स ० [ हि" फिसलना का स०] किसी को फिसलने मे प्रवृत 
करना । 

फिहरिस्त--स्त्री ०>-फेहरिस्त (सूची) । 

फीचला---स ० <फीचना । 

फी--अव्य ० [ अ० फी ]हर एक। प्रत्येक । जैसे---फी आदमी दो आने लगेंगे। 
सत्री०| अनु ०] ऐब। त्रुटि। दोष । 
क्रि० प्र०--निकालना। 
स्त्री० [अ० फी] फीस | 

फीचना--स ० [ अनु ० फिच्‌ फिच्‌ ] कपडे को गीला करके और बार बार 
पटकक र साफ करना। पछाडना । 

फीक--रत्री ० ? ] चाबक की मार। 

फीका---वि० [स० अपक्क; प्रा० अपिक्क] १ (खाद्य पदार्थ) जिसमे 
आवश्यक, उपयुक्त अथवा यथेष्ट मिठास, रस अथवा स्वाद न हो। जैसे--- 





फी सपी 


फीका दूध (जिसमे यथेप्ट मिठास न हो), फीकी तरकारी (जिसमे 
यथेष्ट नमक-मिर्च न हो)। २ (रग) जो यभेष्ट चमकीका या तेज 
न हो। धूमिल। मलित। जैसे--चार दिन मे ही साडी का रग फीका 
हो जायगा। ३ (बेल, तमाशा आदि) जिसमे आनद की प्राप्ति न 
हुई हो। ४ (पदार्थ या व्यक्ति) काति, तेज, प्रभा आदि से रहित या 
हीन। जैसे--मुझे-देखते ही उसके चेहरे का रग फीका पड़ गया। 
मुहा०-- (किसी व्यक्षित का) फीका पड़ना >रूज्जित होते के कारण 
निःप्रभ या क्ली-हत होना। 
५ जिसका अभीष्ट या यथेष्ट परिणाम ने हुआ द्वो अथवा प्रभाव न 
पडा हो। उदा०---नीकी दई अनाकनी, फीकी परी गहा रि ।--बिहारी। 
६ (व्यक्ति का शरीर) जो हलके ज्वर के कारण कुछ गरप्त और 
तेजहीन या सुस्त हो गया हो। (स्त्रियाँ) जैसे-- हाथ लगाकर देखा 
तो पिडा फीका लहगा। 

कीता--पु० [पुतें०] १ सूत आदि की बनी हुई बहुत कप चौटी और बहुत 
अधिक लबी वह घज्जी या पट्टी जी कई प्रकार की चीजे बंधन और कई 
प्रकार क॑ कपडो पर टाकने के काम आती है। जैसे-जुता बांधने का फीता, 
साडी पर ठाॉँकने का फीता। २ उक्त प्रकार की वह धण्जी या पट्टी 
जिस पर इचो आदि के चिह्न बने होते है और जो चीज़ों की ऊँचाई, 
गहराई, लूबाई आदि नापने के काम आती है। (टेप) 

फीफरी--स्त्री ० >-फेफरी । 

फीरती---स्त्री ०>फिरनी (खाद्य पदार्थ )। 

फीरोज्--वि० [फा० फीरोज्ञ] १ विजयी। २ सफल। ३ सुस्ती और 
सम्पन्न। ४. भाग्यवान्‌ | फीरोजे के रग का। हरापन लिये पीछे 
रग का। 

फीरोजा--१० [फा० फीरीज्ञ] एक प्रकार का बहुमूल्य पत्थर या रत्न 
जो हरापन लिये नीले रग का होता है। 

फोरोजी--वि० [ फा० फीरोज्ी ] फीराजे के रंग का । हृरापन लिये नीछा | 
पु० उक्त प्रकार का रग। 

फील---पु० [फा० फील | हाथी। 

फीललाना--पु० [फा० | वह स्थान जिसमे हाथी रखे जाते हे । हस्तिशाला | 
हृथिसार। 

फीलपा--पु० [फा०] एक प्रकार का रोग जिसम पैर या हाथ फूलकर 
बहुत मोटा हो जाता है। 

फीलपाया--पु० [फा० फीलपा] ६ इंटो का बना हुआ वहू मादा खभा 
जिस पर छत ठहराई जाती है। २ पाँव सूजने का एक रोग । 
पु०--फीलपा (रोग)। 

फीलवान---पु०-न्महावत (हाथीवान) | 

फीला--पु० [फा० फील ] शतरज के खेल मे हाथी नाम का मोहरा। 

फीली---स्त्री ०-<पिंडली । 

फीस--स्त्री ० [अ० फी] १ कुछ विशिष्ट व्यवसायियों को उनके विशिष्ट 
कृत्यो के बदले मे पारिअ्भिक के रूप मे दिया जानेवाला धन। जैसे--- 
डाक्टर या वकील की फीस। २ वह धन जो विद्यार्थी को किसी विद्या- 
लय मे शिक्षा ग्रहण करने के बदले में मासिक रूप रो देना पडता है। 
शुल्क । ३ कर। 

फी सदी--अव्य० [फा० फी सदी ] हर सी के हिसाब से। प्रतिगत्त। 


फुंकना 





फुकना--अ० [हिं० फूंकना का जअ० रूप| १ वस्तु जादि का जतकर 
पूणतया भरम होना। जैसे--मकान या शब फुँंकना। २ वाय्‌ 
का फ कर किसी में भरा जाना। जैसे--गुब्बारा फुंडना। ३ धन 
आदि का बहुत ही बरी तरह से और व्यर्थ बरबाद या व्यय होना । 
प्‌ १ थातु, बास आदि की वह पतली नली जिससे हवा फुककर 
आय सुडगाई जाती है। २ भाभी। ३ फुंकेया। (द०) ४ गुरदा 
(उरीर का अग)। 

फुकरना-- अ० | हिं० फूंकार | फूल्कार करना। फूँ फूं शब्द करना। 

फ्कवाना--रा०| हि फूंकना का प्रे० | फूंकन का काम दूसर से कराना। 

फंकाना--भ० फुववाना। 

फुकार--स्त्री ० - फूलार। 

फुकारना -अ०5८ फुंकरना। 

फुकैया--पृ० | हिं० फूकना ] ६ हवा फूँकने या फुँककर भरनेवाला व्यक्ति। 
» छाये भन नप्ट, बरबाद या व्यय करनेवाला व्यक्ति। 

फुंदना प०[हि० फूल | फदा/] [स्श्री० अत्पा> फूँदिया] १ कछी, 
फूल आदि के रूप में ऊन, सूत आदि की बनी हुई बह छाटी गाँठ या लच्छी 
जा दुपट्ट चादर, साड़ी आदि के किनार पर बनी या लगी हुई झालर के 
नीच छटकार्य जाती है। २ उक्त आकार-प्रकार की कोई गाँठ। जैसे-- 
त राजू की डडी का फंदना। 

फदारा|--वि० | हि फुदना ] जिसमे फुंदने टके या लगे हो। 

फुंदिया--रत्री ० (० फुंदना का स्त्री० अल्पा० । 

फदो--रर्स, ० बिदी। 

फूसी-- रखे ० [ स. पतलिका, पा० फनस ] रक्त आदि के विकार के कारण 
स्व घी पर लिवालनागला ऐसा छोटा दाना जिसमे कुछ मवाद भी हो। 

फुआ- -रत्री० -यजा। 

फुआरा--पु० >फेहारा। 

फुकना--रत्री ० [ हि? फैकना | १ फुकने की अवस्था या भाव। २ दाह। 
जलन । 

फुकना--अ० फंकना 
पु० | स्ती० अल्पा० फुबनी] वह नली जिससे फूंक मारकर आग 
सुलगात है। 

फुकनी-- सी ० हि० फुकना का रत्री० अल्पा ० । 

फुकाना-- २ ०--फुकाना । 

फुक्क-- वि ० | हि? फुंकना ] १ जा जलते या जलछाये जाने पर पूर्णत 
भगम हा गया हो। २ (धन) जो पूर्णत बरबाद या व्यर्थ व्यय हो 
चुका है । 
20288 248 88, 

फ्वक्‌ू--वि० [ हिए फूकना ) १ 
साठ ऊरनेबाला । 

फुचड़ा “पु ० [देश० ] वुनावटवाली वस्तुओ मे बाहर निकला हुआ सूत 
था रेशा। जैसे--इस झोठे में जगह-जगह फुचड निकल आये है। 
कि० प्र ०--भिकलछना। 

फुजला--प6 [ अ० फूजल ] १ जूठा बचा हुआ भोजन। जूठन। २ 
बना हुआ रही अदा। सीठी। ३ मैछ। डे गुह। मरू। 

फुट--वि० [स० झफूट| १ जिसका जोडा न हो। एकाकी । अकेला। 


फूकने या भस्म करनेवाला । २ घन व्यर्थ 


२४ 


पुटंस 


२ जो किसी क्रमया श्ूखला से अलग हो। पृथक्‌ | जुदा। 
वि० [हि० फूटता ] टूटा हुआ। जैसे--फुटमत। 
पु०[अ०] १ लबाई चापने का एक उपकरण जो १२ इच लवा होता 
है। २. उबत लंबाई का मान। 

फुटक--पु० --फूटका। उदा०--पानी पर पराग परि ऐसी बीर फुटक 
भरी आरसि जैसी [--नददास । 

फुटकर--वि० [स० स्फुट | हि? कर ([प्रत्य०)] १ जो युग्म न हो । 
जिसका जोर या जाड़ा न हो। अयुग्म। २ जो किसो विशिष्ट मद या 
बर्ग में न हो ओर इसी कारण उन सबस अलग रहकर अपना अलग 
वर्ग बनाता हा। भिन्न भिन्नया अनेक प्रकार का। कई मेल का। जैमे--- 
फूटकर कविता, फूटकर खर्च, फूटकर चीजो की दूकान। ३ (माल 
था सादा) जा इफटठा या एक साथ नहीं, बतिक अछंग अलग या खडो 
में आता या रहता हों। थोक' का विपर्याय। जैसे--फूटकर मार 
बेचनेवाला दुकानदार । 

फुटकल--वि० फूठकर। 

फुटका--१० | स० रफ़ोटफ] [स्त्री० अतन्या० फटकी] १ फफोला। 
छाला। २ उबन आकार-प्रकार का काई छोटा दाग या धव्बा। ३ 
उक्त आका र-प्रका र का काई छोटा कण। 
क्रि० प्र--पडना । 
४ भुती हुई ज्यार, धान, म+के आदि का छावा। 
प१०|* ] ऊल का रस पकाने का बड़ा कडाहा। 

फुटकी--स्नी ० [स० ५टक] १ किसी वस्तु के छोटे छच्छे, या जमे हुए 
कण जो किसी तरल पदार्थ मे अछग अलहूग ऊपर त्तरते हुए दिखाई पड़ते 
है। बहुत छाटी अठी। जैसै---(क) जब दूध फट जाता है तब उसके 
ऊपर फुटकियो-सी दिखाई पड़ती हैं। (व) रोगी के. कफ (था थूक) 
में खन को फुटफियाँ दिखाई देती है। ३. फूदकी (चिड़िया )। 

फुट-नोट---पु० [अ० ] पाद-टिप्पणी । 

फ़ुटन्‍बाल--पु० [अ०] १ हवा भरा हुआ रबड़ का वह् बडा रेद जिस 
पर चमटे की खोली भी चढ़ी हाती है तथा जिसे पैर की ठोकर से उछा- 
कर खेला जाता है। २ गेद से खेला जानेबाला खेल। 

फुट-मत--पु० [हि० फूटना #स० मत | १ ऐसी स्थिति जिसमे दो 
या अधिक पक्षों विशेषत. परिवार, सरथा आदि के विभिन्न सदस्यों में 
किसी बात के सावंत में कई पररपर विरोधी मत होते है। मत-भेद। 
२ फूट। (देखे) 

फूटहरा[--पृ० -फटेहरा । 

फूटा--पु० [अ० फुट) लंबाई नापने का वह उपकरण जिस पर इच्नो 
और फूटों वे निशान और जक बने रहते है। (फूट रूल) 

फुटेहरा--पु० [हि० फूटना | हरा हूफल | १ ज्वार, मकई आदि का 
भुना हुआ वह दाना जो फूटकर खिल गया हो। ९ खूब जोरां की 
हँसी । 
मुहा ०--फुटेहरा फुटना व्जोर की हँसी हाना। (ज्यग्य) 

फुटेलड---वि० उफूट्टेल। 

फुट्ट--वि० दे० फूट'। 

फुटूक--पु० [स० | [स्त्री० फुट्टिका] एक तरह का कपड़ा। 

फुट्टेल---वि० [स० स्फूट, पा० फुट +ऐल (प्रत्य०)| १ पक्षी या पशु 








फूतूर 


जो झुड्द या दल से फूटकर अलग ही गया हो। २ जो अपने जोड़े के 
साथ न रहता हो। ३ बदविस्मत। हत-भाग्य। 

फुहुरय--पु०--फत्र। 

फुतूरिया--वि०5-फतुरिया । 

फुत्री--वि० >फतूरिया। 

कुत्कार--पु०  फ्त्कार। 

फुल्कुंत--४० ० [स०] फूंका हुआ। 

फुल्कृति--स्त्री० [स० फूर्‌/क | वित| फृत्कृति (फरकार)। 

फुदकना--अ० [अनु०] १ थाई थोदी दूर पर उछलते हुए यहाँ से 
वहाँ था वहाँ से यहाँ आल-जाते रहना । जैसे--चिडिया का पेडा 
की डालिया पर फुदकना । २ उमंग में जाकर अथवा प्रसप्नतापूर्वक 
उछलते हुए इधर-उधर आना-जाना। 

फुदकी--जी० [हि० फदकतला | १ फुंदककर एक स्थान से दूसर स्थान 
पर जाने का भाव । 
क्रि० १०--भरना । 
२ एक प्रकार की छोटी चिटिया जा उछल-उछलकर गा फुदकती हुई 
चलती है। ३ टिह्ली । 

कुमंग--पु० -फनगा। 

फुन--अव्य6 [स6 पुन ] १ पुन । फिरख। २ और। ३ 

फुनक--स्त्री० १ फुलक्कार। २ - फनग्री (छाटा फुनगा ) । 

फुनकार--स्त्री ० >फ्त्कार। 

फुनगा--पु० |? ै [स्त्री० अल्पा० फुगगी] १ वृक्षकी झाखा 
का अग्र भाग जिसमे कोमल पत्ते हाते है। फूनग । २ आछ, कपास 
जादि की फसलछां का एक रोग । सूंडी । 

फुनना---१० -फुँदना । 

फुनि*--अव्य० _ फून (फिर) । 
पद--फुनि फुनि (क) बार-बार | (ख) रह-रहकर । 

फुप्फूस---१० [स०] [वि० फौप्फूसीय] फेफडा। 








भी। 


फुफ्फेदी--रत्री० १ -फुबती (नीवी) ।२  फफुंदी। 
फुफकाना---अ० फुफकारना | 


फुफकार--रत्री० [अनु०| १ फुर्फकाश्ने की किया था भाव। ० 
मेंह से निकाछा जानेवाला फूँ फू शब्द । फफकारने से होने-वाला 
ठाब्द। जैसे--बैल या साप की फफकार । 

फुफकारना--अ० [हि० फफकार| क्रोघ मे आकर मूँह से फं फ 
करना (जिससे आधात करने का भाव भी सूचित होता हे )। फ्त्कार 
करना । 

फुफी---स्त्री ०--फू्फी (बूआ)। 

फुफनी--रत्री ०-फर्फूदी । 

फुफू--स्त्री०>फ्फी (बूआ)। 

फुफेरा--नवि० [हिं० फूफा | एरा (प्रत्य०) | [रज्ी० फूफेरी] १ फूफा- 
सबधी। २ फूफा से उत्पन्न। जैसे--फुफेरा भाई। 

फ़ुर--वि० [हिं० फुरना| सत्य। सन्‍्चा। उदा०--पिता बचन फर 
चाहिअ कीन्हा ।--तुलूसी । 
अव्य० सभ्तमुत्न। वास्तव में । 
पु० [अनु०] पक्षियों के उड़ने पर होनेवाला जब्द । 

४-4 


१५ 


फ्र्सौ 


पद--फुर से 5 (क ) फुर शब्द करते हुए। (व) एकाएक । जल्दी से। 

फुरकत--स्त्री० [अ०» फुर्कल] वियोग। जुदाई। बिछोह । 

फुरकना--स० [अनु०] जुलाहों की बोली मे किसी वस्तु को मुंह से 
चबाकर साँस के जोर से धूकना। 
अ० फडकना। 

फुरकाना--स ० “फडकाना । 

फुरती- स्त्री० [स० स्फर्ति] [वि० फूरतीला] १ स्वस्थ शरीर का 
वह गण जिससे कोई उमग से तथा शीक्रतापूर्वक किसी काम मे प्रवुत्त 
या सलग्न हाता तथा अपेक्षाकृत थोड़े समय में ही उसका सपादन करता 
है। २ भीघता। 
क्रि० प्र०--करना | 

फुरतीका--वि० [हि फुरती |ईला (प्रत्य०) | [स्त्री० फुरतीली] 
१ जिसमे फुरती हो। फुरती से काम करनेवाला। २. बहुत तेज 
चलनेवाला। 

फुरन--स्त्री ० [हि फुरना] फ्रते की क्रिया या भाव। 

फुरना--अ० [स० स्फ्रण, प्रा० फुरण] [भाव० फुरन] १ स्फुरित 
होना। उदभृत या प्रकट होना। निकलना। जैसे--मुंह से बात 
फ््‌रना। २ ठीक या पूरा उतरना। सत्य सिद्ध होना। ३ अर्थ 
या आशय समझ में आना । ४ किसी सोची हुई बात का पूरा या सफल 
होना। ५ चमकरना। ६ परो का फइफडाना। 

फुरनी-दाना--१० [फुरती ? + हि० दाना] एक प्रकार का चबैना जिसमे 
चना और जिठवा एक साथ मिला रहता है और जो प्राय घी या तेल 
में भना हुआ होता है । 

फुरफ्र--स्ती ० [अनु० | पक्षियों के उडते समय तथा परो के फडफडाने 
से उत्पन्न होनेवाला दब्द । 

फुरफ्राना--अ० [अनु० फूर फ्र| [भाव० फुरफुराहट] १ फिसी 
चीज का उस प्रकार हिलना कि उससे फुर फुर शब्द हो। जैसे--चिडियो 
या फतिगा का फ्रफ्राना। २ फहराना। 
स० १ कोई चीज इस प्रकार हिलना कि उससे फुर फुर शब्द हो। 
२ फडफडाना। 

फुरफुराहट--स्त्री० [अनु०] फुर फुर गब्द करने या होने की क्रिया या 
भाष। 

फुरफुरी--स्त्री० [अनु० फर फूर] १ कुछ समय तक बराबर होता 
रहनेवाला फूर कर शब्द। 
सुहा०--(चिड़ियो का) फुरफ्री हेना -उडने के लिए पख फड़फडाना | 

फुरमान---१० फरमान। 

फुरसाना --स ० -उफरमाना । 

फुरसत--स्त्री० [अ० फर्सत] १ अवसर। समय। २ हाथ मे कोई 
काम न होने के कारण अवकाश का समय। 
कि० प्र ०--देना ।--निकवालना ।--पाना (--मिलना । 
पव--फुरसत से ->अवकाश के समय । 
३ झझर, बखेटे, रोग आदि से होनेवाली मुक्ति। 

फुरसा--पु० [?] बालू के रग का एक प्रकार का छोटा कितु भीषण 
साँप । 

फुरसी--स्त्री ० [ ? ] एक प्रकार की सजा जो किसी अपराधी को सजा 


फुरहरना 





भोगते रहने की दशा में फिर पहले का-सा अपराध करने पर दी जाती 
है और पहले मिली हुई सजा के साथ जोड़ दी जाती है। 

फुरहरना--अ० [स० स्फ्रण] फूटकर लिकलना। प्रादुर्भूत होना। 

फुरहरा--पु० [हिं० फुरना>-स्फुरण] १ ज्वार, मकई आदि के दानो 
का वह खिला हुआ रूप जो उन्हे भूनने पर प्राप्त होता है । २ खूब 
जोरों की हँसी। ठहाका।! 
क्रि० प्र०--फूटना। 

फुरहरी--स्त्री० [अनु०] १ फुर फुर शब्द करने या होने की अवस्था 
या भाव। फुरफ्राहट। २ पक्षियों फे पर फडफड़ाने का शब्द। 
भुहा ०--(पक्षिप्रों का) फुरहरी लाना या सेना --पक्षियों का मग्न 
हँकर अपने पर फडइफडाना। 
३ कपड़े आदि के हवा में हिलने की क्रिया या शब्द । फरफराहुट । 
४ सरदी, भय आदि के कारण ह्ोनेवाली थरथ राहुट या रोमांच । 
रोमाचयुक्‍त कप। 
क़ि० प्रः--आना ।--खाना ।--लेना । 
५ वह सीक जिसके सिरे पर हलकी रूई लछपेटी हो और जो तेल, इत्र, 
दवा आदि में डुबोकर काम मे लाई जाय। 

फुरामा--स ० [हिं० फुर] १ कथन आदि पूरा उतारना। सच्चा 
ठहूरावा। २. प्रमाणित या सिद्ध करना। 
अ०>-फुरता। 

फूरिं “-वि०फुर | 

फुरेरी]|-स्त्री ०-फुरहूरी। 

फुरैर-सत्री० [अनु० फुर ] १ आवेश। जोश। २. साहस। 
हिम्मत। (बुदेल० ) उदा०--देशराज के साथ अपने को पाकर 
बिक्रम को फ्रेरू आ गई ।--वृुन्दावनलाल वर्मा। 

फुरें--अव्य० [हि० फुरना] सचमुच । 

फुर्तो--स्त्री ० ->फुरती । 

फुसंस--रत्री ० - फुरसत | 

फुछंगो--स्त्री ० [हिं० फूल ? ] पहाड़ी में होनेवाली जगली भाँग का वह 
पौधा जिसमे बीज बिलकुल नहीं रूगते (कलगो से भिन्न )। 

फुल---१० [हिं० फूल] हि? फूल' का यह सक्षिप्त रूप जो उसे समस्त 
पद के आरम में लगने पर प्राप्त होता है। जैसे--फुलझड़ी, फुलवारी 
आदि। 
पु०-फूछ। (पद्िचम ) 

फुलई--रत्री ० [हिं० फूल] वनस्पतियों मे वह्‌ सीका जिसके अगले भाग 
मे फूल छगे होते हैं। जैसे--सरकर्ड की फुलई। 

फुूलका--वि० [हिं० 'हुलका' का अनु ०] फूछ की तरह हलका। फूल जैसा। 
जैसे---हुलका फूछका। 
पु० [स्त्री० अल्पा० फुलकी] १ हलकी और फूली हुई रोटी। 
अपाती । २ एक प्रकार का छोटा कडाहा जिसमे रस से चीनी 
बनाई जाती है। ३ छाला। फफोला। 

फुछकारी--सत्री० [हिं० फूल-+-कारी ([प्रत्य० )] १ कपड़े पर सूत 
ध्रादि से फूल-पत्तियाँ बनाने का काम। २ एक प्रकार का कपडा जिसमे 
मामूली मलमल आदि पर रगीन रेशमी डोरियों से फूल-बूटियाँ आदि 
काढ़ी हुई होती है। 


फुलचुही--सत्री ०--फुलसुंघनी (चिड़िया)। 


फुशाना 


फुलझड़ी--स्त्री० [हि० फूल+झड़ना] १. छोटी, पतली डडी की तरह 
की एक प्रकार की आतिशबाजी जिससे फूल की-सी जिनगारियाँ 
निकलती है। २. छाक्षणिक अर्थ मे ऐसी बात जिसका मल उद्देश्य दो 
पक्षों मे क्षगडा कराकर स्वय तमाशा देखना होता है। 
क्रि० प्र०--छुटना ।--छोडना | 

फुछप्तरी---स्त्री ०--फूलझडी। 

फुलमी--स्त्री० [हि० फूलना] ऊसर भूमि में होनेवाली एक तरह 
की घास। 

फुलशा---पु ० <फुँदना । 

फुलवर--स्त्री० [हिं० फूल+वर (प्रत्य०)] एक वरह का बूटीदार 
रेशमी कपड़ा। 

फुलूुषा--पृ० [हिं० फूल] १ एक प्रकार की गोद जो उबटन तथा दकत्र 
के झृप मे काम आती है। २ एक प्रकार का बैछ। ३. देशी सफेद 
बालू) 
पु०-"फूल (पुष्प)। 

फुलवाई---स्त्री ० --फुलवारी । 

फुलवाड़ी--स्त्री ०--फूलवारी । 

फुलवार--वि० [स० फुल्ल] प्रफुत्ल। प्रसन्न। 

फुलवारा--१० [देश०] चिउली नाम का पेड़। 

फुलवारी--स्त्री० [हिं० फूल+वारी] १ वहे छोटा उद्यान या बगीचा 
जिसमे सुन्दर फूलो के पौधे ही हो, झाहियाँ या वृक्ष न हो। पुष्प-वाटिका। 
२ कागज के बने हुए फूल और पौधे जो तस्तों पर लगाकर विवाह 
में बरात के साथ शीभा के लिए निकाले जाते हैं। ३ छाक्षणिक रूप 
में, बाल-बच्चे जो माता-पिता के लिए परम आनन्ददायक होते हैं। 

फुलसरा--पु० [हिं० फूल+सार) काछे रंग की एक चिड़िया जिसके 
सिर पर छीटे द्वोते हैं। 

फुलसुंघी--स्त्री० [हि फूल+सूंघना] एक प्रसिद्ध छोटी चिड़िया 
जिसका रग नीछापन छिये काले रग का दह्वोता है तथा जो फूलछो पर फुद- 
कती तथा मेंडराती रहती है। इसका घोसजला बहुत ही सुन्दर तथा 
कलापूर्ण होता है। 

फुलहरा| ---१० [हिं> फूल+ हारा] सृत, रंशम आदि के बने हुए झब्बे- 
दार बदनवार जो उत्मयों मे द्वार पर लगाये जाते है। 
पु०-*फुलहारा (माली )। 

फुलहां->-वि० [हिं० फूल (घातु)] [स्त्री० फुलही] फूछ तामक 
घातु का घना हुआ। जैसे--फुलही बटलाही। 
पु०ल्‍फुलवा। 

फुलहारा--पु० [हिं० फूल+ह्वारा (प्रत्य०)] 
फूलहारी |] माली । 

फुलांग--सत्री ०-फुलगों (भाँग)। 

फुछाई--स्त्री० [हिं० फूलना | १ फुल हुए होने की अवस्था था भाव । 
२. फुलाने की क्रिया या भाव। ३ एक प्रकार फा बबूऊ जो पजाब मे 
सिघु और सतलज नदियों के बीच की पहाडियो पर होता है। फुलाह। 
४ दे० सर-फुलाई'। 

फुलामा--स० [हिं० फूलना] (- वृक्षा आदि को फूलों से युक्त करना। 


स्त्री. फूलहारिन, 


फु्लापल 


पुष्पित करमा। २ किसी चीज को फूलने मे प्रवत्त करना। के क्रिया 
करना जिससे कोई चीज हवा से भरकर फुल जाय। जैसे--गुब्बारा 
फुलाना, फूलका फुलाना। 
मुहा ०--गाल या मुंह फूलाना न्‍अभिमानपूर्वक रुष्ट होना। 
४ किगी को आनदित, पुलकित या प्रसन्न करमा। ४. किसी के मन 
में अभिमान या गर्व उत्पन्न करना। गवित करना। घमड बढ़ाना। 
जैसे--तुम्ही ने तो तारीफ कर करके उसे और फूला दिया है। 
पअ०<फ लना 

फुलायल---१० >फलेल | 

फुलाब--पु० [हि० फूलना] १ फले हुए होने की अवस्था, क्रिया या भाव। 
२ दे० 'फूलायट'। 

फुलावट--स्त्री० [हि० फूलना] १ किसी चीज के फूले हुए होने की 
अवस्था या भाव। फुलाव। २ वक्षा आदि के फूलने की अवस्था, 
क्रिया या भाव। 

फुलाआ--प० [हिं० फुल] स्त्रियों के सिर के बालो को गूँथने की डोरी 
जिसमे फल या फेंदने छगे रहते है। खजरा। 

फुलिग--पृ० [स० स्फलिंग, प्रा० फलिग |] चितगारी। 

फूछिया--स्त्री० [हि० फुल] १ किसी चीज का फूल की भाँति उभरा 
और फंला हुआ गाल सिरा। २ छोहे का एक प्रकार का बड़ा काँटा 
जिसका ऊपरी भाग या सिरा गोलाकार फैला हुआ होता है। ३ नाक 
में पहनने का फूल या लौग नाभ का गहना। 

फूुलिसकेप--१० [अ० फूल्सकंप] आकार के विचार से वह कागज जो 
१७ इच लबा और १२ इच चौडा होता है। 

फुलरिया--गजी ० [देश०] कपड़े क। वह टुकड़ा जो छोटे ब वो के चतड़ 
के नीच बिछाया जाता है। पोतदा । 

फुलेरा-- पु० [&० फूल] फल की बनी हुई छतरी जो देवताओं के ऊपर 
लगाई जाती है। 

फुलेला--१० [6हि० फल | तेल] फूर्लों की महक से सुवासित किया 
हुआ तल जा सिर में लगान के काम आता है। सुगधित तेल । 
पू० [हि० फूल] एक प्रकार का पहाड़ी वक्ष। 

फुलेली--रची ० [हि० फूडलेछ] काच आदि का वहू बडा बरतन जिसमें 
फुलल रखा जाता है। 

फुलेहरा--१० फलहूरा। 

फुलौरा--पु० [हि० फूल । बड़ा] [स्त्री० अल्पा० फुलौरी] चौरेठे, 
मैदे आदि के घोल को उबालकर बनाई जानेवाली एक तरह की बरी 
जो तले जाने पर काफी फूल जाती है। 

फुलौरी--स्त्री ० --छोटा फुलौरा। 

फुल्ल--वि० [स०९/फुल्ल (खिलना) +अच्‌] १ फूला हुआ। विक- 
सित। २ प्रसन्न। हृषित। 
पु० फूल। पुष्प। 

फुललदाम (न्‌)--पु० [स० ष० त०] उन्नीस वर्णों की एक वृत्ति जिसके 
प्रत्येक चरण मे ६, ७, ८, ९, १०, ११ और १७वाँ वर्ण लघु होता है। 

फुल्छा--१० [हिं० फुलना] १ अक्न का वह दाना जो सेंकने से फूल गया 
हो। फुरेहरा। (पश्चिम) २ खील। ३ फूली हुई या फूल की 
तरह की कोई चीज। ४ आँख का फूली नामक रोग । 








२७ 


फुछली--स्त्री: [हिं० फूछ] १ फूल के आकार का कोई आभूषण या 
उसका कोई भाग। २ दे० 'फुछिया। ३ दे० फूली'। 

फुवाश[|--६ ०*-फुदारा । 

कुस--१० [अनु०] वह शब्द जो मुंह से फूटकर साफ न निकले) बहुत 
धीमी आवाज । जैसे--फुस से किसी के कान में कुछ कहना। 

फूसकारना---अ० [अनु ०] फूँंक मारता! फ्त्कार छोडना। 

फुसकी--स्त्री० [अनु०] १ किसी के कान में धीरे से कुछ कहुना। 
२ गुदा मार्ग से निकलनेवाली वहू हुवा जिससे एब्द नहीं होता | ठुसकी । 

फुप्तड़ा--१ ० 5फुचढ़ा । 

फुसफस्सन--स्त्री० [अनु०] १ किसी के कान के पास मुँह करके इतने 
घीरे से कुछ कहना कि आस-पास के लोग ने सुन सकें। २ इस प्रकार 
आपस में होनेवाली बात-चीत। काना-फुसी। (छ्िस्पर ) 

फुसफूसा--वि० [हिं० फूस या अनु० फुस] (१. जो दबाने से बहुत 
जल्दी चुर चूर हो जाय। जो कड़ा या करारा न हो। कमजोर और 
तरम। २. जिसमे तीव्रता न हो। मद। मद्धिम। 

फुसफुस्तामा--स ० [अनु०] फुसफूस शब्द करते हुए कुछ कहना। बहुत 
ही दबे हुए या धीमे स्वर से बोलता | 

कफुतलाना--स ० [हिं०] १ किसी को मोठी मीठी बातों से या बड़ी 
बड़ी आशाएँं दिलाकर अपने अनुकूल करना। जैरे---बच्चे या स्त्री 
को फूसछाना। २ छठे हुए व्यक्ति को मनाना। 
सयो० क्रि०--लेना | 

फुहार--सत्री ० [स० फ्ल्कार--फूफ से उठा हुआ पानी का छींटा या बुल- 
बुला] १ आकाश से बरसनेवाली पानी की बहुत द्वी छोटी छोटी 
बूँदें जो देखने में झरने या फुहारे से उड़नेवाली बूँदो के समान जान पड़ें। 
(ड्रिज्िल)। २ ऊपर से गिरनेवाली किसी तरल पदार्थ की बहुत 
छोटी छोटी बूंदें। जेसे--गुछाब जछ की फुहार। 
कि० प्र०--गिरता |--पड़ना । 

फुहारना--स ० [हि फुह्ार] किसी चीज को धोने, रंगने आदि के 
लिए उम पर किप्ली तरल पदार्थ की फूहार डालना। 

फुहारा--पु० [हिं० फुदार] १. एक विषिष्ट प्रकार का उपकरण 
जिसकी सहायता से पानी या किसी तरल पदार्थ की बहुत छोटी-छोटी 
बूंदें चारो ओर गिराई जाती हैं। जल यगत्र। २ जलऊ या किसी तरस 
पदार्थ की तेजधार। जैसे--सिर से खून का फुहारा छूटना। 
कि०्प्र ०--छूटना । 

फुही| स्त्री ०*फूही | 

फुहुंकना---अज ० ++फुफफा रना। उदा०--भृगृटि के कुडर वक्र मरोर, 
फूहुँकता अंध रोष फन खोल ?--पन्‍्त | 

पूँक-स्त्री० [अनु० फूफ्‌] (१. मृह से वेगपू्वंक निकाली जानेवाली 

हवा । 

क्रि० प्र०--मसारना । 

२ ए्वास-प्रषवास जो किसी के जीवित होने के सूचक होते हैं । 

सुहा०--एंक निकलना या निशल जाना -जहरीर से प्राण निकल जाता । 

मरना। 

३. किसी की ओर मत्र पढ़कर मुँह से छोही जानेवाली याय्‌ जो अनेक 

प्रकार के प्रभाव उत्पन्न करनेवाली मानी जाती है। 


फूंकता 


पव--झाइड़-फूंक । (देखें) 

फूंकना--स० [हिं० फूक] १ मुंह का विवर सरामटकार वेग के साथ 
हवा छोडना | होठो को चारो ओर से दबाकर झोक से हवा निकालना । 
जैसे--यह बाजा फूंकने से बजता है। 
सया० क्रि०--देना । 
मुहा ०---एूंक फूंककर चलना या पेर रखना बहुत ही सतक॑ तथा 
सावधान रहकर आगे बढना। 
२ शब्ब, बाँसुरी आदि मुंह से बजाये जानेबाले बाजों को फैंककर 
बजाना। जैसे--शख फूँकना। हे मत्र आदि पदकर किसी पर फूँंक 
मारना। ४ किसी के कान में धीर से काई ऐसी बात कहना जिसका 
कोई अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न हो। जैसे--न जाने किसने उन्हे फूक़ दिया 
है कि वे मुझसे नाराज हो गये है। ५ मूह की हवा छोरकर आग दह- 
काना या सुलगाना। फूंककर अग्नि प्रज्वलित करना। जैस--चूल्हा 
फूंकना । ६ पूरी तरह से भस्म करने के लिए आग लछगाना। जलाना । 
जैसे---किसी का घर या झोपटी फूंकना। ७ धातुओं का वैद्यक की 
रासायनिक रीति से अथवा जडी-बूटिया की सहायता से भरम करना । 
जैसे--सोना-फूँकना । ८ बूरी तरह से नष्ट या बरबाद करना । जैसे-- 
दुव्यंसनों मे धन या सम्पत्ति फूंकना। 
पद---फुंकना-तापना - सुख-भोग के लिए व्यर्थ और बहुत अधिक खर्च 
करना। उडाना। 
९ बहुत दु खी या सतप्त करना । 

फुंका--पु० [हि० फूंक] १ भाथी या चर से आग पर फूंक मारने 
की क्रिया या भाव । २ गौआं-मैसा के स्तनों से अधिक से अधिक दूध 
उतारने या निकालने की एक प्रक्रिया जिसमे बाँस की नली में चरपरी या 
झालदार चीजे (जैसे--मित्रे आदि) भरकर फूक मारते हुए उनके 
सतना के अन्दर इसलिए पहुँचा देते है कि वे अपने बच्चा के लिए दूध 
चुराकर न रख सके। ३ बाँस आदि की वह नली जिससे उबत क्रिया 
की जाती है। ४ छाहला। फफोला। 

फूंव--रत्री ०- फुँदना । 
पद--फूंब-फूंवारा -जिसमे बहुत से झब्बे या फँदने लगे हा। 

फूंवरी--स्त्री ० छोटा फुंदना। (बुन्देछ०) उदा०->गहरे छाल रगवाले 
फूला की फूँदरी छटक रही थी --वृन्दाबनलाल वर्मा। 

फूंदा | --पु० -फंदना | 

फुई--स्त्री ० --फही । 

फ्कना--स ० >-फंकना । 

फूजना--१० [* | अस्त-व्यस्त होना। बिखरना। (पूरब ) 

फूट--स्त्री० [हि फूटना) १ फूंटने की क्रिया या भाव। २ जिन 
लागा का आपस में मिलकर रहना या जो आपस में मिलकर रहते आये 
हा, उनमे उत्पन्न हीनेवाला पारस्परिक विरोध या वैमनस्य। आपसी 
अनबन या बिगाइ। 
पद---फूट-फटक--आपस मे होनेवाली अनबन या फूट । 
मुहा ०--फूट डालना पजो लोग मिलकर रहते हा उनमे भेद-भाव 
या विरोध उत्पन्न करना। 
३ एक प्रकार की बडी ककडी जो पकने पर प्राय खेतों में ही फट जाती 


है। 


२८ 





फ्हना 

फूटल--स्त्री ० [हि० फूटना ] १ फूटने की क्रिया या भाव। २ वह खड 
या टुकड़ा जो फूटकर अलग ही गया या निकल आया ही। ३. शरीर 
के जोड़ा भें होनवाली वह पीडा जिसभे अग फूटते हुए-से जान पड़ते 
है। जैसे---हडफुटन । 

फूटना---अ० [स० रफुटन ] १ मिट्टी, धातु आदि की बनी' हुई वस्तु का 
आधात लगने पर अथवा गिरने के फलस्वरूप अनेक छोटे-छोटे टकाड़ो 
में विभकत होना। जैसे--(क) शीजा फूटना। (ख) स्लेट फटना। 
२ विशेषत किसी कडी और प्राय गोलाकार चीज का आधात लगने 
पर या दबाव पडने पर दस प्रहार टुटना कि उसके अदर का अवकाश 
आस-पास के अवकाश के साथ मिलकर एक हो जाय। जैसे--मटका 
या हेंडिया फूटना। ३ शरीर के किसी अगर में ठोकर लगने पर उसमे 
से रत बहने लगा। जैसे--पाँव या सिर फ्टना। ४ अन्दर का 
दबाव पड़ते से अथवा किसी प्रकार की बाहरी क्रिया से किसी चीज का 
ऊपरी आवरण या स्तर फटना। जैसे--आँख फूटना, कटहल फूटना, 
फोड़ा फूटना। ५ रासायनिक पदार्था विशेषत गाले, बम आदि का 
घमाके के साथ फटना। विरफोट हीना । ६ किसी प्रकार गया रूप में 
ऊपर या बाहर आकर दब्य, प्रकट या स्पष्ट होना। जैसे-- (क) 
चन्द्रमा या सूच की किरणे फूटना। (ख) अग अग से झञाभा या सौदय 
फूटना। ७ किसी चीज का अपने ऊपरी आवरण को ताड़ या भेद कर 
वेगपूर्वक बाहर निकलना। जैसे--पहाड़ में से पानी का सीता फटता । 
< ऊपरी दबाव हटाकर निकलना । बाहर आना अथवा प्रकट होना । 
जेसे-- (क ) गरमी के कारण गरी र में दाने फूटना ! (ख) वतरपतियां 
में अकुर या वक्ष में डाले फूटना | 
मुहा ०--फूट पड़ना- मन में भरा हुआ आवेश बाहर लिकलना था 
निकालना। जैंसे--जी चाहा कि फूट प१"। फूट-फूटकर रोना -विछ्ख- 
बिलखकर रोना। बहुत विलाप करना। 
* उक्त के आधार पर शाखा के रूप मे अछूग हाकर कियी सी५भ में 
जाना। जैसे--थोड़ी दूर पर सड़क से एक और रास्ता फूटा है। १० 
कली का खिलकर फूल का रूप धारण करना। प्रस्फूटित होना। ११ 
मत-भेद, राग-द्वेष आदि होने पर दल, महछी, समाज आदि में से निकल 
क्र किसी का अरूग होना। जैसे-- (क) दल में से बहुत से लोग 
फूटकर विरोधियां में जा मिले है। (ख) इ्स मुकदमे का एक गवाह 
फूट गया है। १२ सयुकक्‍त या साथ न रहकर अलग हाना। जैरे--यह 
नर (पशु) अपनी मादा से फूट गया है। १३ शरीर के अगी या जाडी 
में ऐसा दर्द होना कि वह अग फटता हुआ-सा जान पड़े । फटना । 
मुहा ०--उंगलियाँ फूटना +खीचने या मोडने से उँगलिया के जोड़ा का 
खट खट बॉलना। उगलियाँ चटकना । 
१४ इस प्रकार या इतना अधिक विकृत हाना कि किसी काम का 
न रह जाय। जेसे--भाग्य फूटना। 
पव---फूटी आँखो का तारा---कोई ऐसी बहुत ही प्रिय वरतु जो उसी 
प्रकार की बहुत सी बस्तुओ के नप्ट हो जाने पर अकेली बच रही हो । 
जैसे--सात बच्चा मे यह एक बच्चा फूटी आँखों का तारा रह गया है । 
फूटी कौडी >वह टूटी हुई कौडी जिसका कुछ भी महत्त्व या मूल्य न रह 
गया हो। जैसे--इसे बेचने पर तो फूटी कौडी भी न मिलेगी। 
मुहा ०--फूटो आँखो न देख सकना--जरा भी देखने की प्रव॒ुत्ति या दचि 





फटा 


ने होना। जैसे--सौल के लड़कों को तो वह फुटी आँखों नहीं देख 
सकती। फूठी आँखो न भागा -तनिक भी अच्छा ने छगना। बहुत 
बुरा या अप्रिय छूगता। जैसे--तुम्हारा यह आवागमन मुझे फूटी 
आँखो नहीं भाता | फूटे मुँह ते न बोलना उसेक्षा, ढेप जादि के कारण 
किसी से साधारण बात-चीत भी न करना। 
१५ पानी का या तरल पदार्थ का इतना खौलना कि उसके तर पर 
छोटे छोटे बलबुला के समृह दिखाई देने छग। जैग--जब दूध 
(या पानी) फूटने छंगे, तब उसमे चावछू छोह देना। १६ पानी 
या किसी तरल पदार्थ का किसी तह के इस पार से उस पार 
निकलना ) जेसे--यह कागज अच्छा नहीं है, दंग एर रयाही फुटती 
है। १७ म॑ंह से शब्द उच्चरित होना या निकलना। जैसे--(क) 
लाख ममझ।ओ, पर वह मह से कुछ फूटता ही नहीं हैं। (से) अब भी 
तो मुँह से कुछ फुटो। १८ कोई गएत बाल, भेद या रहस्य सब पर 
प्रकट है| जाना। जैसे--देखों, यह बात कही फूटने न पावे, अर्थात्‌ 
किसी पर प्रकट ने होने पावे। 

फूटा--प० [ठि० फूटना] १ फसछ की वह बाले जो टूटकर खेतों मे 
गिर पहली है। २ झरीर के जोड़ो मे होनेवाला वह टरद जिसमे अग 
फूरते हुए जान पड़ते है। 
वि० [सरत्री० फूटी| १ जो फूट चुका हो। २ 
बिगड़ा हुआ। जैस--फूटी आँख। 

फुत्कार--१० [स० फूत्‌ ,/क्व । घत्र | वह झब्द जो कुछ जतुआ के वगपूर्वक 
सांस बहर निकालते समय होता है। फ-फू। जैसे--सॉप की फत्कार। 

फ्त्कूति-+7 मी ० [स० फत्‌4/क । क्तिन्‌ | फुत्कार। (६०) 

फूफा--प० [स्त्री० फूफी | [वि० फफेरा | राजन के विचार से फफी 
अर्थात बजा का पति। 

फूफी--सत्री ० [स० पितृश्वसा, पा० पितुल्च्छा पा० पिनच्छा ” ] बाप की 
बहन । बुआ। 

फूफू--रंत्रीए फूफी। 

फ्र--पृ० --फड। 

फूरना[--अ०-फूलना । 

फूल--प० [स० फतठ ] १ पौधा और वेक्षो वा वह प्रसिद्ध अग जो कुछ 
नियत ऋतुओ में गाल या लबी पखडिया के योग से गांठ जादि के रूप 
में बता होता है। कुसूम। पुष्प। सुमन। (फ्लाबर ) 
विशेष--वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से इसे पेड-पौधों की जननेद्रिय 
कहे सहते है, क्याकि फल उत्पन्न करनेवाला म्‌ 3 तत्त्व या शक्ति इसी 
में निहित होती है। भिन्न सिन्न फठो के आउार-प्रकार और रूप-रग 
भिन्न होत है और प्रत्येक वर्ग के फूल मे प्राथ कुछ अलग प्रवगर की और 
विभिन्न गत्र या सुगध भी होती है। लोक में फूल अपनी कोमलता, 
सुंदरता और हलकेपन के लिए प्रमिद्ध है। 
क्रि० प्र ०--चुनता ।>-अड़ना ।--निकलना ।--फूलना ।--लगना। 
-जजलाढना । 
पव-फूल-सा -बहुत ही पुन्दर,सुकुमार या हलका। फूलो की चादर +फलो 
से यूंथ कर चादर की तरह का बनाया हुआ वढ़ जार जा मुसऊमान पी रो 
आदि की कक्नो पर चढाते है। फूलों की छड़ी दे० 'फूल-छटी'। फूलों 
की सेज - -वह पलग या दण्या जिस पर सजावट और कामलरूता के लिए 


फलल खराब या 


२९ 


फल 


के 


फूलो की पखड़ियाँ फैछाई या बिछाई गई हा। (श्यूगार की एक सामग्री ) 
मुहा०-- (पेड़ पौधों में) फूल आना शाखाओं आदि में फूल उत्पन्न 
होना या निकलना । फुल उतरना >पेड-पौधों में से फूला का झइकर 
या तोई जाने पर इस प्रकार अलग होता कि काम में आ सके। जैरो-- 
बेल की इस क्यारी में रोज सेरो फूल उतरते है। फूल चुनना वक्षा 
के फुछ तोड़कर इकट्ठे करना। (किसी के मंह से) फूल झडना +-मंह 
से बहुत ही मनोहर और माठ। बाते निकलता, बहुत ही प्रिय-्भापी 
हाना। फूल सूंघ कर रहना -बहुत ही कम खाना। अत्यन्त अल्पाहारी 
होना। जैसे-- आप खाले तो क्या है, फूल संघकर रहने है। 

२ किमी चीज पर अकित किये या और किसी प्रकार बताये हुए फूल 
के आकार के बेल-बूटे या नककाणी। ३ फल के आफ़ार-प्रकार की 
बनाई हुई कोई चीज या रचना | जैसे-- (क ) कान या नाक में पहनने 
का फूल | (ख) मथानी के डडे के सिरे पर का फूल, कागज या चाँदी- 
सोने के फूल। 

मुहा०-- (किसी के गालो पर) फूल पड़ना बोलने, हेंसन आदि के 
सगय गालों पर छोटे गोलाकार गड्ढे से बनना जो सौंदर्यसू कक होते है। 
जैसे--जब यह बच्चा मुस्कराता है, तब इसके गाछा पर फूछ 
परते है। 

४ कोई ऐसी चीज जा देखने में वृक्षों के फुलो के आकार-प्रकार की हो । 
जैसे--चार फूल मेथी (सूखे हुए दान), दस फूल छौंग। ५ किसी 
प्रकार के चूर्ण का वह रूप जिसके दाने या रबे फूल की तरह खिले हुए 
और अलग हो। जैस--आएठ या चीनी के फूल। ६ किसी चीज का 
सत्त या सार। जैस--फुल शराब -सुरासार। ७ किसी पतले या 
द्रव पदार्थ को सुखाकर जमाया हुआ पत्तर या रवा। जैसे --अजवायन 
के फूठ, देशी स्थाही के फूल। ८ एक प्रकार करी मिश्र धातु जो तब 
और रांगे के मेल से बनती है। ९ दीपक की जलती हुई बत्ती पर पड़े 
हुए गोल दमकते दाने जो उभरे हुए मालम होते है। गुल। 

क्रि० प्र०--क्षदना ।--झाइना । 

मुहा ०--- (वीपक की) फूछ करना--दीआ बलड्माना। 

१० शरीर पर पडनेवाला वह लालगा सर्फद धतन्‍्बा जा श्वेत कुण्ठ 
नामक रोग होने पर होता है। ११ स्त्रियों का वह रक्त जो मासिक 
धर्म मे निकलता है। रज। पुष्प। 

क्रि० प्र ०--आना। 

पद--फूल फे दिन स्त्री के रजस्वला होने के दित। उदा०--स० 
महीने मे कुढाते थे मझे फूल के दिन। बारे अब की ता मरे टल गये 
मामूल के दिन ।--रगीन। 

१२ स्त्रियों का गर्भागय। १३ घुटने या पैर की गोल हल्‍्डी। 
चक्‍की। टिकिया। १४ शव जलाने के बाद मृत शरीर की बची हुई 
हडिडियाँ जो प्राय इकट्ठी करके किसी पवित्र जलाशय या नदी मे 
फेकी या प्रवाहित की जाती है। 

क्ि० प्र ०--चुनना। 

स्‍त्री० [हि फूलना | १ बुक्षों आदि के फूलने की अवस्था, क्रिया या 
भाव। फलावट। २ मन के फूलने अर्थात्‌ प्रफुल्लित होने की अवस्था 
या भाव। प्रसन्नता। प्रफुल्लता। उदा०--मृग नैसी दृग की फरक, 
उर उछाह, तन फूल।--बिहारी | 





फूलकारी 


वि० (रगों के सबंध मे ) साधारण से कम गहरा । । (गौ० पदो 
के आरम में सीम' और हवा' की तरह प्रयुक्त) | जैसे--इस साडी का 
रग गुलाबी तो नहीं, हाँ फूल-गुलाबी कहा जा सकता है। 

फूलकारी--स्त्री ० [हि० फूल |-फा० कारी ] १ बेल-बूटे बनाने का काम । 
२ दे० 'फूलकारी'। 

फूलगोभी--रती ० [ हि० फूल |-गोभी ] एक प्रकार का पौधा जिसमे बड़े 
फूल के आकार का बेधा हुआ ठोस पिड होता है। यह तरकारी के काम 
आती है। गोमी। 

फल-छडी---स्त्री ० [हि०] १ श्यूगार, सजावट आदि के काम आनेवाली 
वह छ 2 जिसके चारो ओर बहुत से फुल टाँके या बाँघे गये हो। 
२ चित्रा, मतियों आदि में उक्त प्रकार का चित्रण या लक्षण। 

फ्लझाइ--प१० [हिं०] कॉस आदि की (फुली के आकार की ) सीका का 
बना हुआ झाठ, जिससे महीन धल बहुत अच्छी तरह साफ होती है। 

फूल-डोल--पृ० [वि० फुल | डाल] चैत्र शुक्ल एकादशी को मनाया 
जानेबाला एक उत्सव जिसमे देवता की मृति को फूलों के हिंडोले मे 
रखकर झुलाते है । 

फूल ढोक--पु० [? ] १ प्राय हाथ भर लबी एक प्रकार की मछली जो 
भारत के राभी प्राता में पाई जाती है । 

फूलवान---प्‌ृ० [हि० फल | फा० दान [प्रत्य०) ] मिट्टी, धातूृ, शीक्ष 
आदि का वह पान जिसमे दाग के लिए, फूठ, गुलदस्ते आदि छगराकर 
रखे जाते है। मुलदान । 

फूलदार- -वि० [ हि० फूल | दार (प्रत्य०) | जिस पर बेल-बूटे बने अर्थात्‌ 
फुलकारी का काम हआ हो । 

फुूलना--अ० [हि० फूल । ना (प्रत्य०) ] १ पौधों, वृक्षों आदि का फूलों 
से युवत हीना । पुष्पित होना। जैसे--बवह पौधा वसत में फूलता है। 
मुहा 7-- (किसी व्यक्ति का) फुछना-फलना--लापक्ष णिक रूप में, 
घन धान्य, सतति आदि स॑ परिपूर्ण और सुखी रहना । सब तरह से 
बढदना और सम्मन्न होना। 
२ कछो का सपुट इस प्रकार खुलना कि उसकी परथडियाँ चारो ओर से 
पूरे फूल का रूप धारण कर छे। ३ छाक्षणिक रूप में बहुत अधिक 
आनंद या उल्डास से युक्त हीना। बहुत प्रसन्न या मगन होता । 
सुहा ०--फूले अग ने समाना आनंद का इतना अधिक उद्बेग होना कि 
बिना प्रकट किये रहा न जाय। अत्यत आनदित होता । फूले फिरना 
या फुले फूले फिरना बहुत अधिक आनद, उत्साह या उमग से भरकर 
निश्चित भाव रे इधर-उधर घृमना। उदा०--स्वतत्र सिरताज फिरत 
कूवत मक॑ फूठे।--दीनदबाल गिरि। 
४ छाक्षणिक रूप में, मन में विशेष अभिमान या गये का 
अतुभव करता। जैसे--अपनी प्रशसा सुनकर वहू फूल जाता है। 
५ किसी वस्तु के भीतरी अवकाश में किसी चीज के भर जाने 
के कारण उसका ऊपरी या बाहरी तरल बहुत अधिक उभर 
आना या ऊचा हो जाना। जैसे--(क) हवा भरने से गेंद 
फूछना। (स्व) वाय का विकार होने या बहुत अधिक भोजन करने पर 
पेट फलना। ६ उक्त के आधार पर अभिमान, रोप आदि के कारण 
किसी से रूठना या कुछ समय के लिए विरवत होना। जैसे--हम 
उनके यहाँ नहीं जायगे, आज-कल वे हमसे फूले हुए हैं। ७. आघात, 





झू्हा 


आँतरिक विकार आदि के कारण शरीर के किसी अगर का कुछ उभर 
आना। सूजना। जैसे--इतने जोर का तमाचा छूगा है कि गाल फूल 
गया है। ८. किसी व्यक्तित का असाधारण रूप से मोटा या स्थूल 
होना। जैरो--उसका शरीर बादी से फूला है। 

फूल-पत्ती--स्त्री० [हि०] १ वे फूल-पत्ते जो देवी-देवताओं को श्रढाये 
जाते हैं। २ वनस्पति विज्ञान मे किसी फूल का प्रत्येक दल अथवा 
पत्ती के आकार का अग। (फ्लॉवर-लीफ ) 

फूल-पान--वि० [हि० फूल--पान] (फूल या पान के समान) बहुत ही 
कोमल) नाजुक! 

फूल-बत्ती--स्त्री० [हि०] देवताओं की आरती आदि के लिए बनाई 
जानेवाली रूई की एक प्रकार की बत्ती जिसके नीचे का भाग खिले 
हुए फूछ की तरह गोलाकार फैला हुआ होता है। 

फूल-बाग--पु० [हि० | अ०] वह छोटा बगीचा जिसमे केबल फूलों के 
पौधे हो । 

फूल बिरज--पृ० [हि० फूल + बिरज ] एक प्रकार का बढिया घान। 

फूल-भाँग--स्त्री ० [ हि० फूल--भाँग ] हिमालय में होनेवाली एक प्रकार 
की भाँग। फलगों। 

फूलमती--स्त्री ० [हिं० फूल |-मत (प्रत्य०) ] एक देवी जो शीवला रोग 
की अधिप्ठाती मानी जाती है। 

फूल-बाला--वि० [हि फूल-+-वाला (प्रत्य०)] १ फूला से युक्‍्त। 
२ फूलों कर्थात्‌ बेल-बुटो का काम जिस पर हुआ हो । 
पु० [स्त्री० फूलवाली] गाली, विज्येषत फूल बेचनेवाल] व्यवित । 

फूल-वाराब--स्त्री ० दे० सुरासार'। 

फूल-सेंपेल--वि० [हि० फूल +साँप] बैल या गाय जिसका एक सींग 
दाहिनी ओर और दूसरा बाईं ओर गया हो। 

फूछ सुंघनी--स्त्री ०<-फल-सुंघनी । 

फूला--पृ० [हि० फूलना ] १, भुने हुए अनाज की खीरलू। + पक्षियां 
को होनेवाला एक प्रकार का रोग। ३ गन्ने का रस पकाने का बढ़ा 
कड़ाहा। ४ फूली (आँख का रोग)। 

फूली--स्त्री० [हि० फूल] १ सफ्फंद दाग जो आँख की पु।ली पर पड़ 
जाता है और जिमसे दृष्टि में बाधा होती है। २ एक प्रकार की 
सज्जी। ३ एक प्रकार की हूई। 

फूस--पु० [स० तुष ,पा० मूस, फूस | १ एक प्रकार की घास जो सुखा 
कर छप्पर आदि डालने के काम आती है। २ तृण। तिनका। 
बवि० फूस की तरह बहुत ही तुच्छ या हीन। उदा०--प्रम मास अधि 
फूस ए सखि, जडवा में फूटेला बालि।--य्राम्य गीत । 

फुहु--स्त्री ० -फूही (फहार)। 

फूहड--वि० [7] [भाव० फूहडपन ] १ सम्यो की दृष्टि से, अश्लीकू 
और हेय। जैसे--फूहड शब्द। २ (व्यक्ति) जो उजड्ड या गेवार 
हो तथा जिसे किसी बात का शऊर न होी। ३ बहुत ही निकम्मा 
(व्यक्ति ) । 

फूहड़पत--१ु० [हि० फूहड-+ पन (प्रत्य०)] फूहड़ होने की अवस्था 
या भाव । 

फुहर--वि० >फूहड। 

फूहा--प१० [देश०| रूई का गाल्य। फाह्या। 


ब्छ्लानर लत - 


ख्ब>श. रद. इटटूनकत 





फ्‌ह्लौ ३१ 


फूही-स्त्री ० [हिं० फृहार] १ पानी का महीन छीटा। सूक्ष्म जलू-कण। 
२ बरसनेवाले, पानी की छोटी छोटी बूँदो की झ्डी। झ्ीसी। जैसे--- 
फूही फूही तालाब भरता है। उदा०--निशि के तम में झर धर, हलूकी 
जल की फही, धरती को कर गई सजरू ।--पन्‍त । ३ घी, दूध, मलाई 
आदि के ऊपर दिखाई देनेवाल चिकनाई के छोटे छोटे कण। ४ 
फफूदी। भुकडी। 

फेंक--स्त्री० [हि० फेंकना] फेंकने की क्रिया या भाव। 
वि० फेकनवाला (समस्त पदो के अत में)। जैसे--दिल-फेक औरत 
या मरद। 

फेंक्ना--स० [स० प्रेषण, प्रा० पेखण] १ हाथ मे ली हुई वस्तु जीर या 
झटके से इस प्रकार छोडना कि वह उडती-उद्ती कुछ दूर जा गिरे। 
जैसे---(क ) ईट, पत्थर या रोडा फेंकना । (ख) नदी में जाल फेकना । 
२ हाथ में ली हुई कोई चीज इस प्रकार पकड से अलग करना कि वह 
नीचे जा गिरे। गिरा या छोड दना। जैसे--पाठ्शालछा से 
घर आते समग लड़का रास्ते मे किताब कही फेंक आया। 
३. किसी प्रकार की कमानी, दाब आदि से दबी हुई चीज के प्रति ऐसी 
फिया करना कि बहू जोर या झटके से दूर जा गिरे। जैसे---कमान 
रे तीर या ताप से गाला फेकना। ४ असावधानी, आलरूस्य, भर आाद 
फे कारण चीज या चीजे अस्त-व्यस्त रूप मे इधर-उधर फैलाना या 
छोड दना। जैसे--कपडईे (या पुस्तके) इस तरह फेंका मत करो, 
संभाल कर रखना सीखो। ५ उपक्षापूर्वक कोई चीज किसी के आगे 
पटकना। जैसे---बच्चा बस्ता फेंककर उसी समय कही चला गया। 
६ आपात, प्रहार आदि के उद्देश्य से अथवा ठीक लक्ष्य पर पहुँचने के 
लिए बेगपूर्वक कोई चीज उछालछते हुए कही दूर पहुँचाना। जैसे--(क) 
चिड़ियों (या मछलियों) पर ढेले या पत्थर फेंकवा। (ख) खेल मे 
गेद फैंडना। ७ अनावश्यक और व्यर्थ समझकर दूर हटाना। जैसे-- 
ये पुराने कपड़े फेकी और नये कपड़े पहनो। ८ अनावश्यक रूप से 
या व्यर्थ व्यय करना। जैसे--तुम सौदा खरीदना नही जानते, यो दी 
झंपए फेंक आते हो। ९ जुए के खेल भे, उसका कोई उपकरण दाँव 
छामे के लिए चलना। जैसे--कौडी, गोटी, ताश आदि का पत्ता या 
पाँसा फेफना। १० शरीर के अगर के सबंध मे, उछालते या ऊपर 
उठात हुए नीचे गिराना या पटकना। जैसे--सह बच्चा नींद मे प्राय 
हाथ-पर फेंकता है। ११ क्रिकेट के खेल मे उछली हुई गेंद को ठीक न 
लोक पाने के कारण नीचे गिरा देना। १२. इस प्रकार ऊपर से कोई 
चीज गिराना कि नीचे से उसे कोई लोक छे । १३ कुझती मे प्रतिद्वद्द 
को जमीन पर गिराना या पटकना। १४ काम-घधन्धे आदि के सबंध मे, 
स्‍्त्रय पूरा न करके उदासीनता या उपेक्षापूर्वक इसरो पर उसका भार 
डाऊना। जैमे---तुम सब काम मुझ पर फेककर निर्षिचत हो जाते हो। 

फेंकरना--अ ० +फेकरना । 

फेंकान(--अ० [हिं० फेंकना ] फेका जाता। 

फेंट--स्त्री ० [हिं० पेट या पेटी] १ कमर के चारो ओर का घेरा। २ 
घोती का लबाई के बल का उतना अश जो ररसे की तरह मरोडकर 
कुमर के चारो ओर बाँघा या छूपेटा जाता है। फेटा। (मुहा० के 
लिए दे० फेंटा के मुहा०) । ३ घुमाव। फेरा। लपेट। 
स्त्री० [हिं० फेंटना ] फेटने की क्रिया या भाव। जैसे--ताश के 





फेमका 








पत्तों की फेंट। 

फेंटया--स ० [स० पिष्ट, प्रा० पिट्ठ+ना (प्रत्य०)] ६ किसी गाढ़े 
द्रव को इस प्रकार उंगलियो अथवा किसी उपकरण से बार बार हिंलाना 
कि उसमे कण आदि न रह जायें। जैसे--खोया, दही या पीठी फेंटना । 
२. उँगली से हिलाकर खूब मिलाना। जैसे--यह दवा शहद में फेट 
कर खाई जाती है। २. ताश के पत्तों को इस प्रकार भिछाना कि उनका 
क्रम बदल जाय। 

फेंटा--पु० [हिं० फेंट] [स्त्री० अल्पा० फेटी] १ कमर का घेरा! 
)२ धोती का वह भाग जो कमर के चारो ओर लपेटकर बाँधा जाता 
है (जिससे धोती नीचे खिसकने या गिरने न पावे )। 
मुहा०-- (अपना) फ्रेंटा कसना, या बऑॉधनाउ-किसी काम या बात के 
लिए कमर कसकर तैयार द्वोना। कटिवद्ध या सन्नद्ध होना । (किसो 
का) फेटा पकड़ना >-वोती का उक्त अश पकड़कर रोकना था और 
किसी प्रकार किसी को पकड़ रखना। 
३ कमरबद । फटका। ४ छोटे या कम लबे कपड़े से सिर पर बाँधी 
जानेवाली हलकी पगछी। ५ भटेरन पर छपेटी हुई सूत की बड़ी 
अटी। 

फेकरना--अ० [अनु० फेकें] १ फूट-फूट कर रोना। चिल्ला- 
चिल्ला कर रोना। २ जोर से चिल्लात हुए कर्ण-क्टु शब्द उत्पन्न 
करना। जैस--गीदड का फेकरना । 

फेकारता--स ० [हिं० फेंकना] सिर के बाल खोलकर झटकारना। 
(म्न्रियाँ) 

फेकेश---ु ०* -फिकत । 

फेच--पु०->पेच । (पूरब) 

फेट---स्त्री ० >फेंट । 

फेटना[---स ० >-फेंटना । 

फेटा--पु ० --फेंटा । 

फेड---पु० -स्फेर। 
अव्य० -फिर। 

फेण--पु० >फेन । 

फेणक--पु ० [स० फंण +क] १ फंन। २ फनी नाम का व्यजन। 
बतासफंनी । 

फेद--पु ० < फटा । 

फेदा-- ० [देश० ] घुंदया। भरूई। 

फेन--पु० [स०९/रफाय्‌ (बढना ) | नक्‌, फे--आदेश ] [वि० फेनिल] 
१ बहुत छोटे छोटे वुलबुछों बग वह गठा हुआ समूह जो पानी या किसी 
द्रव पदार्थ के खूब हिलने, सडने, खौलने आदि से ऊपर दिखाई पड़ता 
है। झञाग। 
कि० प्र ०--उठना ।---निकरूना । 
२ नाक से तिकलनेवाऊा कफ। ऐेंट। 

फेनक्--पु० [स० फेन+कन्‌] १ फेन। झाग। २ ऐसी चीजों से 
दरीर मल या रगइड़कर घोना जिनमे से फेत निकछता हो। ३ फेनी 
नाम का व्यजन। 
वि० फेन उत्पन्न करने या बनानेवालां। जिससे फ्रेन उत्पन्न हो। 

फ़रेसका--स्त्री ० [स० फेन*/कै--क--टापू] एक तरह की पीठी। 


फेनना 

फंनना--स० [हि० फेन ] ऐसा काम करना जिससे किसी तरल पदार्थ 
में फेन उत्पन्न होने छगे। 

फेन-मेह--प० [स० ब० स० ]एक प्रकार का प्रमेह रोग जिसमे वीर्य फेन 
की भाँति धांडा-थोडा गिरता है। 

फेनल-- वि० [स०१/फन | लच्‌ | फेनयुक्त | फेनिल। 

फेवा--स््री ० [स० फेन ! अब | टाप्‌ ] एक प्रकार का क्ष्‌प। 

फेनाप्र -५० |स० फंन-अग्र, प० त्तृ०] बदबद। बुलब॒ला। 

फेनिका-- सती [स० फंस | ठनू--हुक,। टाप्‌ | फनी नाम की मिठाई। 

फेनिल-- वि० [स० फन | इलच्‌ ] जिसमे फेन हा। फेन या झाग से युक्त । 
पु० रीठा । 

फंनी--रत्र० [स० फंनिका] छपेटे हा सूत के लच्छे की तरह मंदे की 
एक प्रासद्ध मिठाई जो प्राय दूब में मिलाकर खाई जाती हे । 
जि० ह टढ़ा। २ कुटिल। 

फेसोच्छवासित--वि० [स० फेन-उच्छुआसित, त० त०] क्रोध, परिश्रम 
आदि कें कारण जिसके मह से फेत निकल रहा हो। 

फेनोज्ज्बल--वि० | स ० फेन-उज्ज्ललछ, उपमि० र० ] फेन की तरह उजला। 

फेफडए--१० [ स० फुप्फस । ० हिड्ा (प्रत्य०) ] शरीर के भीतर धौनी 
के आकार का वह अवयब जो प्राय दो भागों में होता है तथा जिसके 
द्ररा जीव हवा अदर खीचते तथा बाहर छोड़ते है। श्वसन अंग ।, 
फफ्फत । (लग ) 
पद--फफड़े की कसरत बच्चों के राने वा परिहासात्मक पद । 

फेफड़ी--रतरी ० | हि० फफा ] चौपाया का एक रोग जिसमे उनके फेफड़े 
सज जाते है और उनका रक्‍त सूख जाता है। 
सत्री० पपडी 

फेफरी २ भरी ० फंफडी । 

फेरड--पु० [स० फे4/रण्ड | अच ] गीदद | सियार। 

फेर---पु० [हिं० फेरना] १ फिरने या फेरने की क्रिया या भाव। 
« एसी स्थिति जिसमे किसी को अथवा किसी के चारा आर फिरना 
पढछ्ता है। घमाव | चक्‍कर । 
जि७ प्र ०--पडइना । 
पद - फेर फी बात - घमाव की बात। ऐसी बात जो सीधी या सररूू 
ने हो, बल्कि जिसमें घुमाव-फिराव, पंच या नालाकी भरी हो। 
महा ०--फेर खाना -सीधे रास्ते से न जाकर घुमाव-फिराववाले 
रास्ते से जाना । 
३ किसी प्रकार का ऐसा क्रम या सिलसिला जिसमे आवद्यकतानु सार 
धोटा-बहत परिवर्तन होता रहे। जैसे--अभी तो काम शुरू किया 
है, जब फर बँध (या बैठ) जायगा, तब कुछ न कुछ अच्छा परिणाम ही 
निकलेगा । 
क्रिए प्र ०--बँच ना ।--बाॉधना ।---बैठना ।--बैठाना । 
४ काड़े बढ़ा या महत्ततपूर्ण परिवर्तेन। कुछ से कुछ हो जाना । 
पद-- उलट-फेर (<० स्वतत्र शाब्द)। विनो (या भाग्य) का फेर 
-देवी घटनाओं का ऐसा क्रमक परिवर्तन जिसरो रूप या स्थिति 
बिलकूड बदल जाय विशेषत अच्छी दशा से निकलकर बुरी दशा 
की हानबाली प्राष्ति। 
५ एसी स्थिति जिसमें भ्रम-वद्य कुछ का कुछ समझ मे आवे। घोखा । 





फेर्ना 





जैमे-- (क) और कुछ नहीं यह तुम्हारी समझ का ही फेर है । 

(ख) यदि इस फेर में रहांगे तो बहुत धोखा खाओगे । ६ ऐसी 
स्थिति जिसमे बुद्धि जल्दी काम ने करती हो। अनिशचय, असमजस 
या दुविधा की स्थिति। जैसे--वह बड़े फेर में पड गया है कि क्या करे । 
क्रि० प्र०-- में डालना ।--में पडना। 
७ ऐसी स्थिति जो अत में हानिकर सिद्ध हो। जैसे- -उसकी बातो मे 
आकर मै हजारा झंपए के फेर में पड गया । 
क्रि० प्र--+में आना |--में डाछना।--में पड़ना । 
८ चालछाकोी या धोखेबाजी से भरी हुई चल या उबित । जैसे--(क) 
तुम उसके फेर मे मत पडना बह बहुत बड़ा धर्त है। (व) बह जाज-क ल 
तुम्हे फसाने के फेर मे लगा है। उदा०--फेर कछ कारि पौरि ते फिरि 
जचितई मुस्फाई--बनिहारी । 
क्रिए प्रर-+में आना।--म डालता।“+में पडना।-+मे लूगना। 
लगाना । 
प4--फेर-फार (4० स्वतत्र शब्द) । 
९ उपाय। तरकीब | युवित। उदा०--देव जौ जो री द हु (सी, मिले 
सा कवनेह फेर ।-जायसी । 
सुहा०--फेर बाधना--त रकीब या युवित लगाना । 
१० लेन-दन, व्यवसाय आदि के प्रसंग मे, समय समय प" कुछ लेते 
ओऔर कुछ देते रहने की अवस्था या भाव । 
पद--हेर फेर -लन-देत का क्रम या व्यवसाय | जैसे---इसी तरह दूर- 
फेर चलता रहता है। 
क्रि० प्र०-ँधना ।--बाँधना | 
११ जजार । झझट | बखेंडा। जैसे--प्रेम (या ७पए-गैंसे) का फेर 
बहुत बरा होता है । 
पव---निन्नाबे का फेर अधिक धन कमाने की वचिता या धुन | 
विशेष--यह पद एक ऐसी कहानी के आधार पर बना है जिनसे किसी 
अपव्ययी को ठीक मार्ग पर छाने के उद्देश्य से उसे ९९ ) दे दिये । 
अपव्ययी ने साचा था कि ये किसी प्रकार पूरे सौ हो जाय, भर फलत 
वह धीरे धीर धन इकट्ठा करने लगा था। 
१५ भत-प्रेत का आवेश या ब्रभाव। जैसे--कुछ फैर है इसी से बह 
अच्छा नही हो रहा हं। (इस अर्थ में प्राथ उपरी फेर पद का ही 
अधिक प्रयाग होता है।) १३६ ओर। तरफ । दिशा। उदा० --सगुन 
हाहि सुस्दर सकछ मन प्रसन्न सब केर । प्रभु आगमन जनाव जन 
नगर रम्य चहुँ फेर।--तुलसी। १४ दे० फेरा। 
अध्य ० “फिर । 
प्‌० [स० फेल्‍/ रु +ट] श्रुगारू। गीदद। 

फेरना--स० [हि फेर या फेर।] १ कोई चीज किसी फेर या घेरे में 
बारबार मडालाकार अयवा किसी ध्री १२ चारो ओर घुमना। जैसे-- 
(क) माछा फेरता (अर्थात्‌ एक एक दाना या मनका सरकाते 
हुए बार-बार ऊपर नीचे करते हुए चक्कर देना ) । (ख) तक्‍की फेरना । 
(ग) मृग्‌दर फेरना (बार बार धुमाते हुए शरीर के चारा ओर हे 
जाना और छे आना ) घोड़ा फेरना (घोड़े को ठीक तरह से चलना सिखाने 
के लिए खेत या मैदान मे मडछाकार चक्कर लगाने मे प्रवृत्त करना) । 
२ किसी तल पर कोई चीज चारो ओर इधर-उधर ऊपर-नीचे ल जाना 





फेश-पलटा 


और छे आना। जैसे-- (क) किसी की पीठ या सिरपर हाथ फेरना 
(ख) दीवार पर चूना था रग फेरता। (ग) पान फेरना-- पान की 
गड़डी या ढोली के पानो को बार बार उलट-पलटकर देखना और सले- 
गछे पास निकालकर अछूग करना । हे कोई चीज लेकर चारो ओर 
या चक्‍क २-सा लगाते हुए सबके सामने जाता। जैसे--(क) अतिथियों 
के सामने पान, इलायची फेरता । (ख) नगर मे डुस्गी था मुतादी 
फेर्ना । ४ जो वस्तु या व्यक्ति जहाँ या जिवर से आया हो, उसे 
लौटाते हैए बढ़ी या उसी ओर कर या भेज दना । वापस करना । 
जैसमे--(क) बलछाने के लिए आया हुआ आदमी फंरना । (ख) 
दुकानदार से लिया हुआ माल या सोदा फेरना । ५ किसी के द्वारा 
मेजी हुई वस्तु न लेना और फलत उसे छौटा देना । लौटाना । ६ 
किसी काम या चीज या बात की गति की दिशा बदलना। किसी और 
घुमाना या मॉडना । जैसे--(क) गादी या घोडे को दाहिने या 
बाए फेरना । (ख) कुजी य। पेच इधर या उधर फेरना। ७ जो चीज 
जिस दिशा में हा, उसका पार्व या मूँ ह उससे विपरील दिशा में करना । 
जसे-- (क) किसी की और पीठ फेरना। (ख) किसी की ओर से 
मेंट फेरना । ८ जैसा पूर्व में रहा हो या साधारणत रहता हो, 
उससे भिथ्र या विपरीत करना । उदा०--कदि धरहि रूषि फेरि 
चलाबहि(--तुलसी। ५ किसी चीज या बात की पहले की स्थिति 
बिलकुल उलट या बदल दना। जेस---( क) जबान फरना बीत कहकर 
सुकर जाना या बचत का पालन ने करता । (ख) किसी के दिन 
फेर्ना - विस का बरी से अच्छी दा मे या प्रतिक्रमात छाना। १० 
अभ्यास या कठरथ करने के लिए बार बार उच्चारण करना या 
दोएराना। जँ॑से--छूटका का पाठ फेरना->अच्छी तरह याद करने के 
लिए दाहराना । 

फेर-पलछटा--१० |हि० फेरना | पछटा] गौना । ह्विरागमन। 

फेर-फार--१० [हिं० फेर | अनु० फार] १ बहुत बड़ा तथा महत्त्वपूर्ण 
परिवर्तन | उल्ट-फेर । २ घ॒ुमाव-फिराव । चक्‍कर। ३ धुमाव- 
फिराब या छल-कपट की बात-चीत | घृर्तता का व्यवहार । चालाकी। 
जैस--हमसे इस स रह की फेर-फार की बाते मत किया करो। ४ लेन- 
दन या व्यवहार के चलते रहने की अवस्था या भाव। जैसे--राजगारियों 
का फेर-फार चलता रहना चाहिए। 

फेरब--१० |स० फेरव ] गीदड । उदा ०--फेरजबि फफ्‌ फारिस गाइआ । 
विद्यापत्ति | 

फेरषच--वि० [स० फें-रव, ब० स०] १ बतं। चालबाज। < हिंसक । 
पु० १ राक्षम। २ गीदड। 

फेरबट--स्त्री० [हि० फेरना] १ फेरने या फिरे का भाव । २ फेरे 
जाने पर होनेवाला चक्‍कर। फेरा। ३ घुमाव-फिराव। ४. अतर। 
फरख । 

फेरवा---पु ० [हि० फेरता ] सोने का वह छहला जो तार को दो, तीन बार 
लपेटकर बनाया जाता है । लपेटा हुआ तार । 
पुए-फेरा । 
[पु० [स० फेरव| गीदड। 

फेरा--पु० [हि० फेरना | [स्त्री० फेरी] १ किसी चीज के चारो ओर 
फिरने अर्थात्‌ घूमने की क्रिया या भाव। चकक्‍कर। परिक्रमण। जैसे-- 

४-५ 


फेरौती 


यह पहिया एक मिनट में सौ फेरे लगाता है। २ किसी लम्बी तथा छचीली 
चीज को दूसरी चीज के चारो ओर घुमाने, आवृत करने, लपेटने आदि 
की क्रिया या भाव । ३ उक्त प्रकार से किया हुआ आवतेन, घुमाव 
या लपेट । जेसे--इस लकडी पर रस्सी के चार फेरे अभी और लगाने 
चाहिए। 
समो० क्रि०--देना ।--लगाना । 
४ बार-बार कही आने-जाने की क्रिया या भाव। जैसे--यह मिखमगा 
दिन भर में इस बाजार के चार फेरे लगाता है । 
समो० क्रि०--डारना ।--लगाना । 
५ कही जाकर वहाँ से कौटना या वापस आना विज्ञेपत निरीक्षण करने, 
मिलने, हाल-चाल पूछने आदि के उद्देध्य से किसी के यहाँ थोडी देर या 
कुछ समय के लिए जाना और फिर वहाँ से वापस लौट आना। जैसे-- 
दिन भर में तकाजें के उद्देश्य से दस फेरे लगाता हैं । 
सयो० क्रि०--रूगाना +--लगाना । 
६ आवर्त। घेरा। मडल । ७ विवाह के समय वर्बबप द्वारा 
की जान॑वाली अग्नि की परिक्रमा । भाँवर। ८ (विवाह के उपवरासत ) 
लड़की का ससुराल जाने का भाव | जेसे--उसे दूसरे फेर घटी और 
तीसरे फेरे बाइसिकिल मिली थी। (परिचिम) ५ दं० फेर । 

फेरा-फेरी--स्त्री ० [ हि० फेरना ] १ बार बार इश्चर-उधर फेरने की क्रिया 
या भाव । २ द० हेरा-फेरी। 
क्रि० वि० १ बारी-वारी से । २ रह-रहकर । 

फेरि--अव्य ० [ हि० फिर] फिर (पुन )। 
पव--फेरि फेरि फिर फिर। बार बार। 

फेरी--स्त्री० [हि० फेरना] १ देवी-देवता आदि की की जानेबाली 
परिक्रमा । प्रदक्षिणा। २ विवाह के समय वर और वध की वह 
प्रदक्षिणा, जो आग्नि के चारो ओर की जाती है। भावर । 
क्रि० प्र०--डालना ।“-पड़ना । 
३ भिक्षुकों का भिक्षा के उद्देश्य से गली-गुहल्ले का लगाया जानवाला 
चक्कर | 
क्ि० प्र ०--देना ।--लछगाना ।--लेना । 
४ छांटे व्यापारी द्वारा गलियो, गावा आदि में फुटकर ग्राहका के हाथ 
समान बंचने के उद्देश्य से लगाया जानेवाला चक्‍कर। 
पद--फेरीबालत । (दे०) 
५ बार बार कही आते-जाते रहना । ६ एक तरह की चरखी जिससे 
रस्सी पर ऐंठन डाली जाती है। ७ फेर। ८ फेस । 

फेरीवार--पु० [हि० फेरी | फा० दार ] [ साव० फेरीदारी ] वह जो किसी 
दूकानदार था महाजन की ओर से घृम-घ्सकर कजेदारों सपावना 
बसूल करने का काम करता हो। 

फेरीदारी--स्त्री ० [हि० फेरीदार] फेरीदार का काम, पद या भाव । 

फेरीवाला--पु० [8० फंरी | वाला | वह छोटा व्यापारी जा ग़ो-गली 
या गाँव-गाँव में घूम-घूमकर फुटकर ग्राहकी के हाथ सौदा बचता हू! 

फेरआ---पु ० ->फेरवा । 

फेदक-- पु० [स०] गीदड । सियार। 

फेशौती--रत्री ० [हि फेरना ] टूटे-फूटे खपरेछो के स्थान पर नये खपरले 
रखने की क्रिया या भाव । 


फेल 


फेछ--पृ० [अ० फ़ेल] १. कार्य, कृत्य या क्रिया । २ बुरा कम । 
पु० [? ] एक प्रकार का वृक्ष जिसे बेयार भी कहते है। 
पु० [स०] १. जूठा भोजन। २ जूठन। 
वि० [अ० फेल] १ जो परीक्षा मे अनुत्तीर्ण हुआ हो। २ जो अपने 
प्रयास मे विफल हुआ हो। ३ जो समय पर ठीक और पूरा काम न दे। 

फेला--स्त्री० [स०] १ जूठा भोजन । २ जूठन। 

फेलिका--स्त्री ०--फेला । 

फेली--स्त्री० [स०] दे० 'फेला' । 
वि० [अ० फेल | १ बुराया बुरे काम करनेवाछा । २ दुराचारी। 
३ व्यभिचारी। ४ धूत॑ । 

फेलो--प० [अ०,फ़लो] १. सहयोगी । २ किसी बहुत उच्च तथा बडी 
सभा या सस्था का सदस्य या सभासद । जैसे--विदवविद्यालय का 
फेलो। 

फेल्ट--पु० [अ०फेह्ट] १ जमाया हुआ ऊन । नमदा। जैसे-फेल्ट की टोपी । 
२ एक तरह की टोपी जो बहुत-कुछ हैट से मिलती-जुलती होती है। 

फेहरिस्त--स्त्री० [अ० फैहरिस्त | १ सूची। २ सूची-पत्र। 

फंसो--वि० [अ० फ़ेसी] १ जो किसी ठीक कल्पना तथा रुचि के अनुकूल 
हो। फछूत अलकृत तथा सुदर | २ काट-छाँट, रग-रूप आदि के विचार 
से अपने वर्ग की औसत चीजों से उत्कृष्ट और सुन्दर। जैसे---फेंसी 
साडी | 

फंफरटी--स्त्री ० [अ०] विष्यविश्यालय के अन्तर्गत किसी विद्या या शास्त्र 
के पडितो और आचार्यों का वर्ग। विह्वन्मडल। 

फेक्टरी -स्त्री० [अ०] वह स्थान जहाँ यत्रो की सहायता से वस्तुओं का 
उ. ग्दत या निर्माण किया जाता हो। कारखाना । निर्माणशारा । 

फंज--पु० [ज० फैज़] १ दानशीलता । २ फायदा । छाभ। 
क्रि० प्र०--पहुँचाना । 
३ उपकार। भलाई। ४ यश। कीति। 

फ्रेदम--१० [अ०] जलाशयो की गहराई की एक नाप जो छ फूट की होती 
है । पुरसा । 

फंयाज्--वि० [अ० फैयाज़] [भाव० फेैयाजी ] १ जिसमे फैज अर्थात्‌ 
दानशीलता हो। दानी। मुक्तहस्त। २ बहुत बड़ा उदार और 
मलमानुस । 

फंयाज्ञी--स्त्री० [अ० फैयाज़ी ] १ फैयाज होते की अवस्था, गुण या भाव। 
दानशीलूता । २ उदारता । 
क्रि० प्र<--दिखलाना । 

फर--स्त्री० [अ० फायर] १ बदूक, तोप आदि हथियारों को दागने की 
क्रियाया माच । २ उक्त के दागने से होनेवाले दब्द। ३ बदक आदि 
की गोली का लगने या होनेवाला आधात। 

फुल--स्त्री० [हिं० फैलना] १ फैलने या फैले हुए होने की अवस्था 
पा भाव। विस्तार। २ छडकों का वह दुराग्रह जो वे जमीन पर फैल 
अर्थात्‌ इधर-उधर छोट-पोटकर प्रकट करते हैं। ३ और अधिक प्राप्त 
या वसूल करने के लिए किया जानेवाला हठ अथवा इधर-उधर की बातें । 
क्रि० प्र०--मचाना । 
पु०>-फेल (कर्म)। 
 पृ० [ भ० फ्रेड | क्रीछा। खेल। 


हड 


फैकामा 


>०६४->#-न ४ न अनाज पड 





फेलता---अ० [स० प्रसरण प्रा० पयहर--ना (प्रत्य०)] १. किसी चीज 
का चारो ओर दूर तक विस्तृत प्रदेश में स्थित रहना या होना। विस्तार 
से युक्त होता । जैसे--(क) यह पर्वत (प्रदेश) सैकड़ों मील तक 
फेला है। (ख्र) कपडे परूगनी पर फैले हैं। २. किसी चीज का 
अभिवद्धित होकर अथवा पनपकर बहुत दुर तक पहुँचता। इधर-उधर 
बढ़ते हुए अधिक स्थान घेरना। जैसे--बगीचे में छृताओं का फैलता । 
३. किसी क्षेत्र, प्रदेश या स्थान मे प्रभावपूर्ण तथा सक्रिय हीना। जैसे-- 
(क) छाहर मे बीमारी फैलना । (ख) गाँव में आग फैलना। ४. 
आकार, रूप आदि से पहुले से अधिक बड़ा या बढ़ा हुआ होना । जैसे--- 
(क) बादी से शरीर फैलना । (ख) आबादी बढ़ने से बस्ती का 
चारो तरफ फैलना । ५. अधिक्षेत्र या कार्यक्षेत्र की सीमाएँ बढ़ना । 
जैसे--विदेशो मे व्यापार फैलता । ६ बात आदि का व्यापक क्षेत्र में 
चर्चा का विषय बनना । जैसे--हड़ताछ की खबर फैलना । ७. 
चारो ओर छितरा या बिखरा हुआ होना । जैसे--कमरे मे सारा सामान 
फैला पड़ा है। ८, किसी प्रकार के अवकाश, विवर आदि का यया- 
साभ्य अधिक विस्तृत होना। जैसे--मुँह फैलना। ९, किसी काम, 
चीज या बात का प्रचलन या प्रचार मे आता। जैसे---आज-कल स्त्रियों 
में फैशन बहुत फैल गया है। १० किसी रूप मे दूर दूर तक पहुँचा 
हुआ होना या लोगो की जानकारी में होना । जैसे--बदनामी फैलना, 
बदबू फैलना । ११ व्यक्तियों के सबध मे, कुछ अधिक पाने या लेने 
के लिए आग्रहपुर्वक थाचना या हुठ करना। जैसे--दस रुपए इनाम 
मिल जाने पर भी पड़े कुछ और पाने के लिए फैलने छगे । १२ गणित 
के प्रसग मे, लेखे या हिसाब का परिकलन होना या बैठाया जाना । 

फेल-फुट्ट|--वि० [हि फैलना+फुट अकेला) १ इधर-उधर फैला 
या बिखरा हुआ। २ फुटकर। 

फेलसूफ--वि० [यू० फ़िलसफननदा्निक] [भाव० फैलसूफी] ! 
बहुत बडा अपव्ययी । फजूलखचे। बहुत ठाट-बाट या शान-शौकत से 
रहनेवाला। ३ फरेबी और घूर्त। 
पु० दा निक। 

फंलसुफी--स्त्री ० [हिं० फैलसूफ] १. आवश्यकता से अधिक धन व्यय 
करना। अपव्यय। फजूछखर्ची। २. झूठा और दिखावटी ठाट-बाट। 
३ चालाकी। धूतंता। 

फेलाना--स० [हि फैलना का स०] १ किसी को फैलने मे प्रवृत्त 
करना। २ कोई चीज खीचकर उस विस्तार या सीमा तक छे जाना, 
जहाँ तक वह जा सकती हो अथवा जहाँ तक उसे ले जाना भ्ावध्यक 
या सगत हो। लबाई-चौड़ाई अथवा चौडाई के बल विस्तार बढ़ाना | 
पसारना । जैसे--(क) सुखाने के लिए पेड या रस्सी पर कपड़े 
फैलाना । (ख) कुछ पकड़ने या छेने के लिए हाथ फैलाना। ३ 
किसी चीज को तानते हुए आगे बढाना। जैसे--- (क) पक्षियों फे पर 
फ़ैछाना। (ख़) आराम से बैठने के लिए पर फैछाना। ४. ऐसा काम 
करना जिससे कोई चीज आवश्यक या उचित से अधिक स्थान घेरे । 
बिखेरना। जैसे--बौकी पर तो तुमने कागज-पत्र फैला रखे हैं। 
५. किसी पदार्थ के क्षेत्र, मर्यादा, सीमा आदि का विस्तार करना । 
बढ़ाना । जैसे--उन्होंने अपने कार-बार सारे देश से फैला रखा है। 
६. किसी भ्रकार के घेरे या बिवर का विस्तार बढाना। जैसे--(क) 


रैकाव 


श्प 


फोड़ना 





कुछ लेने के लिए झोली फैलाना। (खत) दाँत उसाड़ने के लिए मुंह फैछाना। 
७. ऐसी क्रिया करना जिससे दूर धक किसी प्रकार का परिणाम भा 
प्रभाव पहुँचे। जैसे--यश (या सुगन्‍्ध) फैलाना । ८. ऐसी क्रिया 
करना जिससे दूर तक के छोगों को किसी वात की जानकारी या परिचय 
हो। जैसे--फूलो का सुगन्‍्ध फैलाना । ९ ऐसी क्रिया करना जिससे 
किसी चीज का लोगो में यथेष्ट प्रचार या व्यवहार हो। उदा०--- 
राज-काज दरबार मे फैछाबहु यह रत्न ।--भारतेन्दु। १०. कोई चीज 
ऐसी स्थिति मे ऊना कि उस पर विज्लेष रूप से या अधिक लोगो की दृष्टि 
पड़े या ध्यान आकृष्ट हो। जैसे--आडम्बर या ढोंग फैलाना । ११. 
गणित के क्षेत्र मे, किसी प्रकार लेखा या हिसाब तैयार करने के लिए 
अथवा तैयार किये हुए हिसाब की जाँच करने के लिए किसी प्रकार का 
परिकलन करना। जैसे-- (क) ब्याज या सूद फलाना। (ख) लागत 
फैलाना । 

फेलाब--स्त्री० [हि० फैलाना] १ फैले हुए होने की अवस्था या भाव । 
विस्तार । २ उतनी लबाई-चौड़ाई जिसमें कोई चीज फैली हुई हो। 

फेलाबट--सर्त्री ०--फैछाव । 

फेशन---प० [अं० फैशन] १ समाज में विशेषतः समाज के उच्च वर्गों 
द्वारा किये जानेवाछे बनाव-श्यूगार, धारण की जानेवाली बेदा-भूषा 
आदि का इस रूप में होनेवाला प्रयत्न जिसे जन-साधारण भी अपनाने 
में अग्रसर हो रहा हो। २ ढग।! रीति। 

फंसला--१० [अ० फैसल ] १ न्याय-कर्ता द्वारा दी जानेवाली व्यवस्था । 
निर्णय। निबदारा। 
मुहा ०--फंसला सुनाना-न्यायाधीश अथवा निर्णायक द्वारा किसी 
विवादास्पद विषय के सबंध में अपना निर्णय सुनाता । 
२ किसी यात के सबध में किया जानेवास्य अंतिम तथा दृढ़ निश्चय । 
क्ि० प्र०--करना। 

फेसिय्म--प० [अ० फंसिज्म] शासन का यह प्रकार जिसमें प्रभुसत्ता 
किसी राष्ट्रवादी निरकुश शासक मे केन्द्रीभूत्त होती है। 

फेसिस्ट--पुं० [अं० फ़ैसिस्ट] १ वह जो फैसिज्म के सिद्धान्त मानता हो। 
२ फंसिज्म के रिद्धान्तों पर बना हुआ इटली मे एक राजनैतिक दरू। 
३. लाक्षणिक अर्थ मे, वह व्यक्ति जो सारा अधिकार अपने हाथ मे 
रखना चाहता तथा विरोधियों को कुघल डालने का पक्षपाती हो। 

फॉक--पु० [सं० पुख] १ तीर का पिछला सिरा जिसपर पख लगाये 
जाते हैं। २ दे० भोगली' । 

| वि० पु०७फोक । 

फॉकली--सरन्नी ० दे० भोगली!'। 

फोंका--पु० [स० पुख या हिं० फुँकता] १. रूबा और पोरा योगा । 
फोकी। २ पोले डठलवाले दास्यों की फूनगी। जैसे--मटर का फोका । 
पुं० १ >फुका । २. सच्सर-फोका। 

फोंका ग्रोला--पु० [हिं० फोक-गोला] सोप का एक प्रकार का 
लबा गोरा । 

फॉबा---पु ० “-फुंदना । 

फॉफर---वि० [अनु०] १. खोखला। २. पोछा। ३. निस्सार | योथा। 
पूं० दो तको के बीच की ऐसी दरज या सन्धि जिसमे से उस पार की 
चीजें दिल्लाई देती हों। 


फॉफी---स्त्री० [अनु०] १. गोल बी नझी। छोटा 'बोगा । २. सुनारों 
की वह नली जिससे वे आग धौंकते हैं। ३. दे० भोगंली' | 

फोक--पुं० [स० स्फोट] १. वह सीरस अद्य जो किसी रसपूर्ण पदा् 
में से रस निचोड़ कर निकाल लेने के उपरान्त बच रहता है। सीठी। 
२. लाक्षणिक अर्थ में ऐसी चीज जिसमे कोई तत्त्व न रह गया हो। 
पु० [? ] एक तृष जिसका साथ बनाया जाता है। 
स्‍त्री० [?] पीढ़ा। वेदता । 
वि० [?] चार। (दलाल) 

फौकट---वि० [सरा० फुूकट] १. जिसमें कुछ भी तत्व या सार न हो। 
निस्सार। २ जिसके छिए कुछ भी परिश्रम या व्यय न करना पड़ा ही | 
मुफ्त का । जैसे---फोकट का माल । 
पद--फोकट का्व्मुफ्त । फोकट में--(क) बिना कुछ व्यय किये । 
मुफ्त। (स्व) व्यर्थ बे-फायदा । 

फोकरा--पु० [सं० वल्कल, हिं० बोकला] [स्त्री० फोकलाई] किसी 
फल आदि का ऊपरी छिलका। 
वि०"फोका । 

फोकराप--वि० [देश०] चौदह। (दछाल) 

फोका--वि० [हिं० फोक ] [स्त्री० फोकी |] १ फोक के रूप में होनेवाला 
अर्थात्‌ रस-हीन और बेस्वाद । २. जिसमे मिठास न हो। ३. जिसमें 
कोई तत्व न हो। ४ खाली। रिकत। ५ खोखला । पोला ! 
जैसे--फोका बाँस । ६. हलके दरजे का। धटिया। 
अब्य० केवछ । निरा। 
 पुं०पोका । 

फोकी--स्त्री० [हिं० फोका ] ऐसी मुलायम भूमि जिसमे आसानी से हल 
चल सके । 

फोग--१० [? ] राजस्थान में होनेवाला एक प्रकार का क्षप। 

फोट---पु० [सं० स्फोट] स्फोट। 
पु० [हिं० फूटना] १. फूटने की क्रिया या भाव। २ मुँह से निकलनेवाली 
मन की बात । उदगार । 

फौटफा[--वि ० ""फोकट । 

फोटा--१० [स० स्फोटक ] १ माथे पर छगाई जानेवाली गोल बिंदी। 
२. किसी प्रकार का गोलाकार चिह्न । ३. दे० 'टीका'। 

फोटो--१० [अं० फ़ोटोग्राफ] १ एक विशिष्ट यात्रिक उपकरण 
द्वारा खीचा हुआ चित्र। छाया-चित्र | २ वह पत्र जिसपर उक्स चित्र 
छपा होता है । 
क्रि० प्र०--उतारता ।--खीचना ।--लेना । 

फोटोग्राफ--पु० फोटो । 

फोदोग्राफर---पृ ० [अ० ] फोटो अर्थात्‌ छाया चित्र बनानेवाला कछाकार। 

फोटोग्राफी--स्त्री ० [अ० ] फोटो उतारने के यत्र के द्वारा फोटो या छाया- 
चित्र बनाने की कला तथा कृत्य । 

फोड़त--सस्त्री० [हिं० फोड़ना] वे मसाले जो दाल-तरकारी आदि आँच 
पर रखने से पहले उन्हें छींकने या बधारने के लिए डाले जाते हैं। 
तड़का । 
बि० फोड़नेवाला । 


कौड़ता---स० [स० स्फोटन; प्रा० फोडन] १. हिं० 'फूटना' का स० 


फोड़ा 





कप 


फ्रस 


रूप । ऐसा काम करना जिससे कोई चीज फूटे। २ खरी या करारी | फौजदार--१० [अ० फौज +-फा० दार] [भाव० फ़ौजदारी] सेना का 


घस्तुओ को दबाव या आघात द्वारा तोडइना । खड़ खड करना। जैसे-- 
घड़ा फोडना । 
पद---तोड़ना-फोड़ना । 
३ ऊपरी आवरण या तल मे स्थान स्थान पर अवकाज उत्पन्न करना 
कि अन्दर की चीज बाहर निकल आये या निकलने लगे। जैसे--(क ) 
कच्चा पारा शरीर को फोड देता है। (ख) बरसात में जमीन को 
फोडकर उसमे से नये कह्ले निकलते है। ४ किसी दल या पक्ष 
के व्यक्ति या व्यवितयों को प्रलोभन आदि देकर अपनी ओर मिलाना। 
दूसरों में फूट डालकर उनमे से कुछ को अपनी ओर मिला लेना। जैसे-- 
शत्रुओं ने कई अधिकारियों को फोडकर अपनी ओर मिला लिया। 
५ व्यर्थ ऐसा परिश्रम करना जिसका कोई फल न हो या बहुत ही कम 
फल हो। जैसे-- (क) किसी महीन काम के लिए आँखें फोडना । 
(ख़) किसी को समझाने के लिए अपना सिर फोइना अर्थात्‌ माथा- 
पच्ची करना। ६ किसी का भेद या रहस्य सब पर प्रकट करता। जैसे--- 
किसी का भड़ा फोडना । ७ उँगलियों के सबंध मे उनके पोरों को इस 
प्रकार ऐठना या खीचना कि उनमे से खट खट शब्द हो। जेसे--बार 
बार उँगलियाँ फोडते रहना अशुभ होता है । 

फोड़ा--प० [स० रफोटक, प्रा० फोड ] [स्त्री० अल्पा० फोडिया] शारीरिक 
विकार के कारण होनेवाला ऐसा १ण जिसमे रवत सडकर मवाद का रूप 
धारण कर लेता है। (एब्सेस) 

फोड़िया--पु० [हिं० फोड़ा, या स० पिडिका] छोटा फोडा। 

फोत्ता--पु० [फा० फोत ] १ कमरबन्द | पटका। २ लूगी। ३ पगडी। 
४ खेत या जमीन पर लगनेबाला राज-कर | पोत। छगान । 
मुहा०--फोता भरना--कर या लगान देना । 
५ रुपये आदि रखने की थैली। ६ अड-कोजग। 

फोतेदार--प१० [फा० फोतदार] १ कोषाध्यक्ष। 
२ रोकडिया। पोतदार। 

फोनोग्राफ--१० [ अ० फोनोग्राफ ] एक प्रकार का यत्र जिसमें कही हुई बाते 
और बजाये हुए बाजों के स्वर आदि चूडियो में भरे रहते है और ज्यो 
के त्यो सुनाई पढत है। (ग्रामोफोन इसी का विकसित रूप है।) 

फोरना--स ० >फो टना । 

फोरसेन--पु० [अ० फोरमन | कारखानों मे कारीगरो और काम करने 
वालो का प्रधान या सरदार। जैसे--प्रेस का फोरमैन । 

फोहा--प ० >फाहा । 

फोहारा--१ ०--फुहारा । 

फौंकना---अ० [अनु० ] आवेश मे आकर डीग मारना । शेखी हॉकना । 

फ्रॉदन--पु ०--फुदना । 

फौआरा--पु ०--फुहारा । 

फौक--वि० [अ० फौक | १ उच्च । श्रेष्ट । २ उत्तम । 
पु० १ उच्चता। ऊँचाई। २. प्रधानता । श्रेष्ठता। 
मुहा०-- (किसी से) फौक ले जाना--किसी से बहुत बढ़कर या श्रेष्ठ 
सिद्ध होना । 

फौज--स्त्री० [अ० फौज] [वि० फौजी] १ सेना । २ झुड | जैसे-- 
बदरों या बच्चो की फौज । 


खजाची। 


एक छोटा अधिकारी । 

फौजदाशी--स्त्री० [०] १. फौजदार का कायें या पद । २ बह 
न्यायालय जिसमे मार-पीट, हत्या आदि सबंधी मुकदमों की सुनवाई 
होती है। ३२ गहरी मार-पीट की कोई घटना । 

फौजी--वि० [फा० फ़ौजी] १. फौज का । जैसे--फौजी अफसर । 
२ फौज या फौजों में होनेवाला । जैसे->फौजी हूडाई । 

फौत--वि० [अ०फौत] १ मराहुआ। मृत। २ जो नष्ट हो गया हो। 
जैसे--किसी बात का मतलब फौत होना । 
स्त्री० मृत्यु। मौत। 

फोली--वि० [अ० फौत ] १ मृत्यु-सबधी। मृत्यु का। ३ मरा हुआ। 
मृत। 
स्‍त्री० १ मृत्यु । मौत। २ किसी विशिष्ट स्थानीय शासक विशेषत 
जन-गणना करनेवाले किसी अधिकारी को दी जानेबाली किसी की मृत्यु 
की सूचना । 

फौतीनामा--१० [अ० फ़ौत--फा० नामा] १ मृत्त व्यक्तियों के नाम 
और पते की सूची जो नगरपालिका आदि की चौकी पर तेयार की जाती 
है, और प्रधान कार्यालय मे भेजी जाती है। २ सेना द्वारा किसी मृत 
सेनिक के घर उसकी मृत्यु का भेजा जानेवाला समाचार | 

फौरन--क्रि० वि० [अ० फौरन | तत्क्षण । उसी समय । जल्दी ही। 
तत्काल । तुरन्त । 

फौरी--बि० [अ० फौरी ] (काम ) जो चट पट या तुरत क्रिया जाने की हो । 

फौलाइ--पु० [फा० फौलाद] असली लोहा। 

फौलादी--वि० [फा० | १ फौलाद का बना हुआ । जैसे--फौलादी 
ढाँचा । २ बहुत ही दृढ़ या पक्का । 
स्त्री० वह डडा जिसके सिरे पर बलल्‍लम या भाला जड़ा रहता है। 

फौयबारा]--१ ० --फहा रा । 

फ्रास--१० [अ० ] यूरोप का एक प्रसिद्ध देश जो स्पेन के उत्तर मे है। 

फ्रांसीसी--वि० [ हिं० फ्रास | ईसी (प्रत्या०) | फ्ास का । 
पु० फ्रास देश का निवासी। 
स्त्री० फ्रान्स देश की भाषा 

फ्राक--१० [अ० फ्राक] लबी आस्तीन का ढीला ढीला एक प्रकार का 
छाटे बच्चों विशेषत लडकियों के पहनने का कुरता । 

फ्री--वि० [अ० फ्री| १ जिस पर किसी का दबाव या नियन्त्रण न हो । 
स्वतत्र। २ जिसके लिए कोई कर या देन नियत न हो। ३ जो किसी 
प्रकार का कर या देन चुकाने से मुक्त कर दिया गया हो। 

फ्रीसेसन--प्‌ृ० [अ०] फ्रीमेसनरी नामक सम्प्रदाय का अनुयायी या 
सदस्य । 

फ्रीमेसनरी--स्त्री० [अ०] अमेरिका और यूरोप में मध्ययुग का एक 
रहस्य सम्प्रदाय । 

फ्रेच---वि० [अ० फ्रेंच] फ्रास देश का । 
स्त्री० फ्रास देश की भाषा । 
पु० फ्रास देश का निवासी। 

फ्रेम--पु० [अं० फ्रेम] १ चित्रो आदि का या और किसी प्रकार का चौकठा । 
२ ढाँचा। 


क्नि- 





भक्ष--देवनागरी वर्णमाला का पवर्गीय वर्ण जो व्याकरण तथा भाषा- 
विज्ञान की दृष्टि से ओष्ठय, अधोष, अल्पप्राण तथा स्पृष्ट व्यंजन है 
पूं० [सं०१/बल (जीवन देना)-ड] १ वरुण। २ समुद्र । ३. 
जरूू। पानी। ४ सुगंधि। ५. ताना। ६ घड़ा। ७. भग। योनि! 
अथ्य ० [ फा० ]एक अव्यय जो अरबी-फारसी शब्दो के पहले रूगकर ये 
अर्थ देता है--( के) सहित। साथ। जैसे--ब्खरियत --खैरियत 
से। (ख) पूर्वक। जैसे--बखूबी। (ग) के द्वारा। जैसे---बज- 
रिया जरिये द्वारा। (घ) पर या से । जैसे--खुद-ब-खूद --आप से 
आप। (च) किसी की तुलना मे। जैसे--ब-जिन्स किसी के ठीक 
अनुरूप। (छ) अनुसार। जैसे--बदस्तू र, बमूजिब। 

बंक--वि० [स० वक्त, वक| १ टेढा। तिरछा । २. जिसमे पुरु- 
पार्थ और विक्रम हो। ३ दुर्गंम। ४ विकट । 
प्‌० दे० बॉकरा। 
१० अस्थि। हड्डी। उदा०--मचर्क्काह रीढ़क बंक अमाप।-- 
कविराज सूर्यमलू। 
पु० [अ० बैक] वह महाजनी सस्था जो मुख्य रूप से शूद पर रुपयो 
के लेन-देन का काम करती हो | 

बंकर--वि० [ स० वक ] १. वक। टेढ़ा। २. तीम् । ३ विकट । 
पू० [स० व्यंकट ? | हन्‌ मान। 

बकनाल--स्त्री० [हिं० बक | नाल] १ सुनारों की एक नली जो 
बहुत बारीक दुकडो की जोडाई करने के समय चिराग की लौ फूँकने 
के काम आती है। बगनहा। २ कोई टेढ़ी पतली नली। ३ ह॒ठ- 
योग में शखिनी नाडी का एक नाम । 

बकराज---१ ० [हि० बक | राज] एक प्रकर का साँप। 

बेंकवा| ---प्‌ ० [सं० वक] एक तरह का बढ़िया अगहनिया धान। 

बंकसालू--प्‌ ० [देश०] जहाज फा बह बड़ा कमरा जिसमे मस्तूलों 
पर चढ़ाई जानेवाली रस्सियाँ या जजीरें ठीक करके रखी जाती है। 

बंका--वि० [सं० बक]| [माव० बकाई] १ हेढ़ा। तिरछा। २. 
दुरगंम। ३ विकेट। ४ पराक्रमी। ५ बाँका। 

बंकाई --सत्री० [ हिं० बक|+-आई (प्रत्य०) ] टेढ़ापन। तिरछापन। 
वक्ता । 

बंकी--स्त्री ०--बाँक । 

बंकुर| --वि० [भाव० बंकुरता]-ज्यंक (वक्र) । 

बंकुरा। ---वि०>न्बक। 

बेंकेअन+ ---अव्य ०, प्‌ ० -ब्कर्याँ । 

दंग---प्‌ ०--वग। 

बंगई--स्त्री० [स० वग] सिलहट की भूमि में होनेवाली एक तरह 
की कपास। 
| स्त्री० [हिं० बंगा] १. उदंडता। २. झगड़ारूपन। ३. | बदभाणी। 
लुच्चापत | 

बंगउर| --प्‌ ०--विनौना । 

बंगड़ी| ---स्त्री० [देदा०] १. लाख या काँच की बनी हुई चूडी या 
कंगन। २. आलू की फसल में होनेवाल्ा एक तरह का रोग। 


है 





न्न््ििजखििख+ 


बेंगला--वि० [हिं० बंगाल] १. बंगाल प्रदेश-सबंधी। २ बगाल में 
बनने या होनेवाला। जैसे--बंगला मिठाई। 
स्‍्त्री० १ बंगाल देश की भाषा। २. उक्त भाषा की लिपि जो देव- 
नागरी का ही एक स्थानिक रूप है। 
१० १. एक मजिला हवादार तथा बरामठेवाला छोटा मकान जिसकी 
छत प्राय खपरेल की होती है तथा जो खूले स्थाम में बना हुआ होता 
है। २ कोई छोटा हवादार तथा बरामदेवाला मकान । ३ बोल- 
चाल में, ऊपरवाली छत पर बना हुआ हवादार कमरा। 

बंगलिया--पु ० [हिं० बंगाल] १. एक प्रकार का धान। २. एक 
प्रकार की मटर। 

बंगली--स्त्री ० [? ] स्त्रियों का एक आमूषण जो हाथो मे चूडियों के 
साथ पहना जाता है। 
प्‌ ० [हिं० बगाल] एक प्रकार का पान। 
पु० [?] घोड़ा। (डिगल) 

बंगसार--प ० [? ] समुद्र मे बनाया हुआ वह चबूतरा जिस पर से यात्री 
जलयान मे चढते हैं। बनसार। 

बगा--वि० [स० बक] [रत्री० बगी] १. टेढा। २ झगडालू। ३ 
पाजी। रुच्चा। ४ अज्ञानी। मूर्ख। ५ उद्देड। 

बगारी--प्‌ ० [स० वग+अरि | हरताल। (डि०) 

बंगाल--प्‌ ० [स० वग] १ भारत का एक पूर्वी प्रदेश जिसका आधा 
भाग पूर्वी बगाल (पाकिस्तान) और आधा भाग पश्चिमी बगाल (मारत ) 
के नाम से प्रसिद्ध है। बग प्रदेश। २ सगीत मे एक प्रकार का राग 
जिसे कुछ लोग मैरव राग का और कुछ लोग मेघ राग का पुत्र मानते 
हैं । 

बंगालिका--स्त्री ० [ ? ] एक रागिनी जिसे कुछ लोग मेधराग की पत्नी 
मानते हैं। 

बंगाली---१ ० [हि० बगाल+ई (प्रत्य०)] बगारू अर्थात्‌ वग-प्रदेश 
का निवासी। 
वि० १. बंगाल देश का। बगाल-सम्बन्धी। 
सत्री० १ बंगला भाषा। २ संगीत में सम्पूर्ण जाति की रागिनी 
जो प्रीप्म ऋतु मे प्रातःकाल गाई जाती है। ३ विशुद्ध अद्वित का 
ज्ञान प्राप्त होने की अवस्था। (बौद्ध) 

बंगुरी--स्त्री ०--बंगली (आमूषण)। 

बंगू--पु० [देश० | १ वग तथा दक्षिण भारत की नदियों मे होनेवाली 
एक तरह की मछली। २ जंगी या भौंरा नाम का खिलौना। 

बंगोभा--१ ० [देश० ])गगा और सिधु नदियों में होनेवाला एक तरह 
का कछुआ। 

अंचक---वि० [माव० बचकता ]--वंचक (ठग )। 

बंचकताई---स्त्री ०--बचकता। 

अंचन--५ ०८--वंचन । 

अंचना--स ० [स० बंचन] ठगना। छलना। 
अ० ठगा जाना। 
स्त्री? -वंचना। 


बंचर 


स० [स० वाचन] पढ़ना। बाँचना। 
बंचर---१ ०--वनचर। 


३८ 


बंद 





बेंटाधार] >--वि० [सं० विनष्ट+आधार] पूरी तरह से चौपट, नष्द 
पा अष्ट किया हुआ। (पुरब) 


बंचबाना--6ि० [स० बाँचना का प्रे०] बाँचने (पढ़ने) का काम दूसरे | बेंदाना--स० [हिं० बाँटना] १ किसी संपत्ति आदि के हिस्से 


से कराना। पढ़वाना। 

बंचित---वि ० +-वचित । 

बंकना! --स० [सं० व्छा] वाछा अर्थात्‌ इच्छा करना। चाहना। 

बंछनीय! --वि० - वाँछनीय । 

बंछित | --वि०--वाछित । 

बंज--7 ० [देश० ] हिमालय प्रदेश मे होनेवाला एक प्रकार का बलृत 
जिसकी छकडी का रग खाकी होता है। इसे सिल और मारू भी कहते 
हैं। 
प्‌ ०-बनिज। 

घंजर--वि० [स० बन | उजड] (मूमि) जिसमे कोई चीज न उगती 
हो फलत जो उपजाऊ न हो। ऊसर। 
पु० बजर भूमि। 

बंजर भूमि--स्त्री० [स० |शुष्क प्रदेशों मे कटा-फटा या ऊबड़-खाबड़ 
मू-खड़ जिसमे कोई वनस्पति नहीं होती। ऐसी भूमि में बीच बीच में 
छोटी-मोटी चट्टाने या दीले भी होते है। (बैंड लेड) 

बजरिया| ---वि० बजर। 
स्‍त्री ०5 बन-जरिया । 

बंजारा--१०--बनजारा। 

बजल--प्‌ ० वजुर (अशोक)। 

बह्चा--वि०, स्त्री० - बाल । 

बेंटन--प्‌ ०[हि० ऑँटना ] बाँटने की क्रिया या भाव। 

बेंटना---अ० [हिं० 'बॉटना' का अ०| ? अलहूग अछूग हिस्सों में बाँटा 
जाना। २ किसी प्रकार या रूप में विभक्‍त था विभाजित होना। 
सयो० क्रि०--जाना । 
प्‌ृ०- बटना। 

बेंटवाई--स्त्री ० [6हि० बेंटवाना] बेटवाने की क्रिया, माव या पारि- 
श्रमिक । 
स्त्री ०--बंटाई। 

बेंटवाना--स ० [हि० बॉटना] दूसरों को कोई चीज बाँटने में प्रवृत्त 
करना। 

स०- बटवाना। 

बेंटवारा--१ ० [हिं० बॉटना] १ बाँटने का काम। २ भाइयों, 
हिस्सेदारों आदि में होनेवाला संपत्ति का विभाजन। अलछगोझा। 
जैसे--- (क) खेत का बेटवारा। (स्व) देश का बेंटवारा। 

बंटा--प्‌ ० [स० वटक, हिं० बटा+गोछा] [स्त्री० अल्पा० बंटी] 
कोई छोटा गोल चौकोर डिब्बा। जैसे---पान का बटा। 
वि० छोटे कद का। नाठा। 

बेंटाई--स्त्री० [हिं०? बॉटना] १ बॉटने की क्रिया, भाव या पारिश- 
मिक। २ थांटे जाने की अवस्था या माव। ३. किसी को जोतने- 
भोने के लिए खेत देने का वह प्रकार जिसमे खेत का मालिक छगान के 
बदले में उपज का कुछ अश लेता है। जैसे--यद् खेत इस साल 
बेंटाई पर दिया गया है। 


छगवाकर अपना हिस्सा लेता। जैसे--उसने सारी जायदाद बैठा छी 
है। २. किसी कांम या बात में हस प्रकार सम्मिलित होना कि दूसरे 
का मार कुछ हलूका हो जाय। जैसे-- (क) किसी का दु ख बेंटाना। 
(क्व) किसी काम में हाथ बंटाना। ३. दे० बेंटवाना। 

बेंटावन--वि० [हिं० बेंटवाना] बेंटवाकर अपना हिस्सा लेनेबाला। 

बेंटी--स्त्री० [? | हिरन आदि पशुओं को फेंसाने का जाल या फंदा। 
सत्री० हिं० बंटा' का स्त्री० अल्पा०। 

बेंटेया--वि० [हिं० बॉटना] बॉटनेवाला। 
वि० [हिं० बंटवाना] बेंटवाकर अपना हिस्सा ले लेनेवाला। 

बेंड--वि० >बांडा । 
प्‌ू०>7-बडा। 

बेंडल--१० [ अ० ] रस्सी आदि से अच्छी तरहू बेधा हुआ पुलिदा। 

बेंडवा| ---वि० + बाँड़ा । 

बंडा--प१० [7० बटा] १ अरुई की जाति की एक छता। २. उक्त 
लता के कद जिनकी तरकारी बनाई जाती है। ३ अनाज रखने का 
बखार। 

बंडी--स्त्री ० [हिं० बाड़ा >कटा हुआ] १ बिता अस्तीन की एक प्रकार 
की कुरती। फलूही। मिरजई। २ बगरूबन्द नाम का पहनने का 
कपडा। 

बेंडेर---स्त्री ० [सं० वरदड़ ? ] वह बल्‍्ला या शहतीर जिसके ऊपर छाजन 
का ठाठ स्थित होता है । 

बढेरा] ---पु० “बेडेर । 

बंडेरी| --स्त्री ० >बडे र । 

बद--पु ० [स० बंध से फा०] १ वह चीज जो किसी हुसरी च्रीज को 
बाँधघती हो। जैसे--डोरी, रस्सी आदि। २ लोहे आदि की वह लम्बी 
पट्टी जो बडी बडी गठरियों, सदूकों आदि पर इसलिए रक्षा के विचार से 
बाँधी जाती है कि माल बाहर भेजते समय उससे से कुछ चुराया या 
निकाला न जा सके। ३. किसी प्रकार की हम्बी धज्जी या पढट्टी। 
जैसे--कपड़े या कागज का बन्द । ४ वास्तुरचना मे, पत्थर की वह पटियाँ 
या पत्थरों की वह श्वुखल्ा जो दीवारों मे मजबूती के छिए छगाई 
जाती है और जिसके ऊपर फिर दीवार उठाई जाती है। ५. पानी की 
बाढ़ आदि रोकने के लिए बनाया जानेवाला धुस्स। बाँध । ६ फीते 
की तरह सीकर बनाई हुई कपडे की वह डोरी था फीता जिससे अँगरखे, 
चोली आदि के पल्ले आपस मे बाँध जाते हैं। ७ कागज, धातु आदि 
की पतली लबी घज्जी। पट्टी | ८, छाक्षणिक रूप में, किसी प्रकार 
का नियत्रण या बधन। जैसे--बदे के जाये बदी मे नहीं रहते। ९. 
उर्दू कविता में वह पद जो पाँच या छ 'भरणों का होता है। १०. 
कविता का कोई चरण या पद। ११ शरीर के अगों का जोड़ या संधि- 
स्थान। जैसे---बद बद जकड़गा या ढीला होना। १२९. कोई काम 
कौशलपूर्वक करने का गुण, योग्यता या शक्ति। १३- तरकीय। 
युक्ति। उदा०--कस्बोहुनर के याद हैं जिनको हजार बन्द | ++ 
नजीर। 


बंएक 





हम मनमक न >-+-+-+- नीनन--.+० 


वि० ९. (पदार्थ या व्यक्ति) जो चारों ओर से घिरा या रुका हुआ 
हो। जैसे--(क) कोठरी में सब सामान बद है। (ख) पुलिस ने 
उसे थाने भे बन्द कर रखा है। २. (स्थान) जो चारों ओर से खुलूता 
या खूला हुआ न हो फकत. जो इस प्रकार घिरा हो कि उसके अन्दर 
कुछ या कोई आ-जा ने सके। जैसे--वह मकान तो चारो तरफ से बन्द 
है; अर्थात्‌ उसमे प्रकाश, वायु आदि के आने का यथेष्ठ मारे नहीं है। 
हे. (स्थान) जिसके अन्दर छोगों के आने-जाने की मनाही या रुकावट 
हो। जैसे---जन-साधारण के लिए किला आज-कल बन्द हो गया है। 
४. (किसी प्रकार का भार्ग या रास्ता) जो अवरुद्ध हो अर्थात्‌ जिसके 
आगे ढकना, तारा, दरवाजा, या ऐसी ही कोई और बाधक चीज या 
बात॑ छूगी हो जिसके कारण उसके अन्दर पहुँचना या बाहर निकलना 
न हो सकता हो। जैसे--नाली का मुंह बन्द हो गया है, जिससे छत 
पर पानी रुकता है। ५ ढठकने, दरवाजे, पल्ले आदि के सबंध मे, जो 
इस प्रकार भेड़ा या लूगाया गया हो कि आने-जाने या निकालने-रखने 
का रास्ता न रह जाय। जैसे--कमरा (या सदूक) बद कर दो। 
विशेष---इस अर्थ मे दस शब्द का प्रयोग ढकने, दरवाजे आदि के सबंध 
में भी होता है, और उस चीज के संध मे भी जिसके आगे वे रंगे रहते 
हैं। 
६ शरीर के अगो, यशत्रो आदि के सबंध मे, जिनकी क्रिया या व्यापार 
पूरी तरह से रुक गया हो अथवा रोक दिया गया हो। जैसे-- (क) 
बुढ़ापे के कारण उनके कान बन्द हो गए है। (ख) धोड़ के पिछले 
पैर दो दिन से बन्द हैं, अर्थात्‌ ठीक तरह से हिछ-डुल नहीं सकते। (ग) 
पानी की कल ( या बिजली) बन्द कर दो। ७. किसी प्रकार के मुख 
या विवर के सबंध मे, जिसका अगला भाग अवरुद्ध या सपुदित हो। 
जैसे--- (कफ) फमल रात मे बन्द हो जाता है और दिन मे खुलता (या 
खिलता ) है। (ख) थोड़ी मिट्टी डाछकर यह गड़ढा बन्द कर दो। ८. 
(कार्य करने का स्थान ) जहाँ अस्थायी या स्थायी रूप से कार्य रोक दिया 
गया हो या स्थगित हा चुका हो। जैरो---(क ) जाड़े मे रात को ९ बजे 
सब दहुकाने बन्द हो जाती हैं। (ख) उनका छापाखाना (या विद्यालय ) 
बहुत दिनो से बद पडा है। ९. कोई ऐसा कार्य, गत्ति या व्यापार जो 
चल न रहा हो, बल्कि थम या रक गया हो। जैसे---(क) अब थोड़ी 
देर में वर्षा बन्द हो जायगी। (ल) उन्होंने प्रकाशन का काम बन्द 
कर दिया है। १०. (व्यक्तित) जो अक्रिय तथा उदास होकर बैठा 
हो। (बव०) जैसे---आज सबेरे से तुम इस तरह बन्द से क्यों बैठे हो ? 
११. लेन-देन या हिसाब-किताब जिसके व्यवहार का अन्त हो चुका हो। 
जैसे--आज-कल हमारा उनका लेन-देन बन्द है। १२. (व्यक्ति) 
जिसके साथ सामाजिक व्यवहार का अन्त हो चुका हो। जैसे--वह 
साल भर से बिरादरी से बन्द है। १३. कोई परिमित अवधि या समय 
जिसकी समाप्ति हो गई या हो चली हो । जैसे---एक दो दिन में यह महीना 
(पा साल) बन्द हो रहा दै। १४. शस्तरों की धार आदि के सबध से, 
जिसमे कार्य करने की दाक्सि त रह गई हो। जो कुठित हो गया हो। 
जैसे--यह चाकू (या कोची) तो बिलकुछ बन्द है, अर्थात्‌ इससे काटने 
या कतरने का काम नहीं हो सकता। 
वि० शब्दों के अन्त में प्रत्यय के रूप मे, प्रयुक्त होने पर, जड़ने, बाँधने 
या छूग्रातेबाला। जैसे--कमर-बन्द, माछ-बन्द, नैचा-बंद। 


अंदर-सत 


'वि०- वंच्य (वंदनीय)। 
(पुं०बिंदु। 

अंदक| ---वि० (१. 5 वंदक (वदना करनेवाला)। २ बघक (बाँघने- 
बाला) । 

[वि० [हिं० बद |क (प्रत्य०)] बन्द करनेवाला। 

बंबगी--स्त्री० [ फा०] १. किसी के सामते यहू मान छेना कि 
मैं बन्दा (सेवक) हूँ और आप मालिक (स्वामी) हैं। अधीनता 
और दीनता स्वीकृत करना। २. मन में उक्त प्रकार का भाव या 
विचार रखकर की जानेबाली ईदवर की बदता। ईश्वराराधन। ३. 
किसी को आदरपूर्वक क्रिया जानेवाला अभिवादल। नमसस्‍्कार। 
सझाम। ४ आज्ञा पालन। ५. टूल । सेवा । उदा०--जैसी 
बन्दगी, वैसा इनाम। (कहा० ) 

बंद-गोभी--स्त्री० [हि० बंद |गोमी] १५ करमकल्ला । पातगोभी 
का पौधा। २. उक्त पौधे का फल जिसकी तरकारी बनाई जाती है। 

बंदन--प:;|ं० [स० बदनीः-गोरोचन] १ रोचन। रोछी | २. इंगुर। 
सिदूर। 
प्‌ृ०-वृदन। 

बदनता|---स्त्री ०-वदनीयता। 

बंदनवान[--१ ० [स० बधन| कारागार का प्रधान अधिकारी । 

बंदनवार---१ ० [स० वदनमाछा] आम, अशोक आदि की पत्तियों को 
किसी हरूम्बी रस्सी में जगह-जगह टाँकते पर बननेवाली श्ुखला जो 
शुभ अवसरो पर दरवाजों, दीवारों आदि पर लटकाई जाती है। 
तोरण। 

बंदनसाल]| --स्त्री ० [सं० बधन+णाला] कारागार। 

बंदसा--स ० [सं० चंदन] १ वंदता था आराधना करना। २. 
नमस्कार या प्रणाम करना। 
| रत्री ०<बंदना। 

घंदनी--स्त्री० [स० वंदनी-माथे पर बनाया हुआ चिह्न] स्त्रियों का 
एक आमूषण जो सिर पर आगे की ओर पहना जाता है। इसे बदी या 
सिरबदी मी कहते हैं। 
वि०--वदनीय। जैसे---जग-बदनी । 

बंदनीमाल--स्त्री० [स० वदनमाल] बहू लम्बी मारा जो गले से पैरों 
तक लटकती द्वो। घुटनों तक लूटकती हुई छबी माला। 

बंदर--मु० [स० वानर] [स्त्री० बँदरिया, बेंदरी] १. एक प्रसिद्ध 
स्तनपायी चौपाया जो अनेक बातों मे मनुष्य से बहुत-कुछ मिलता- 
जुलता होता ओर प्राय: वृक्षो आदि पर रहता है। कपि। सर्कट। 
घाला-मृग । 
पद---बदर का घाव -दे० बेंदर-खत'। बंदर धुड़की या बंदर भभकी-< 
बदरो की तरह डराते हुए दी जानेवाली एसी धमकी जो दिखावे भर 
को हो पर जो पुरी न की जाय । 
२. राजा सुग्रीव की सेना का कोई सैनिक। 
पुं० [फा०] बदरगाहू। 

बंदर-खत|--१० [हिं० बदर+क्षत- भाव] १. बन्दर के शरीर में 
होनेवाला धाव जिसे बह प्राय नोच-मनोच करः बढ़ाता रहता है। २. 
ऐसा कार्य या बात जिसकी खराबी या बुराई जात-बुझकर बढ़ाई जाय | 


बंदरगाहु ४० बंधक 


बंदरगाह--पू ० [फा०] समुद्र के किनारे का वह स्थान जहाँ जहाज 
ठहरते है। 

बंबर बॉट--स्त्री ० [हिं० बदर | बाँटना] न्याय के नाम पर किया जाने- 
बाला एसा स्वार्थपर्ण बँटवारा जिसमे न्यायकर्ता सब कुछ स्वय हजम 
कर छेता है और विवादी पक्षो को विवाद-ग्रस्त सपत्ति मे से कुछ भी 
प्राप्ति नहीं होती। 

बेंबरा--प्‌ ० दे० बनरा। २ दे० बन्दर। 

बंदरिया--स्त्री ० हि० बदर का स्थत्री० रूप। 

बदरी--स्त्री० [फा० बन्दर]| १. बन्दर या बन्दरगाह-सम्बस्धी। २ 
बन्दरगाहु में होकर आनेवाछा, भर्थात्‌ विदेशी। जैसे--बदरी 
तलवार । 
स्त्री० हि० बन्दर (जानवर) का स्त्री०। मादा बदर। 

बवली--१० [देश०] स्हेलखड में पंदा होनेवाला एक प्रकार का धान 
जिसे रायमुनिया और तिलोकचदन भी कहते है। 

बंदबान--प्‌ू ० [स० बदी+वान] बदी गृह का रक्षक। कद खाने का 
प्रधान अधिकारी। 

बदसाल--१० [स० वदीशाला] वदीगृह। कंदखाना। 

बदा--प१० [फा० बद ] १ दास। सेवक। २ भक्‍त। ३ मनुष्य। 
विशेष--वक्‍ता नपम्नता सूचित करने के लिए इसका प्रयोग अपने लिए 
मी करता है। जैसे--लीजिए बन्दा हाजिर है। 
प्‌० [स० बदी| कंदी। बदी। 

बदा-नवाज--वि० |फा० बद नवाज | [माब० बदा-नवाजी | १. आश्रितो 
और दीना पर अनुग्रह या कृपा करनेवाला। दीन-दयालु। २ भकक्‍त- 
बत्सल। 

बद्ा-परवर--प्‌ ० [फा० बद पर्वर | [भाव० बदा-परवरी | >बदा-नवाज़ । 

बदानी--१० [? ] गालदाज। तोप चलानेवाला। (लश्करी ) 
प्‌० [* ]एक प्रकार का हलका गुलाबी रग जो प्याजी से कुछ गहरा 
होता है। 
वि० उक्त प्रकार के रग का । 

बदारु--वि० | स० वदारु ,५/वन६-] आरु | आदरणीय और पृज्य | वदनीय । 
+प० बदाल। 

बदाल--प्‌ ० [” | देवदाली। घधरवेल। 

बदि--स्त्री० [स० बदि] बधन। २. कंद । 
| स्त्री० -बदीगृहु (कारागार) । 
प्‌ ०>बदी या वदी (दी) । 

बबि कोषप्ठ--प१ ० [स० वदीकोष्ठ] वदीगृह (कारागरार)। 

बदि छोर--वि ० --बदीछोर । 

बदिया--सत्री ० -बदी (आमृषण)॥। 

बंदिश--स्त्री० [फा०] १ बॉघने की क्रिया या भाव। २. किसी 
प्रकार का बन्घन या रकावट। हे कविता के चरणों, वाक्यो आदि 
में होनेवाली शब्द-योजना। रचना-प्रगध। जैसे--गजल या गीत 
की बदिश। ४ किसी को चारो ओर से बाँध रखने के लिए की जाने- 
वाली योजना । ५ कोई बड़ा काम छेड़ने अथवा किसी प्रकार की रचना 
आरभ करने से पहुले किया जानेवाला आयोजन था आरभिक व्यवस्था । 
६. परड्यत्र। 


। बंदी--प्‌ ० [सं०] चारणों की एक जाति जो प्राचीन काछ में 


राजाओं का कीततियान किया करती थी। माठ। चारण। दे० वदी । 
पू० [स० वन्दिनू] कदी। बेँधुआ। 
स्त्री०-नबदनी (सिर पर पहनने का गहना)। 
वि० फा० बंदा' (दास या सेवक) का स्त्री०। 
स्‍त्री? [फा०] १. बद करने की क्रिया या भाव। जैसे--दुकान 
बदी। २. बाँधने की क्रिया या भाव। जैसे--ताकेबदी । ३. 
व्यवस्थित रूप से लाने का भाब। जैसे--दलऊबन्दी । 

बंदीखाना--१० [फा० बदीखान.] जेलखांना। कैदखाना। 

बदीघर--पु्‌ ० [स० वदिगृह] कंदखाना। जेलखाना। 

बंदीछोर--वि० [फा० बदी +हिं० छोर (ड़) ना] १. कैद से छंडाने- 
वाला। २ संकटधूर्ण बंधन से छुड़ानेबाला। 

बंदीधान--प्‌ ० [स० वदिन्‌] कैदी। 

बंदूक--स्त्री० [अ०] एक प्रसिद्ध अस्त्र जिसमे का रतूस, गोली आदि 
मरकर इस प्रकार छोडी जाती है कि लक्ष्य पर जाकर गिरती है। 
क्रि० प्र०---चरूाना ।--छोडना--दागना । 
मुहा ०--बदूक भरनाज”-बदूक में कारतूस, गोली आदि रखना । 

बंदूकची--पू ० [अ० बदूक+फा० थी (प्रत्य०)] १ बहूक चलाने- 
वाला सिपाही। २ बदूक की गोली से छक्ष्य-मेंदन करनेवाला व्यक्त । 

बंदूख[--स्त्री २--बदूक । 

बंदेरा[---7० |फा० बन्द ] [रत्री० बेंदेरी] १ दास! २ सेवक। 

बंदोड़'--प्‌० [फा० बन्द | गुलाम। दास। 

बदोबस्त|--प० [फा०] १ प्रबध। व्यवस्था। २ खेतों की हृदबदी, 
उनकी मालगुजारी आदि निदिचत करने का काम। 
पद--बदो बलत आरिजी-- कृषि-सबधी होनेवाली अस्थायी व्यवस्था। 
बदोअस्त-इस्तमरारी या दबामी “पक्की और सदा के लिए निद्दिवत 
क्रेषि व्यवस्था । 

बघ--प्‌ ० [स०५/बध्‌ (बधना) | घम्‌] १ वह चीज जिससे कोई 
दूसरी चीज ब्रॉँबी जाय। जैसे--डोरी, फीता, रस्सी आदि। २ 
बाँधने की क्रिया या भाव। हे. बबन। ४. किसी को पकड़कर बाँध 
रखने की क्रिया। कैद। ५ कोई चीज अच्छी तरह गठ या बॉधकर 
तैयार करना। जैसे---काव्य-ग्रथ का सर्ग-बध । ६ रचता करना। 
बनाना । ७ कल्पना करना। ८ गद्य या पद्म के रूप में साहित्यिक 
रचना करना। तिबस रचना। ९. लगाव। सबध। १०. आपस 
में होनेवाला किसी प्रकार का निश्चय। ११. योग-साधन की कोई 
मुद्रा। जैसे--उड्डीयान बध। १२५ कोक शास्त्र में, रति के मुख्य 
सोलह आसनो में से एक आसन। १३ रति या स्त्री-समोग करने का 
कोई आसन या मुद्रा। १४ चित्रकाव्य में छए की ऐसी रचना जिसमें 
कुछ विशिष्ट नियमों के अनुसार उसकी पक्तियों के अक्षर बँठाने से 
किसी विद्षेष प्रकार की आक्ृति या चित्र बन जाय। जैसे--अश्ववध, 
खड्गबध, छत्र-बघ आदि। १५. बनाये जानेवाले मकान की लंबाई 
और चौडाई का योग। १६ काया। शरीर। १७ जलाशय के 
किनारे का बाँध। 
प७ १३. न्ज्जधु। 


बंधक--वि० [स०३/बंध्‌ (बंधना) +प्युडद--अक] १. बाँधनेवाला 


बंध-ररजण 


२. (पदार्थ) जो किसी से रुपए उधार लेने के समय इस दृष्टि से जमा- 
नत के रूप मे उसके पास रखा गया हों कि जब तक रुपया (और सूद) 
चुकाबा न जायगा; तथ तक वह उसी के पास रहेगा। रेहन। ३. 
अदला-बदली या विनिमय करनेवाला । 
पु० [सं० बध+करन्‌ ] लेन-देन या व्यवष्टार का वह प्रकार जिसमे 
किसी से रुपया उधार लेने के समय कोई मूल्यवान्‌ वस्तु इस दृष्टि से 
महाजन के पास जमानत के तौर पर रख दी जाती है कि यदि ऋण 
और ब्याज न चुकाया जा सके तो महाजन वह वस्तु बेचकर अपना 
प्राप्प घम के सकता है। रेहन। (मार्टगेज ) 

बंध-करण---प० [ष० त०] कैद करना। कारावास मे बद करना। 

अंधक-कर्ता (त)--१० [स० ष० त०] वह जो कोई चीज बधक रूप 
मे किसी के यहाँ रखता हो। (मार्टगेजर) 

बधकी---स्त्री० [स० बधक+डीब] १ 
रडी । वेश्या । 
वि० [हिं० बंधक] जो बधक के रूप मे पडा हुआ या रखा गया हो। 
जैसे---बधकी मकान । 

बंध-संत्र--प्‌ ० [ मध्य ० स०] किसी राजा अथवा राज्य की संपूर्ण सैनिक 
धक्ति। पूरी सेना। 

बंधन--पू ० [स०१/बध्‌--ल्युटू--अन ] १ बँधने या बाँधने की क्रिया 
या भाव। २. बाँधनेवाली कोई चीज, तत्त्व या बात। जैसे--जजीर, 
ढोरा, रस्सी, प्रतिज्ञा, वचन आभादि। २ कोई ऐसी चीज या बात जो 
किसी को उच्छुखरू होने या मन-माना आचरण अथवा व्यवहार करने 
से रोकती हो। कोई ऐसा तत्त्व या बात जो किसी को नियमित या 
मर्यादित रूप से आचरण करने के लिए बाध्य करती हो। जैसे---प्रेम 
या समाज का गधन। ४. वह स्थान जहाँ कोई बाँध या रोककर रखा 
गया हो अथवा रखा जाता हो। जैसे--कारामार आदि। ५. कोई 
चीज अच्छी तरह गठ या बॉघकर तैयार करना। जैसे--सेतु-बधन । 
६. दारीर के अन्दर की रगे जिनसे भिन्न-भिन्न अंग बंधे 
रहते हैं। 
मुहा ०-- (किसी के ) बंधन ढीले करना 5 (क) बहुत अधिक मारना- 
पीटना। (ख) सारी शेखी या हेकडी निकाल देना। 

७. तदियों आदि का बाँध। ८. पुर। सेतु। ९. बब। हत्या। 
१०. हिंसा। ११. शिव का एक नाम। 

बंधन-प्रंथि--स्त्री० [ष० त०] १. शरीर में वह हड्डी जो किसी जोड़ 
पर हो। २. फाँस। ३. पश्चुओं को बाँधने की डोरी या रस्सी । 

बंधन-पालक--पू ० [ष० त०] कारागार का प्रधान अधिकारी । 

बंधन-रक्षी (किन )--१० [सें० बधन4/रक्ष+णिनि] कारागार का 
प्रधान अधिकारी । 

बंधन स्तंभ---7० [ष० त०] वहू खम्मा था खूँटा जिससे पशुओ को 
बाँषा जाता है। 

बेंधमा--अ० [ हिं० बाँधना' का अ० रूप] १ बंधन मे आना 

या पह़ना। बाँधा जाना। २. डोरी रस्सी आदि से इस प्रकार 

छपेटा जाता अथवा कपड़े आदि की गाँठ से इस प्रकार कसा या जकड़ा 

जाना कि जल्दी उससे छूटा न जा सके। जैसे---गौ या घोड़ा बेधना, 

गठरी था पारसर बँघना। रे. किसी प्रकार के मियमन, प्रतिबंध 
४-६ 


न 3 जीत + अल न 


ब्यभितारिणी स्त्री। २. 


डर 


अंधातो 

आदि से युक्त होना। जैसे--अ्रतिज्ञा या वचन से बंघना। ४. कारा- 
गार आदि में रखा जाना। कैद होना। जैसे--दोनों गुडे साल-साल 
भर के लिए बंध गए। ५. अच्छी तरह गठकर टीक या प्रस्तुत होना । 
बनाया जाना। रचित होना। जैसे--मजमून बँघना। ६. पालन, 
प्रचछन आदि के लिए नियत या निर्धारित होना। जैसे--कायदा 
या नियम बेंबना। ७, किसी के साथ हस श्रकार सबत्ध, संयुक्त या 
संलूग्न होना कि जल्दी अकूग्राव या छुटकारा न हो । उदा०---अली 
कली ही ते बेंध्यो आगे कौन हवाल ।---विहारी। ८. ध्यात, विचार 
आदि के सबध मे, निरतर कुछ समय तक एक ही रूप से बना या छगा 
रहना। जैसे--किसी आदमी या बात का र्यारू बेंघना। 

बंधतागार--पु ० [स० बघधन-आगार, ष० त०| कारागार। 

बंधनालय--पु० [स० बंधघन-आलय, घब० त०] कारागार। 

बेंधनि---स्त्री ०बधन। 

बंधनी--स्त्री० [स०९/बध्‌ +ल्युटू--अन, डीप्‌) १. शरीर के अन्दर 
की वे मोटी नसें जो संधि स्थान पर होती है और जिनके कारण दो अव- 
यव आपस में जुड़े रहते है। २. बह जिससे कोई चीज बाँधी जाय। 

बंधनीय--वि० [सं०५/बंघ्‌+अनीयर्‌] जो बाँघा जा सके या बाँधा 
जाने को हो। 
पु० १ बाँध। २. पुर। सेतु 

बध-पत्र--प्‌ू ० [स० ष० स०| १ विधिक दृष्टि से मान्य वह पत्र 
जिस पर हस्ताक्षर करनेवाला व्यक्ति अपने आप को कोई काम करने 
के लिए प्रतिज्ञा-बद्ध करता है। जैसे---नियत कार तक कोई काम या 
नौकरी करते रहने, नियत समय पर कही उपस्थित होने या कुछ धन 
देने का बष पत्र)२ एक प्रकार का सार्वजनिक ऋण-पत्र जिनमे निश्चित 
समय के अन्दर कुछ विद्विष्ट नियमों या शर्तों के अनुसार लिया हुआ 
ऋण चुकाने की प्रतिज्ञा होती है। (आड़) 
बविशेष---अतिम प्रकार का बंध-पत्र प्राय राज्यो, नगर-निगमो और 
बड़ी बड़ी व्यापारिक सस्थाओ के द्वारा प्रचलित होते हैं। 

बंध-मोचनिका--स्त्री० [स० ष० त०] एक योगिनी का नाम । 

बंध-मोचिनी---स्त्री ० --बंधमोचनिका । 

बंधव [---१ ०--बाँधव । 

बेंधवामा---स ० [हिं० बाँघना का प्रे०] १. बाँघने का काम किसी 
दूसरे से कराना। किसी को कुछ बाँधने में प्रवत्त करना। जैसे--- 
बिस्तर बेंघवाना। २ नियत या मुकर्रर कराना। ३ वास्तु आदि 
की रचना कराना। जैसे--कूआँ या तालाब बेंधबाना | ४ बंधन 
अर्थात्‌ कारागार आदि में डलवाना या रखबाना। जैसे--चोरो को 
बेंघवाना । 

बधान--स्त्री ० [हिं० बंधना] १. बंधे हुए की अवस्था या भाव | २ 
बहू नियत परम्परा या परिपाटी जिसके अनुसार कुछ विशिष्ट अवसरों 
पर कोई विशिष्ट काम करते का बन लगा होता है। ३ वहु घम 
जो उक्त परिपाटी के अनुसार दिया या लिया जाय। ४ सगीत में 
गीत, ताल, लय, स्वर आदि के संबंध में बंधे हुए नियम। ५ बाँघ। 

बंधाना---स ० >> बँंघवाना | 

बंधासी---१० [स॒० बंध] बोझ ढोनेबारा। मजदूर। कुली। 
स्‍त्री ०>-बंधान । 


बंधाल 


बंधाल--प० [हिं० बधान] जलयान, नाव आदि के पेदे का वह माग 
जिसमें छेदो मे से रिसकर आया हुआ पानी जमा होता है और जो बाद 
में उठीचकर बाहर फेका जाता है। गमतखाना। गमतरी। 

बधिका--स्त्री  [हिं० बधन | करधे में की वह डोरी जिससे ताने की 
सांधी बॉधी जाती है। (जुलाहे) 

बघित--मू० कृ० [स० वध्या| बॉस । (डिगल ) 

बंधित्र--प० [स०९/बय्‌ | इत्र] १ काम-देव। 
४ चमडई का बना हुआ पखा। 

बधी (धिन)--वि० [स॒० बब +हनि) १ बंधन में कसा जकडा रा 
पडा हुआ। २ जिसमे या जिसके लिए किसी प्रकार का बवन हो। 
सत्री० [हिं० बाघना] १ बधध हुए होने की अवस्था या भाव। २ 
बेंधा हुआ क्रम। नियमित रूप से या नियत समय पर नित्य किया 
जानेवाला काम। जैसे--हमारे यहाँ दूध की बँघी लगी है। 
क्रि० प्र०--लगना ।--लगाना | 

बंधु--पृ० [स०६/बन्ध्‌ (बन्धघन)+उ] १ माई। अआ्राता। २ परम 
आत्मीय और माइयो की तरह साथ रहने या काम आनेवाला व्यक्ति । 
3 ऐसा प्रिय मित्र जिसके साथ माइयो का सा व्यवहार हों। ४ पिता। 
७५ एक वर्ण बृत्त जिसके प्रत्येक चरण में क्रण तीन तीन मंगण और 
दो दो गुरु होते है। दोबक। ६ बेघधूक नामक पौधा और उसका फूछ। 

बेंधुआ--वि० [हिं० बँधना +आ (प्रत्य०)] १ जो बँधा रहता हो। 
२ (पशु आदि) जिसे बॉधकर रखा गया हो। 
प्‌ ० कैदी । बदी। 

बधुक--प ० [स०९/बघु |उक] १ डेढ-दो फूट ऊँचा एक तरह का 
क्षु५ जिसमे गोलाकार लाल रग के फूल दोपहर के समय खिलते है। 
० उन क्षप का फूल जो वैद्य क मे वात तथा पित्त नाशक और कफ 
बढानवाला माना गया है। दुपहरिया । ३ जारज सतान। 

बधुका--मत्री ० [स० बचु । कन्‌ +टाप्‌ | व्यभिचारिणी स्त्री। 

बधुक्ी--सत्री० [स० बधु |-कन्‌ +डीष ] व्यमभिचारिणी स्त्री | 

बथु-कुत्य--१ ० [स० प० त०]) व्यक्ति का अपने माई-बधुओ तथा 
स्वजनो के प्रति होनेवाला कतंव्य। 

बधु-जीव---पू० [स० बध्‌५/जीव 
(पीचा और फूल) | दुपहरिया। 

बधु-जोचक--प्‌ ० [स० बधुजीव-+-कन्‌ | बधूक। दुपहरिया। 

बधुता--सम्त्री० [स० बब्‌ तल |-टाप] १ बचधु होने की अवध्था 
या माव। २ बधुओ अर्थात्‌ स्वजनों में परस्पर होनेवाला उचित 
व्यवहार। माई-चारा । ३. दोस्ती। मित्रता। ४ भाई-बधु तथा 
स्वजनों का वर्ग । 

बधुत्व--प्‌ ० [स० बधु ! त्व |- बंघुता । 

बंधु-दत्त--मृ० कृ० [ स०्तृ ० त० | बधुओ द्वारा दिया हुआ । बधुओ से प्राप्त । 
पु० बबुओ, स्वजनो आदि द्वारा कन्या को उसके विवाह के अवसर पर 
दिया जानेवाला धन । 

बंघुदा--स्त्री० [स० बधु५/८दा (देना)+क टाप| १ 
स्त्री। बदचलन औरत। २ रही। वंश्या। 

बघुसान्‌ (सत्‌)--वि० [स० बथु |-मतुप | जिसके कई या बहुत से बंघु 
या स्वजन हो। 


२ तिल (चिह्न)। 


(जीना) +णिच्‌ +अच्‌ | बधूक 


दुराचारिणी 





बेब 


बंधुर--प० [स०५/बघ्‌+उरच्‌] १ बहरा आदमी। २. हस। ३. 
बगला। ४ मुकुट। ५ गुरू दृपहरिया का पौधा था फूल। ६ 
काकडा-सिंघी। ७ विडग। ८ चिड़िया। पक्षी। ९ खली। 
वि० १. मनोहर । सुन्दर। २ नम्र। विनीत । मे झुका हुआ। 
४, ऊँचा-तीचा | 

बधुरा-स्त्री० [स० बधुर | टाप| बध॒दा । (दे०) 

बबधुल--वि० [स०९/बब्‌ | उछच्‌ | १ झुका हुआ। वक्र। २ सुन्दर। 
नम्न। 
पू० १ वह व्यक्ति जो पर-पुरुष से उत्पन्न हुआ ही पर किसी दूसरे के 
घर में पला हो तथा पराये के अन्न स पुष्ट हुआ हं। २ बदचलन स्त्री 
का लड़का। ३ वत्रेश्या का छडका। 

बेंबुआ[--पु० बँधुआ । 

बधूक--पू० [स० “बच ,ऊऊ] बबुक। 

बधूप | --पु ० - बधूक । 

बयूर--पु० [स०/बयू | ऊरचू | १ 
३ मनाहर। 
पु० छेद । 

बधेज--प१० [हि बबना | एज (प्रत्य०) | १ कोई नियत और पर- 
म्परागत प्रथा। विशेषत बँधी हुई तथा सर्वमान्य ऐसी परम्परा जिसके 
अनुसार सबधियो, सेवको आदि का कुछ विशिष्ट अवसरों पर धन आदि 
दिया जाता है। २ उक्त प्रथा के अनुसार दिया अथवा किसी को मिलने- 
वाला धन। से दे० बाँध (छपाई)। ४ प्रतिबध। रुकाबट। 
५ ऐसी युक्तित जिससे वांय को जल्दी स्तलित नहीं होने दिया जाता 
वाजीकरण ! 

बध्य--वि० [स०१/बध +यक्‌] १ जो बाँधा जा सके अथवा बाँधने 
के योग्य हो। २ कारावास में रबे जाने के योग्य। ३ जो तैयार 
किये जाने, बनाये जाने अथवा निमित किये जाने को हो। ४ जो उप- 
जाऊ न हो। ऊसर। ५ बाञझ्ज (स्त्री) । 

बध्या--स्त्री ०[स० बध्य | टाप्‌ | १ स्त्रीया भादा प्राणी जिसे सताम ने 
होती हो। बाँश। 
पद--बध्या-पुत्र | (देखे ) 

२ यानि का एक रोग। ३ एक गक-दरव्य। 
बंध्या-करकोटकी--स्त्री ० (स० ष० त० | कडव। ककडी। बाँझ-ककोड़ा। 
बध्यापन---प्‌ ० --बॉझपन । 
वध्यापुत्न--पु० [स० ष० त०] १ बांझ स्त्री का पुत्र अर्थात्‌ ऐसा अनहोना 

व्यक्ति जो कमी अस्तित्व मे न आ सकता हो! २ छाक्षणिक अर्थ 

में कोई ऐसी चीज या बात जो बध्या के पुत्र के समान अनहोनी हो । 
बध्यासुत--पु० [घ० त०] बध्यापृत्र। 

बं-पुलिस-स्त्री ० [० बम+पुलिस] सार्वजनिक शौचालय। 

बब--पु० [अनु ० | १ बब शिव शिव आदि शब्दों की ऊँची ष्यनि जो 
शैव छोग मक्ति की उमग में शिव को प्रसन्न करने के लिए किया करते 
हैं। २ युद्धारम में वीरो का उत्साहवर्धक नाद। रणनाद। उदा०-- 
नारद कब बंदूक चलाया व्यासदेव कव॒ बंब बजाया |---कबीर। ३ बहुत 
ओर का शब्द । 
क्रि० प्र०--देना ।---बोलना | 


झुका हुआ। २ ऊँचा-नीचा। 


अंभई 


४. घौसा। नगाड़ा । ५. सीग का बना हुआ तुरही की तरह का 
एक बाजा। ६. दे० बम । 

बबई--स्त्री० [स० बल्मीक] १ दीमकों की बॉबी। २ रहेस्यवादी सतो 
की भाषा में, देह। शरीर। 

बंबा--प्‌ ० [० मरा] १ स्रोत। सोता। २. उद्गम। ३. पानी की 
कल। पप। ४ जल-करू। ५ पानी बहाने का नल। ६ कोई 
लंबोतरा गोल पात्र। जैसे--डाक की चिट्ठियाँ डालने का बबा । 

बंबाता--अ० [ अनु० | गौ आदि पश्ुओ का बम2८॑ा बॉ शब्द करना । रँमाना । 

घंबू--प्‌ ० [ सठाया० अम्बू--बाँस| १ चड़्‌ पीने की बॉस की नली। 
ए नली। 
कि० प्र०--पीना ! 

धबुकाट---प्‌ ० [ मलाया बबू- अ० कार्ट] एक प्रकार की टाँगे की तरह 
की सवारी। (पश्चिम ) 

बेंबर--प्‌ ०८बबूल। 

बभा--प्‌ ० - “अहय। 

बेंभनाई---स्त्री ० [स० ब्राह्मण] १ ब्राह्मणत्व। क्राह्मणपत्र।२ ब्राह्मणों की 
यजमानी घोती। ३, दुराग्रह। ४ जिंद । हठ। 

बंस--प्‌ ० “वश । 

बलसकप्र--१० बस-लोचन । 

बसकार*---प. ० [स० वश] बसुरी। 

बेंसगर--प्‌ ० [ हि० बॉस (-फा० गर (प्रत्य०)] बाँस की चटाइयाँ, टोक- 
रियो आदि बनानेवाला व्यक्ति। 
वि०[स० वश | अच्छे वशवाऊा। कुलीन । 

बेंस-विया--पु ० [हि० बाँस+ दिया | गाड़े हुए बाँस के ऊपरी सिरे पर 
लटकाया जानेवाला दीया। विशेष दे० आकाश दीप। 

बंसम्रणी--स्त्री ० [हि० बांस ; मुर्गी] एक प्रकार की चिडिया जो तालों 
के किनारे तथा घनी झाडियो के आस-पास प्राय. रहती है। इसे दहक 
भी कहते है। 

बसरी*--स्त्री ०--बाँसुरी। 

बेंसली--स्त्री ० --बाँसू री । 

बस-लोचखन---१०- वशलोचन। 

बंसवाह़ा--प ० [हिं० बाँस |-वाडा (प्रत्य०) ] [स्त्री० अल्पा० बेंसवाडी] 
१ वह बाजार या मुहल्ला जहाँ बाँस बेचनेवालो की बहुत सी दुकाने 
या घर हो। २ एक जगह उगे हुए बाँसो का समूह । कोठी । 

अंसवार|--१० [स्त्री० अल्पा० बसवारी| बँसवाहा | 

बेंसहटा---१० [हिं० बांस] [स्त्री० अल्पा० बसहटी] वह चारपाई जिसमें 
पाटी की जगह बाँस छूगे हुए हो। 

बंसार--प्‌ » | देश ० | बगसार। (रूवकरी ) 

अंसी--स्त्री ० [स० वी] १ बॉसुरी। बशी। २ देवताओं के चरणों मे 
मानी जानेबाली एक प्रकार की रेखा जो बासुरी के आकार की होती 
है। ३ लाक्षणिक अर्थ में कोई ऐसी च्रीज या बात जिससे किसी को 
फँसाया जाता हो। ४ धान के लेतों में होनेवाली एक प्रकार की 
घास। बाँसी। ५. एक प्रकार का गेहें। ६. तीस परमाणुओ 
की एक तौल। भसरेणु। 
स्त्री० [सं० बरिशी ] मछली फंसाने की कॉटिया। 


०.५०-२-+ल नल नी नि गखखक्‍ख::क्‍77: 57 कक च 


... _. ...0808......>- जलन “एलन नल भा चना अनिल नल 


बसीधर--१० - वशीघर (श्रीकृष्ण )। 

बंसुरूर, बेंसुला---प्‌ ०--वसूला । 

अंसोर--पु० [हि० बांस] बांस की चटाइयाँ, टोकरियाँ आदि बनानेवाली 
एक जाति। 

बेंहुगी---स्त्री ० [स० वह] भार ढोने का एक प्रकार का उपकरण जिसमे 
एक लबे बाँस के टुकड़े के दोनों सिरों पर रस्सियों के बडे-बड़े छीके या 
दौरे लटका दिये जाते है और जिनमे बोझ रखा जाता है । 
क्रि० प्र०---उठाना ।--ढोना । 

बंहरला|--२० [हि० बाँह] बॉट पर पहनने का एक गहना। 

बेंहिया--स्त्री० १ --बाँह। २ >बहगी। 

बेंहूटा, बेंहुँटा[--पु० [हिं० बाँह] बह पर पहनने का एक प्रकार का 
गहना । 

बेंहोल () )--स्त्री ० [हिं० बाँह] आस्तीन। 

बंहोलनी, बेंहोली[--स्त्री ० - बेहोल। 

बहुठना[---अ ० ८-बैठता । 

बहर*--प्‌० १ >वैर। २ जवबैर (पेड़ या फल) | 
वि०ज्वधिर (बहरा)। 

बउर--पु० १ दे० बौर। २ दे० 'मौर। 

बउरा[--वि ० >_वावला । 

बठराना---अ०, स०-“बौराना। 

बक--प१० [स०५/बक (टेढा होना ), | अचू, पृषो "सिद्धि | १ बगछा । २ एक 
प्राचीन ऋषि। ३ अगस्त्य नामक वृक्ष और उसका फूल। ४, कुबेर । 
५. एक राक्षस जिसे मीम ने मारा था। ६ एक राक्षस जिसे श्रीकृष्ण 
ने मारा था। 
वि० बगले की तरह सफेद। 
स्‍त्री० [हिं० बकना] १ बकते की क्रिया या भाव। २. बकवाद। 
क्रि० प्र०--लगाता। 
पद--अक अक या बक झ्षक -(क) बकवाद। प्रराप। व्यर्थवाद। ( ख) 
कहा-सुनी । 
३. मुँह से निलकनेवाली बात। बचन। 

बकचंदन--प्‌ ० [देश० ] एक वुक्ष का नाम जिसकी पत्तियाँ गोल और बड़ी 
होती है। भकचदन। 

बक-चक--स्त्री ० [ अनु० ] मध्य युग का एक प्रकार का हथियार | 

बकचन---प ० बक-चदन | 
(स्त्री० --बकुचन। 

बकचर--वि० [स० बक९/चर्‌ (गति) +ट] ढोगी। 

बकलवा--पु० -बकुचा । 

बक-चिखिका--स्त्री ० [स०] कौआ नाम की मछली। 

सकस्ी--स्त्री० बकुची। 

बकचुन---स्त्री०  बकुचन। 

बकजित--पु०_[स० बक५/जि (जीतना) + क्विपू, तुकू, उप० स॒०] 
१ भीम। २ श्रीक्ृष्ण। 

बकठाना---अ० [स० विकुठन | बहुत कसेली चीज खाने से जीम का कुछ 
छऐेठना या सित्र॒ड़ना। 

बकतर--पु० [फा० बकतर] [स्त्री० अल्पा० बकतरी] मध्य-यूग में युद्ध 


बकतर-पोषा 
के समय पहना जानेवाला एक तरह का अँंगरखा जिसमे आगे और पीछे 
दो-दो तवे छगे रहते थे । चार-आईना। सन्नाह । (जिरह से भिन्न) 

बकतर-पोश--१० [फा० अक्तर | पोश] वह योद्धा जो बकतर पहने हो। 

बकता[---१ ० - वक्‍ता। 
पु०: -बखता । 

बकतार[|---१ ० - वक्‍ता। 

बकतिया--रत्री ० [ देश० ] एक प्रकार की छोटी मछली। 

अ-कवर---क्रि० वि० [फा० ब+-अ० कद्र] १ अमुक दर, मान या हिसाब 
से। २ अनुसार। 

घक-यान--प्‌ृ० [स० ष० त०] कोई दुष्ट उद्देश्य सिद्ध करने के लिए उसी 
प्रकार भोले-माले या सीधे-मादे बनकर विचार करते रहना जिस प्रकार 
बला जलाशयों मे से मछलियाँ पकडकर खाने के लिए चुपचाप खड़ा 
रहता है। बनावटी साधु-माव। 
कि० प्र०--छगाना । 

बक-ध्यानी (निन्‌)--वि० [हिं० बकध्यान+इनि ] बक-ध्यान लंगाने- 
बाला। 

शकना---स० [स० वचन] १ उठपटाँग या व्यथ की बहुत-सी बातें 
कहना। व्यर्थ बहुत बोलना । 
पद--बकना-क्षकना--क्रोध मे आकर बिगडते हुए बहुत-सी खरी खोटी 
बाते कहना। 
२ निरथंक बातों या शब्दों का उच्चारण करना। प्र्ाप करना। 
बडबंडाना। ३ विवश होकर अपने अपराध या दोष के सम्बन्ध की 
सब बाते बतलाना। 

बक-निषुदन--पु० [स० ष० त०] १ भीम। २. श्रीकृष्ण। 

बक-पंचक---पु० [स० ब० स०,--कप्‌ ] कातिक महीने में शुक्ूपक्ष की 
एकादशी से पूणिमा तक के पाँच दिन जिनमें मांस, मछली आदि खाना 
बिलकुल मना है। 

बकस--- ० -“वक्‍्कम । 

बकमोन--१ ० [स० ष० त० ]मपने दुष्ट उहेश्य की सिद्धि के निमित्त बगुले 
की भाँति मौन तथा शांत बनकर चूपचाप रहने की क्रिया, भाव या मुद्रा 
वि० जो उक्त उद्देश्य तथा प्रकार से बिलकुल चुप या मौन हो । 

बक-पंत्र--7१ ० [ स० उपमि० स०] वैद्यम में औषधों का सार निकालने 
के लिए एक प्रकार का यत्र, जो काँच की शीक्षी के आकार का द्वोता 
है। 

बकर--पु०[ अ० बक़र] गाय या बैलू। 

बकर-ईद---स्त्री ० -बकरीद | 

बकर-कसाव--१० [ हिं० बकरी+अ० कस्साव-कसाई ] [स्त्री० 
बकर-कसायिन] बकरों का मांस बेचतेवाला पुरष। कसाई। 

बकरना--स ० [ हिं० बकार क्यवा बकना] १. आप से आप बकना। 
अड़बडाना। २ अपने अपराध या दोष की बातें विवश होकर कहना। 

बकरम---प१० [अ० बक़रम] गोंद आदि छगाकर कड़ा किया हुआ बहू 
करारा कपडा जो पहनने के कपड़ों के कालर, आस्तीन आदि में कड़ाई 
लाने के लिए अन्दर लगाया जाता है। 

घकरवाना---स ० [ हि? बकरना का प्रेर० ]किसी को बकरने में प्रवत्त करना । 

बकरा--पुं० [सं० वर्कार] [स्त्री० बकरी] एक श्रसिद्ध नर पु 





डढ 


जकसी 





जिसके सीग तिकोने, गठीले और ऐंठनदार तथा पीठ की ओर शुके हुए 
होते हैं। पूंछ छोटी होती है और एरीर से एक प्रकार की गंध भाती 
है। अज। छाग। 

बकराना---स २ -बकरवाना | 

बकलछ|---प्‌ ०--बकला। 

बकलस---१ ० +बकसुआ | 

बकला--१ ० [सं० वल्कल] [स्त्री० अल्पा० बकली] १. पेड़ की छाल। 
२. फल के ऊपर का छिलका। 

बकली--स्त्री ० [देश० ] एक प्रकार का बड़ा और सुन्दर वृक्ष जिसे धावा, 
धव आदि भी कहते हैं। 

बकबती--स्त्री  [ स० वक +मतुप्‌, डीप्‌+वकवती] एक प्राचीत नदी। 

बकवाद---स्त्री ० [हिं० बक-+वाद ] लबी-चौड़ी, बेसिर-पेर की तथा बिना 
मतलब की कही जानेवाली बातें। 
क्रि० प्र०“--करना । 

बकवादी--वि० [ हि? बकवाद+ई (अत्य०)] १ (व्यक्ति) जो बक- 
वाद करता हो। २. बहुत अधिक बाते करने बाला। जो 
प्रकतिश्' प्राय बाते करता रहता हो। ३ बकवाद सबधी या बकवाद 
के रूप में होनेवाला। 

बकवाना---स ० [हिं० बकना का प्रे०] १- किसी को बकने या बकवाद 
करने मे प्रवुत्त करता। २. किसी से कोई बात कहलवा लेना। कहने 
में विवश करना। 

अकवास--स्त्री ० [ हिं० बकना--बास (प्रत्य०) ] १. बकवाद | २ बकवाद 
या बक-बक करने की प्रवुत्ति या शौक । 
क्रि० प्र०--छगना | 

बकवासी---वि ० -बकवादी । 

बक-बुत्ति--स्त्री ०[ सं० ष० त०] बकों या बगलो (पक्षियों) की-सी 
वह वृत्ति जिसमें वह ऊपर से देखने पर तो बहुत भोला-माला 
या सीधा-सादा बना रहता है, पर अन्दर ही अन्दर अनेक प्रकार के 
छल-कपट की बातें सोचता रहता है। 
वि० [ष० त०] (व्यक्ति) जिसकी मनोवृत्ति उक्त प्रकार की ही। 
बक-ध्यानी । 

बकब्नती (तिनु)--वि०[स० बक-श्रत, ष० त०,+इईनि] बक वृत्तिबाला। 
कपटी। 

बकस--० [अ० बाकस ] १. लकड़ी, लोहे आदि का बना हुआ एक तरह 
का ढक्‍कनदार चौकोर आधान जिसमे वस्त्र आदि सुरक्षा की दृष्टि 
से रखे जाते हैं। संदुक। २. गहने, घड़ियाँ आदि रखने का खाना। 

बकसना--स० [फा० बख्झ-हिं० ना (प्रत्य०) ] १ उदारतापूर्वक किसी 
को कुछ दान देना । २ अपराधी या दोषी को दण्डित न करके उसे क्षमा 
करना। माफ करना। ३ दयापूर्वक छोड़ देना या जाने देना। 

बकसबाता---स ० --बखशवाना । 

बकसा---पु ० [ देश ० ] जलाशयों के किनारे होनेवाली एक तरह की घास। 
'पुं०॑बकस (संदूक) । 

बकसाता--स० [हिं० बकसना' का प्रें० रूप] क्षमा या माफ कराना। 
बखशवाना | 


बकसी| ---१० “बस्थशी। 


बरसीसा 


शकसीऊझा--वि० [हिं० बकठाना] [स्त्री० अकसीली] जिसके खाते 
में मुँह का स्वाद बिगड़ जाय और जीम ऐंठने छगे। बकबका। 

अफस्ीस--स्त्री० [फा० बस्शिश] १. दान। २. इनास। पुरस्कार। 
३, शुभ अवसरों पर गरीबों तथा सेवकों को दिया जानेबाछा दान। 

बकसुआ --प० [अ० बकरू] पीतरू, छोहे आदि का एक तरह का 
चौकोर छलला जिससे तस्में, फीते आदि बाँघे जाते हैं। 

शरका--सत्री० [अ० बक़ा] १. नित्यता। २ अनश्वरता। ३ अस्तित्व 
में बने रहूना। ४. जीवन। 

बकाहइत! ---१ ० +जकायन (वृक्ष )। 

बकाउ| ---स्त्री ०--बकावली। 

बकाउर --सत्री ००-बकावली | 

अकाना--स ० [हिं० बकना का श्रें० रूप] १. किसी को बकने में 
प्रवृत्त करना। २ किसी को दबाकर उसके मन की छिपी हुई बात 
कहुछाना। 

बकायम--प ० [हिं० बड़का--नीम ? ] नीम की जाति का एक पेड 
जिसकी पत्तियाँ नीम की पत्तियों के समान तथा कुछ बडी और दुर्गन्ध- 
युक्त होती हैं। महानिव। 

बकाया--वि० [अ० बकाय.] बाकी बचा हुआ। अविशिष्ट। शेष। 
पू० १. वह घन जो किसी की ओर निकल रहा हो। ऐसा धन जिसका 
मुगतान अमी होने को हो। २. बचा हुआ धन। बचत। रे. किसी 
काम या बात का वह अंश जिसका अमी सपादन होना शेष हो। 

बकारि--पू० [स० बक-अरि, ष० त०] बकासुर के शत्रु अर्थात्‌ 
श्रीकृष्ण । 

अकारी--स्त्री० [स० वकार या वाक्य] वह शब्द जो मुँह से श्रस्फूटित 
हो। मुँह से निकलनेवाला शब्द । 
क्रि० प्र ०---निकलना ।--फूटना । 

स्त्री ०5बिकारी। 

बकाबर] --स्त्री ०>बकावली | 

बकाबलौ--स्त्री० [स० बक-आवली ष० त०] १. बगलों की पंक्ति। 
बक-समूहू। २. दे० गुल-बकावली' (पौधा और फूल)। 

बकासुर--पुं० [स० बफ-असुर, मध्य० स०] एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण 
मे मारा था। 

बकिलय[--प्‌ ० >वकायन (वृक्ष)। 

बकिया--वि० [अ० बक्तियः] बाकी बचा हुआ। अवशिष्ट। 

अकी--सत्री० [सं० बकफ+डीष्‌] बकासुर की बहिल पृतना नामक 
राक्षसी। 

बकुखन*--स्त्री० [?] १. हाथ जोडना। २. मुट्ठी या पंजे में 
पकड़ना । 

अकुचना---अ० [सं० विकुचन ] सिमटना। सिकुडना। संकुचित होना। 

खकुजा--7« [हि० बकुचना] [स्त्री० बकुची] १. छोटी गठरी। 
बकचा। २. ढेर। ३. गुच्छा। ४. जुड़ा हुआ हाथ। 

बकुचामा--स० [हिं० वकुचा] किसी वस्सु को वकुचे में बाँधकर कंधे 
पर लछटकाना या पीछे पीठ पर बाँधता। 

बकुची--स्त्री ० [सं० वाकुची] एक प्रकार का पौधा जो हाथ सवा हाथ 
ऊँचा होता है। इसके कई अंग ओषधि के काम में आते हैं। 








(स्त्री० हिं० बकुचा' (गठरी) का स्थ्री० अल्पा०। 

बकुचोहाँ--अव्य० [हिं० बकुचा--औहाँ (प्रत्य० )] 
चौही] बकुचे की माँति। बकुचे के समान। 
वि० जो बकुचे या गठरी के रूप में हो। 

बकुर--पृ० [स० भास्कर या मयकर पृषो० सिद्धि] १- भास्कर। 
सूर्य। २. बिजलो। विद्युत) ३ तुरही। 

१०--बक्कुर। 

बकुरता--अ ० ->बकरना | 

बकराना--स ० [हिं० बकुरना का प्रे० रूप] अपराध या दोष कबूल 
कराना या मुँह से कहलाना। 

बकुल---पु० [स०५/बक्‌+उरचू, र--ऊर'] १ मौकसिरी। २ शिव। 
हे एक प्राचीन देश। 
वि० [स्त्री० बकुली | च्वक्र (टेढा)। 

बकुलटर--पु० [हिं० बकुला +टरर अनु०] पानी के किनारे रहनेवाली 
एक प्रकार की चिड़िया जिसका रंग सफेद होता है और जो दो-तीन 
हाथ ऊँची होती है। 

बकुला[--पु० ्बगला । 

बकुली|--स्त्री० हिं० बक (बंगला) की मादा। 
जल हस कहावा ।---जायसी। 

बकुल--]० ल्‍्वकूल। 

ब्रफेन---स्त्री० [स० वच्कयणी] ऐसी गाय या मेस, जिसे ब्याये ५-६ 
महीने से ऊपर हो चुका हो, और जो बराबर दूध देती हो। दे० 
लिवाई! का विपर्याय। 

बकेना|--सत्री ०--बफेन । 

बकेशका--रत्री० [स० बक (टेढा) +ड+एरुकू+कन्‌, (-ठाप्‌..] 
१ छोटी बकी। २ हवा से झुकी हुई वृक्ष की शाखा। 

बकेल---स्त्री० [हिं? बकछा] पलाश की जड़ जिसे कूटकर रस्सी बनाते हैं। 

बर्कयाँ--स्त्री० [स० बक+ऐया (4त्य०)] छोटे बच्चों का घुटनों के 
बल चलने की क्रिया। 

बकोट--स्त्री ० [स० प्रकोष्ठ वा अभिकोष्ठ, पा० पक्कोष्ठ] १ बकोटने 
की क्रिया या माव। २ बकोटने के फल-स्वरूप पडा हुआ चिह्न। 
३ बकोटने के लिए बनाई हुई उंगलियों और हथेली की मुद्रा। ४. 
किसी पदार्थ की उतनी मात्रा जितनी उक्त मुद्रा में समाती हो। चगुरू। 
जैसे---एक बकोट चना इसे दे दो। 

बकोटता---स० [वि० बकोट 4 ना (प्रत्य०)] १ नाखूनों से कोई चीज 
विशेषत. शरीर की त्वचा या मांस नोचना। २. छाक्षणिक रूप में 
कोई चीज किसी से बलपूर्वक छेना या वसूछ करना। उदा०-न्ये 
चदा ब॒कोटनेवाले फिर जेल से बाहर आ गये ।--वुन्दावनलाल 
वर्मा । 

अकीटा---पु० [हिं० बकोटना] १ बकोटने की क्रिया या भाव। २. 
बकोटने से पडनेवाला चिह्न या निशान। ३. उतनी मात्रा जितनी 
चंगुल या मुट्ठी मे आ जाय। 

इकोरी--स्त्री ० >गुलबकाबली | 

बकौंडा--प० [6ि० बक्‍्करू| पछाश के पेड़ की जड़ों का कूटा हुआ बहू 
रूप जिसे बटकर रस्सी बनाई जाती है । 


[स्त्री० बढु- 


उदा०--बकुली तेहि 


बकौंरा 


१पृ०--ब॒कौरा। | 

बकौरा--प्‌ ० [हि० बाँका | [स्त्री० अल्पा० बकौरी ] वह टेढी रूकडी 
जो बैलगाईी के दोनों आर पहिए के ऊपर रूगाई जाती है। पैगनी। 
पंजनी। 
)पृ० बकौडा। 

बकीरी | --स्त्री० गल-बकावछी। उदा०--कोइ बोल 
बतौरी ।--जायसी । 

बकील--अव्य० [अ० बकौल] (किसी के) कथनानुसार। जैसे-- 
बकौले शग्से किसी व्यक्ति के कथनानसार। 

बककस--7]० [अ० वकम | एक प्रकार का वृक्ष जो मद्रास, मध्यत्रदेश, 
तथा बर्मा में अधिक होता है। यह आकार में छोटा और कटीला होता 
है। पतग। 

बक्‍कल --पु० [सं० वटकल, पा० वक्‍करल| १ छिलका। २ छारूू। 

बक्का--पु० [देदा०| [रत्री० अल्पा० बककी |] धान की फसल में रूगने- 
वाले एक तरह के सफंद या खाकी रग के छोटे छोटे कीड़े । 

बक्काल--प० |अ० बक्‍काल | १ सब्जी बेचनेवाला व्यक्ति। कुँजडा। 
२ बनिया। वणिक्‌। ३ परचूनिया। 

बक्‍की--वि० [हिं० बकना | बकवाद करनेवाला। बकवादी। 
रजी० [देश०] भादों मे पकत्र तैयार होनेवाला एक तरह का घान। 

बकक्‍्कु र--पु० [स० बाकय] मह से निकला हुआ शब्द। बोल । वचन। 
क्रि० प्र०--निकलना ।--फुटना। 
प्‌ ० - बककर। 

बक्खर--प्‌० [देश०| १ वाई प्रकार के पौधों की पत्तियां और जड़ो 
आदि को कूटकर तैयार किया हुआ वह खमीर जो दूसरे पदार्थों मे खमीर 
उठाने के लिए डाला जाता है। २ वह स्थान जहाँ पर गाय-बैल 
बांधे जाते है। 
[प० बखार। (तृण)। 

बक्ष।ज*--प्‌ृ० वक्षोग (स्तन)। 


ड६ 


७ 3७ 9७०४० > के 3पटकनेलन किले के ५८८ 2५०० 2००७ जद २ पक 


सिरि पुहुप 








बक्स--प्‌ृ० बकस। 
बखत--प१० १ वक्‍त (समय)। २ बख्त (भाग्य)। 
बखतर--प्‌ृ० बकतर। 


बखता| --प्‌० [”] भना डुंआ चना जिसका ऊपरी छिलका उतारा 
जा चक्ता हो। 

बखर' --१० [? | खेत जातने के उपकरण। 
प० बखार। 

बेखर7--पु० [फा० बखर | १ भाग। हिल्सा। २ किसी चीज 
या चाजा का कार्ट अशों में होनेवाला बह विभाजन जो अलग-अलग । 
हिस्सेदारों को मिलता है। 
प्‌० बखार। 

बखर,--रत्रीः [हिं० बखार का उज़्त्री अल्पा० | गाँव में, वह सकान 
जा साधारण बरो की अपेक्षा! बड़ा तथा बढ़िया हो। 

बखरेंट--वि० [टि० बखरा ।ऐत ([प्रत्य०)) बखरा या हिस्सा 
बटानेयाला। हिस्‍्सेदार। साझीदार। 

बलसभना--अ० बस्शना (क्षमा करना)। 

बखसीस--स्त्री ० बक्सीस | 





यख्त 
बलसीसना---स» [फा० बखशिश] बखशिश के रूप में देना। प्रदान 
करना। 
बखान---प० [स० व्याख्यान, पा० पकक्‍खान] १ बखानने की क्रिया या 
भाव। २ बखान कर कही जानेबाली बात। ३ विस्तारपूर्वक किया 
जानेवाऊछा वर्णन। ४ तारीफ। अ्रशसा। 
बखानना--स* [हि० बखान +-ना (प्रत्य०) | १ विस्तारपूर्वक कहना था 
वर्णन करना। २ तारीफया प्रशसा करना। ३. विस्तारपुर्वक तथा 
गालियां देते हुए किसी के दुर्गंगो, दोषो आदि का उल्लेख फरना। ४ 
गालियाँ देते हुए किसी का उल्लेख करना। जैसे--किसी का बाप- 
दादा बखातना। 
बलार---पु० [स० आकार | [स्त्री० अल्पा० बखारी] १ दीवार या 
टट्टी आदि से घेरकर बनाया हुआ गोल और विस्तृत घेरा जिसमे गांवों 
में अन्न रखा जाता है। २ वह स्थान जहाँ किसी चीज की प्रच्तुरता 
हो। 
बसख्ारी--स्त्री० [हि० बवार] छोटा बखार। 
बलिया--पु० [फा० बखिय | एक प्रकार की महीन और मजबूत 
सिलाई, तिममे दोहरे टॉके लूगाये जाते है। 
क्रि० प्र०--उघड़ना ।--उधेडना |--करना । 
मुहा०--बखिया उ्धेडना - मेद खोलना। मडा फोडना। 
२ जमा । पूंजी। ३ योग्यता। ४ जक्ति। सामर्थ्य। ५ 
गति। पहुँच। 
बलियाना--स० [हिं० बखिप्रा] बखिया (सिलाई) करना। 
बलखोर--स्त्री० [हिं० खीर का अन० | गन्ने के रस में चावल पक्राकर 
बनाई जानेवाली एक तरह की खीर। 
बखोल--वि० [अ० बखील]|  [भाव० बखीली| कृपण। कजूस। 
सूम | 
बखीली--स्त्री० [अ० बस्लीली| कजसी। कृपणनता। 
बखूबो--अव्य० [फा०] १ खूबी के साथ। भली भांति। अच्छी 
तरह मे। २ पूरी तरह से या पूर्ण रूप से । 
बखेड[--प्‌ू० [हि० बिखरना] १ किसी चीज के इस प्रकार बिखरे 
हुए होने की स्थिति कि उसे इकट्ठा करने तथा संवारने में अधिक परि- 
श्रम तथा समय अपेक्षित हां। २ व्यर्थ का विस्तार। आडबर। ३ 
काई उलझनवाला और बहुत कठिन काम जिसे सरलता से सुरुझाया 
और सपन्न न किया जा सकता हों। ४ कोई सासारिक क्रिया कलाप। 
५ झगडा। विवाद। 
बखेड़िया--वि० [हि० बखेडा | इया (प्रत्य०)] बखेडा करनेबाला। 
बखेडा अर्थात्‌ विवाद करनेवाला। बहुत अधिक झगडालू। 
बलेरनता--स ० -- बिखेरना । 
बलेरो--स्त्री० [देश ०] छोटे कद का एक प्रकार का केटीला वृक्ष जिसके 
फलो से चमदा रगा तथा सिश्ाया जाता है। इसे कुती भी कहते है। 
बखोरना। --स० [हिं० खोर -गली | सीधे रास्ते से छुडा या बहकाकर 
किसी और रास्ते पर के जाना। अहकाकर इधर-उधर ले जाना। उदा०- 
साकरि खोरि बखोरि हमे किन खोरि लगाय खिरसबौ करो कोइ ।-देव । 
बख्त--प० [फा० बख्त] किस्मत। भाग्य। 
पद--बख्तो-जला --बहुत बड़ा अमागा। 


बतेरे 
० - वक्‍त (समय) । 

बख्तर---प१० - बकतर। 

बत्ताधर--वि० [फा० बसख्तावर] [माव० बख्तावरी] १ सौमाग्य- 
शाली। २ घनी। सम्पन्न। 

अस्दा---वि० [फा० बरुश |] १ समस्त पदों के अन्त में, देने या प्रदान 
करनेबाला। जैसे--जाँ-बख्णा - जीवन देनेवाला। २ बख्शने अर्थात्‌ 
क्षमा करनेवाला। जैसे--खता-बख्श अपराय क्षमा करनेवारा। 
३ नामो के अन्त में बख्शिश, देन, प्रसाद। जैसे---करीम-बख्श, 
मौला-बल्श । 

बलदामा---स० [फा० बरुद| १. प्रदात करमसा। देना। २ क्षमा 
करना। ३ दयापूर्वक छोड़ देना या जाने देना । 

बरुदानासा---प ० --बस्शिशनामा । 

बलशावासा--स ० [हिं० बरूशना का श्रे० रूप] किसी को कोई चीज 
बंखसीस रूप में देने अथवा किसी अपराधी को क्षमा करने में प्रवृत्त 
करना । 

बढशासा---स ० बर्शवाना। 

बलिशिह--स्त्री० [फा० बस्शिश ] १ 
इनाम। पुरस्कार! ४ क्षमा। 

बड्शिशतासा--प१ु० [फा० बल्छिशनाम | वह पत्र जिसके अनुसार 
कोई सम्पत्ति बरुझ्षी था प्रदात की गई हो। दाल-पत्र। 

बतशी--प्‌० [फा ०] १ मध्य-युग मे सैनिको को तनख्वाह बॉटनेबाला 
एक कर्मचारी। २. खजाची। ३ गाव, देहातो में कर वसूल करने- 
बाला अधिकारी । 

बरुशीव--रत्री ० - बल्शिश । 

बघग---ए्‌०--खगला । 
स्त्री० हिं० बाग (लगाम) का सक्षिप्त रूप। जैसे--बगछूट, बग- 
मेल। 

बगई! --स्त्री० [देश०) १ एक प्रकार की मक्‍शी जो कुत्तों पर बहुत 
बैठती है। कुकुरमाछी। २ पतली और कऊबी पत्तियोवाली एक प्रकार 
की घास, जिससे डोरियाँ बटी जानी है। 

बगछुट--वि० [हिं० बाग | छटना| १ (घोडा) जिसकी बाग या 
लगाम छोड दी गई हो और इसी लिए जो बहुत तेजी से दौडा जा 
रहा हो। 
अव्य ० इस रूप मे दौडना था भागना कि मानो कोई नियत्रण न रह 
गया हो। बे-लहाशा। सरपट। 

बगदुट--वि०, अब्य०- बगछुट। 

अगड़--पू० [१] बाडा। घेरा। 
|१० बागड। (राज०) 
) स्त्री" बगल। 

बगड़ा| --पु० [? ] ग्रौरेया (चिड़िया)। 

बगतरा --पू ० - बकतर। 

बगवसा--अ० [स० विक्ृत, हि? बिगड़ता| १ बिगडना। खराब 
होना। २ रास्ता भूलकर कही से कही चले जाना। भटकना। ३ 
कतेब्य, सुसागं आदि से च्यूत होना। 

बपबर(--पु० [देश०] मच्छर। 


दानशीलता। २ दान। ३ 


डे 


3) “व 3अकल्नहजर्मन सके उन, 


त 


ब्रगरू 


० लक से कर बह ८. कहे. >>न-+ कक 3 अप मी 


बा़बबाना--स ० [हिं० बगदाना का प्रे० रूप| किसी को बगदाने में 
प्रवृत्त करना। 

बगदहा ---वि० [हिं० बगदना +हा (प्रत्य०)] [स्त्री० बंगदही | 
१ बिगड़नेवाला। २ (पशु) जो गुस्से मे आकर जल्दी बिगड़ खडा 
होता हो। ३ लड़नेवाला। 

बगदाद--पु० [फा० बगदाद| इराक नामक राज्य की राजधानी। 

बगवाना--स० [हि० बगदना] १ नष्ट या बरबाद करना। २ 
अ्रम में डालकर मटकाना। ३ गिराना। लड़काना। हे कं्तंव्य, 
प्रतिजा आदि से च्युत कराना। 

बगना| --अ० [स० वल्गन | १ घूमना-फिरसा। २ गन करना। 
जाना। ३ दौडना। ४ भागना। 

बगनी| --स्त्री० [2] १ एक प्रकार का टोटीदार लोटा। 

स्‍त्री०--बगई (घास)। 

बगबवाना--अ० [अनु०] ऊँट का काम-वासना से मत्त होना। 

बग-सेल--पु० [हिं० बाग मेल] १ दूसरे के घोडे के साथ बाग मिला- 
कर चलूना। एक पक्ति में या बराबर-बराबर चलना। २ घुड- 
सवारों की पक्ति या सतर। 3३ यात्रा, युद्ध आदि में होनेवाला सग- 
साथ। ४ बराबरी। समानता। 
क्रि०वि० १ घोडो के सवारो के सबंध में, बाग मिलाये हुए और साथ 
साथ । २. बराबर साथ रहते हुए। 

बगर--पु० [स० प्रघण, श्रा० पषण | १ महूंल। प्रासाद। २. घर। 
मकान। ३ कमरा। कोठरी। ४ आँगन। सहन। ५ गौए-मेसे 
आदि बाँधने का स्थान। 
) स्त्री ०>-बगल। 

बगरता (---अ० [स॒० विकिरण] फेलना। बिखरना। छितराना। 

बगरबामा--स ० [हिं० बगराना का प्रे० रूप] किसी को कुछ बगरामे 
अर्थात्‌ बिखेरने मे प्रवृत्त करना। 

सगरा--पु ० [देश०] एक अ्रकार की छोटी मछलठी जो जमीन पर उछ- 
लती हुई चलती है। इसे धुभा भी कहने है। 

बगराता--स ० [हिं० बगरना का स० रूप] बिखेरना। छितराना। 
अ० बिखरना। 

बगरिया[ - स्त्री० [देश०] गुजरात राज्य के कच्छ-काठियावाड 
आदि प्रदेशों में होनेवाली एक तरह की कपास । 

बगरी| ---पु० [हि बगर का स्त्री० रूप] १ छोटा महछ। २ 
मसकान। बखरी। ३ गोौएँ, मेंसे आदि बाँधने का छोटा बाडा। 
पु० [देश०] एक प्रकार का धान। 

घगरू--स्त्री० [फा० बगल] १ बाहु-मूल के नीचे का गड़ढा। काँख। 
पद--बगल-गध । (देखे) 
मुहा०--बगले बजाना बहुत प्रसन्नता प्रकट करना। खूब खुशी 
मनाना | 
विशेष--प्राय लड़के बहुत प्रसन्न होने पर बगल मे हथेली रखकर उसे 
जोर से बाँह से दबाते हैं जिससे विलक्षण शब्द होता है। उसी के आधार 
पर यह मुहा० बना है। 
२. छाती के दोनो किनारो का बह भाग जो बाँह गिराने पर उसके नीचे 
पढ़ता है। पाइर्व। 





बगल गंध 


पद---बगल-बदी । (देखें) 
मुहा०-- (किसी की ) बगल गरम करना --सहवास या संभोग करना। 
बगल में दाबना या लेना-- (क) कोई चीज उठाकर ले चलने के लिए 
उसे बगल में रखना तथा भुजा से अच्छी तरह दबाकर थामे रखना। 
जैसे--गठरी बगल में दबाकर चल पडना। (ख) अपने अधिकार 
मे करना। उदा०--लै गे अनूप रूप-सपत्ति बगल में दाबि उचिके 
अचान कुचकचन पहार से |--देव। बगल झ्कलॉकनाउ-निरुत्तर या 
लज्जित होने पर यह समझने के लिए इधर-उधर देखना कि अब कया 
करना या कहना चाहिए। 
३ कपड़े का वह टुकडा जो अंगरखे, कुरते आदि की आस्तीन में बगल 
के नीचे पडनेवाले अश में ऊगाया जाता है। ४ वह जो किसी की 
दाहिनी या बाई ओर स्थित या अतिष्ठित हो। जैसे---(क) समापति 
की बगल में अतिथि विराजमान थे। (ख) उनकी दुकान की बगल 
में पान की एक दृकान है। ५. समीप का स्थान। पास की जगह। 
जैसे--सडक के बगल मे ही एक नया मकान बना है। 
पद---बगल सें>- (क) पास मे। (ख) एक ओर। जैसे---बगल में 
हो जाओ। 

बगछ गध--स्त्री ० [हिं० बगल--गध ] १. बगल या काँख मे होनेवाला 
एक प्रकार का फोडा। कंखवार। केंवौरी। २ एक प्रकार का रोग 
जिसमे बगल या फाँख मे से बहुत बदबूदार पसीना निकलता है। 

बगलगीर--वि० [अ० बगल +फा० गीर| [भाव० बगलगीरी| १: 
जो बगल या पास में स्थित हो। जिसे बगल मे सटाकर बैठाया गया 
हो। पार्श्ववर्ती। २ जो गले मिला हो अथवा जिसे गले से लगाया 
गया हो। आलिंगित। 
मुहा०--बगरूगीर होना--आलिगन करना। 

बगलबंदी--स्त्री० [ हि० बगल +-बद ] एक प्रकार की मिरजई जिसमे 
बगल मे बन्द बंधि जाते हैं। 

बरगला--पु० [हिं० बक | छा (भ्रत्य०)] [स्त्री० बगली] १ सारस 
की जाति का सफेद रग का एक पक्षी जिसकी टाँगे, चोच और गला 
लबा और पूंछ बहुत छोटी होती है। 
पद--बगला -भगत | (देखे) 
२ रहरय संप्रदाय मे, मन। 
पु० [हि० बगल] थाली की बाढ़ । अँवठ। 
पु० [देश०] एफ प्रकार का झाडीदार पौधा। 

बंगला भगत--पु० [हिं०] वह जो देखने मे बहुत धार्मिक तथा सीधा- 
सादा जान पढ़ता हो, पर वास्तव में बहुत बडा कपटी या धत्त हो। 

बगलामुखी--स्त्री ० [स० | तत्र के अनुसार एक देवी । कहते हैं कि इसकी 
आराधना करने से शत्र की वाणी कुठित एवं शेष इंद्वियाँ स्तभित हो 
जाती हैं। 

बगलियाना---अ० [ हिं० बगल-+-इयाना (प्रत्य०) | बात-चीत या सामता 
न करते हुए बगल से होकर निकल जाना। कतराकर निकल जाना। 
स० १ बगल में करना या लाना। २ बगल मे दबाना। ३ अलग 
करना या हठाना। 

बगली---वि० [हिं० बगल |ई (प्रत्य०)] १ बगल से सबंध रखने- 
वाला। बगल का। 


>> जल लीन अििजणवआऑिनन--- जज 5 





ड८ट 


बगिया 





पद---बगली घूंसा । (देखें) 
२. एक ओर का। 
सत्री० १ ऊँठों का एक दोष जिसमे चलते समय उनकी जाँघ की रग 
पेट मे लगती है। २ मुगदर चलाने का एक ढग। ३ वह थैली 
जिसमे दरजी सूई-तागा आदि रखते हैं। तिलेदानी। ४ दरवाजे 
की बगल मे रूगाई जानेवाली सेंध। 
क्रि० प्र०--काटना --मारना। 
५ अँगरखे की आस्तीन मे लगाया जानेवाला कपड़े का वह टुकड़ा 
जो बगल के नीचे पड़ता है। बगल। 
स्‍त्री० [हिं० बंगला] १ मादा बगला। २ बगके की जाति की 
एक छोटी चिडिया जो ढीठ होने के कारण मनुष्यों के इतने पास आ जाती 
है कि लोग इसे 'अंधी बगली” भी कहते है। 

बगली घूंसा--पु० [हिं०] १ वह घूँसा जो किसी की बगल मे अथवा 
किसी की बगल मे स्थित होकर लगाया जाय। २ वहू वार जो आड़ 
में रहकर अथवा छिपकर किया जाय। ३ वह वार जो साथी बनकर 
या साथी होने का ढोग रचकर किया जाय। ४ बह व्यक्ति जो थोखे 
से उक्त प्रकार का वार करता हो। 

बगली टाॉँग--स्त्री० [हिं० बगली--ठाँग] कुश्ती का एक पेच। 

बगली बॉह--स्त्री ० [हिं० बगली +-बाँह] एक प्रकार की कसरत जिसमे 
दो आदमी बराबर खडे होकर अपनी बाँह से एक दूसरे की बाँह मे धक्का 
देते है। 

बगलेंदी--स्त्री ० [?] एक प्रकार की चिड्टिया। 

बगलौहा|--वि० [हिं० बगल+-औहां ] [स्त्री० बगलौही] बगरू की 
ओर ज्लुका हुआ। तिरछा। 

बगसना[--स ० >बरुशना। उदा०--होई कृपाल हस्तिनी सग बगसी 
रुचि सुन्दर ।--चदवरदायी। 

बगा--पु० [स० वक ] बगला। 
प१०-च्बागा (पहनने का) । 

बंगाना--स ० [हिं० बगना] घधृमाना-फिराना। सैर कराना। 
स० [स० विकीरण] फैलाना। बिखेरना। उदा०--टूटि तार 
अगार बगावै ।--नददास। 
[स०-|"भगाना। 
'अ०5""भागना। 

बगार|/---१० [देश०] गौओ के बाँधने का स्थान। गो-शाला। 

बगारना|--स० [स० विकिरण, हिं० बगरना] १ फैलाना। 
२ छितराना। बिखेरना। 
स० चबगराना। उदा०--सब देसनि मैं निज प्रभात निज प्रकृति 
बगारति--रत्नाकर। 

बगाबत--स्त्री ० [अ० बगावत ] १ आज्ञा, आदेश आदि की की जानेवाली 
स्पष्ट अवज्ञा। २ विद्रोह। सैनिक विद्रोह अथवा युद्धात्मक भावना 
से युक्त विद्रोह। 

बगितारा--पु० [स० वक्‍तृ] १ 
२ बकबक। बकवाद। 

बगिया--स्त्री० [ हिं० बाग +इया ] 
बारी। 


जोर से की जानेवाली पुकार। 


छोटा बाग विशेषतः फुल- 


बगीचा 


बगीचा--पु० [फा० आग़च'] [स्त्री० अल्पा० बगीबी] १. छोटा 
बाग । २. फुझुवारी। 

शंगुरदा--पु० [7] पुरानी चाल का एक अस्त्र। 

अयुलूपतोश--प० [हिं० बगला-+पतोख] एक प्रकार का जल-पक्षी। 

घगुला--पू० १ वचबगला। २. बबगूला। 

बगुली|--स्त्री ० >बगली (चिड़िया) । 

अग्रा[--१० ्बगूला । 

बगूला--पु० [हिं० बाउ (वायु) #गोला] तेज हवा की वह अवस्था 
जिसमे वह घेरा बाँधकर चक्कर लगाती हुई तथा ऊपर उठती हुई आगे 
बढ़ती है। चक्रवात। बवडर। 

बगेड़ी |--स्त्री ० >थगेरी (चिड़िया)। 

जगेदना *--स ० [हिं० अगवना] १ धक्का देकर गिरा या हूटा देना। 
२ विचलित करना। 

बंगेरी--स्त्री० [देश०] खाफी रग की एक प्रकार की छोटी चिडिया। 
बगौधघा। भरुही। 

बगेला[---]०-बगीचा। 

बगेर--अव्य० [अ० बगैर] न होने की दशा में। बिन। जैसे-- 
आपके बगैर काम नहीं चलेगा। 

जगौधा--पु० [देश०] [स्त्री० बगौधी] बगेरी (चिड़िया)। 

बग्गा-गोटी--स्त्री० [”] लड़को का एक प्रकार का खेंल। उदा०-- 
तीनों बग्गा-गोटी खेला करेंगे ।---धुन्दावनलाल वर्मा । 

बरयी|--स्त्री ० >न्बग्धी । 

बग्घी--स्त्री० [अ० बीगी] चार पहियो की पाटनदार गाडी जिसे एक 
या दो घोड़े खीचते है। 

बचंबर|--पु ० --बाघव र | 

बध--१० [हि० बाघ] हिन्दी 'बाघ' का सक्षिप्त रूप जो उसे समस्त 
पदों के आरभ मे छूगने पर प्राप्त होता है। जैसे--बध-छाकला, 
बघ-मखा। 

बध-छाला--स्त्री० [हि० बाध-+-छाला] बाघ की खाल। बाघबर। 

बधनखा--प्‌० [हिं० बाघ +नखा (नखोबाला) | [स्त्री० अल्पा० बध- 
नखी] १ बाघ के नख के आकार-प्रकार के प्राचीन अस्त्र। शेर- 
पजा। २ गछे में पहनने का एक प्रकार का गहना जिसमे चाँदी या 
सोने के खड़ो मे बाघ के नाखून जड़े रहते हैं। 

घघनहाँ *--पु० बघनखा । 

बधनहियाँ[--स्त्री ० दे० 'बधनखा'। 

बचमा।| ---१०--बघनहाँ । 

घधनाव[--प० [हिं० बाघ । वायु ] बाघ या शेर के शरीर की दुर्गध। 

बघरुरा--पु० [हिं० वायु+-गंडरा] बगूछा। चक्रवात। बवडइर। 

बधवार*--१्‌० [हिं० बाघ+बाल |] बाष की मूंछ का बाल। 

अधार--प० [हिं० बधारना] १. बघारने की क्रिया या भाव। २- 
बह मसाका जो बघारते समय घी मे डाला जाय। तडका। छौंक। 
क्रि० प्र०--दैना। 
३. बधारते से निकलनेबाली सोधी गध। 
कि० प्र०--आनो ।--उठना ।--भिकलना। 
४. पाण्डित्य प्रदर्शन के लिए किसी विषय की की जानेवाली भीथी 

४००७ 





अनीन-न+++ज 4 लत क लत तनमन पा 


बैंचंग 





चर्चा। ५. शराब पीने के समय बीच-बीच मे तमाकू, बीडी आदि पीने 
की क्रिया। (व्यग्य) 

बधारता--स० [स० व्याघारण | १. कलछी या चिस्मच मे घी को आग 
पर तपाकर और उसमे हीग, जीरा आदि सुगधित मसाले छोडकर उसे 
तरकारी, दाल आदि की बटलोई मे उसका मुंह ढाककर छोडना जिससे 
वह सुगव्षित हो जाय। तड़का देना या छगानां। छौंकना। २ अपनी 
योग्यता, शक्ति का बिना उपयुक्त अवसर के ही' आवश्यक से अधिक 
या निरर्थक प्रदर्शत करना। जैसे--अभँगरेजी या सस्कृत बधारता। 
३ डीग या शेखी के सबंध मे, आतक जमाने के छिए, बढ़ा-चढाकर चर्चा 
करना। जैसे--शेखी बघारना। 

बधूरा| --पु० न्‍वगूला। 

बघेरा। --पुं० [हि० बाध] लकडबग्पा। 

अधेलसं ड--पु० [हि बधेल (जाति)+खंड] [थि० वर्घेलखडी] 
आधुनिक मध्यप्रदेश के अन्तर्गत नागौद, रीवाँ, मैहर आदि भुभागा 
की सामूहिक सज्ञा। 

बर्णेछलंडी---वि० [हिं० बधेलखड] बघेलखड का। बधेलख़ड-सवधी । 
पु० बघेलखड का रहनेवाला। 
सत्री० बघेलखड की बोली । बघेली। (देखें) 

बधेलो--स्त्री० [हि० बधेलखड] बधेलखड की बोली जो पूर्वी हिन्दी 
के अन्तर्गत मानी गई है और अवधी से बहुत कुछ मिरूती-जुलती है। 
सत्री० [हि० बाघ+एली (प्रत्य०)) बरतन खरादनेवालों का वह 
खूँदा जिसका ऊपरी सिरा आगे की ओर कुछ बढा होता है। 

बधेरा। --१० -बगेरी (चिडिया)। 

बच--स्त्री ० [स० वचा ] पर्वतीय प्रदेश के जलाशयों के तट पर होनेवाला 
एक प्रकार का पीधा जिसके अगो का उपयोग औषधों भें होता है। 

पु० [स० बच'] वचन। बात। 

बचजका| --१० --बजका (पकवान )। 

बचकाना---वि० [हि० बच्चा+काना (प्रत्य०)] [स्त्री० अल्पा० 
बचकानी] ६ बच्चों के पहनने या काम में आनेवाला। जैसे-- 
बचकानी टोपी। २ बच्चों की तरह छोटे आकार-प्रकार का। जैसे-- 
बचकाना पेड। ३. बच्चों के स्वभाव का । जेसे--अचकानी बूढ्धि। 

बयत--स्त्री० [हि० बचना | १ बचे हुए होने की अवस्था या भाव। 
जैमे--इस तरह करने से काम मे समय की बहुत बचत होती है। २. 
व्यय आदि के बाद बच रहनेवाली घन-राशि। ३ लागत, व्यय आदि 
निकालने के बाद बचा हुआ धन। मुनाफा। राभ। (सेविंग) ४ 
लाक्षणिक अर्थ मे, किसी प्रकार से होनेवाला छुटकारा या बचाव। 
जैस--झठ बोलमे से तुम्हारी बचत नही हो सकेगी। 

बचता| ---पु० [हि० बचना] [स्त्री० बचती] देन चुकाने, उपयोग, 
व्यय आदि करने के उपरात बचा हुआ धन। 

बचन--प० [स० वचन] १. मुँह से कही हुई बात। वचन। २, याणी। 
३ दुढता, प्रतिज्ञा, शपथ आदि के रूप मे कही हुई ऐसी बात जिसमें 
कभी अस्तर न पड़े। प्रतिज्ञा। जैसे--हम तो अपने बचन से बसे है। 
क्रि० प्र ०--छोड़ना ।--तोड़ना ।--देवा ।-निभाना ।- पालना ।-लेना । 
मुहा०---अचस देला--दृढ़ प्रतिज्ञापूर्वक यह कहना कि हम तुम्हारा अमुक 
काम अवश्य कर देंगे। (किसी से) बच्चन बंधाना -दृढ़ प्रतिज्ञा कराना । 


बचन-विवग्धा 





उदा०--ननन्‍्द जरोदा बचन बेंधायों, ता कारण देही धरि आयो। 
---सूर। बच्चन साँगना--किसी से यह प्रार्थना करना कि आपने जो 
बचत दिया था, उसका पालन करें। बचने हारना --प्रतिज्ञापूर्वक किसी 
से कही हुई बात या किसी को दिए हुए वचन का पालन करने के लिए 
विवश होना। 
४ किसी से निवेदन या प्रार्थनापूर्वक कही जानेवाली बात। 
मुहा०-- (कसी के आगे) बचन डालना--किसी काम या बाल के 
लिए प्रार्थना या याचना करना। 

बचम-विदरधा--त्री ० >वचन-विदग्धा । 

बचमा--अ० [स० वचन -न पाना] १ उपयोग, कार्य, व्यय आदि 
हो चकने के बाद भी कुछ अश, पास या शेष रहू जाना। अवशिष्ट 
होना। जैसे--(क) दस रुपयों में से तीन रुपए बचे है। (ख) 
दो कुरते बन जाने पर भी गज भर कपडा बचेगा। २ बंधन, विपद्‌, 
सकट आदि से किसी प्रकार अलग या दूर या सुरक्षित रहना। जैसे--- 
बहू गिरने से बाल बाल बच गया। ३ किसी कार्य मे सछग्न न हीना 
अथवा दूसरा द्वारा किए जानेवाले कार्यों के परिणाम, प्रतिक्रिया, प्रभाव 
आदि से अछूता रहना। जैसे--(क) किसी के आक्षेप से बचना। 
(ख) झूठ बोलने से बचना। ४ किसी का सामना करने या किसी 
के सम्पर्क मे आने से धबराना या सकोच करना और सहसा उसका 
सामना ने करना या उसके सम्पर्क मे न आना। जैसे--बह तगादा 
करनेवालों से बचता फिरता है। ५ किसी गिनती, वर्ग, समाज आदि 
के अन्तगंत न आना या न होना। छूट या रह जाना। जैसे--इनके 
व्यग्य-वाणों से कोई बचा नहीं है। 
स० [स० वचन] कथन करना। कह्ना। 

बस्चपन--प१० [हिं० बच्चा+पन (प्रत्य०)] १ बच्चा (अल्प- 
वयस्क ) होने की अवस्था या भाव। २ बाल्यावस्था। रूडककपन। 
३ बालका की तरह किया जानेवालहूा सयानों द्वारा कोई कार्य। बच- 
पना। 

शश्पमा--प० [हिं० बचपन] १ बचपन। २ सयाते ब्यक्तिय। द्वारा 
किया जानेवारा कोई ऐसा अशाभनीय कार्य जो उनकी बुद्धि की अपरि- 
पक्‍वता का सूचक होता है। 

बचवा[--पु० [हिं० बच्चा| १ बालक। बच्चा। २ हाथ में पह- 
नने की अँगूडी में लगे हुए छोटे घुंघरू । उदा०--उँगली तेरी छल्ला 
सोभे, बचवे की बहार। (क्षमर ) 

बचरेया--वि० [हि० बचाना+वैया (प्रत्य०) | बचानेवाला। रक्षक। 

सदधा--पु० [स० वत्स,पा० वच्छ, हि० वच्चा] [स्त्री० बच्ची] १ 
रूडका। बालक। २ एक प्रकार का तुच्छतासूचक सबोधन। जैसे- 
अच्छा बचा, तुमसे भी क्रिसी दिन समझ छूँगा। 

अचाना--स ० [हि० बचना का स०] १ ऐसी क्रिया करना जिससे 
बुछ था कोई बचे। २ उपयोग, व्यय आदि के उपरात भी कुछ अव- 
छ्षिप्ट रखना। जैसे--वह दो-चार रुपए रोज बचा लेता है। ३ किसी 
प्रकार के कष्ट, बंधन, सकट आदि से किसी प्रकार अलूग करके मुक्त या 
सुरक्षित करना । जैसे--जुरमाने, रोग या सजा से बचाना । ४. दुष्कर्म, 
दूपित प्रभाव आदि से अछग और सुरक्षित रखना। जैसे--किसी को 
कुमार्ग में पड़ने से बचाना। ५. आधात, आक्रमण आदि से सुरक्षा 


प० 


द्छा 


करना। ६ सामना न होने देना या संपर्क मे न आने देना। जैसे-- 

(क) किसी से आँख बचाना। (ख) किसी का सामना बचाना। 

बचाब--प० [हिं० बचना] १ कष्ट, सकट आदि में बचे हुए होने की 
अवस्था या भाव। जैसे--इस पेड के नीचे धूप (या वर्षा) से बचाव 
रहेगा २. ब्राण। रक्षा। २. कष्ट, सकट जादि से बचने के लिए 
किया जानेवाला उपाय या प्रयत्त। (३२ बचत। 

बचिया--स्त्री० [हिं० बच्चान्‍-छोटा] कसीदे के काम में छोटी-छोटी 
बूटियाँ। 

बचुआ--पु० [देश० | एक प्रकार की मछली। 
पु०लबच्चा। 

बचन--१० [हि० बच्चा] भालू का बच्चा। (कलदर ) 

बचो--पु० [देश०] एक तरह की लता। 

बच्चा--प० [स॒० वत्स, प्रा० बच्छ से फा० बच्च | [सरत्नी० बच्ची] 
१. किसी प्राणी का नवजात शिशु। जैस--कुत्ते या बित्ली का 
बच्चा, आदमी का बच्चा। २ मनुष्य जाति का कम अवस्थावाला 
प्राणी । बालक । 
पद---अच्चे-कच्चे -:छोटे छोटे बच्चे। बाल-बच्च। 
सुहा०--बच्चा देना-न्‍्गर्भ से सतान उत्पन्न करना। प्रसव करना। 
पद--बच्चों का ख्ेरूू--बहुत ही तुच्छ, सहज या साथारण काम । 
वि० १ कम उमरवाला। २ नादान। ३ अनुभवद्वान। 

वच्चाकदइ--वि० [फा०] बहुत बच्चे जननवाली (च्त्री)। 
(विनोद ) 

बच्चादान---१० |फा०] गर्भाशय। 

बच्ची--स्त्री ० [ हि० बच्चा का स्त्री० रूप] ६ छोट लडकी । २ वह 
छोटी घोडिया जो छत या छाजन म बडी घोड़िया के नीचे लगाई 
जाती है। ३. वे बाल जो होठ के नीच बीच में जमत है। ४ दे७ 
'बचिया। 

बच्चेदानी--स्त्री ०>वबच्चादान (गर्भाशय )। 

बच्छ--पु० [स० बत्स, प्रा० वच्छ| १ 
बछडा। 

बच्छनाग[--पु० --बछनाग । 

बच्छुछ---वि ० >वत्सल । 

बच्छतत--पु० [स० वक्षस्‌] वक्ष स्थल। छातो। 

बच्छा--पु० [स० वत्स, प्रा० वच्छ ] [स्त्री० बछिया] १. गाय का 
बच्चा। बछडा। बछवा। २ किसा पथश्ुु का बच्चा। (क्त्र०) 

बछ--पु० [स० वत्स, प्रा० वच्छ] गाय का बच्चा। बछडा। 

|स्त्री०-जबच (ओर्षाष)। 

बछड़ा--पु० [हि० वच्छ+-डा (प्रत्य०)] [स्त्री० बछडी, बछिया] 
गाय का बच्चा! 

बछनाग--१० [स० वत्सनाग] एक स्थाजर विष। (एकोसाइट) 

बछरा[--१० ->बछडा। 

बछरू]--१पु० -बछडा (गाय का बच्चा)। 

बछल[--वि० >व्यत्सल । 

बछवा--पु० [हि० वच्छ] [स्त्री० बछिया] गाय का बच्चा। बछड़ा। 

बछा|--पु०>न्वच्छा । 


बच्चा। २ बेटा। ३ 


बचिया 


बजा 


न कनन«न-ना+न-फा3»मनक -+-»नलनिनाक वन पमन न लिनननन।लतखत-ज नल ननभ+-नननननन--म-म- मनन“ पिनन+े नी ननननननम-- “नरम 4“ कन ७५०७५ ५अन-न-+ न ननम-कन+-ब न एलन ननक न» ++नननानना न था लनाए नि यिियतयनननकीन-+ पान नीलम नीनिनिनन न» वन- पान मनन न ननमन-+न-+नननननन-म 3 न++--न-नन-पनननन++ कल ननन-- -+ 4 -+ पा भा+ था >ऊ3 परम भाइबमम. 


बछियर--स्त्री० [हिं० बछा] गाय का मादा बच्चा। 
पद--अछिया का ताऊ या बाबा-- (बैल की तरह) निरब॑द्धि या मूर्खे। 

बक्केड़ा--पुं० [सं० वत्स; प्रा० वच्छ; पु० हिं० वचुछ] [स्त्री० बछेडी ] 
घोड़े का बच्चा। 

बछेरा[--पूं ० ++बछेडा । 

बछेक[--प० >-बछडा। 

बछोंटा--प० [हि बाछ-+औंटा (प्रत्य०) ] वह चदा जो हिस्से के 
मुत्ताबिक छगाया या लिया जाय। 

बलंत्री---पृ० [हिं० बाजा] १. बाजा बजानेवारहा। बजनियाँ। २ 
बाजे बजानेवालो की सण्डली। ३ मूुसलऊमानी राज्य-काल मे बाजा 
बजानेवालो से छिया जानेवाला एक तरह का कर। 

बजकंद--पु० [स० वद्धकद] एक प्रकार की जगली लता। 

बजकना---अ० [अन॒०] तरल पदार्थ का सडकर या बहुत गदा होकर 
बुलबुले फेंकना। बजबजाना | 

बजका---१० [हि० बजकना] १ बेसन आदि की वे पकौडियाँ जो दही 
में डाली जाने से पहले पानी मे फूलाई जाती है। २ दे० 'बचका'। 

बजगारी--नत्री० [स० बच्चन] वज्ञपात। उदा०--देऊक जवाब होई 
थजगारी ।--कबी र । 
वि० दे० 'बज-मारा'। 

झजठ---१० [अ०] १ आय-व्यय का मासिक या वाधिक छेखा। २. 
आय-व्यय पत्रक। 

बजड़ना--स ० ६ टकराना। २ कही जाकर पहुँचना। 

बजड़ा---प०- बजरा। 

बजतक--१० [?] पिरते का फूल जिससे रेशम का सूत रंगा जाता है। 

बजना--अ० [हि० बाजा] १ किसी चीज पर आधात किये जाने पर 
ऊंची ध्वनि निकलना। जैसे--(क) घटा बजना। (ख) तबला 
या मृदग बजना। २ ऐसा आधात छगना जिससे किसी प्रकार का उच्च 
शब्द उत्पन्न हो। जैसे--किसी के सिर पर डडा बजना। ३ अस्त्र- 
शस्त्र आदि का शब्द करते हए प्रहार होना। जैसे--छाठी बजना। 
४ एसी लडाई या झगडा होना जिसमे मार-पीट भी हो। ५. हुठ 
करना। जिद करना। अडना। ६ किसी नाम से छयात या प्रसिद्ध 
होना । 
थि० बजनेवारा। जो बजता हो। 
पु० १ चाँदी का रुपया जो ठनकाने या पटकने से बजता अर्थात दब्द 
करता है। (दलाल) २ दे० 'बाजा'। 

बजनियाँ--पु० [हिं० बजना+इया (प्रत्य०) | वह जो बाजा 
बजाने का ध्यवस्ताय करता हो। वह जिसका पेजश्ा बाजा बजाना हो। 
(प्राय ब्याह-शादी आदि के अवसरों पर बाजे बजानेवालों के लिए 
प्रयृकत ) 

बजनिहॉँ--प ० >्वजनियाँ । 

बजनी--स्त्री० [हिं० बजाना] ऐसी लड़ाई या झगड़ा जिसमे उठा-पटक 
या मार-पीट भी हो। 
वि० अणने था बजाया जानेबाला । बजन्‌ | 

बजनूँ--वि० [हि० बजाना] बजने या बजाया जानेवाला। जो बजता 
या बजाया जाता ही। 


बजबजाना---अ० [अनु०] १ उमस, गरमी आदि के कारण किसी 
जलीय या तरल पदार्थ मे खमीर उठने पर अथवा उसके सड़ने पर उसमें 
से बुलबुले निकलता । जैसे--कटहल या भात बजबजाना । २ श्स 
प्रकार बुलबुले निकलने से पदार्य का दूषित होना । 

भजसारा--वि० [सं० वज्--हिं० मारा] [स्त्री० बजमारी] १. वज्ष से 
आहत। जिस पर वच्च पड़ा हो। २ बहुत बडा अभागा। 

बजरंग--वि० [स० वष्ध +अंग] १ वच्च के समान कठोर अंगॉवाला । 
२. परम शक्तिशाली और हृष्ट-पुष्ट | 
पु० हनुमान । 

बजरंगबली---पु० [हि० बजरंग--बली ] हनुमान्‌ । महावीर | 

बजरंगी बेठक--स्त्री० [हि० बजरग-+-बैठक ] एक प्रकार की बैठक 
जिससे शरीर बहुत अधिक पृष्ट होता है । 

बजर--वि० [स० वच्च] १ बहुत मजबूत। दृढ़ या पक्का । उदा०--- 
किसू सफीछा भुरज की, काहू बजर कपाट ।---बाकीदास । २. कठोर। 
पु०्लचञ् । 

बजरबहु--१० [हिं० बजर | बट्टा ] १. एक प्रकार के व॒क्ष के फल का 
दाना या बीज जो काले रंग का होता है और जिसकी माला नजर आदि 
की बाधा से बचाने के लिए लोग बच्चों को पहनाते हैं।२ व्यापक 
अर्थ मे कोई ऐसी चीज जो किसी प्रकार का अपशकुन तथा दूषित 
प्रभाव रोकती है। ३ एक प्रकार का खिलौना । 

बजरबोंग--पु० [हि? बजर +बोग (अनु ०) ] १ एक प्रकार का धात जो 
अगहन मास मे पकता है। २ बड। भारी या मोटा डंडा । 

बजर-हुड्डी--स्त्री० [हिं० बजर-हड्डी] धोड़ों के पैरो में गाँटे पड़ने 
का एक रोग। 

बजरा---१० [स० वज्चा] वह बड़ी नाव जो कमरे के समान खिड़कियों 
तथा पक्‍की छतवाली होती है। 

प०--बाजरा । 

घजरागि--स्त्री ० ज्वज्ञारिन (बिजली) । 

शजरिया--स्त्री० [हिं० बाजार ।इया (प्रत्य०)] छोटा बाजार । 

बजरी--स्त्री० [स० वा] १. पत्थर को तोड़कर बनाये जानेवालछे वे 
छोटे छोटे टुकड़े जो फरदा, सड़क आदि बनाने के काम आते हैं। २. 
आकाह से गिरनेवाहा पत्यथर | बोला । ३ वह छोटा नुमायश्ी 
कंगूरा जो किले आदि की दीवारों के ऊपरी भाग में बराबर थोड़ें-बोड़े 
अतर पर बनाया जाता है और जिसकी बगल में गोलियाँ चलाने के छिए 
कुछ अवकाश रहता है। 
4 स्त्री ० [ हिं० बाजरा] वह बाजरा जिसके दाने बहुत छोटे-छोटे हों । 

बजवाई--स्त्री० [हि० बजवाना+ई (प्रत्य०) ] १. बाजा बजवाने का 
कार्य या भाव । २. वह मजदूरी जो किसी से बाजा बजवाने के फल 
स्वरूप उसे दी जाती है । 

अजवाना--स ० [हि० बजाता का प्रें०] [भाव० बजवाई ] किसी को कुछ 
बजाने मे प्रवुत करता । जैसे--बाजा बजवाना । 

सजबेया--वि० [हि० बजाना+वैया ([प्रत्य०) ] बजानेवाला । थो 
बजाता हो। 

धजा--वि० [फा० बजा] १. जो अपने उचित, उपयुक्त या ठीक स्थान 
पर ही। २ उचित। बाजिब। 


बजागि ५९ 





मुहा ०--अजा छाना-- (क) पूरा करना। पालन करना। जैसे--- 
हुकुम बजा लाना । (ख) सम्पादन करना। जैंसे---आदाब बजा 
छाना । 
३. जो दुश्स्‍्त तथा छुद्ध हो। 

अजागि--स्त्री ० [स० वज्ञ | अग्नि] वज्ञ की आग अर्थात्‌ विद्यत्‌। बिजली। 
उदा०--सूरज आग बजागि-दुख तृष्ण पाप बिलाप।--केशव । 
२ भीषण कष्ट देनेवाला ताप। उदा०--विरह-बजगि सौंह रथ 
हाँका ।--जायतसी | 

बजागिन---स्त्री ०--बजागि | 

बजाज--१० [अ० बजज्ञाज़] [स्त्री० बजाजिन, भाव० बजाजी] कपडे 
का व्यापारी । कपड़ा बेचतेवाला | 

बजाजा--१० [हिं० बजाज | वह बाजार जिसमे कपडो की बहुत-सी 
दुकानें हो। 

ब्रजाजी--स्त्री० [अ० बय्ज़ाज़ी] १ बजाज का काम। कपड़ा बेचने 
का व्यवसाय । २ बजाज को दृकान पर बिकनेवाले या बिकने 
योग्य कपडे । 

बजाना--स० [हिं० बाजा] १. किसी चीज पर इस प्रकार आधात 
करना कि उसमे से शब्द निकलने छंगे । जैसे--(क) घटा बजाना । 
(स्व) ताली बजाना । २ कोई ऐसी विशिष्ट प्रक्रिया करना जिससे 
कोई बाद्य, सुर, ताछ़, छलय आदि में शब्द करने लगे । जैसे--शहनाई 
या सितार बजाना । 
पद--बजाकर ->डका पीटकर । खुल्लमखुल्ला । 
मुहा ०--गाल बजाना--दे० गाल' के अन्तगंत मुहा ० । बर्दोबजासार- 
सैनिका को कवायद आदि के लिए बुलाने के उद्देश्य से बिगुल 
बजाना । 
३ लाठी, सोटे आदि से लडाई-झगडा करना । 
४ पुकारना । बलाना । (पूरब) ५ खरेपन आदि की परीक्षा के 
लिए किसी चीज को उछालकर, पटककर अथवा उसपर आधात करके 
दाब्द उत्पन्न करना । 
पद--ढठोंकमा-बजाना-- (क) अच्छी तरह जाँचना या परखना। 
जैसे--जो चीज छो वहू ठोक-बजाकर लिया करो।(ख) बात या 
व्यक्ति के सबंध में प्रामाणिकता, सत्यता आदि का निश्चय करना । 
जैसे--उन्हे अच्छी तरह ठोक-बजाकर देख लो। कही ऐसा न हो, 
कि वे पीछे मुकर जायेँ । 
५ आधात या प्रहार करना। मारना-पीटना | जैसे--जते बजाना । 
६ स्त्री के साथ प्रसंग या सभोग करना । (बाजारू ) 
स० [फा० बजा+ना (प्रत्य०)] पालन करना । जैसे--ताबेदारी 
बजान',, हुकुम बजाना । 

बजाय--अध्य० [फा०] (किसी की ) जगह या स्थान पर अथवा बदले मे । 
दऊंसे---3नहे झपयो के बजाय कपड़ा भी मिल जाय तो काम चल जायगा । 

बजार[--पु० >न्‍बाजार । 

बजारी[--वि०--बाजारी । 
बि० [हिं० बाजनान-बोलना] बहुत बढ-चढकर और व्यय बोलनेवाला। 
उदा०--कीति बडो करतूति बडा जन, बात बड़ो सो बड़ोई बजारी ।-- 
तुलसी । 


जे न जय जल ४-3 


बजारू(--वि० >>बाजारू। 

बआवतहार|-- वि० [हिं० बजाना+हार (प्रत्य०)] बजानेवाला । 

बजायमना|--स ० 5-बजाना । 

बजुआ--पु० -चबाजू । 

बजुज--क्रि० वि० [फा० बजुश] अतिरिक्त । सिवा । जैसे--अजुज 
इसके और कीई चारा नही है। 

बजुल्छा--पु० [स० बाजू+उल्हा (प्रत्य०) ] बाँह पर पहनने का 
बिजायट नाम का गहना । 

बजका--१० [? ] १. धातु का एक प्रकार का बडा नल जिसमे से बिजली 
की सहायता से शत्रुओ पर अग्नि-वाण आदि छोडे जाते है। (इसका 
प्रयोग पहले-पहल अमेरिका ने दूसरे यूरोपीय महायुद्ध मे किया था) । 
२. दे० 'बिजूखा'। 

बजूला--पु० १.5-बजूका २.७बिजूखा। 

बफ़्जना--अ ० >बजना | 

बज्जर---प०वज् । 

अज्जात--वि० [फा० बद ज्ञात] [भाव० बज्जाती] १ दुप्ट। पाजी। 
२ कमीना। नीच। अघम । 

बज्जाती--स्त्री ० [फा० बदज्ञाती ] १. दुष्टता। पाजीपन । २ कमीना- 
पन। नीचता। अधमता । 

बज्जुन---१० [हिं० बजना ] बाजा । 

बज्म--स्त्री० [फा० बज़्म] १ सभा। २ गोष्ठी। 

बच्थ*--पु० -न्वज्ञ । 

बढज्औी--पु० ज्वज्ञी (इन्द्र )। 

अप्तना--अ० [स० वद्ध, प्रा० वज्ञ+ना [(प्रत्य०) ] १ बधन में पढ़ना । 
बेंधना । २ उलझना । फ़सना । ३. किसी से उलझकर लडाई- 
झगड़ा करना। ४ जिद या हठ करना । 

बप्तकट--स्त्री० [हि० बाँझ |-वट (प्रत्य०) | १ बॉझ सस्‍्त्री। २ कोई बाल 
मादा पशु। ३ वह डठल जिसमे से बाल तोड छी गई हो। 
स्त्री० बह्लावट। 

बप्ताऊ---वि० [हि बश्चाता] बच्चाने अर्थात्‌ फँसाने वाला । 
पु०>बच्ाव । 

अश्नाम--स्त्री० [हि० बलह्चनना] बच्चने या बच्चाने की अवस्था, क्रिया या 
भाव। बलश्ाव । 

असह्काना--स ० [हिं० बक्नना का सकर्सक रूप ) १ बंधन से डालता या 
लाना। २. उलझाना। फंसाना। ३ जाल मे फेसना। 
[अ० बंधन में फेंसना । जकड़ा जाना। बच्चना। 

बप्ताव--प्‌० [हिं० बक्नना] १. जार, फदे भादि में बल्चाने की 
क्रियाया भाव। बह्मावट । २ बह्लाने था फँसानेवाली कोई चींज । 
बल्लावट । 

बह्तावट--स्त्री० [हिं० बश्नना+आवट (प्रत्य०) | १. बचने या बच्चाने 
की अवस्था, क्रिया या भाव। बल्चलाव। २ उलझन। ३. जाल। बच्चाव। 

बश्ावना---स ० -बन्नाना | 

बशावा --पु० [हि० बल्लाना>फेसाना] किसी को फेंसाने के लिए 
बनाया हुआ जाल या गभीर योजना। 

बट--पु० [स० बट] १ बड का पेड़। बढ़। २ किसी चीज का गोला। 


बटई 


३. सिझ पर चीजें पीसने का बद्दा। ४. बाट। मार्गे। रास्ता । 
५ चीजों को तौलने का बटखरा। बाट। ६. बड़ा साम का पकवान। 
पु० [हिं० बटता>-बेछ डाछता ] १ बटे हुए होने की अवस्था या भाव। 
२. रस्सी आादि के बह ऐठन जो उसे बठते से पड़ती है। बल | 
क्रि० प्र०--डालता ।--देना। 
है. पेट में होनेब्राली ऐएँठडन या पडनेजाली मरोड। 
पूं० हिं० बाट का वह सक्षिप्त रूप जो उसे यौगिक शब्दों के आ्रारभ में 
लगने पर प्राप्त होता है। जैसे--बट-खरा, बट-मार। 
पु० [ हिं० बैंटना ] बैंटने पर सिलनेवाला अश। बाँट। हिस्सा। उद्दा०-- 
छाज म्रजाद मिली औरन कौ मुदु मुसुकानि मेरे बट आई ।--नारायण 
स्वामी । 
बटई[--स्त्री० >बवटे्‌र। उदा०--तीतर बटई लवा न बाँचे ।--जायसी । 
बठकला--अ० बचना । (बुन्देड०) उदा०--ईसुर कान बटकने 
नद्याँ देख लेबर यह ज्वानों।---छोकगीत । 
बटलर--प्‌ ०> बटखरा । 
बटखरा--१० [स० वटक | धातु, पत्थर आदि का किसी निमत तौल का 
टुकड़ा जिससे अन्य पदार्थ तराजू पर तौले जाते है। 
बट-छीर*--पु० [स० बट-+ हिं० छीर] वट वृक्ष की वह छाल जो पहनने 
के काम आती थी। उदा०--कहोत प्रात बट-छीर मंँगावा |--- 
तुलसी । 
बटन--स्त्री० [हिं० बटना] १ रस्सी आदि बटने या ऐंठले की क्रिया 
या भाव । २ बटने के कारण ररसी आदि मे पड़ी हुई ऐंठन। बरू। 
प्‌ृ० [अ०] १ धातु, सीग, सीप आदि की बनी हुई बिपटे आकार की 
कडी गोल घुडी, जो कोट, कुरते अगरखें आदि में टॉँकी जाती है और 
जिसे काज नामक छेद मे फँसा देते से खुली जगह बद हो जाती है और 
कपड़ा पूरी तरह से बदन को ढक छेता है। बृताम। २ उबत आकार- 
प्रकार की वह घ॒ुड़ी जिसे उठाने, दबाने, हिलाने आदि से कोई 
यात्रिक क्रिया आरंभ था बद होती है । जैसे---बिजली का बटन । 
क्रि० प्र० “-दबाना । 
३ बादले का एक प्रकार का तार। 
बटना---स ० [स० वट्‌>बटना] कई ततुओ, तायो या तारो को एक साथ 
मिलाकर इस प्रकार मरोडना कि वे सब मिलकर एक हो जायें। ऐठन 
देकर मिलाना । जैसे--डोरी, तागा या रस्सी बटना | 
१० रस्सी आदि बटने का कोई उपकरण या यन्त्र । 
स० बादना (बट्टें से पीसना) । 
पु० [स० उद्बचंन; आ० उन्वाटुन] सिल पर पीसी हुई सरसों, चिरौजी, 
आदि का लेप जो ब्रीर की मैल छूड़ाने के लिए मरा जाता है। 
उबटन। 
बटपरा--प ० >वबटपार । 
अटपार--प० [स्त्री० बटपारिन] दे० बट-मार'। 
बट-पारी--स्त्री ० दे० बट-मारी। 
पु०चबट-पार (बट-मार) | 
बटभ--१० [? | पत्थर गढ़नेवालो का एक औजार जिससे वे कोना नापकर 
ठीक करते है। कोनिया । 
पु० न्यटन | 


न ननननननया- ब-५०-++ मनन. 34०--+मभानन+4मन-+ 33० 





बदाक 





बटम-पाम---पुं० [बटम-+अ० पामन्‍च्ताड़] बंगाल में होनेवाला एक 
प्रकार का ऊँचा पेड़ । 

बट-मार---पु० [हिं० बाट-+-मारनता ] पथिको या यात्रियों को मार्ग से मारकर 
धन, सपत्ति छीन लेनेवाला छुटेरा । 

बट-मारी--स्त्री० [हि० बटमार] बटमार का काम या भाव । 

बटला--पु० [स० वर्तुरू; प्रा० वद्नल] [स्त्री० अन्पा० बटली] चावल, 
दाल आदि पकाने का चौई मुंह का गोल बरतत।। बडी बटलोई। देग। 
देगचा । बटुआ | 

अटली---स्त्री ०+बटलोई | 

बटलोई---स्त्री ० [हि० बटला] छोटा बटला | बटली। देगची। 

बटवॉ--वि० [हिं० बाटनापीसता] सिल पर पीसा या पिसा 
हुआ। 
झउदा ०---कटवाँ बटवाँ मिला सुबासू । ।--जायसी | 
वि० [हि० बटनाल्‍नबल डालना] बटा हुआ । 

बटबा--पु ०-+बटुआ । 
पु०-च्बटला। 

बटबाई--स्त्री ० [हिं० बटवाना+आई (प्रत्य०)] बटवाने की किया, 
भाव या मजदूरी। 

अटवाना--स० [हिं० बाटना का प्रे०] बाटने या पीसने का काम किसी 
से करवाना । 
]स० ्बेंटवाना । 

बटवार--पु० [हिं० बाट] १ रास्ते पर पहरा देनेवाला व्यक्त) 
पहरेदार । २ रास्ते पर खड़ा होकर वहाँ का कर उगाहनेवाले 
करमेचारी । 

बटवारा--पु ० >>बेंटवारा । 

बदा--पु० [स० वटक] [स्त्री० अल्पा० बटिया] १ कोई गोलछाकार 
चीज। गोला। २. कदुक । गेंद। ३ पत्थर का दुकड़ा। ढोका । 
४ सिल पर चीजें पीसने का बट्टा । 
पु० [हिं० बाट] बटोही। 
पुृ० १ गणित में एक प्रकार का चिह्लु जो छोटी कितु सीधी क्षैतिज 
रैखा के रूप में (-) होता है और जो किसी पूरी इकाई का भिन्न अर्थात्‌ 
अश या खड सूचित करता है। जेसे--- ३ (तीन बटा चार) भें ३ और 
४ के बीच की पाई बटा कहलाती है। २. गणित मे भिन्न अर्थात्‌ पूरी 
इकाई के तुलनात्मक अश या खड़ का वाचक शब्द। जैसे--दो बटा 
(या बढें) तीन का अर्थ होगा--पूरी इकाई के तीन भागों में से 
दो भाग। 

बटाई--स्त्री० [हि० बटना] बठने या ऐंडन डालने की क्रिया, भाव 
या पारिश्रमिक । 
| स्त्री०>-बेंटाई । 

बहाऊ--१० [हिं० बाट-नरास्ता+आऊ (प्रत्य०)] १ बाट अर्थात्‌ 
राह पर चलता हुआ व्यक्ति) राही। २. अनजान । अपरिचित 
या राहु-बलूता नया आया हुआ व्यक्ति। 
मुहा ०---बटाऊ होता>-खलऊूता होना । चल देना । 
पु० [हिं० बाँटना] १ बेंटवाने या विभाग करानेवाला | २ अपना 
अप या पभ्राप्य बेंढवा या जरूम कराकर लेनेवाला । 


बटाफ 
बटाक--वि० [हिं० बडा ?] १ बड़ा। २. ऊँचा | ३ विज्ञाल । 
बटाटा--प्‌० [अ०» पोर्टटो] आलू (कद) | 
घटाना--स ० [हिं० बटना का प्रे०) बटने या बाठने का काम किसी 
और से कराना । 
पं अ० पटाता (बन्द होना)। 
बटालियन--१० [अ०] पैदझठ सेना का एक बदा विभाग । 
बटाली--स्त्री ० [ लश० ] बढ़इयो का एक औजार। रुखानी। (लश० ) 
बटिका--स्त्री ०>-वटिका । 
बटिया--स्त्री० [हि० बटा - गोला] १ गोली। बटी। २ सिल पर 
पीसने का छोटा बढ़ा। लोडिया। 
|स्त्री ०--बेटाई (खत की उपज की ) । 
बटी---स्त्री० [स० वटी ] १ किसी चीज की बनाई हुई छोटी गोली। 
बटी। २ पीछी की बड़ी या बरी। 
स्त्री० ्वाटिका | 
बटु--पु ० --वट (ब्रह्माचारी )। 
बदुआा-- पुृ० [स० वटक या हि० बटना] [स्त्री० अल्पा० बटुई] 
१ कपड़े, चमर्ट आदि का खाने तथा ढक्‍तनंदार एक उठौआ छोटा 
आधान जिसमे रुपये पैसे, आदि रखे जाते है। 
अटुई--सत्री० बटलोई। 
बदुक--पू ०5 वटुक (ब्रद्यचारी)। 
पु० [? ] लवग। 
बटुरना--अ० [हि० बटोरना का क्ष०] १ इक्कट्ठा या एकत्र होना । 
२ सिमटना । ४ बढारा जाना । 
संयो० क्ि०->जाना । 
बदुरी--स्त्री ० [देश० ] खेसारी या मोठ नाम का कदन्न। 
सत्री० -ज्बटलोई। 
बदुला--प० [स्त्री० अल्पा० बटुली | >बटला । 
बंदुवा--प्‌ ० जबट्आ । 
पु०बटला । 
बटे--पु ० -बटा (गणित का) । 
बटेर--स्त्री० [सर“्वोत्तर] तीतर की तरह की एक छोटी चिडिया जो 
अधिक उष्ठ नहीं सकती। इसका मास खाया जाता है। कुछ शौकीन 
लोग बटेरो को आपस में लठाते भी है । 
बटे्‌रबाज--प१० [हि० बटेर + फा० बाज्ञ ] [भाव० बटेरबाजी] बठेर 
पकडने, पालने या लटानेबाला व्यवित। 
बदेरबाजी--रम ० [हि० बटर | फा० बाजी] बटेर पकड़ने, पालने या 
लडाने का काम या शौक । 
बटेरा--पुृ० [हिं० बटा | कटोरा । 
[पु०--नर बटेर । 
बटेरी--स्त्री ० [ हि० बॉटना ] हिन्दुआ में विवाह के समय की एक रस्म 
जिसमे कन्या-पक्ष वाले बर-पक्षबालों को आभूषण, घन, वस्त्र, आदि 
देते हैं। 
बटोई--प ०- बटोही। 
सत्री० -बटलोई । 
बटोर--पु० [हि० बटोरना] १. बटोरने की क्रिया या भाव। २ किसी 





षट्टा 





विज्लिष्ट उद्देश्य से बहुत से आदमियों को इकट्ठा करना । जैसे--बिरादरी 
के छोगों की अथवा पंचायत की बटीर। रे चीजें बटदोर कर उनका 
लगाया हुआ ढे र। ४. कृडे-करकट का ढेर । (कहार ) 

अमठोरत--स्त्री० [हि० बठोरना] १ बटोरने की क्रिया या भाव । 
२ वह जो कुछ बटोर कर रखा गया या हुआ हो । ३ कमरे, घर, आदि 
के झाड़े-बुहारे जाने पर मिकलनेवाला कूड़ा जो प्राय एफ स्थान पर 
इकट्ठा कर लिया जाता है। ४ खेत मे पड़े हुए अन्न के दाने जो बटोर कर 
इकट्ठे किये जायें । 

बटीरना--स० [हिं० बटरना] १. छितरी या बिखरी हुई वस्तुओं को 
उठा या खिसकाकर एक जगह करना । जैसे--(क) गिरे हुए पैसे 
बटोरना । (ख) कूड़ा बटोरना। 
क्रि० प्र०--देता ।--जलेना। 
२ इकट्ठा करना, जोडना या जमा करना। जैसे--धन बटोरना। 
३. फैलाई या फैली हुई चीज समेटना। जैसे--चादर या पैर बटोरना । 
४, चुनना। 

बटोही--१० [ हि० बाट ] बाट अर्थात्‌ रास्ते पर चलनेवाला या चलता हुआ 
यात्री। राही। पथिक । मूसाफिर । 

बहु--पु० [हि० बटक)] १ बठा । गोला । २ 
३. बटलखरा । बाद। 
पु० [हि० बटना] १ कोई चीज बटने से पडा हुआ बल । बट | 
२ शिकन। सिलवट। 
१०--बाट (रास्ता)। 

बटून--पु० [हि० बटना] बादले से भी पतला एवं प्रकार का तार। 

बद्ठा---प० [स० बटक, हिं० बटा ज्गोछा ] [स्त्री० अल्पा० बट्टी, बटिया ] 
१ पत्थर का यह गोल टुकड़ा जो सिल्ल पर कोई चीज कूटने या पीसने 
के काम में आता है। कटने या पीसने का पत्थर । लोढा। २ पत्थर 
आदि का कोई गोल-मटोल टुकड़ा । ढे ला ।३ छोटा गोल डिब्बा । जैसे-- 
गहने या पान के बीडे रखने का बट्टा। ४ छोटा गोलाकार दर्पण । 
५ बह कटोरा या प्याला जिसे औधा रखकर बाजीगर उसमे किसी 
बस्तु का आना या निकल जाना दिखलाते है। 
पद---अष्टंबाज । (देखें) 
६ एक प्रकार की उबाली हुई सुपारी । 
पु० [स० वरत्ति, प्रा० बाट्ट लबनिये का व्यवसाय] १ किसी चीज 
के पूरे दाम मे हीनेवाली वह कमी जो उस चीज में कोई खोट, त्रुटि, 
दोब या मिलावट होने के कारण की जाती है । 
पद--बट्टें से>-त्रुटि, दाष मिलावट आदि के कारण किसी चीज की 
अकित, नियत या प्रसम दर की अपेक्षा कुछ कम मूल्य पर । जैसे-- 
जिस गहने मे टाँके अधिक होते है, वह पूरे दाम पर नही, बल्कि बट्टे 
से बिकता है। 
क्ि० प्र ०--काटना |--देना ।---लगाना । 
२. सिक्‍के आदि तुडाने या बदलवाने मे होनेवाली मूल्य की कमी। 
भाँज। जैसे--सौ रुपए का नोट भुनाने में दो आना बट्ढटा छगता 
है। 
क्रि० प्र०--लूगना । 
पद---व्याज-बटा। (देखें) 


कन्दुक ! गेंद । 


बडा -शाता 





३. उक्त दृष्टि या बिचार से होनेवाला घाटा या टोटा। जैसे-- 
बह थान अन्दर से कटा हुआ निकला था, इसलिए दुकानदार की एक 
रुपया बहा सइना पड़ा। 
क्रि० प्र"--सहना। 
पद---अट्रा -लाता। (देखें) 
४ दस्तूरी, दलाली आदि के रूप में दिया जानेवाला घन। ५ 
किसी चीज या बात मे होनेवाला ऐब, कलक या दोष ! दाग। जैसे-- 
तुम्हारा यह आचरण तुम्हारी प्रतिष्ठा मे ब्ठा लगानेवाला है। 
क्रि० प्र०--लगना ।--छगाना । 

बहा-खाता---प० [हिं? बढ़ा +खाता] महाजनो के यहाँ वह बही या लेखा 
जिसमे डबी हुई अथवा न वसूछ हो सकनेवाली रकमे लिखी जाती हैं। 
मुहा०--बहे जाते लिखनातन प्राप्त हो सकतेवाली रकम डूबी हुई 
रकमो के खाते में चढ़ाना। 

बह्ाहाल--वि० [ हिं० बहा | 8लना] इतना चौरस और चिकना कि उस 
पर कोई गोला लुढकाया जाय तो लछुढ़कता जाय। खूब समतरू और 
चिकना ! 
पु० उक्त प्रकार का चिंकना और चौरस समतल स्थान । 

बट्टाबाज--वि ०, पु०-- बट्टेबाज । 

बट्दी--स्त्री० [हिं० बद्मा] १ पत्थर आदि का छोटा दुकड़ा। २ 
सिल पर चीजे पीसने का छोटा बट्ठा। ३. किसी चीज का प्राय गोला- 
कार खड। टिकिया। जैसे --साबुन की बट्टी। 

बहु---१० [देश०] १ धारीदार चारखाना। २ दक्षिण भारत में 

 होनेबाल्य एक प्रकार का ताड। बजरबट्टू। ताली। ३ बोडा या 

लोबिया नाम की फली। ४ लोहे का वह गोला जिसे नट लोग उछालते, 
गायब करते और फिर निकारूकर दिखलाते है। बट्ढा। उदा०--जिहि 
विधि नट के बदू।--तागरी दास । 

बट्ें-लाते--वि० [ हि०] (रकम) जो डूब गई हो भा वसूल न हो सकती 
ही। 
क्रि० प्र०--डालना |--लिखना । 

बट्टेबाज--प्‌ ० [हि० बट्टा । फा० बाज ] १ नजर-बद का खेल करनेवाला 
जादूगर। २ बहुत बडा चालाक या घूर्ते। 
वि» दुश्चरित्रा (स्त्री )। पुश्चली। 

बढठिया--स्त्री ० [ देश० ] पाथे हुए सूले कडो का ढेर। उपलो का ढेर। 

बड़ंगा--१० [हि बड़ा | अग-+-आ। (प्रत्य०) ] [स्त्री० अल्पा० बडगी] 
दीवारा पर लबाई के बल बीचो-बीच रखा जानेवाला बल्‍ला जिस पर 
छाजन टिकी होती है । 

अड़ुंगी--पु० | हि० बड़ | अग ] घोड़ा। (डि०) 

बड़ंगू---१ु० [देश० ] दक्षिण भारत में होनेवाला एक प्रकार का जगली 
पेड । 

बड़--स्त्री ० (अनु० बड़ बड ] १. बड़बडाने या मुंह से बड बड़ शब्द उत्पन्न 
करने की क्रिया या भाव। ३ निरथ्थक था व्यर्थ की बातें। प्रलाप। 
जैसे--पागलो की बढ। ३ डीग। शेखी। 
क्रि० प्र०--मा रना ।--हाँकना । 
पु०[स॒० वट ] बड का पेड। बट वृक्ष । 
बि० १ हि० 'बडा' का वह सक्षिप्त रूप जो उसे समस्त पदी के आरम्भ 





५५ बड़भागी 





में लगने पर प्राप्त होता है। जैसे---बड-बोला, बड-भागी। २ उदा०- 
पुनि दातार दइअ बड़ कीन्हा ।--जायसी । 

बडश़्का[--वि० [हिं? बड़ा] [स्त्री० बढकी ] बोल-चाल मे (वह) जो सबसे 
बड़ा हो। जैसे--बडके भैया, बडकी दीदी । (पूरब ) 

बड़ कुंहमा--स्त्री० [हि० बडा। कूआँ ] कच्चा कूआ | 

बडु-कौला---पु० [ह० बह+कोपल ] बरगद का फल। 

बड़-गल्ला--पु० [ हि० बड- बगुला | एक प्रकार का बगला। 

घड़-दंता--वि० [हि० बडा+दाँत| [स्त्री० बडदती | बड़े-बड़े दाँतों 
वाला । 

बड़-दुसा--पु० [ हि० बड़ा | फा० दुम |] वह हाथी जिसकी पूँछ पाँव तक 
लबी हो। लबी दुम का हाथी। 
वि०[ स्त्री ० बड-दुमी | बडी दूम या पंछवाला | 

बढ़प्पन--पु० [हिं० बड़ा |-पन (प्रत्य०)] बड़े अर्थात्‌ श्रेष्ठ होने की 
अयस्था, गुण या भाव। महत्त्व। श्रेष्ठता। बडाई। जैस--नुम्हारा 
बड़प्पन इसी में है कि तुम कुछ मत बोलो । 

बड़-फर--पु० [6० बढ |फेलक] ढाल। (डि० ) उदा०--बड़-फरि 
ऊछजत॑ विर्शाध |--प्रिथीराज । 

बड़-फन्नी--रत्री ० [हि० बठा |फन्नी] वह मठिया (हाथ में पहनने का 
गहना ) जो साधारण से अधिक चौडी होती है। 

बड़-बटुः--पु० [हि० बड़ | बड़ा ] बरगद का फल। 

बड़बड़ --स्त्री ० (अनु ०] १ मुँह से निकलनवाले ऐसे शब्द जो न तो स्पष्ट 
रूप में दूसरों को सुनाई पडे और न जिनका जल्दी कोई सगत अर्थ निकल 
सकता ही। बडबड़ाने की क्रिया या भाव। २ व्यर्थ की बातचीत। 
प्रलाप। बकवाद। 
क्रि० प्र०“--करना ।--लगाना। 
३ क्रोध मे आकर अपने मन की भडास निकालने के विचार से बहुत 
धीरे-धीरे मुंह से उच्चारत होने वाले शब्द । 

अड़वड़ाना--अ० [अनु० बडबइ| १ धीरे-धीरे तथा अस्पष्ट रूप से 
इस प्रकार बोलता कि बड़ ब७' के सिवा और कुछ युनाई न दे। २ 
क्रोध मे आकर आप ही आप कुछ कहते रहना। कुडबंडाना। ३ बक- 
बक करना। बकवाद करना। 

बड़ुबड़िया-- ० [अनु० बडबड | इया (प्रत्य०) | १ बडबड अर्थात्‌ 
बकवाद करनेवाढा। २ कोई बात अपने सत्र में ने रख सकने 
के कारण दूसरो से कह देनेवाला। 

बड़-बोल--प० [हि० बडा +बोल | [स्त्री बड-बोली] अपने कतुंत्व, 
योग्यता, शक्ति आदि का अत्यवितपूर्ण कधन। डीग या शेखी की बात । 
वि०न्‍बड-बोला । 

बड़-ओला--वि० [हि० बड़ा +बोल] [स्त्री० बड-बोली] बडी बडी बातें 
बघारने या डीग हॉकनेवाला। बढ-बढ़कर छबी-चौड़ी बातें करने- 
बाला। 


बड़-भाग--वि ० >न्यडभागी। 

बड़- सागा--वि० [ हि. बड़ा +भागी (स० भागिन्‌) ] [स्त्री ० बड-मागी ] 
बड़े अर्थात्‌ उत्तम भाग्यवाला। सौभाग्यशाली। उदा०--ऊधो आज 
भई बड-भागी (-सूर। 

अड़-भागी--वि ० ->बड़भागा । 


बड़-भुज 


अड़- भुज|--- १० ->भड -भूजा । 

बड़रा[--वि० [ स्त्री० बडरी ] वबडका। 

बड़राना[--अ० >बर्रानता । 

बड़बा--स्त्री० [स० बलू%/बा +क,+ठापू, ऊ--ड | १ घोडी। २. सूर्य 
की पत्नी की सज्ञा जिसने घोड़ी का रूप धारण कर लिया था। 
३ अध्विनी नक्षत्र। ४ वायु देव की एक परिचारिका। ५ एक 
प्राचीन नदी। ६ दासी। सेविका। ७ बडवानलू। 
|१० | हि० बडा] भादो मास के अत में होनेबाछा एक प्रकार का धान । 

बड़वास्नि--सत्नी ०: बडवानल (समद्र की अग्नि )। 

बड़तानल--पु० [स० बडवा-अनल, ष० त० ] समुद्र के अन्दर चट्टानों मे 
रहनेवाली आग जो सबसे अधिक प्रबल तथा भीषण मानी गई है। 

बड़वामख--पु० [स० बेडवा मुख, ष० त०, अच्‌ ] १ बड़वारिन। 

7 मख। 

घड़वार[--वि० [भाव० बडवारी |] बडा। 

बड़वारी--स्त्री ० है० बडवार] १ बडप्पन। २ बडाई। महत्त्व। 
३ प्रशसा। 

बड़वाल--स्त्री ० देश ०] हिमालय की तराई मे होनेवाली भेडो की एक 
जाति। 

बड़वा-सुत--पु० [स० ष० त० ] अध्विनीकुमार । 

बड़वाहुत--पु० [स० तृ० त० | स्मृतियों के अनुसार बह व्यक्ति जिसे किसी 
दासी से विवाह करने के कारण दासत्व भ्रहण करना पडा हो। 

बड़-हंस--१० [ हि० बड-| स० हस ] एक राग जो मेघ राग का पुत्र माना 
जाता है। कुछ लोग इसे सकर राग भी कहते है। 

बड़-हंस-सारंग--पु० [ हि? बडहस+सारग ] सम्पूर्ण जाति का एक राग 
जिसमे सब शुद्ध स्वर लगते है। 

बड़-हसिका--स्त्री ० [ हि? बड+स० हसिका] एक रागिनी जा हनुमत्‌ 
के मत से मेघराग की स्त्री कही गई है। 

बड़हना--पु० [ हि? बडान धान ] १ एक तरह का धान। २ उक्त 
धान का चावल । 

पवि० -बड़ा। 

बड़हर|--१०| ? ] वह स्थान जहाँ पर जलाने के लिए सूखे कड़े इकटूठे 
करके रखे जाते है। 
पु० >बडहल। 

बडहल--पु० | हि? बड़ा- फल] १. एक प्रकार का बड़ा पेड जो पश्चिमी 
घाट, धूरव बगाल और कुमा> की तराई आदि मे बहुत होता है। २ 
उबत पेड़ का फल जो अचार बनाने अथ्वा यो ही खाने के काम आता 
है । 

बड़हार--प१० [ हि० वर+आहार ] विवाह हो जाने के उपरान्त कन्या- 
पक्षेबालों द्वारा वर और बरातियों को दी जानेवाली ज्योनार। 

बड़ा--वि० [स० बन, प्रा० बडढन, हि० बढ़ना या स० बड़ ] [स्त्री०- 

ही] १. जो अपने आकार, धारिता, मान, विस्तार आदि के विधार 

से और! से बढ-चढ़कर हो। प्रसम या साधारण से अधिक डीरू-डौल 
वारा। जैसे--(क) बहा पेह, बड़ा मकान, बडा सदूक। (ख)बडा 
दिन। 
पद--बड़ा आदमी, बड़ा घर, बड़ा-बुढ़ा। (दे० स्वतत्र शब्द ) 


शिव 


33 


जन अनन्त ज * जज लक जजञ 5. ५ वऑलाण का आओ ननिलाओ 3४2 की ॥»% 





बड़ो घर 


के नमन 


ऊ.+-+> अन्न 


मुहा०--बड़ी बड़ी बातें करमा--अपनी अथवा किसी की योग्यता, 
झबित आदि के सबध में बहुत-कुछ अत्युक्तिपूर्ण या बढा-चढाकर बातें 
करना। 
२ जो गरिमा, गुण, मर्यादा, महत्व आदि के विचार से औरो से बहुत 
आगे बढा हुआ हो। जैसे--(क) बडा दिछ। (ख) बडा साहस । 
(ग) बडा कारीगर। ३ जो अधिकार, अवस्था, पद, मर्यादा, शक्ति 
आदि के विचार से बढा हुआ या बढ-चढ़कर हो। जैसे--(क) बड़ा 
अधिकारी। (ख) बड़े-बूढ़े (या बडे छोग) जो कहे, वह मान लेना 
चाहिये। ४ जो किशोर विशेषत युवावस्था को प्राप्त हा। चुका ही। 
जैसे---छडकी बडी हो गई है अब इसका विवाह कर देना चाहिए। 
५ तुलनात्मक दृष्टि से जिसकी अवस्था या वय अपने वर्ग के औरो 
से अधिक हो। ज्यादा उमरवाहा। जैसे--बडा भाई, बड़े मामा। 
६ जो मात्रा, मान, सख्या आदि के विचार से औरो से बढ़-चढक र हो । 
जैसे-- (क) उन्हे इस वषे सबसे बडा इनाम मिला है। (ख ) खाते में एक 
बड़ी रकम छूट गई है। ७ जो बहुत अधिक स्थान घे रता हो । अधिक जगह 
धेरनेवाला। जैसे--बड़ा कारखाना, बडी दूकान। ८ जो देखने मे तो 
बहुत बढ-चढ़कर, महत्त्वपूर्ण या प्रभावशाली हो (फिर भी जिसमे कुछ 
तत्त्व या सार न हो )। जेसे--बडा बोल बोलना,बडी बडी बाते बधारना | 
९ कुछ अवस्थाओं मे किसी अनिष्ट, अप्रिय या अशुभ क्रिया के रथान 
पर अथवा ऐसी ही किसी सज्ञा के साथ प्रयुक्त होनेवाला विशेषण। 
जैसे-- (क) दीया बड़ा करना (अर्थात्‌ बुझाना), बड़ा जानवर 
(अर्थात गीदड़ या साँप) । 
क्रि० बि० बहुत अधिक। उद०--बडी लबी है जमी, मिलेगे लाख 
हमी ---। कोई झायद। 
पु० [स० वटक, हिं० बटा | [स्त्री० अल्पा० बडी | १ एक प्रकार 
का पकवान जो मसाका मिली हुई उर्दे की पीठी की गोल चक्राकार 
टिकियो के रूप में होता और घी या तेल मे तलकर बनाया जाता 
है। २ उत्तरी भारत मे होनेवाली एक प्रकार की बरसाती घास। 
बड़ा आदसी--१० [हि०] १ ऐसा आदमी जिसके पास बशेप्ट घत- 
सम्पत्ति हो। अमीर। धनवान। २ ऐसा आदमो जो गुण, पद, 
मर्यादा आदि के विचार से औरो से बहुत बढ़कर हो। 
बड़ाई--स्त्री ० [ह० बडा+ई (प्रत्य०)] १ बडे होने की अवस्था या 
भाव। बडापन। २ किसी काम या बात में औरा की अपेक्षा बढ़- 
चढ़कर होनेवाला कोई विद्येष गुण या श्रेष्ठता। ३ उक्त के आधार 
पर किसी की होनेवाली प्रतिष्ठा या मान-मर्यादा। महिमा। ४ किसी 
में होनेवाले विशिष्ट गुण के सबंध में कही जानेवाली प्रशसात्मक उक्ति। 
५ प्रशसा। तारीफ। 
मुहा०-- (किसी की) बढ़ाई देना ->किसी के गृण, योग्यता आदि 
का आदर करते हुए उसका आदर या प्रशसा करना। (अपनी ) बड़ाई 
मारता - अपने मुंह से आप अपनी योग्यता का बखान या प्रशसा करना । 
बड़ा कुंवार--१० [६० बडा +कुंवार | केवड़े की तरह का एक पेड जिसके 
पत्ते किरिच की तरह हरूम्बे होते है। 
बड़ा घर--पु० [है०] १ कुलीन प्रतिष्ठित और सम्पन्न कुल। ऊंचा 
और कुलीन घराना। २ छाक्षणिक अर्थ मे, कारागार या जेरूखाना। 
मुहा ०--बड़े धर की हवा खाना--कद भुगतना। 


बड़ा बिन 


ह बड़ा दित--पुं० [ हि० बडा +दिन ] २५ दिसम्बर का दिन जो ईसाइयो का 


प्रसिद्ध त्यौहार है। 
बविशेष--प्रायः इसी दिन या इसके कुछ आगे-पीछे दिल-मान का 
बढ़ना आरम्भ होता है, इसी से इसे बडा दिन कहते है। 

डड़ा नहान--पु० [हिं०] बह स्नान जो प्रसूता को प्रसव के चालीसवें दिन 
कराया जाता है। 

बढ़ाती[(--वि ० >-अडा । 

बड़ा पीलू--पु० [हि० बड़ान पील] एक प्रकार के रेशम का कीडा। 

बड़ा बाबू--पु०[हि०] किसी कार्यालय का प्रधान लिपिक जिसके अधीन 
कई लिपिक फाम करते हो । 

बड़ा-अढ़प---पु ० [ हि० ) ऐसा व्यक्ति जो अवस्था या वय के विचार से भी 
ओर गृण, योग्यता आदि के विचार से भी औरो से बढ़-चढकर या श्रेष्ठ 
ही। बुजुर्ग । 

बडि (लि)श--१० [स० बलिन4/शो (तीक्षण करना)+क, ल--ड] 
१. मछली फेंसाने की केडिया। बाँसी। रे. हाल्य-चिकित्सा मे काम 
आनेवाला एक शस्त्र)! 

बड़ी--स्त्री० [ है० बडा] १ आलू, दाल, सफेद कुम्हेड़े आदि को पीसकर 
तथा उसमे नमक, मिरघत्र, मसाला आदि डालकर उसका सुखाया हुआ 
कोई छांटा टुकड़ा जां दाल, तरकारी आदि में डाला जाता है। कुम्ह- 
डौरी। २ मास की बोटी। (डि०)। 

बड़ी हलायची--रबी ० [ हि०] १ एक तरह का इलायची का पेड जिसका 
फल कुछ बडा और काले रग का होता है। २ उक्त का फल जिसके 
दाने था बीज मसाले के रूप मे प्रयुक्त होते है। 

बड़ी गोटी--स्त्री ०[? | चौपायों की एक बीमारी । 

बड़ी बात--स्त्री० [हि०] कोई मह्‌रवपूर्ण कितु कठित काम। जैसे-- 
उन्हें रास्ते पर छाना कौन बड़ी बात है। 

बड़ी साता--स्त्री ० [हि० बडी-।मात्ा] शीतऊलछा। चेचक। (पॉक्स) 

बड़ी सेल--स्त्री ० [ देश० ] एक प्रकार की चिड़िया जो बिलकुल खाकी 
रग की होती है। 

बड़ी राई---स्त्री ० | हिं० बडी + राई ] एक प्रकार की सरसो जो लाल रग 
की होती है। छाही। 

बड़्जा---१० -- बिडीजा । 

बड़ेरा|--वि० [ हिं० बड़ा+रा (प्रत्य०) | [स्त्री० बड़ेरी] १ बडा। २ 
प्रधान । मुख्य 
पु०[स० बडीमि, प्रा० बडीहि+रा] [स्त्री० अल्पा० बडेरी] कुएं पर 
दो खभो के ऊपर ठहराई हुई बहू छूकडी जिसमें घिरनी लूगी रहनी है। 
पु० १.बैंडेर। २.वन्‍ववडर। 

बड़े लाट--१ ० [ हि? बडा--अ० छार्ड] अगरेजी शासन-काल मे भारत 
का सर्व-प्रमुख प्रधान शासक। गबनर-जनरल । 

बड़ेल!---पृ० [हि० बडा] जगली सूअर। 

बड़ोंसा--पृ० [ हि० बड़ा +-ऊख ] एक प्रकार का गन्ना जो बहुत छबा और 
नरम होता है। 

बड़ोना[--१० [हि बड़ापत |] १ बढ़ाई। सहिमा। २ प्रशसा। तारीफ! 

बडड--जि० सवा । 

बडडान--अ० >अड़बड़ाना । 

| आ 


५७ बढ़ता 


बढ़ुंती[---स्त्री ० बढ़ती । 

बढ़--वि० [हि० बढ़ना] १. बढा हुआ। २ अधिक। ज्यादा। ३ 
मूर्सख। ४ हि० बढना (क्रि०) का विशेषण की तरह प्रयुक्त होने 
वाला सक्षिप्त रूप। 
स्‍त्री० ६१ नचचढती । २. बाढ़! 

घढ़ई--प१ु ० [सं० वद्धंकि; प्रा० वडुह] १. लकड़ी को छील तथा गढ़कर 
उसके उपयोगी उपकरण बनामेबारा कारीगर। २. उक्त कारीगरों 
की जाति या वर्ग। ३ रहस्य सप्रदाय में, गुरु जो शिष्य रूपी कुन्दे 
को गढ-छीलकर सुन्दर मूर्ति का रूप देता है। 

बढ़ई सधु-सक्ली--स्त्री ० [हि० ] एक प्रकार की मधु-मक्सी जिसका रगे 
काला और पख नीछे होते हैं। यह वृक्षों के काठ तक काट डालती है। 

बढ़ती--स्त्री ० [हि० बढ़ता +ती (प्रत्य०)] १ बढ़ने अथवा बढ़े हुए 
होने की अवस्था या भाव। २. गिनती, तौल, नाप, मान आदि में 
उचित या नियत से अधिक था बढ़ा हुआ अंश | ३ धन-धान्य, परिवार 
आदि की वृद्धि 
पद---बढ़ती का पहुरा-उन्नति और समृद्धि के दिन। 
४ आवश्यकता, उपभोग, व्यय आदि की पूर्ति हो चुकने पर भी कुछ बच 
रहने की अवरथा या भाव। बचत (सरप्छस) ५ मूल्य की वृद्धि । 
पद---अढ़ती से >अछ-पत्र, राज-ऋण, विनिमय आदि की दर के सबंध 
में अकित या नियत मूल्य की अपेक्षा कुछ अधिक मूल्य पर । 

बढ़ती फसल--स्त्री ० [हि०-+अ०] वह फसल जो अमी खेत में बढ़ 
रही हो, पर अमी पूरी तरह से तैयार न हुई हो। (प्रोइग क्रॉप ) 

बढ़वार|--स्त्री० [हि बाढधार ? ] पत्थर काटने की टॉँकी। 

बढ़न--स्त्री० [हिं० बढ़ना] बढ़ने तथा बढ़े हुए होने की अवस्था या 
मभाव। बढती। वृद्धि 

बढ़ता---अ० [स० वद्धेंन, प्रा० वड़्ढन] १. आकार, क्षेत्र, विस्तार 
व्याप्ति, सीमा आदि में अधिकता या वुद्धि होना। जितना या जैसा 
पहले रहा हो, उससे अधिक होना। जैसे---(क) पेड़-पौधों या बच्चों 
का बढ़ना। (ख) कर्मचारियों की छुट्टियाँ बढ़ना। (ग) दाढ़ी या 
नाखूनों का बढना। २ परिमाण, मात्रा, सख्या आदि में अधिकता 
या वृद्धि होना। जैसे--(क) धर का खरच बढ़ता। (ख़) देश की 
जन-मख्या बढ़ना। (ग) नदी में जल बढ़ना। ३ कार्यक्षेत्र, गुण 
आदि का विस्तार होता। व्याप्ति मे अधिकता या बुद्धि होना। 
जैसे--(क) शक्षगडा-तकरार या बेर-विरोध बढ़ना। (ख) अ्भाव- 
क्षेत्र या व्यापार बढ़ना। ४ तीक्रता, प्रबकूता, बेग, शक्ति आदि में 
अधिकता या वृद्धि होता। जैसे-- (क) किसी चलनेवाली चीज की 
चाल बढ़ना। (ख) रोग या विकार बढ़ना। ५ किसी प्रकार की 
उन्नति या तरक्की होना। जैसे--बहू तो हमारे देखते देखते इतना बड़ा 
है। ६. आगे की ओर चलना या अग्रसर होना। जैसे---(क) आज- 
कल औद्योगिक क्षेत्र मे अवेक पिछडे हुए देश आगे बड़ने लगे है। (ख) 
आकाश में गुडंडी या पतग बढ़ना। (ग) तुम्हारे तो पैर ही नही बढ़ते। 
मुहा०--बढ़ चलनान्‍-(क) उन्नति करना। (ख़) अपनो योग्यता, 
सामर्थ्य आदि से अतिरिक्त आचरण या व्यवहार करना। (ग) अभि- 
मान या ऐड दिखाना। इतरावा। 
७. प्रतियोगिता, होड़ आदि में किसी से आगे होता। जैसे--अब बहु 


& >फेलब। -- 5: २७४७४ ६६:२४०६४-६२ ५४ क ०9० 3०२२३८+ मनन कन बन 


बढ़नी 


कई बातो में तुमस बहुत आगे बढ़ गया है। ८ रोजगार या व्यापार में 
लाभ के रूप में धन प्राप्त होना। जैसे--चलो, इस सौदे मे हजार रुपए 
तो बढ़े, अर्थात्‌ हजार रुपए की आय या लाभ हुआ। ९ कुछ विशिष्ट 
प्रसंगो मे, मगल-मापित के रूप में, कुछ समय के लिए फिसी काम, 
चीज या बात का अन्त या समाप्ति होना। जैसे--(क) किसी स्त्री 
के हाथ की चूडियाँ बढना, अर्थात्‌ उतारी या तोडी जाना। (ख) 
दीया बढ़ना, अर्थात्‌ बुझाया जाना, दूकान बढना अर्थात्‌ कुछ समय 
के लिए बन्द होना। 
*स० बढ़ाना। विस्तृत करता। उदा०--ल्वन सुनत करुना सरिता 
भए बढैयों बसन उम्गी ।--सूर। 

बढ़नी--स्त्री ० [स० वड्धनी, प्रा० बइडढनी] १ झाड़। बुहारी। कूचा। 
माजनी। २ वह अनाज या धन जो किसानो को खेती-बारी आदि के 
काम पर पेशगी दिया जाता और बाद में कुछ बढाकर लिया जाता है। 
सत्री० |हि० बढना] पेशगी। अप्निम। 

बढ़वाना*--स ० [हिं० बढाना का प्रे० ] किसी को कुछ बढाने मे प्रवृत्त 
करना । 

अढ़धारि[--स्त्ती ०--बढती । 

बढ़ाना--स० [हि० बढ़ना का स०| १ किसी को बढ़ने में प्रवृुत्त करना | 
ऐसा काम करना जिससे कुछ या कोई बढे। २ कोई चीज या बात 
का विस्तार करते हुए उसे किसी दूर फे विदु, समय आदि तक ले जाना। 
विस्तार अधिक करना। जैसे---(क ) उपन्यास या कहानी का कथा- 
भाग बढ़ाना। (ख) नौकरी की अवधि या समय बढ़ाना। (ग) घातु 
की पीटकर उसका तार या पत्तर बढाना। ३ परिमाण, मात्रा, सख्या 
आदि में अधिकता या वृद्धि करना। जैसे--(क) किसी चीज की दर 
या भाव बढ़ाना। (ख) किसी का वेतन (या सजा) बडाना। (ग) 
अपनी आमदनी बढ़ाना। ४ किसी प्रकार की व्याप्ति में विस्तार 
करना। जैसे--झगडा या बात बहावा। कार-बार या रोजगार बढ़ाना । 
पद--बढ़ा-सढ़ाकर  (क) इतनी अधिकता करके कि अत्युक्ति के 
क्षेत्र तक, जा पहुंचे। जैसे--बढा-चढाकर किसी की प्रशेसा करना या 
कोई बात कहना। (ख) उत्तेजित या उत्साहित करके। बढावा 
देकर। जैस---किसी को बढ़ा-चढाकर किसी के साथ लड्ड देना। 
५ जो चीज आगे चल या जा रही हो, उसके क्षेत्र, गति आदि में अधि- 
कता या वृद्धि करमा। जैरो--(क) चलने मे कदम या पैर बढाना, 
अर्थात्‌ जल्दा जल्दी पैर रखते हुए चलना। (ख) गुड्डी या पतग बढाना 
अर्थात्‌ उसकी डोर या नख इस प्रकार ढीली करना कि वह दूर तक जा 
पहुंचे। ६ गण, प्रमाव, शक्ति आदि में किसी प्रकार की तीन्नता या 
प्रबछता उत्पन्न करमा। जैसे---(क ) किसी का अधिकार (या मिजाज ) 
बढ़ाना। (ख) अपनी जानकारी या परिचय बढाना। ७ जो चीज 
जहाँ स्थित हो, उसे वहाँ से और आगे बढ़ने में प्रवृत्त करना। जैसे-- 
जलूस या बरात बढाना। ८ प्रतियोगिता आदि में किसी की तुलना 
में आगे ले जाना या श्रेः्ठ बनाना। जैसे--घुड-दौड़ मे घोड़ा आगे 
बढाना। ५ किसी को यथष्ठ उन्नत, सफल या समृद्ध करना। उदा०- 
सूरदास करूणा-निधान प्रभु जुग जुग मगत बढा दो ।-नसूर। १० 
कुछ प्रमगा मे मगल-भाषित के रूप मे, कुछ समय के लिए किसी काम या 
चीज का अन्त या समाप्ति करना। जैसे--(क) चूडियाँ बढ़ाना -: 





५८ वलणिक-पथ 


मम न अल ताक था 2 3 8 ही मन अपन नल व केजन ५ डरकननन 


उतारना या तोडना। (ख) दीया बढ़ानाल्‍-|वुझाना। (ग) दूकान 
बढानाउ-बन्द करना। 
अ० खतमभ या समाप्त होता। बाकी न रह जाना। चुकाना। उदा०-- 
मेघ सबे जल बरखि बढ़ाने विधि गून गये सिराई।--सूर। 

बढ़ा-बढ़ी--स्त्री० [हिं० बढना] १ आचरण, व्यवहार आदि में आव- 
इ्यकता या औचित्य से अधिक आगे बढने की क्रिया या भाव। मर्यादा 
या सीसा का उल्लंघन | जैसे---इस तरह की बढा-बढी ठीक नही है। 
२. प्रतिद्ृद्विता। होड। 

बढ़ार---पु० दे० बडहार'। 

बढ़ालो--स्त्री ० [देश०] कटारी। कटार। 


बढ़ाब--पू ० [हिं० बढ़ना -आब (प्रत्य०)] १. बढ़ने या बढे हुए होने 
की अवस्था या भाव। २ फैलाव। विस्तार। ३ मूल्य आदि की 
वृद्धि। बढती। बाढ़। 


बढ़ाबन--्त्री० [हिं० बढावना] गोबर की टिजिया जो बच्चों की नज़र 
झाडने मे काम आती है। 

बढ़ावना---स ० >-बढ़ाना । 

बढ़ाबा--प्‌ ० [हि० बढाव ] १ आगे बढकर कोई महत्त्वपूर्ण काम करने 
के लिए किसी को दिया जानेवाला प्रोत्साहन। २ प्रोत्साहित करने 
के लिए कही जानेवाली बात। 
क्रि० प्र०---देना। 

बढ़िया--वि० | हिं० बढना ] (पदार्थ) जो गुण, रचना, रूप-रग, सामग्री 
आदि की दृष्टि से उच्च कोटि का हो। उम्दा। जैसे--वढिया कपड़ा, 
बढ़िया चावल, बढ़िया पुस्तक, बढ़िया बात। 
पु० १ गन्ने, अनाज आदि की फसल का एक रोग जिससे कनखे नहीं 
निकलते और बढाव बन्द हो जाता है। २ प्राय डेढ सेर की एक पुरानी 
तौल। ३ एक प्रकार का कोन्‍्हू। 
सत्री० १ एक प्रकार की दाल। २ जलाशयो आदि की बाड़। 

बढ़ियार|--वि० [हिं० बढ़ना] (जलाशय या नदी) जिसमे बाढ़ आई 
हो। जैसे--बढ़ियार गगा। 
सत्री० नदियों आदि में आनेवाली पानी की बाढ़ । 

बढ़ेल--स्त्री० [देश०] हिमालय पर पाई जानेवाली एक प्रकार की 
मेड। 

बढ़ेला--प१ ० [स० वराह | बनेला सूअर। जगली सूअर। 

बढ़ेया --वि० [हिं० बढ़ाना, बढता] १ बढ़ानेबाला। २ उन्नति 
करनेवाला | 
वि० [हि० बढ़ना] बढ़नेवाला। उन्नतिशील। 
पु०-बढई। 

बढ़ोतरी--स्त्री० [हिं० बाढ+उत्तर] १ उत्तरोत्तर होनेवाली वृद्धि। 
बढती। ३ उन्नति। तरक्‍्की। हे व्यापार में होनेवाला लाभ। 

बणिक--7० [स० वणिक | १ वह जो वाणिज्य अर्थात्‌ रोजगार 
या व्यापार करता हो। रोजगारी। व्यवसायी। व्यापारी। २ 
कोई विशिष्ट चीज बेचनेवाला सौदागर। ३ गणित, ज्योतिष में 
छठा करण। 

खणिक-पथ--पु० [स० वरणिक्तथ] १ बाणिज्य। २ व्यापार की 
चीजों की आमदनी। रफ्तनी। ३ व्यापारी। ४. दुकान । ५ तुला राशि। 


बलिक-सार्थ 
बलिक-सार्य--प्‌० [स० वणिक्सार्थ |] दे० ० क्टक'। 
बणिसभंधु--१० [सं० बणिग्बघु] नील का पोधा। 
अणिर्वहू---प१० [सं० वणिग्वड | ऊंट। 
बणिण्वीती--स्त्री० [सं० वणिग्वीधी| बाजार। 
बणिग्वुसि--स्त्री० [स० वणिम्बत्ति] वणिक का पेशा। व्यापार। 
बणिज---प ० --बणिक्‌ | 
बत--स्त्री० [हिं० वात' का सक्षिप्त रूप] हिंदी 'बात' का सक्षिप्त रूप 
जो उसे समस्त पदों के आरम्भ में लगने पर प्राप्त होता है। जैसे-- 
बत-कही, बत-रस। 
सत्री० [अ०] १ बतस्र की जाति की एक मौसिमी चिड़िया जो 
मठमेले रग की होती है। २ बत्तख। 
बतक--स्त्री० [हिं० बत्तत] १ बतख की ग़रदन के आकार की एक 
प्रकार की सुराही जिसमें शराब रखी जाती थी। (राज०) २ बतख 
नाम की चिड़िया। 
बत-कट--वि० [हि० बात+-काटना] १ बात काटने अर्थात्‌ उसकी 
यथार्थता को चुनौती देनेवाला। २ किसी के बोलने के समय बीच मे 
उसे बार-बार टाकनेवाला। उदा०---नस-कट खटिया, बत-कट जोय। 
--बाघ। 
बत-कहाव[--पु० >बत-कही । 
बत-कही--रजी ० [हिं०" बात +कहता] १ साधारणत केवल मन बह- 
लाने या समय बिताने के लिए की जानेवाली इधर-उधर की बात- 
चीत। उदा०--कश्त बत-कही अनुज सन, मन सिय-रूप लुभात।-- 
तुलमी। २ बात-चीत की तरह का बहुत ही तुच्छ या साधारण काम । 
उदा०--दसकघर मारीच बत-कही |---सुलसी। ३ वाद-विवाद। 
कहा-सुनी । तकरार। ४ झूठ-मूठ या मन से गढ़कर कही जाने- 
वाली बात। 
घतख--स्त्री० [अ० बत] हस की जाति की पानी की एक चिड़िया जिसका 
रग सफेद, पे झिल्लीदार और चोच का अग्र माग चिपटा होता है, 
और जिसके अ्ड म्रगी के अडो से कुछ बड़े होते है। 
बत-चल--बि० [हिं० बात +चलाना] बकवादी। बक्‍्की। 
स्त्री ० >वात-बीत। 
ब्रत-छुट--वि० [हिं० बात-+छूटना] बिना सोचे-समझें अच्छी-बुरी 
सब तरह की बातें कह डालनेवाला। 
बत-धर--वि० [हिं० बात-+-स० घर >घारण करनेवार] जो अपनी 
कही हुई बात या दिये हुए वचन का सदा पूरी तरह से पालन करता 
हो। 
बत-बढ़ाबथ--१० [हिं० बात-+बढाव] १ बात बढ़ने अर्थात्‌ झगडा 
खडे होने की अवस्था या भाव। २ छोटी या तुच्छ बात को दिया 
जानेवाला विकट और बिस्तृत रूप। 
बत-बाती|--स्त्री० [हिं० बात] १ बे-सिरपर की बात। बकवाद। 
२ किसी से छेड़-छाड करने या घनिष्ठता बढ़ाने के छिए की जानेवाली 
बात-चीत। उदा०--कछुक अनूठे मिस बनाय ढिग आय करत बत- 
बाती ।---आनन्दधन। 
बतर--वि २:-बदतर | 
बत-रस---१० ([हिं० वात-+रस] बातों से मिलनेवाला आनद। 


अल >न-+ २ नमल+म न +-++- 





घर 





बतासा 








मन “+“++८+5+< वी नननीम- लत 


बत-रसिया--वि० [हिं० बात+रसिया] १ हर बात में रस लेने- 
बारा। २. जिसे बहुत बात-चीत करने का चस्का हो। बातों का 
शौकीन । 

बतरान--स्त्री० [हिं० बतराना] बातचीत । 

बतराना--अ० [हिं० बात+आना (अत्य०)] बातचीत करना। 
उदा०--हम जाने अब बात तिहारी सूधे नहिं बतराति।--सूर। 

बतरातनि|--स्त्री०>बतरान (बात-चीत ) | 

बतरावशि|--स्त्री० [हि बतराना] १ बात-चीत। वार्तालाप। 
उदा०--. ललित क्सोरी' फूल झरनि या मधुर-मघुर बतरावनि। 
--ललित फिशोरी। २ बात-चीत करने का ढंग या प्रकार। 

बतरोहाँ---वि० [हिं० बात] [स्त्री० बतरौही] बहुत बातें करने- 
वाला। 

बतलाना---स ० "बताना । 
अ०--बतराना (बात-चीत करना )। 

बत-बन्हा--१० [देश०] एक तरह की नाव । 

बताना--स० [हिं० बात+ना (प्रत्य०), या स० वदन-कहना] १ 
कोई बात कहकर किसी को कोई जानकारी या परिचय फराना । 
जैसे--तुम्हारी नौकरी लगने की बात मुझे उसी ने बताई थी। २ 
कोई कठिन काम या बात इस प्रकार कर दिखलाना या समझाना कि 
उससे अनजातो का ज्ञान या योग्यता बढे। जैसे--(क) गुरु जी ने 
अभी तुम्हे व्याकरण का विषय नही बताया है। (ख) नौकर ने मालिक 
को खर्च का हिसाब बताया। हे किसी प्रकार का निर्देश या संकेत 
कफरना। जैसे---फिसी की ओर उंगली दिखाकर बताना। ४. माच- 
गाने आदि के प्रसग मे ऐसी मुद्राएं बताना जो गीत के भाव के अनुरूप 
या उनकी स्पष्ट परिचायक हों । जैसे--बहू गाता (या नाचता) तो उतना 
अच्छा नही है, पर मांव बहुत अच्छा बताता है। 
मुहा ०--भाव बताना-- किसी काम या बात के समय स्त्रियों कै से हाव- 
भाव प्रदर्शित करना । 
५ किसी को धमकाते हुए यह आशय प्रकट करना कि हम तुम्हारा 
अमिमान दूर कर देगे या तुम्हारी बुद्धि ठिकाने कर देंगे। जैसे-- 
अच्छा किसी दिन तुम्हे भी बताऊँगा। ६ दिखलाना ! जैसे--बावली 
को आग बताई, उसने ले घर मे लगाई। (कहा० ) 
पु० [स० वर्तक एक धातु] १. हाथ में पहलने का कडा। २ 
वह फटा-पुराना या साघारण कपड़ा जो पगडी बाँधने से पहले यों ही 
सिर पर इसलिए लपेट लिया जाता है कि बालों से पगड़ी गंदी या 
मैली न होने पावे। 

बताशा--प० --बतासा। 

बतास--स्त्री ० [स० बातास] १ वात के प्रकोप के फारण होनेवाला 
गठिया नामक रोग। 
क्रि० प्र०--धरना |--पकड़ना | 
२ वायू। हवा। 

अतासना(---अ० [हिं० बतास] हवा चलना या बहुता। (पूरब) 

बतासफेनी---स्त्री० [हिं० बतासा+फेनी] टिकिया के आकार की एक 
मिठाई। 


अतासा--पु० [हिं० बतास--हबा] १. एक प्रकार की मिठाई जो 


बतीसी 


सीनी की खासनी टपकाकर बनाई जाती है और जो फूठ की तरह फूली 

हुई और बहुत हकूकी होती है। २ एक प्रकार की छोटी आतिशबाजी 

जो मिट्टी के कसोरे मे मसाला रखकर बनाई जाती है। ३ पानी का 

बुलबुला । 

बतासी--रती ० [देद्य०] एक प्रकार की कालापन लिए हुए जैरे रंग 
की चिडिया जिसकी आँख की पुतली गहरी-मूरी, चोच काली और 
पैर लल-छोंह होते हैं। 

बतिया--स्त्री० [स० वकत्तिका, प्रा० वत्तिआ बत्ती] सब्जी के काम में 
आनेवाला कोई छोटा कच्चा ताजा हरा फल । ज॑से---कह या बेगन 
की बतिया। 
4 स्त्री०>बात । 

बतियाना---अ० [हि० बात] बातचीत करना। 

घतियार--स्त्री० [हिं* बात] बातचीत। 

बतीसा--प० [हिं* बत्तीस] [स्त्री० अल्पा० बतीसी] १ बत्तीस 
वस्तुओ का समाहार या समूह। २ बत्तीस दवाओं और मेवों के योग 
से बनाया हुआ लड्डू या हलवा जो प्रसूता को पुष्टि के लिए खिलाया 
जाता है। ३. दाँत से काटने का घाव या चिह्न । 

बलीसी---स्त्री ०--बत्तीसी । 

बतू--पु०--कलाबत्तू । 

बतोला--पु० [हिं० बात +ओला ([प्रत्य०)] १ धोखा देने के उद्देश्य 
से कही जानेवाली बात। २ झाँसा। 
सुहा०--अतोले बनाता-(क) बाते बताना। (ख) मुलावा देना । 

बतौर--अव्य ० [अ०] १ (किसी की) तरह पर । रीति से। तरीके 
पर। २ के सदश। के समान। 

बतोरी--स्त्री० [?] रसौली। 

बतील कुंती--स्त्री० [हिं० बात] कान में बातचीत करने की नकल 
जो बदर करते हैं। (कलदर ) 

बत्त| --्त्री ०--बात | 

बसक---स्त्री ० - -बतक। 

बत्तर--वि०--बदतर। 

बतसरी।---स्त्री ० >बात | 

बत्ता--१० [सं० वरत्तेक] सरकडे के वे मुट्ठे जो छाजन के छप्पर के 
अगले भाग मे बाँघे जाते हैं। 

बलसिस--वि ०“ बत्तीस । 

बस्ती--स्त्री० [स० वत्ति, प्रा० वत्ति] १. प्रकाश के निमित्त जलाया 

जानेवाला सूत, रूई, कपड़े आदि का बटा हुआ लबोतरा लूच्छा जो तेल 

आदि से मरे हुए दीए मे रखा जाता है। 

मुहा ०---बसी चढ़ाना>-शमादान मे मोमबत्ती लगाना। बत्ती जलाना-- 

अंधेरा होने पर प्रकाश के लिए दीपक जलाना। (किसी चीज में) 

बस्ती लगाना >पूरी तरह से नष्ट-म्रष्ट करना। जैसे---वह छाखो 

रुपए फी सपत्ति में बत्ती छगाकर कग्राल हो गया। 

३ दीपक। चिराग। ४ रोशनी। प्रकाश। 

मुहा०--बत्ती दिखाना--प्रकाश दिखाना। 

५. लछपेटा हुआ चीथडा जो किसी वस्तु में आग लगाने के लिए काम में 

लाया जाय। फलीता। पलीता। ६. बत्ती के आकार-प्रकार की कोई 


बदकारी 


गोलाकार लंबी चीज। जैसे---धाव में भरने की बत्ती, लाह की बत्ती। 
७ छाजन मे लगाने का फूस आदि का पूला। ८. कपड़े की वह रूबी 
घज्जी जो घाव मे मवाद साफ करने के लिए भरते हैं। ९ सींक आदि 
पर गध-द्रव्य या ज्वलनशीरू पदार्थ लपेटकर बनाई जानेबाली बत्ती 
जो पूजन आदि के समय जलछाई जाती है। जैसे--अगर-बत्ती, घूप- 
बत्ती, मोमबत्ती। १० पगडी या चीरे का ऐठा या बटा हुआ कपडा। 
११. कपड़े के किनारे का वह माग जो सीने के छिए मरोडकर बसी के 
रूप में लाया जाता है। 

बत्तीस---वि० [स० द्वारविशत, प्रा० बत्तीसा] गिनती या सख्या में जो 
तीस से दो अधिक हो। 
पु० उक्त की सूचक सख्या जो इस प्रकार लिखी जाती (३२) है। 

बसीसा--१० बतीसी। 

बत्तीसी--स्त्री० [हिं? बत्तीस] १ एक ही तरह की बत्तीस चीजों का 
समूह। २. मनुष्य के मुँह के ३२ दाँतो फा समूह । 
मुहा०---बत्तीसी खिलना-मुंह पर स्पष्ट रूप से हँसी दिखाई देना। 
( किसी की) बसीसी झाइना-इतना मारना की सब दाँत टूट जायें। 
बत्तीसो दिखाना निर्ुज्जतापुर्वक हँसना । बसीसो बजना -सरदी 
के कारण दाँतों का कापकर कटकट शब्द करना। 

बत्रीस--वि०, प्‌ ० >बत्तीस। 

यथना --अ० [स० व्यथा] पीडा या दर्द होना। 

बथान|--पु० [स० वास-+ स्थान] १ पशुओं के बाँधे जाने की जगह। 
पशु-शाला। २ गरोह। शुड। 
स्त्री० [हिं० बथना] पीडा। द्दें। 

बधिया--स्त्री० [?] सूखे गोबर का ढेर। 

बयुआ--१० [स० वास्तुक, पा० बात्युआ ] १ मोटे, चिकने हरे रग 
के पत्तोवाला एक पौधा जो १ से ४ हाथ तक ऊंचा होता है तथा गेहूँ 
जौ आदि के खेतो मे अधिक होता है। २. उक्त के परे अथवा उनका 
बना हुआ साग। 

बध्य--स्त्री० [स० वस्तु] चीज़। 

बद--स्त्री ० [स० वर्धन--गिलटी] १ आतंशक या गरमी की बीमारी 
के कारण या यो ही सूजी हुईं जाँघ पर की गिलटी। गोहिया। बाघी। 
२ चौपायों का एक संक्रामक रोग जिसमे उनके मुँह से लार बहती है 
और खुर तथा मुँह मे दाने पड़ जाते है। 
वि० [फा०] [माव० बंदी] १ खराब। बुरा। २. दुराचारी। 
३. दुष्ट। पाजी। 
स्त्री० [हिं० बदना] १ पछटा। बदला। एवज। जेंसे--इसके 
बद में कुछ और दे दो। २ किसी का निश्चित पक्ष। जैसे--हों गाँठ 
रूई हमारी बद की भी खरीद लो, अर्थात्‌ उसके घाटे-नफे के हम जिम्मे- 
दार रहेगे। 

बब-असली--स्त्री० [फा० बद -अ० अमल] राज्य या झासन का 
कुप्रबध। शासनिक अव्यवस्था। अराजकता। 

बतजामी --स्त्री० [फा०] कुप्रबंध। अव्यवस्था । 

बदइंकार--वि० [फा०] [माव० बदकारी] १, बुरा काम करने- 
वाला। कुकर्मी। २ दुराचारी। 

बदकारी--स्त्री० [फा०] १. कुकर्म। २. व्यमिचार। 


बदकिस्मत 


बदकिस्मत -->वि० [फा० बद--अ० किस्मत] बुरी किस्मतवाला। 
फूटे भाग्यवाला। अमागा। 

मवखत--वि० [फा० बदखत) [भाव० बदखती] लिखने में जिसके 
भ्क्षर सुन्दर और स्पष्ट न होते हों। 

बदस्वाह--वि० [फा० बदस्वाह) [भाव० बंदस्वाही] 
चाहनेवाला। २. जो शुमचितक न हों। 

बब-गुमान---वि० [फा०] [साव० बद-गुमानी] जिसके मन मे किसी 
के प्रति बुरी धारणा हो। 

बद-गुमानी--स्त्री० [फा०] किसी के श्रति होनेवाली बुरी धारणा। 

बद-गों--वि० [फा०] [भाव० अद-गोई] १. दूसरो की निन्‍दा या 
बुराई करनेवाला। २ चुगलखोर। ३. गालियाँ बकनेबाला। 

ब्रद-गोई--स्त्री० [फा०] १ किसी के संबंध में बुरी बात कहना। 
निंदा या निदा करने की क्रिया या माव। २. बदनामी । ३ चुगल- 
खोरी। ४. गाली-गलौज। 

बद-खलन---वि० [फा०] [माव० बद-चलनी] १ 
चलनेवाऊला। २. दुश्चरित्र। ३ वेश्यागामी। 

बद-चलनी--स्त्री० [फा०] बद-चलन होने की अवस्था था भाव | 

बद-जवान---वि० [फा० बद-ज़बान] [माव० बद-जवबानी] १ अनु- 
चित, गदी या दूषित बाते करनेवाला। २ गाली-गलौज करनेबाला । 

बदजात--वि० [फा० बद+अ० जात] [माब० बदजाती] अधम | 
नीच । 

बब-समीज---वि० [फा० बद |-तमीज] [माव० बदतमीजी] शिष्टा- 
चार और सलीके का ध्यान न रखते हुए अनुचित आचरण या व्यवहार 
करनेवाला (व्यक्ति) । 

बंद-तमीजी---स्त्री ० [फा० बदतमीज़ी | १ बदतमीज होने की अवस्था 
या भाव। २ शिष्टाचार और सलीके से रहित कोई अश्लोमनीय 
आचरण या व्यवहार। 

बदतर--वि० [फा०] बुरे से बुरा! बहुत बुरा! 

बददिसाग--वि० [फा०+-अ०]) [भाव० बद दिमागी] १ जरा 
सी बात पर बुरा मान जानेवाला (व्यक्ति) । २. अभिमानी। घमडी। 

बद-दिमागी--स्त्री० [फा०+अ०] १ जरा सी बात पर बुरा मानने 
की आदत। २, अहकार। 

बब-दुआ--स्त्री० [फा०--अ०] ऐसी अहित कामना जा दब्दो के द्वारा 
प्रकट की जाय। दाप। 
क्रि० प्र०--देना। 

बवन---१० [फा०] तन। देह। शरीर। 
महा ०---बदन दू टका-शरीर की हड्डियों विशेषत जोडो में पीडा होना । 
अंग अंग में पीड़ा होना। बदन तोड़ना--पीडा के कारण अगो को तानना 
और ख्ीचना। तन-बदन की सुध से रहना--(क) अचेत रहना। 
बेहोश रहना। (ख) इतना ध्यानस्थ रहना कि आस-पास की बालों 
का कुछ भी पता न चले। 
पु० [सं० बदन] मुख। चेहरा। जैसे---गज-वदन। 
सत्री० [हिं० बदना] कोई बात अदने की क्रिया या भाव। बदान। 
उदा०---बदन बदी थी रंग-महर की टूटी मेंडैया मे ल्याइ उतारयो। 
(गीत) 


१. बुराई 


बुरे रास्ते पर 


सबमीयती 


बदन-तौल--स्त्री० [फा० बदन +हिं० तौर] मालखम की एक कसरत 
जिसमें हत्यी करते समय माऊखभ को एक हाथ से रूपेटकर उसी के 
सहारे सारा बदन ठहराते या तौलते हैं। 

अदन-निकाल--पु ० [फा० बदन+हिं० निकालना ]मालखंम की एक कस- 
रत जिसमे मालखभ के पास खड़े होकर दोनों हाथो की कोची बाँधते हैं। 

बद-नसीस---वि० [फा० ! अ०] [भाव० बद-नसीबी ] बुरे नसीबवाला। 
अमागा। 

बद-तसीबी--स्त्री० [फा०] दुर्माग्य। 

अदसा--स० [स०९/ वद्‌--कहना] १ कथन या वर्णन करना। फहना। 
२ बात करना। बोलना। ३ दृढ़ता या नि३चयपूर्वक कोई बात 
कहना । 
पद---बदकर या कह-बबकर - (क) बहुत ही दुढता या मिश्चयपूर्वक 
कहकर। जैसे--वह फह-बदकर कुदती जीतता है। (ख) दृढ़ता- 
पूर्वक आगे बढकर। 
४ प्रमाण के रूप मे मानना। ठीक समझना। सकारना। उदां ०--- 
औरहू न्हायो सु मै न बदी, जब नेह-नदी मे न दी पग-आँगुरी। >-नागरी- 
दास। ५ आपस में नियत, निश्चित या पक्का करना। ठहेराना। 
जैसे---दोनो पहलवानों की कुइती बदी गई है। उदा०--(क) बदन 
बदी थी रग-महरू की टूटी मेंड़ैया मे स्थाइ उतारयो। (ख) अवधि 
बदि सैयाँ अजहूँ न आये।--गीत। ६ किसी प्रकार की प्रतिद्द्विता 
या होड के सबंध में बाजी या दार्त छगाना। जसे--तुम तो बात बात 
में शर्त बदने लगते हो। ७ बड़ा या महत्त्व का मानना। उदा०--- 
हिरदय मे से जाइद्दौं, मरद बदौंगी तोहि। ८ किसी को किसी गिनती 
या लेखे में समझना। ध्यान में लाना। मान्य समझना। जैसे--बह 
तो तुम्हे कुछ भी नही बदता। उदा०--(क) सकति, सनेहु कर 
सुनति करीएं, मैं न बदउंगा माई।--कबीर। (ख्र) बदतु हम कौ 
नेकु नाँही, मरहिँ जो पछिताहि।--सूर। १०. नियत या मुकरंर 
करना । जैसे---किसी को अपना गवाहू बदना। 
अ० पहले से नियत, निश्चित या स्थिर होना। जैसे--जो भाग्य में 
बदा होगा, वही होगा। 

घदनाम--वि० [फा०] [भाव० बदनामी] जिसका बुरा नाम फैला हो, 
अर्थात्‌ कुख्यात । 

बदनामी--स्त्री० [फा०] वह गहित या निन्दनीय छोक-चर्चा जी कोई 
अनुचित या बुरा काम करने पर समाज में विपरीत धारणा फैलने के 
कारण होती है। अपकीति | कुख्याति। लोक-निंदा। (स्कॉडल ) 
क्रि० प्र०--फैलना ।--फैलाना। 

बदसली--वि० [फा०] १. शारीरिक। २ शरीर से उत्पन्न। 
पु० [हिं० बदना] एक तरह का शर्तेनामा जिसके अनुसार किसान 
अपनी फसल बाजार भाव से कुछ सस्ते मूल्य पर महाजन को उससे 
लिए हुए ऋण के बदले में देता है। 

बद-नीयत--वि० [फा० बद+अ० नीयत] [भाव० बद-सीयती] १. 
जिसकी नीयत बुरी हो। जो सदाशय न हो। बुरे साववाला। २. 
छोभी। लालची। ३. बेईमान। 

ववत्तीयती--स्त्री० [फा०+-अ०] १. नीयत बुरी होने की अवस्था 
या भाव। २. लालच। ३. बेईमानी। 


बवनुमा 

बदनसा--फा० [फा० बद - बुरा +नुमा- दिखानेवाला] [साव० बंद- 
नुमाई] जो देखने में कुरूप, महा या भोडा हो। 

बद-परहेज--वि० [फा० बद-परहेज] [भाव० बद-परहेजी] व्यक्ति 
जो ऐसी चीजो का भोग करता हो जो उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकर 
हो और जिनसे उसे वस्तुत परहेज करना चाहिए। 

बब-परहेजी--स्त्री ० [फा० बद-परहेजी ] १ परहेज न करने की अवस्था 
या भाव। बीमार का खाने-पीने में परहेज न करना। २ कुपथ्य 
का भोग। 

बदफेल--वि० [फा० बद [अ० फेल | 
करनेवाला। दुष्कर्मी । 

बबफेली--स्त्री० |फा० वद ' अ० फेली ] १ दुष्कमम। 
के साथ किया जानेवाला सभोग। 

बवबस्त--वि० [फा० बदबख्त] [माव० बदवख्ती] अमागा। 

बदबर्ती--स्त्री : [फा० बदबस्ती] अमागापन। 

बद-बला--स्त्री० [फा०] चुडठ। डाइन। 
वि० १ चुईल या डाइन की तरह का। २ दुष्ट। ३ उपद्रबी। 

बद-बाछ---१० [फा० बद- हि० बाछ] वेईमानी या अनुचित रूप से 
प्राप्त किया जानेवाला हिस्सा। 

बदबू--स्त्री० [फा०| बुरी गध या दुर्गन्ध। 
क्रि० प्र०--आना |- -उठना | --निकलना ।- -फैलना । 

बदबदार--वि० [फा०] जिसमे से बुरी बास निकल रही हो। दुर्गन्ध- 
युक्त । 

बद-सजगी--रत्री० [फा० वबदमजगी | 'बद-मजा' होने की अवस्था 
या भाव। 

बद-सजा--वि० [फा० बदमजा ] [ माव० बद-मजगी ] १ (वस्तु) जिसका 
मज़ा अर्थात्‌ स्वाद बुरा हो। २ (स्थिति आदि) जिसके रग में मग 
पड गया हो फलत जिसमे पूरा पूरा आनद न मिल सका हो। 





([भाव० बद-फंली | दुष्कर्म 


२ पस्-्तरी 


बद-मस्त--वि० [फा०| [माव० बदमस्ती] १ मदोन्‍्मत्त। २ 
कामोन्मत्त। 

बबमस्ती--स्त्री० [फा०] १ बद-मस्त होने की अवस्था या माव। 
२ नशा। 


बदसाधा--वि० [फा० बद |-अ० मआश जीविका] [माव० बदमाशी ] 
१ जिसकी जीविका बुरे कामों से चलती हो। २ बुरे और निक्ृष्ट 
काम करनेवाला। दृबुंतत ३ कुपथंगामी। बदचलन। ४. गुडा 
और लक्चा। 

बदप्ताशी--स्त्री० [फा० बद+-अ० मआशी] १ बदमाश होने की 
अवस्था या भाव। २ बदमाश का कोई कार्ये। ३, कोई ऐसा कार्य 
जो लडाई-झगडा कराने अथवा किसी के अहित के उद्देश्य से जानबूझकर 
किया जाय। ४ व्यभिचार। 

बव-मिजाज--वि० [फा० बदमिज़ाज] [माव० बद-मिजाजी ] (व्यक्ति) 
जो चिड़चिडे स्वमाव का हो। 

बद-मिजाजी--स्त्री० [फा० बद | मिज़ाजी] बुरा स्वभाव। चिड- 
चिड़ापन । 

अवरग--वि० [फा०] १ बरे रगवारला। २ जिसका रग उड़ गया 
हो या फीका पड़ गया हो। ३ विवर्ण। ४ खराब। खोटा। ५ 


बदरीबण 


-+>रमननन 





५ >न++- नानी निभा ज-++ लनण-+ कक लिन नीता ।+६हवेे 5 


(ताज के खेल में वह व्यक्ति) जिसके पास किसी विशिष्ट रंग का पत्ता 
नहो। 
१० १ बदरगी। २ चौसर के खेल मे, बहू गोटी जो रग न हुई हो; 
अर्थात्‌ पूगनेवाले घर मे न गहँची हो। 

बदरंगी--स्त्री० [फा०] १ रंग का फीकापन या भद्ापनत। २ ताश 
के खेल मे किसी विशिष्ट रग के पत्ते न होने की स्थिति। 

बबर---१० [सं०५/बद्‌ (स्थिर होता) | अरब] १. बेर का पेड या फल । 
२ कपास। ३. बिनौला। 
क्रि० वि० [फा०] दरवाजे पर। जैसे--दर-बदर भीख माँगनता। 
मुहा०--(किसी को) बदर करता घर से निकालकर दरवाजे के 
बाहर कर देना। जैसे--किसी को शहर बदर करता अर्थात्‌ इसलिए 
दरवाजे तक पहुँचा देना कि वह जहाँ चाहे चला जाय, परन्तु लौटकर 
न आवे। (किसी के नाम) बदर निकालमा”-किसी के जिम्मे 
रकम बाकी निकालना। किसी के हिसाब से उसके नाम बाकी 
बताना । 

बबर-नवीसी--स्त्री० [फा०] १. हिसाव-किताब की जाँच। २. 
हिसाब-किताब में से गड़बड़ रकमे छांटकर अछग करना । 

बदरा--स्त्री० [स० बदर +टाप्‌ू] वराह क्राति का पोधा। 
प०७-बादल (मेघ)। 

बदराई[---सत्री ० 5बदली (आकाश की मेघाच्छन्नता)। 

अदरासलक--प० [स० उपमि० स०] पानी आमला। 

बद-राह--वि० [फा०] १ बुरे रास्ते पर चलनेवाला। कुमार्गी। 
२ दुष्ट। पाजी। 

बवदरि--१० [स०९/बद्‌ (स्थिर होना)+अरि, बा०] १ बेर का पेड़। 
२ उक्त पेड का फल। 

बदरिका--स्त्री० [स० बदरी+कन्‌ +, ठापू, हृस्व] १. बेर का पेड़ 
और उसका फल। बदरि। २ गगा का उदगम-स्थान तथा उसके 
आस-पास का क्षेत्र। 

बदरिकाश्रम--पु० [स० बदरिका-आश्रम, मध्य० स० | उत्तर प्रदेश के 
गढ़वाल जिले के अन्तर्गत एक प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल जहाँ किसी समय नर- 
नारायण ऋषियों ने तपस्या की थी। 

बदरी--स्त्री० [स० बदर+डीष्‌] बेर का पेड और उसका फछ। 
ब॒दरि। 


(स्त्री ० >-बदली | 
सत्री० [देश०] १ थैली। २ बोझ ३ माह का बाहर भेजा 
जाना । 


बवरीरछद--पु० |स० ब० स०] एक तरह का यघ द्रव्य । 

बदरी-ताथ--पु० [स० प० त*] १ बदरिकाश्रम नाम का तीथें। 
२ उक्त तीर्थ के देवता या उनकी मूर्ति। 

बदरी-तारायण--पु० [स० ष० त०] बदरी-ताथ। 

बदरी-पत्रक--१० [स० ब० स०, +कन्‌ | एक प्रकार का सुगन्ध द्रथ्य। 
नखरी। 

बवरीफला--स्त्री० [स० ब॒० स०] नील शेफालिका का वक्ष और उसका 
फल । 

बवरीयण--प्‌ ० <बदरीवन। 


बदरी-शन 





बबरी-धन--पू० [स० ध० त०] १. वह स्थान जहाँ बेर के बहुत से 

पेड हैं। २. बदरिकाश्रम। 

बदरम--प० [?] पत्थर या लकडी में की जानेवाली एक प्रकार की 
जारीदार नवकाक्षी जिसमें बहुत से कोने होते हैं । 

बदरोब--वि० [फा०-+अ०] [भाव० बदरोबी] १. जिसका रोब 
होना तो चाहिए, फिर भी कुछ रोब न हो। २ तुच्छ। ३ 
भहा। 

बवरोह--वि० [फा० बदरी] बदचलन। बदराहू। 
१० [हिं० बादर] आकाद्ा में छाये हुए हलके बादल। 

बदरौमक--वि० [फा० बदरौनक] १ जिसमे कोई शोमा न हो। 
श्री-हीन। २ उजाड़। 

बदलछ---प० [अ०] १ बदलने की क्रिया या भाव । २ बदले मे दी 
हुई बस्तु। ३ पलटा। प्रतिकार। ४ क्षतिपूर्ति। 
पु० [हिं० बदलना] बदले हुए होने की अवस्था या भाव। 

बद-रलूगास--वि० [फा०] जिसके मुँह मे लगाम न हो; अर्थात्‌ जिसे 
मभल्ता-बुरा कहने मे सकोच न हो। मुँहजोर। मुंहफट। 

बवलना--अ ० | अ० बदछ->परिवर्तन-+ ना (प्रत्य ०) ] १. किसी चीज या 
बात का अपना पुराना रूप छोडकर नया रूप घारण करना। एक दशा 
या रूप से दूसरी दशा या रूप में आना या होना। जैसे--ऋतु बदलना, 
रग बदलना, स्वभाव बदलना। २ किसी चीज, बात या व्यक्ति का 
स्थान किसी दूसरी चीज, बात या व्यक्ति को प्राप्त होना। जैसे-- 
(क) इस महीने से कई गाडियो का समय बदल गया है। (ल) जिले 
के कई अधिकारी बदल गये है। (ग) कल सभा मे हमारा छाता (या 
जूता) किसी से बदल गया था। ३ आकार-प्रकार, गुण-धर्म, रूप- 
रग आदि के विचार से और का और, अथवा पहले से बिलकुल भिन्न हो 
जाना। जैसे (क) इतने दिनों तक पहाड़ पर (या विदेश मे) रहने 
से उसकी धाकल ही बिऊूकुल बदऊू गई है। 
सयो० क्रि०--जाना | 
स० १ जो कुछ पहले से हो अथवा चछा आ रहा हो, उसे हटाकर उसके 
स्थान पर कुछ और करना, रखना या छलाना। जैसे---(क) कपड़े 
बदलना अर्थात पुराने या मेले कपडे उतारकर नये या साफ कपडे पहनना। 
(ख) नौकर, पहरेदार या रसोइया बदलना, अर्थात्‌ पुराने को हटाकर 
नया रखना। २ जो कुछ पहले से हो, उसे छोडकर उसके स्थान पर 
दूसरा प्रहण करता। जसे--(क) उन्होंने अपना पहलेबाला मकान 
बदल दिया है। (ख) रास्ते मे दो जगह गाडी बदलती पड़ती है। ३ 
अपनी कोई चीज किसी को देकर उसके स्थान पर उससे दूसरी चीज 
लेना। विनिमय करता। जैसे--हमने दुकातदार से अपनी कलम 
(या किताब) बदल छी है। 
सवो० क्रिए---डालना ।--देना ।--लैना । 
४ किसी के आकार-प्रकार, गुण-धर्म, रंग-रूप आदि में कोई तात्त्विक 
या महत्वपूर्ण परिवर्तत करना। जैसे--(क) उन्होंने मकान की मर- 
म्मत क्या कराई है, उसकी शबल ही बिलकुल बदल दी है। (ख) 
विद्रोहियो ने एक ही दिन में देशा का सारा शासन बदल दिया। (ग) 
अब मैने अपना पुराना विचार क्दरू दिया है। 
सयो० क्रि०->डाऊना “देना । 


बदखौबल 








बदलवाना--स० [हि० बदलना का प्रे०| बदलने का काम दूसरे से 
कराना। 

बदला--पु० [अ० बदर, हि० बदलना] १. बदलने की क्रिया, भाव 
या व्यापार । २. वह अवस्था जिसमे एक चीज देकर उसके स्थान 
पर दूसरी चीज ली जाती है। आदान-प्रदान । विनिमय। जैसे--- 
किसी की घडी (या छडी ) से अपनी घडी (या छड़ी ) का बदला करना। 
३ किसी की कोई क्षति या हानि हो जाने पर उसकी पूर्ति के लिए 
दिया जानेवाला घन या कोई चीज। क्षति-पूति । जैसे---बदि आपकी 
पुस्तक मुझसे खो जायगी, तो मै उसका बदला आपको दे दूँगा। 
पद--बदले या बदले सें--रिकत स्थान की पूति के लिए। किसी के 
स्थान पर। जैसे--हमारी जो कलम उनसे टूट गई थी, उसके बदले 
(या बदले मे) उन्होंने महू नई कलम मेज दी है। 
४ किसी ने जँसा व्यवहार क्रिया हो, उसके साथ किया जानेवाला वैसा 
ही व्यवहार । प्रतिकार। पलटा । जैसे--सज्जन पुरुष बुराई का बदला 
भी मलाई से ही देते हैं। ५ जिससे जैसी हानि पहुँचाई हो, उसे 
भी अपने सतोधार्थ बैसी ही हानि पहुँचाने की भावना, अथवा पहुँचाई 
जानेवाली वैसी ही हानि। 
मुहा०-- (किसी से) बदला चकाना या लेना >जिसने जँसी हानि पहुँ- 
चाई हो, उसे भी वेसी ही हानि पहुँचाना। अपने मनसस्‍्तोंष के लिए 
किसी के साथ वैसा ही बुरा व्यवहार करना जैसा पहुले उसने किया हो। 
जैसे--मले ही आज उन्होने मुझ पर झूठा अभियोग लगाया हो, पर मैं 
भी किसी दिन उनसे इसका बदला लेकर रहूँगा। 
६ किसी काम या बात से प्राप्त होनेवाला अ्रतिफल। किसी काम या 
बात का वहू परिणाम जां प्राप्त हो या मोगता। पडे। जैसे--तुम्हे भी 
किसी न किसी दिन इसका बदला मिलकर रहेगा। 
क्ि० प्र०--देना ।--पाना ।--मिलना । 
७ वह धन या और कोई जीज जो किसी को कोई काम करने पर उमे 
प्रसन्न या सयुष्ट करने के लिए दिया जावथ। एबज। मुआवजा। जैवे-- 
उनकी सेवाओं का बदला यह सामान्य पुरण्कार नहीं हो सकता। 

बदलाई--स्त्री० [हिं? बदलना+आई (प्रत्य०)]) १ बदलन की 
क्रिया या माव। अदल-बदल। विनिमय। २ बदले में ली या दी 
जानेवाली चीज। ३ बदलने के लिए बदले में दिया जानेवाला घन। 
४ अपकार, हानि आदि करने पर किसी की की जानेवाली क्षत्ि-पूर्ति। 

बदलाना--स ० बदलवाता। 

]अ० बदलता (बदला जाना)। 

बबली--स्त्री० [अ० बदल | ई (प्रत्य०)] १ बदले हुए होने की अव- 
सथा या भाव। २ किसी सवा के कमजारी को एक स्थान से हटाकर 
दूसरे स्थान पर मेजा जाना। तबादरा। स्थानातरण। (ट्रानस्फर) 
स्त्री० [हिण् बादल] १ छोटा बादक। २. आकाश में बादलों के 
छागे हुए होने की अवस्था या भाव। 
4 स्त्री०-- बदरी (बेर का फल)। उदा०--मली विधि हो बदली 
मुख लावे ।--केदाव। 

बदलछोअल--स्मती ० [हि बदलना] १ अदल-बदल करने की किया 
या माव। २. बदल जाने की अवस्था या भाव। 

बदलो वल---स्त्री ० - बदलौअल। 


बवब-इ(कल 


्ब्र + जन + ननज+-+ ऑअओिीआ ऑन अनिल नाता 7 ४४ 5 


बद-शक्षल--वि० [फा० बदशक्ल] [माब० बदशकली] बुरी और 
मह्दी शक्‍लू-सूरत का । कुंूप। बेडौल। 

बददऊर--वि० [फा० बंद +-अ० शऊर] [माव० बदशुअरी ] १ जो 
ठीक ढग से तथा शिष्टतापूर्वक कोई काम करना न जानता हो। 
२ बदतमीज। रे मुख । 

बबशुगूल--वि० [फा०] १ अशुभ। २ मनहस। 

बददागूनी--रत्री० [फा०] शगन का खराब होता । 

बदसलीका -- वि० [फ।० बंद । अ० सलीक ] १ बदशुकऊर। २ बदतसीज। 

बवसलूकी---स्त्री०, [फा० बद ;अ० सलूक] बुरा व्यवहार। अशिप्ट 
व्यवहार । 

बदसुरत--वि० [फा० बद +अ० सूरत] [भाव० बद-सूरती] भद्दी 
सूरतथाला । कुरूप । बेडील। 

बबसूरती--रत्री ० [फा० बद +अ० सूरती] बद-सू रत होने की अवस्था 
या भाव। 

ब-दस्त--अव्य० [फा०] किसी के हाथ से या द्वारा। मारफत। हस्ते। 

बदस्त्र--अध्य० [फा०] १ जिस प्रकार पहले से होता आया हो, 
उसी प्रकार। ९ जिस रूप में पहले रहा हो, उसी रूप मे। बिना किसी 
परिवर्तन या हेर-फेर के। यथापूर्व । यथावत्‌। 

बवहुद्धघो--रत्री० [फा० बद | अ० हस्मी] १ खाई हुई चीज हजम 
न हाने की अवस्था या भाव। अजीण। अपच। २ वह स्थिति 
जिसमे कोई चीज या बात ठीक तरह से नियज्रित न रखी जा सके, 
और अनावश्यव रूप में प्रदर्शित की जाय। जैसे---अक्छ या दौलत की 
बद-हजमी । 

बदहवास- वि० [फा० +अ०] [भाव० बद-हवासी] १ जिसके 
होगा-हलाश ठिकाने न ह। बौखलाया हुआ। २ उद्धिग्न। विकलू । 
३ अचेत। बहोंग। 

बद-हाल--वि० [फा० |अ०] [माव० बद-हाली) १ दु्दशाग्रस्त । 
२ राग से आक्रात और पीडित । ३ कंगारू । 

बवान--स्त्री० [हिं० बदना |-आम (प्रत्य०)) १ बदने की क्रिया 
या भाव। २ वाजी या शर्त का बदा जाना। 
अव्य ० १ जप से। बाजी छगाकर। २ दृढताएूर्वक प्रतिज्ञा करते हुए । 

बदा-बदी--स्ञो ० [हिं० बदना] १ ऐसी स्थिति जिसमे दोनों पक्ष 
एक दूसर से आगे निकलना अथवा एक दूसरे को नीचा दिखाना चाहते 
हा। ४ द० बदान। 
क्रि० वि० कहु-वदकर। उदा०-- बदा-बदी ज्यों लेत हैं ए बदरा 
बदराह [--बिह।री । 

बअदास--प्‌ ० >वादाम । 

बंवासा--वि० [फा०] बादाम के आकार-अ्रकार का । अड़ाकार। 
(भोवछ ) 

बदामो - -प० [हि बादाम ] कौडियाले की जाति का एक प्रकार का पक्षी । 
वि० बादाम के रग का । बादामी। 

बदि--रत्री 6 [स० वर्त्त -पलटा] किसी काम यथा बात का बदला चुकाने 

के छिए फिया जानेवाऊझा काम या बात। बदलछा। 

अव्य० १ किसो काम या बात के पलटे या बदले मे । २ किसी की 

खातिर में। ३ लिए। वास्ते। 


हे बढ़कोष्ठ 








 स्त्री० >बदी (कृष्ण पक्ष )। 

बदी--स्त्री ० [स० बहुल में का ब+दिवस मे का दिल्‍्ण्बदि] चादर मास का 
कृष्ण पक्ष । अंधेरा पाख। सुदी' का विपर्याय। जैसे---भादों बदीअष्टमी । 
सत्री० [फा०] १. बद अर्थात्‌ बुरे होने की अवस्था या भाव । खराबी। 
बुराई। 
पद--नेकी-बदी +- (क) उपकार और अपकार। भलाई और बुराई। 
(ख) धर-गृहस्थी में होनेवालिे शुभ और अशुभ काम या घटनाएँ। 
(बिवाह, मृत्यु आदि) । जैसे---वह नेकी-बदी मे सबका साथ देते (या 
सबके यहाँ आते जाते ) है। 
२ किसी का किया जानेवाला अपकार या अहित। जैसे--उन्होंने 
तुम्हारे साथ कोई बदी तो नही की है। 
३ किसी की अनुपस्थिति मे की जानेवाली उसकी निदा। 

बदीत--वि० [स॒० विदित] प्रसिद्ध। मशहूर। उदा०--जगत बंदीत 
करी मन-मोहना ।--मीराँ । 

बदूख|---स्त्री ०>-अदूक । 

बबूर (ल)[-- पु० >न्बावल । 

बदे--अव्य ० [ह6ि० बदपक्ष] वास्ते। लिए। खातिर। (पूरब) 
उदा०--भेवरू छयल बा दूध में खाजा तोरे बदे ।--तेगअली । 
पु० वह मुल्य जिसमे दलाली की रकम भी सम्मिलित हो। (दलाल) 

बदौलत--अव्य० [फा० ब०--अ० दौलत] १ कृपापूर्ण अवजब या 
सहारे से । जैसे--उन्हे यहू नौकरी आपकी ही बदौलत मिली थी। 
२ कारण या वजह से ! 

बहुर|---१ ० बादल । 

बहुल [--१ ०--बादल । 

बहु--पु० [अ० बदू | अरब की एक असम्य खानाबदाण जाति। 
वि० [फा० बद | >बदनाम | 

बद्ध--वि० [स०५%/बध्‌+क्त] १ जो बँधा हो या बाँधा गया हो। 
जकड़ा या बंधन में पडा हुआ। २ जो किसी प्रकार के घेरे मे ह.। 
जैसे--सीमा-बद्ध। ३े जिस पर कोई प्रतिबध या रुकावट लगी हा। 
जैसे--नियम-बढ्ध, प्रतिज्ञा-बद्ध। ४ जो किसी प्रकार निर्धारित या 
निश्चित किया गया हो। जैसे--आम्ा-बद्ध। ६ अच्छी तरह जमाया 
या बठा हुआ। स्थित । जैसे--पक्ति-बद्ध। ६ जो पकड़कर कही 
रोक रखा गया है। जैसे--काराबद्ध। ७ किसी के साथ जुड़ा, 
लगा या सटा हुआ। जैसे--कर-बद्ध । ८ कुछ विशिष्ट नियमा के 
अनुसार किसी निश्चित और विशिष्ट रूप में छाया या रचा हुआ । 
जैसे---छदीबद्ध, भाषा-बद्ध। ९ उलक्ा या फंसा हुआ। जैसे-- 
प्रेम-बद्ध, मोह-बद्ध। १० जिसकी गति, मार्ग या प्रवाह रुका हुआ हो। 
जैसे--कोष्ठ-बद्ध । ११ धामिक क्षेत्र मे, जो सासारिक बधना या 
मोह-माया में पडा हो। मुक्त का विपर्याय । 

बद्धक -“-वि० [स० बद्ध+कन्‌ | जो बाघ या पकडकर मँगाया गया हो। 
पू० बेंधुआ। कदी। 

बद्ध-कक्ष--वि० [स० ब० स०] बद्ध-परिकर । तैयार। प्रस्तुत) 

बदुकोप्ठ--पु० [स० ब० स०] पाखाना कम या न होने का रोग। 
कब्ज । कब्ज़ियत । 
वि० जिसे उक्त रोग हुआ हो । कब्ज से पीड़ित । 


अद्ष-कोष्ठता 


बड़-कोच्ठता--स्त्री० [सं० बद्ध-कोष्ठ+-तलछू, टापू] वह स्थिति जिसमे 
पाखाना कम या न होता हो। कब्जियत। 

बद्ध-गुब--पु० [सं० ब० स०] आँतों मे मल अवरुद्ध होने का रोग। 

बद्ध-मुदोवर--पु० [सं० ब० स०] पेट का एक रोग जिसमे हृदय और 
नाभि के बीच में पेट कुछ बढ़ आता है और जिसके फलस्वरूप मल 
रुक-रकक र और थोडा-थोड़ा निकलता है। 

बड़-प्रह --वि० [सं० ब० स०] हठी। 

अद्भू-लिस ---वि० [सं० ब० स०] जिसका मन किसी वस्सु या विषय पर 
जमा हो। एकाग्र। 

बद्ध जिहुब--वि० [सं० ब० स० ] जो चुप्पी साथे हो। मौन। 

बद्ध-दुष्टि--वि० [सं० ब० स० ] जिसकी दृष्टि किसी पर जमी या छगी हो । 

बद्ध-परिफर--वि० [सं० ब० स० ]जो कमर बाँधे हुए कोई काम करने के 
लिए तैयार हो। उद्ृत । तत्पर । 

बद्ध-प्रतिश --वि० [सं० थ० स०] प्रतिज्ञा से बेंघा हुआ। वचन-बद्ध। 

बड्ध-फल--पूं० [स० ब० स०] करज । 

बद्ध-भूमसि--स्त्री० [स० कर्म ० स०] १ मकान बनाने के लिए ठीक की 
हुई भूमि। २. मकान का पक्का फ्ो । 

बद्ध-मुष्टि---वि० [सं० ब० स०] १ जिसकी मुट्ठी बँघी रहती हो; 
अर्थात्‌ जो निर्धनो को भिक्षा, ब्राह्मणों को दान आदि न देता हो। 
२ बहुत कम खरच करनेवाला | कजूस। 

बद्ध-मूल---वि० [सं० ब० स०] १. जिसने जड पकड़ ली हो। ३ जो 
मलत दृढ़ और अठल हो गया ही। 

बद्ध-मौन--वि० [स० ब० स०] चुप्प। मौन। 

चद्ध-रसाल---पु० [स० कर्म० स०] एक प्रकार का बढ़िया आम । 

बद्ध-राग--वि० [स० ब० स०] किसी प्रकार के राग या प्रेम में बंधा 
हुआ। अनुरकत । 

बद्ध-व्चेस--वि० [स० ब० स०] मल-रोधक । कब्जियत करनेवाला । 

बद्ध-बाकू---वि० [सं० ब० स०] वचन-बद्ध । 

बद्ध-वेर--वि० [स० ब० स०] जिसके मन में किसी के प्रति पक्का 
बैर हो। 

बद्ध-शिक्ष--वि० [स० ब० स०] १ जिसकी शिखा या चोटी बेंधी हुई 
ही। २ अल्पवयस्क। 
पु० छोटा बच्चा। शिशु । 

बद्ध-शिजा--स्त्री० [स० बद्ध-शिख+टाप] भूस्यामलूकी। 

घद़-तुतक ---पु० [सं० कर्म० स०] रसेहवर दर्शन के अनुसार पारा जो 
अक्षत, लघुद्रावी, तेजोविधिष्ट, लिर्मेल और गुरु कहा गया है । 

बद्ध-स्नेह--वि० [स० ब० स०] किसी के स्नेह में बँधा हुआ । 
अनुरकत । आसकक्‍त । 

बद्धांजलि--वि० [ सं० बद्ध-अजलि, ब० स० ] सम्मान-प्रदर्शन के लिए 
जिसने हाथ जोड़े हों। कर-बद्ध । 

बद्धानुराणय---वि० [स० बद्ध-अनुराम, ब० स० ] -5आसकक्‍त। 

बद्धी---स्त्री० [स० बद्ध+हिं० ई (प्रत्य०)] १ वह जिससे कुछ कसा या 
बाँधा जाय। जैसे--डोरी, तस्मा, फीता आदि । २ माछा या सिकड़ी 
के आकार का चार लड़ों का एक गहना जिसकी दो छड़ें तो गले मे होती 
हैं और दो लड़ें दोनों कंधों पर से जनेऊ की तरह बाँहो के नीचे होती 

४-९ 





-..+>>>-++लत+--०--+++ै हे किल्लत ल॑ज+- “जलन कल, अनन नन ताल 


अधायता 


७» अत जन “«नन तनमन ननलन-++बनपननन+५+नकनननननननननना नि कान, लननपनानमनगनिनिनानटशिनान कम 


हुई छाती और पीठ तक छटकी रहती हैं। ३२ किसी लबी चीज की 
चोट से शरीर पर पड़नेवाला छबा चिह्न या निशान । साँट। जैसे--बेंत 
की मार से शरीर पर बढ़ियाँ पड़ना । 
कि० प्र ०--पढ़ता। 
बढ़ोदर--पु० [स० बद्ध-उदर, ब० स० ] बद्ध-गुदोदर रोग । बद्ध-कोष्ठ । 
बध--पु० न्व्यध । 
पैस्त्री०च्यढ़ती (अधिकता) । 
बधइया(--स्त्री ० वन्वधाई । 
बध-गराड़ी--स्त्री ० [ हिं० बाध+गराड़ी ) रस्सी बटने का एक उपकरण। 
बघता---स० [स० वधू+हिं०ना (प्रत्य०) ] बषया हत्या करना। सार 
डालना । 
पुं० [स० वर्धत] मुसलमानों का एक तरह का टोटीदार लोदा। 
पूं० [देश० ] लाख की चूडियाँ बनानेवालो का एक औजार | 
बध-सूसि--स्त्री० [स० वध-मूमि ] १. वध करने का नियत स्थान। 
२ वह स्थान जहाँ अपराधियों को प्राण-दड दिया जाता ही। 
अ्रधवा(---प० १ल्‍व्वधावा। २ दे० बधाई । 
बधाई--स्त्री० [स० वड़ंत, प० वधनाल्चढ़ना] १ बढ़ने की 
अवस्था, क्रिया या भाव। बढ़ती। वुद्धि। २ किसी की उन्नति मा 
भाग्योदय होने अथवा किसी के यहाँ कोई मांगलिक अथवा शुभ कार्य होने 
पर प्रसन्नतापूर्वक उसका किया जानेवाल़्ा अभिनदन और उसके प्रति 
प्रकट की जानेवाली छशुभ-कामना । यह कहना कि हम आपके अमृक 
अच्छे काम या बात से बहुत प्रसन्न हुए हैं, और आपकी इसी प्रकार की 
उन्नति या वृद्धि की हादिक कामना करते हैं। मुबारकबाद । (कांग्रै- 
चुलेशनस्‌ ) जैसे--किसी के यहाँ पुत्र का जम्म या विवाह होने पर या 
किसी के प्रतिष्ठित पद पर पहुँचने अथवा कोई बहुत बडा काम करने या 
सफल-मनोरथ होने पर उसे बधाई देना । 
क्रि० प्र०--देसा ।--मिलना । 
३, घर मे पुत्र जन्म, विवाह आदि शुभ कृत्यो के अवसर पर होनेवाला 
आनद-मगलछ या उसके उपलक्ष में होनेवाला उत्सव । ४ उक्त अवसरों 
पर होनेवाले नृत्य, गीत आदि । 
कि० प्र०--गाना ।--बजना ।--बजाना । 
५ वह उपहार या धन जो उक्त प्रकार के आनंदमय अवसरो पर अपने 
आश्वितो, छोटो या निकटस्थ सबंधियों को अपनी प्रसन्नता के प्रतीक 
के रूप में दिया या बाँटा जाता है। जैसे--उन्होंने अपने सबधियों को 
दो दो रुपए बधाई के दिये है। 
क्ि० प्र ०--देना ।--बाँटना । 
बधाऊ[--१ ०-१. बधाई। २-बधावा। 
वधाना--स ० [हि० बधना का प्रें०] बधने या हत्या करने का काम 
दूसरे से कराना । 
(अ० [हिं० बधिया] (बेल आदि का) बधिया किया 
पस०5च्बटाना। 
बधाया--7० [हिं० बधाई] १ बधाई। २ बधावा। 
बधाधड़ा।--१ ० नच्बधावा । 
बधघावना[--स ० व्यधाना । 
पु० दे० बघाई । 


जाना । 


बअधावा 


बधावया--प्‌० [हि० बधाई] १ बधाई। २ शुभ अवसर पर होनेवाला 
आनन्दीत्मव या गाना-बजाना । 
क्रि० प्र०--बजना । 
३ वह उपहार या भेट जो गाजे-बाजे के साथ कुछ विशिष्ट मागलिक 
अवमसरा पर सबधियों के यहाँ भेजी जाती है। ४ इस प्रकार उपहार 
ले जानेवाले लोग। 

बधिक--प्‌० [स० घातक | १ बध करने या मार डालनेवाला । हत्यारा। 
२ वह जो अपराधियों के प्राण लेता हो। फाँसी देने या सिर काटने- 
बाला | जल्लाद। ३ व्याध । बहेलिया। 

बघधिया--वि० [हि० बध >मारता] (बह बैल या कोई नर पशु) जिसका 
अडकोश कुचछ या निकाल लिया गया हो और फलत उसे पड कर 
दिया गया हो। नप्सक किया हुआ चौपाया। खस्सी। आख्ता। 
आँड' का विपर्याय। 
प्‌ ० उक्त प्रकार का बैल जिस पर प्राय बोझ लादकर ले जाते है। 
समुहा०--बधिया बैठना - इतना अधिक घाटा होना कि कारबार बद 
हो जाय। 
पपु० [”] एक प्रकार का गन्ना । 

बधियाना--स ० [हि० बधिया] कुछ विशिष्ट नर पशुओ का शल्य से 
अडकोश निकालकर उन्हे बधिया करना। बधिया बनाना । 

बधिर--प्‌ ० [स०९/बन्ध्‌ (बाधना ) +किरच्‌, न-छोप ] [भाव० बधिरता | 
जिसमें सुनने की शक्ति न हो या न रह गई हो । बहरा । 

बधिरता--स्त्री० [स० बधिर+तल » ,टाप्‌ ] श्रवण-शक्ति का अभाव । 
बहरापन । बधिर होने की अवस्था या भाव | 

बर्धापित --भू ० कृ० [स० बधिर +-क्विप्‌ “बत] बहरा किया या बनाया 
हुआ । 

बधिरिसा (मन्‌)--स्त्री० |स० बधिर |-इमनिच्‌ ] बधिरता । बहरापन। 

बधू--स्त्री० [स०५ बन्ध्‌ (बाँधना) । ऊ, न लोप] वधू। 

बधूक- -प्‌ ० “बधूक । 

बधूटी--स्त्री० [ स० बधू |टि ।डीप] !ै१ पुत्र की स्त्री। पतोहू । 
२ सौभाग्यवती स्त्री। ३. नई ब्याही हुई स्त्री ! 

बधूरा--१० - बगुला (बवडर ) | 

बधेया--स्त्री ० - बधाई । 

बध्य--वि० [स० वध्य] १ जिसे बध किया जा सके या जो वध किये 
जाने को हो। « बध किये या मारे जाने के योग्य । 

बन--१० |स० वन] १ वह पर्वतीय या मैदानी क्षेत्र जिसमे न तो मनुष्य 
रहते हो और न जिसमे खेती-बारी होती हो, बल्कि जिसमे प्रकृति-प्रदत्त 
पेड-पीचधा तथा जंगली जानवरों की बहुलता हो। जंगल । कानन। 
पद--बन की धातु ->गेरु नामक लाल मिद्टी। 
२ रामृह । ३ जल। पावी। ४ उपवन्त। बगीचा। ५ निराने या 
नीदने की मजदूरी। निरीनी। निदाई। ६ वह अन्न जो किसान लोग 
मजदूर। को खेत काटने की मजदूरी के रूप में देते हैं। ७ कपास का 
पौधा । उदा०--रानु संक्यो, बीती बनौ, ऊखौ लई उखारि ।-- 
बिहारी। ८ बढ़ भठ जो किसान लोग अपने जमीदार को किसी उत्सव 
के उपलक्ष मं दते है। शादियाना। ९ दें० वन' । 

पु० -बद । 





समचारी 
स्‍त्री० [हिं० बनाना] १ सज-धज। बनावट। २. बाना। मेस। 
बन-आल[--पु० [हिं० बन |-आल्‌ ] जमीकद की जाति का एक कद। 
बनउर|--१ु० १ >विनौला। २.३ ओला । 
बन-कंडा--पु० [हि० बन+कंडा ] वह कडा या गोहरी जो पराथकर 
न बनाई गई हो बल्कि जगल में गाय-बैल आदि के गोबर के सूख जाने पर 
आप से आप बनी हो। 
अनक--स्त्री ० [सं० वन +-क (प्रत्य०) |] बन की उपज। जगल की पैदा- 
वार। जैसे--गोद, लकडी, दाहद आदि। 
सत्री० [? ] एक प्रकार की साटन। 
|स्त्री ०>वानक। 
बन-ककड़ी--स्त्री० [स० वन-कर्कटी] एक पौधा जिसका गोद दवा के 
काम आता है। 
बनकटी--स्त्री ० [हि० वन (जंगल) +काटनता] १ जगलरू काटकर उसे 
आबाद करने, खेती-बारी अथवा रहने के योग्य बनाने का हक। 
२ एक प्रकार का पहाडी बॉस जिससे टोकरे बनाये जाते है। 
बनकर--पु० [स० वनकर ] १ शत्रु के चलाये हुए हथियार का निष्फल 
करने की एक यक्तित। २ सूर्ये। (छि०) 
पु० [स० वन +कर] वह कर जो जगल में होनेवाली वस्तुओं के क्रय- 
विक्रय पर लगता है। 
बन-कल्ला--पु० [हि० बन -कह्ला ] एक प्रकार का जगछी पेड। 
बन-कस--पु० [हि वन + कुश] एक प्रकार की घास जिसे वनकुस, 
बेमनी, मोप और बामर भी कहते हैं। इससे रस्सियाँ बनाई जाती है। 
बनकोरा--पु० [देश० ] छोनिया का साग। लोनी | 
बनखंड--पु० [स० वनखड ] १ वन का कोई खण्ड या भाग । + पयन्‍य 
प्रदेश । 
बनखंडी--स्त्री ० [ 6० वन--खड़ --दुकढ) | १ वन का कोई खड़ था भाग । 
२ छोटा जगल या वन। 
वि० वन या जगल में रहने या होनेवाला । 
बनखरा--पु० [हि० वन--खरा ] वह भूमि जिससे पिछडी फेस ड़ में कपास 
बोई गई हो । 
बनखोर--पु० [देश० | कौर नामक वक्ष । 
बनगाव--पु० [हिं० वन | फा० गाव -हिं० गौ | १ एफ प्रक्नार का बडा 
हिरन जिसे रोझ भी कहते है। २ एक प्रकार का तेदू (वक्ष)। 
बनगोभी---सत्री ० [ हिै० बन+गोभी | एक तरह की जगछी घास । 
बनचर--१० [स० वनचर | १. जंगल में रहनवाला पशु। वन्य पशु। 
२ बन या जगल में रहनेवाला आदमी। जंगली मनष्य। ३ जल में 
रहनेवाले जीव-जन्तु । 
वि० बन में रहनेवाला। 
बनचरी--स्त्री० [देश० ] एक प्रकार की जगली घास जिसकी पत्तियाँ 
ज्वार की पत्तियों की तरह होती हैं। बरो। 
पु०--बनचर। 
वि० बनचर का। बनचर-सम्बन्धी । जैसे--अनचरी रग-ढछग । 
बनवारी--वि० [स० वनचारिन्‌ ] वन में घृमने-फिरने या रहनेवाला । 
पु० १ वन में रहनेवाले; पशु, मनुष्य आदि | २ जल में रहनेवाले 
जीव-जन्तु। जलूचर। 


नअज-जतने ही अलतन-- जानने 


धनचोर 


बनता 





बसज्ञौर-स्त्री० [स० वन+चमरी] पर्वतीय प्रदेशों मे होनेवाली | अनधातु--स्त्री० [स० वनघातु] गेर या और कोई रगीन मिट्टी। 


एक तरह की गाय जिसकी पछ की चवर बनाई जाती है। सुरागाय। 

बनखोरी--स्त्री० -बनचौर । 

बनज --पु० [स० यनज ] जगरू में होने या रहनेवाला जीव । 
बवि० दे० बनज। 
पु०-वबाणिज्य (व्यापार) । 

घनजना *---स ० [हि० बनज] १ व्यापार करना। २ किसी के साथ 
किसी तरह की बात-चीत या लेत-देन निश्चित करना। जैसे---किसी की 
लड़की के साथ अपना छड़का बनजना (अर्थात्‌ ब्याह पक्का करना) । 
स० १ व्यापार करने के लिए कोई चीज खरीदना । 
२ किसी को इस प्रकार वश भे करना कि मानो उसे मोल के लिया 
गया हो। 

बनजर--रत्री ० >बजर । 

बनजरिया---रत्री ० [हि० बन-+जारना>ू+जलाना ] भूमि का बहू टुकड़ा 
जो जगल को जला या काटकर के खेती-बारी के लिए उपयुक्त बनाया 
गया हो! 

बनजात--पु० [स० ननजात ] कमल । 

बनजारा- -१० [हिं० वनिज +हारा] १ वह व्यक्ति जो बैलो पर अन्न 
लादकर बेचने के लिए एक देश से दूसरे देश को जाता है। टाँडा लादनेवाला 
व्यक्ति। टॉडैया। टेंडवरिया। बजारा। २ व्यापारी। सौदागर। 

बनजी--प० [स० वाणिज्य] १ व्यापार या रोजगार करनेबाला । 
सौदागर। २ वाणिज्य। व्यापार । 

बसज्योत्स्ता--स्त्री० [स० वनज्योत्मना] माधवी छता। 

बनड्ा---]० [? ] बिलावल राग का एक भेद। यह झूमढा ताल पर गाया 
जाता है । 
प्‌ृ० [हि० बना दूल्हा] विवाह के समय वर-पक्ष मे गाया जानेबाला 
एक प्रकार का गीत। 

बनड़ा जंत--प० [हि० बनडा-+-स० जयत | एक शालक राग जो रूपक 
ताल पर गाया जाता है। 

बनड़ा-वेवगरी--पू० [हि० बनडा+स० देवगिरि] एक शालक राग जो 
एकताले पर गाया जाता है। 

बनत--स्त्री० [हि० बनना+त (प्रत्य०)]| १ किसी चीज के बनने 
या बनाये जाने का ढंग, प्रक्रिया या भाव। २ किसी चीज की बनावट 
यथा रचना का विशिष्ट ढग या प्रकार। अभिकल। भात। (डिजाइन) 
३. पारस्परिक अनुकूलता या सामजस्य। मेरू । ४. ग्रोटे-पट्टे की 
तरह की एक प्रकार की पतली पट्टी। बॉकडी। 

घनताई[--स्त्री ० [ह० वन+-ताई (प्रत्य०)] १. बन या जंगल की 
सघधनता। २ बन की भयकरता। 

बनतुरई--रत्री ० [हिं० बस +-तुरई] बदारू। 

बन-तुलसो---स्त्री० [सं० वन | सुझूसी] बबेर नाम का पौधा जिसकी 
पत्ती और मजरी तुलसी की-सी होती है । बर्बरी। 

बनद--१० [स० वनद ] बादरू। मेघ। 
वि० जल देनेवाला । जरूद। 

अनदास--स्त्री ० [स० बनदाम | वन माला । 

बनदेवी--स्त्री ० [स० वनदेवी] किसी वन की अधिष्ठात्री देवी! 


अबनना--अ० [स० वर्णन, प्रा० वण्णन चित्रित होना, रचा जाना] 


१. अनेक प्रकार के उपकरणों, तत्वों आदि के योग से कोई नई चीज 
तैयार होना अथवा किसी नये आकार या रूप मे प्रस्तुत होकर अस्तित्व 
में आना। जैसे--कल-कारखानों मे कागज, चीनी या घातुओ की चीजें 
बनाना। 

पद--अना अनायात (क) जो पहले से बनकर ठीक या तैयार हो। 
जैसे--बना-बनाया कुरता मिल गया। (ख) जिसमे पहले से ही 
पूर्णता हो, कोई कोर-कसर न ही। उदा०--मैं याचक बना-बनताया 
या।--मैथिलीशरण । 

सुहा०--- (किसो का) बना रहना --ससार में कुशलतापूर्वक जीवित 
रहना। जैसे--ईएवर करे यह बाऊक बना रहे। (किसी का किसी 
स्थान पर ) बसा रहना--उपस्थित या वतंमान रहना। जैसे--आप जब 
तक चाहे तब तक यहां बने रहे। 

२ किसी पदार्थ का ऐसे रूप भे आना जिसमे वह व्यवहार में आ सके । 
काम में आने के योग्य होता। जैसे--दवा या भोजन बनना । ३. 
किसी प्रकार के रूप-परिवर्तन के द्वारा एक चीज से दूसरी नई चीज 
तैयार होना। जैसे--चीनी से शरबत बतना, रूई से डोरा या सत 
बनाना। ४ उक्त के आधार पर, पारस्परिक व्यवहार मे किसी के साथ 
पहलेवाले भाव या सबध के स्थान पर कोई दूसरा नया भाव या सबंध 
स्थापित होना । जैसे-- (क ) मित्र का शत्रु, अथवा शत्रु का मित्र बनना । 
(ख) किसी का दत्तक पुत्र या मुंह-बोला भाई बनता। ५ आविष्कार 
भादि के द्वारा प्रस्तुत होकर सामने आना। जैसे--अब तो नित्य सैकड़ों 
तरह के नये नये यत्र बनने छगे हैं। ६ पहले की तुलना मे अधिक अच्छी, 
उन्नत या संतोषजनक अवस्था या दशा में आता या पहुँचना | जैसे---वे 
तो हमारे देखते देखते बने हैं। 

पब---बतकर ”-अच्छी तरह। पूर्ण रूप से। भली-माँति। उदा०--- 
मनमोहन से बिछुरे इतही बनि की न अब दिन दै गये है। --पद्माकर। 
अल ठनकश -खूब बनाव-सिगार या सजावट करके। जैस्े---आज-कल 
तो बहू खूब बन-ठनकर धर से निकलते है। 

७. किसी विद्विष्ट प्रकार का अवसर, योग या स्थिति प्राप्त होना। 
मुहा ०---धनम कआञना--अच्छा अवसर, योग या स्थिति प्राप्त होता । 
जैसे--उन छोगो के छडाई झगड़े मे तुम्हारी खूब बन आई है। प्राणों 
पर आ अलना--ऐसी स्थिति आ पहुँचना कि प्राण जाने का भय हो। 
जान जाने की नौबत आना। जैसे-तुम्हारे अत्याचारों (या दु्व्यबहारो) 
से तो मेरे प्राणो पर आ बनी है। (किसी का) कुछ बन बैठना >न्‍्वास्त- 
विक अधिकार, गुण, योग्यता आदि का अभाव होने पर भी क्षिसी 
पद या स्थिति का अधिकारी बन जाना अथवा यह प्रकट करना कि 
हम उपयुक्त या वास्तविक अधिकारी हैं। जैसे--वहू कुछ सरदारों 
को अपनी ओर मिकाकर राजा (या शासक) बन बेठा। (हहि० के 
हो बेठना' मुहा० की तरह प्रयुक्त ।) 

८. किसी कास का ऐसी स्थिति मे होना कि वह पूरा या सम्पन्न हो सके । 
संभव होना। जैसे--जिस तरह बने, उसकी जान बचाओ। ९, किसी 
प्रक्रिया से ऐसे रूप मे आना जो बहुत ही उपयुक्‍्त,ठीक या सुदर जान पढ़े । 
जैसे--(क) नई बेल टेकते से यह साड़ी बन गई है। (ख) दफ्ती 


पर चढ़ने और हाशिया लगने से यह तस्वीर बन गई है। १० किसी 
प्रकार के दोष, विकार आदि दूर किये जाने पर या मरम्मत आदि होने 
पर किसी चीज का ठीक तरह से काम में आने के योग्य होना। जैसे--- 
पाँच रुपये मे यह घड़ी बनकर ठीक हो जायगी। ११ किसी पद या 
स्थान पर नियुक्त या प्रतिष्ठित होकर नये अधिकार, मर्यादा आदि से 
युक्त होना । जैसे--किसी कार्यालय का व्यवस्थापक (या मंदिर का 
पुजारी) बनना। 
मुहा ०---बन बेठताउ-अधिकार प्रहण करके या रूप घारण करके किसी 
पद या स्थान पर आसीन होना । जैसे--उनके मरते ही उनका भतीजा 
मालिक बन बैठा। 
१२ आशिक क्षेत्र मे, किसी प्रकार की प्राप्ति या छाभ होना। 
जैसे--चलो, इस सौदे में १०) बन गये। १३ आपस मे यथेष्ट 
मित्रता के भाव से और घनिष्ठतापूर्वक आचरण, निर्वाह या व्यव- 
हार होना । जैसे--हध्र कुछ दिनों से उन दोनो मे खूब बनने लगी है। 
१४ अभिनय आदि मे किसी पात्र की भूमिका में दशकों के सामने 
आना। किसी का रूप धारण करना | जैसे--मैं अकबर बनूंगा और तुम 
महाराणा प्रताप बनना। १५ समाज मे प्रतिष्ठा प्राप्त करने के उद्देश्य 
से अपने आपको अधिक उच्च कोटि का या योग्य सिद्ध करने के लिए 
प्राय गभीर मुद्रा धारण करके औरो से कुछ अलग अलग रहना। जैसे--- 
अब तो बाब्‌ साहब हम लोगो से बनने लगे हैं। १६ किसी के बढावा 
दैने या बहकाने पर अपने आपको अधिक योग्य या समर्थ समझने लगना , 
और फलत दूसरो की दृष्टि मे उपहासास्पद तथा मूर्ख सिद्ध होना । 
जैसे---आज पह्िर्तों की सभा मे शास्त्री जी खूब बने। 
विशेष---हस अर्थ मे इस शब्द का प्रयोग प्राय सकर्मक रूप मे ही अधिक 
होता है । (जैसे--शास्त्री जी खूब बनाये गये।) अकर्मक रूप में अपेक्षया 
कम ही होता है । 

अमनिनि[--स्त्री० [हि० बनना] १. बतावट। २ बनाव-सिंगार। ३. 
सजावट । 

बसलिधि--पु० [सं० वननिधि] समुद्र । 

घन-पति---पु० [स० वनपति] सिंह। शेर। 

बन-पथ---पु० [स० बनपथ ] १ समुद्र। २. ऐसा रास्ता जिसमे नदियाँ 
या जलाशय बहुत पड़ते हो। ३. ऐसा रास्ता जिसमे जगल बहुत पडते 
हो। 

बन-पाट--पु० [हिं० वन+पाट ] जगली सन। जगली पटुआ। 

बन-पाती --स्त्री ० -न्‍वनस्पति। 

बन-पाल--पु० [स० वनपाल] बन या बाग का रक्षक। माली। 

बन-पिडालू--पु० [हिं० बन+पिडालू] एक प्रकार का मझोला, जगली 
वृक्ष। इसकी लकड़ी कघी, कलमदान या नक्‍काशीदार चीजें बनाने के 
काम आती है। 

बनप्रिय--पु० [स० वनप्रिय, ब० स० ] कोयछ। कोकिल। 

बन-पती (--्त्री ० वनस्पति) उदा०--भएउ बसत राती बनपती ।-- 
जायसी | 

अ्षम-फूल---पुं० [ हि? वत+-फूल] जगली वृक्षों के फूल। 

बन-प्रशा--वि० [फा०] १. नीले रग का। 
हरा। 


२ हलका 


पु० उक्त प्रकार का रग । 

बनफ्शा---पु० [फा० बनफ्शा ] एक प्रकार की बनस्पति जो नेपारू, कश्मीर 
और हिमालय पर्वत के अनेक स्थानों मे होती और औषध के काम आती 
है। 

बनअकरा--पुं० [हिं० बन-+बकरा] पर्वतीय प्रदेशों मे हीनेवाला एक 
तरह का बकरा । 

अन-बास--पु० [स० वनवास] १ बल में जाकर रहने या बसने की क्रिया 
या अवस्था। २. प्राचीन भारत भे, एक प्रकार का देश-निकाले का दंड । 

बन-बासी--वि० [हि० बनबास] १ बन में रहनेवाला। जगली। २ 
बत में जाकर बसा हुआ । ३. जिसे बनवास (दड़) सिला हो। 

बनबाहत---पुं० [स० वलयवाहन ] जलयान। नाव। नौका। 

बन-बिखझार!| ---पु० नव्वन-बिलाव । 

बनबिलाब--पु० [हिं० बन-+-बिछाव८”|विल्ली] बिल्ली की तरह का, 
या उससे कुछ बड़ा और मठमैले रण का एक जंगली हिंसक जतु जो 
प्राय झाड़ियों में रहता और चिडियाँ पकड़कर खाता है। कुछ लोग 
इसे इसलिए पालते भी हैं कि उससे चिड़ियो का शिकार करने में 
बहुत सहायता मिलती है। इसके कानी का ऊपरी था बाहरी भाग 
काला होता है, इसी लिए इसे 'स्थाहगोश' भी कहते है। 

बनवेर--पु० [हिं०] एक प्रकार का जगली बेर। 

घन-सानुस---पु० [हिं० बन+-मानुष ] बदरों से कुछ उन्नत और मनुष्य 
से मिलते-जुलते जगली जतुओ का वर्ग जिसमे गोरिल्ला, चिंपेजी, ओरग, 
ऊठग थदि जस्तु हैं। 

बससाल--स्त्री ० चवनमाला | 

बसमाला---स्त्री० [स० वनमाला] १. जगली फूलो को पिरो कर बनाई 
हुई माला । २ पैरो तक छबी वह माला जो तुलसी की पत्तियों और 
कमल, परजाते और मंदार के फूलों को पिरो कर बनाई जाती है। 

बनसाली--वि० [स० वनमाली ] जो बनमाला धारण करता या धारण 
किये हुए हो। 
पु० १ श्रीकृष्ण। २ नारायण | विष्णु। ३. बादछ। मेध। ४ ऐसा 
प्रदेश जिसमे बहुत से बन या जंगल हाँ। 

अनमुरगा---पु० [हिं० बन+फा० मुगें] [स्त्री० बनमुर्गी] एक तरहू का 
जगली मुरगा जो पालतू मुर्गों की अपेक्षा कुछ बडा होता है। 

बनमुरशिया--स्त्री ० [हि० बन+-फा० मुर्ग +हि० इया (प्रत्य ७) ] हिमालय 
की तराई में रहनेवाला एक प्रकार का पक्षी जिसका गला और छाती 
सफेद और सारा छरीर आसमानी रग का होता है । 

बनमुर्गो--स्त्री० [हिं० +फा०] क्ुकुट्टी नामक जगली चिडिया। 

बनरखा---१० [हि० बत+रखना--रक्षा करना] १. जगल और उसमें 
की संपत्ति की रक्षा करनेवाला व्यक्ति ' २ एक जगली जाति जो पशु- 
पक्षी पकड़ने और मारने का काम करती है। 

अमरा--पुं० [हिं० बनना] [स्त्री० बनरी] १ वर। दूत्हा। २ 
विवाह के समय गाये जानेवाले एक प्रकार के गीत । 
पु०चचदर। 

बनराज--पु० [स० वनराज, ष० त०] १. बन का राजा अर्थात 
सिंह। २. बहुत बड़ा वृक्ष। 
१० च्च्वूंदावन । 


बन राय 

बनराय[---१० >॑वनराज | 

बनराहु---१० [सं० वत+राज] घना या बडा जगरू। 

बनरी--स्त्री० [हिं० बनरा का स्त्री०] नई व्याही हुई बध। दुल्हन । 
स्‍्त्री०-ब्वदरी (मादा बंदर)। 

बनरीठा--१० [हिं० बन--रीठा] एक प्रकार का जगली रीठे का वक्ष 
जिसके बीजों से लोग कपड़े तथा केश घोते है। 

बनरीहा--सत्री० [हिं० बन-रीहा (रीस) या स० रह न्यौधा] 
एक प्रकार का पौधा जिसकी धास को बटकर रस्सी बनाई जाती है। 
रीसा। 

बमशह--पृ० [स० वनरुह] १. जंगली पेड । २ कमर । 

अनरहिया--स्त्री० [स० वन्तरह] एक तरह का पौधा और उसकी 
कपास । 

बनरोह--१० [हि०] एक प्रकार का चौपाया जो देखने से बदी छिपकली 
की तरह होता है। (पैग्मेलिन ) 

बनबना|----स ० “बनाता । 

बनवरा--प्‌ ० *+बिनीरा । 

बनतसन--पु० [स० वनवसन] वृक्ष की छाल का बना हुआ कपडा । 

बतवा|--पृ० [स० वन->जल ! वा (प्रत्य० ) ] पनडुब्बी नामझ जल-पक्षी । 
पु० [? ] एक प्रकार का बछनाग (विष) । 

बनवाना --स ० [ ६िं० बनाता का प्रे० रूप] बतनानेका काम दूसरे से कराना । 
किसी को कुछ बनाने मे प्रवृत्त करना । 

बमवारी---प ० >वनमाली (श्रीकृष्ण) । 

बनवासी---वि ०, १०-ज्वनवासी । 

बनवंया---वि० [हिं० बनाता+-वैया (प्रत्य०)] बतानेवाला। 
वि० [हिं० बनवाना+बैया [प्रत्य०)] बनवानेवाला। 

बनसपती---रज्ञी ०>वनस्पति । 

बनसार--१० [स० वन- शालह्त ] समुद्र तट का वह स्थान जहाँ से जहाज 
पर चढ़ा या जहाँ पर जहाज से उतरा जाता है । 

बनसो|--स्त्री० [हि० बसी] १ बाँसुरी। २ मछलियाँ फेसाने की 
कंटिया। 

बनस्थली--रजी ० >-वनस्थली (वन की भूमि) । 

बनस्थपति--पु० ->वनस्पति । 

बनहूटी--स्त्री ० [देश० ] एक प्रकार की छोटी नाव । 

बलहूरवी--स्त्री ० [ सं० बन हरिद्वा] दास्हल्दी। 

बना--१ ० [? ] एक प्रकार का छंद जिसमे १०, ८ और १४ के विश्वाम से 
३२ मात्राएँ होती हैं। इसे 'दंडकला' भी कहते हैं। 
पु० [हिं० बनना | स्त्री० बनी] दृल्हा । वर। 

बनाइ*---अव्य० [हिं० बनाक्र--अच्छी तरह]१. अच्छी तरह! भली- 
भाँति। (दे० बनाना” के अन्तर्गत पद बनाकर”) २ अधिकता से। 
३. निपट। बिलकुल। 

बनाउ[--प्‌ ०>-बनाव। 

बनाउरि|--स्त्री ०“बाणावलि (वाणों की पंक्ति) । 

बनाग्सि--सत्री० [स० वनार्ति] वन से छूगनेवाली आग। दावानरू । 

बसात--स्त्री ० [हिं० बताना] [वि० बनाती] एक प्रकार का बढ़िया तथा 
रंगीन ऊती कपड़ा। 


के 





बनाना 





बनाती--वि० [हिं० बनात+ई (प्रत्य०) ] १. बनात-संबंधी। २. बनात 
का बना हुआ। 

बनान---स्त्री ० [हिं० बनाना] बनाने की क्रिया , ढंग या माव। बनावद। 

बसाना--स० [हिं० बनना का स०] १. किसी चीज को अस्तित्व देना या 
सचा में छाना। रचना। जैसे--(क) ईश्वर ने यह संसार बनाया है। 
(स) सरकार ने कानून बनाया है। २ भौतिक वस्तुओं के संबंध 
में, उन्हें तैयार या प्रस्तुत करना। रचना। जैसे--(क) मकान या 
कारखाना बनाता। (ख) गंजी या मोजा बसाना। ३. अमौतिक 
तथा अमूत॑ वस्तुओं के सबंध मे, विचार-जगत से लाकर प्रत्यक्ष करना। 
जैसे---कविता बनाना। 
पव--अनाकर-- खूब अच्छी तरह। मली-माँति। जैसे--आज हम 
बनाकर तुम्हारी ख़बर छेंगे। 
सुहा ०--- (किसी व्यक्षित को) बनाये रखना-- अच्छी दशा में अथवा ज्यों 
का त्यों रखना। रक्षापुवंक रखना । (किसी व्यक्षित को) बनाये रखना -+ 
सकुगल, जीवित या बर्तेमान रखना। जैसे--..इंश्वर आपको बनाये 
रखे। (आशीर्वाद) (ख) किसी को अनुकूल या अपने प्रति दयालु 
रखना। जैसे--उन्हे बनाये रखने से तुम्हारा लाम ही हीगा। 
४ ऐसे रूप मे लाना कि वह ठीक तरह से काम में आ सके अथवा 
भला और सुन्दर जान पड़े। ५. किसी विशिष्ट स्थिति में रूना। 
जैसे--उन्हींने अपने आपको बना लिया है, अथवा अपने लड़के को बना 
दिया है। 
सुहा ०--जनाये न बनना --बहुत प्रयत्त करने पर भी कार्य की सिद्धि या 
सफलता न होना । जैसे--अब हमारे बनाये तो नहीं बनेगा। उदा०-- 
जौं नहिं जाऊँ रहइ पछितावा। करत विचार न बनइ बनावा |-- 
तुलसी। 
६ आशिक क्षेत्र मे, उपाजणित या प्राप्त करना। छाम करना । जैसे--- 
उन्होंने कपड़े के रोजगार मे लाखों रुपए बना लिए हैं। ७ किसी पदार्थ 
के रूप आदि में कुछ विशिष्ट क्रियाओ के द्वारा ऐसा परिवर्तन करता कि 
वह नये प्रकार से काम मे आ सके। जैसे--गुड़ से चीनी बनाना; चावछ 
से मात बनाना , आटे से रोटी बनाना। ८ एक विशिष्ट रूप से दूसरे 
विपरीत या विरोधी रूप में छाना। जैसे---(क) मित्र को शत्रु अथवा 
शत्रु को मित्र बनाना। (ख) झ्ृठ को सच बनाना। ९ दोष, विकार 
आदि दूर करके उचित या उपयुक्त दशा या रूप मे छाना। जैसा होना 
चाहिए, वैसा करना। जैसे--पछोड़ या फटककर अनाज बनाना। 
१०. जो चीज किसी प्रकार बिगड़ गई हो, उसे ठीक करके ऐसा रूप 
देना कि वह अच्छी तरह काम दे सके। मरम्मत करना। जैसे-करूम 
बनाना, घड़ी बनाता। ११. किसी प्रकार का आविष्कार करके कोई 
नई चीज तैयार या प्रस्तुत करता। जैसे---मई तरह का इजन या हाई 
जहाज बनाना। १२ अकन, लेखन आदि की सहायता से नई रचना ऋतुत 
करना। जैसे--गजरू या तसवीर बनाना। १३. किसी को किसी पद 
या स्‍थान पर आसीन अथवा प्रतिष्ठित करके अधिकार, प्रतिष्ठा, 
मर्यादा आदि से युक्त करना। जैसे--(क) किसी को मठ का महृत 
या सभा का समापति बनाना। (ख़) अपना प्रतितिथि बनाना। 
१४. किसी के साथ कोई नया पारिवारिक संबंध स्थापित करना। जैसे-- 
किसी को अपना दामाद, भाई या लड़का बनाना। १५, बात-चीत 


बनाफर 


में किसी की प्रशंसा करते हुए या उसे बढ़ावा देते हुए ऐसी स्थिति मे लाना | 


कि वह आत्म-प्रशसा करता करता औरो की दृष्टि मे उपहासास्पद और 
मूर्ख सिद्र हो। जैसे--आज पडित जी को लोगों में खूब बनाया। 
१६ कोई विशिष्ट क्रिया या व्यापार सम्पन्न करना। जैसे--(क) 
खिलाड़ी का गोल बनाना। (ख) नाई का दाढी बनाना। (ग) 
डाक्टर का आँख बनाना। 

बनाफर--१ ० [स० वन्यफल ? राजपूत क्षत्रियों की एक शाखा | 

घना-बनत--रत्री ० [ हिए बनना | वर और कन्या का सम्बन्ध स्थिर करने से 
पहले उनकी जन्म-पश्नियों का गणित ज्योतिष के अनुसार किया जाने- 
वाला मिलान । 
कि० प्र०--निकालता |--बनाना ।--मिलाना। 

अनाम--अव्य ० (० ]१ किसी के नाम पर। नाम से। जैसे---बनामे 
खुदा ईपवर के नाम पर। २ किसी के उद्देश्य से किसी के प्रति। ३. 
किसी के विरुद्ध । जैसे--यह दावा सरकार बनाम बेनीमाघव दायर हुआ 
है, अर्थात्‌ सरकार ने बेनीमाघय पर मुकदमा चलाया है। 

बनाय---अव्य ० [हिं० बनाकर अच्छी तरह] १ अच्छी तरह बनाकर। 
२ ठीकढग से। अच्छी तरह। ३ पूरी तरह से। पूर्णतया । 

बनार--१०[? ]१ चाकसू नामक ओषधि का वृक्ष। २ काला कसौदा। 
कासमर्द। ३ एक मध्ययुगीन राज्य जो वर्तमान काशी की सीसा पर 
था। 
+अव्य० दे० बनाय। 

बनारना--स ० [? ] काटना, विशेषत काट-काटकर किसी चीज के टुकड़े 
करना। 

बनारस--पु० [स० वाराणसी ] [वि० बनारसी] हिन्दुओ के प्रसिद्ध तीर्थ 
काशी का आधुनिक नाम । 

बनारसी--वि० [हि० बनारस+ई (प्रत्य०)| १ बनारस (नगर) 
सबधी। २ बनारस में बनने, रहने या होनेवाला। जैसे--- बनारसी 
साड़ी । 
पु० बनारस का निवासी । 

घनारी--स्त्री ०|स० प्रणाली | कोल्ह मे नीचे की ओर लगी हुई नाली की 
वहू छकडी जिससे रस नीचे नाॉँद में गिरता है। 

बनाल --पु० बदाछ। 

बनाला[--पू ० -बदाल। 

बनावत ---रत्नी० दे” बना-बनत । 

बनाव--प्‌ ० [ हि० बनना +-आव (प्रत्य०)] १ बनने या बनाये जाने 
की क्रिया या भाव। २ बनावट। रचना। हे शुगार। सजावट। 
पद---बनावर्नसगार । 

बनावट--स्त्री ०[हि० बनाना--आवट (प्रत्य०)] [वि० बनावटी] १. 
किर्सी चीज के बनने या बनाये जाने का ढग या प्रकार। रचने या रचे 
जाने की शैंली। रूप-विधान। २ किसी वस्तु का वह रूप जो उसे 
बनाने या बनाये जाने पर प्राप्त होता है। रूप-रचना। गढ़न। जैसे-- 
इन दोनो कमीजो की बनावट में बहुत थोडा अन्तर है। रे. किसी चीज को 
विशिष्ट और सुन्दर रूप में लाने की क्रिया या माव। रूपाघान । (फार्मेदन ) 
डे केवल दूसरों को दिखाने के लिए बनाया जानेवाला ऐसा आचरण, 
रूप या व्यवहार जिसमे तथ्य, दृढ़ता, वास्तविकता, सत्यता आदि का 


बनिया 

बहुत कुछ या सर्वथा अमाबव हो। केवल दिखावटी आकार-प्रकार, 
आखचार-व्यवहार या रूप-रग। ऊपरी दिखावा। आडंबर। कृत्रिमता। 
जैसे-- (क) यह उनकी वास्तविक सहानुभूति नहीं है; कोरी बनावट 
है। (ख) उसकी बनावट में मत आना, वहू बहुत्त बडा धूर्त है। ५. वह 
दमपूर्ण मानसिक स्थिति जिसमे मनुष्य अपने आपको यथार्थ अथवा वास्त- 
विकता से अधिक योग्य, सदाचारी आदि सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। 
पाखंडपूर्ण सिथ्या आचरण और व्यवहार। (एफेक्टेशन) जैसे-न्यों 
साधारणत. वे अच्छे विद्वान हैं, पर उनमें बनावट इतनी अधिक है कि 
लोग उनकी बातो से घबराते हैं। ६. दे० 'रचना। 

बनावटी--वि० [हि० बनावट] १. जिसमें केवल बनावट हो, तथ्य या 
वास्तविकता कुछ भी न हो। ऊपरी या बाहरी। जैसे--बनावटी हँसी। 
२ वास्तविक के अनुकरण पर बताया हुआ । कृत्रिम) नकली। 
जैसे--बनावटी नगीना। 

वबजावन--पु० [हि० बनाना] १ बनाने की क्रिया या भाव। २. अन्न में 
मिली हुई वे ककड़ियाँ आदि जो बिनकर निकाली जाती है। ३. 
इस तरह बिनकर निकली हुई रद्दी चीजो का ढेर । 

बतावतहारा--वि० १० [हिं० बनाना+हारा (भप्रत्य०)] १ बनानेवाला। 
२. सुधारनेवाला। 

बनाव-सिगार--प० [हि०] किसी चीज की विशेषत शरीर की वह सजावट 
जो प्राय दूसरों को आकृष्ट फरने या उन पर प्रभाव डालने के लिए की 
जाती है। 

बनास--स्त्री ० [देश०) राजपूताने की एक नदों जो अवंली पर्वेत 
से निकलकर चबल नदी भें गिरती है। 

बनासपती--स्त्री० वनस्पति। 
]वि० वनस्पतियों से बनाया हुआ। जैसे--बनासपती घी। 

बनि[--अव्य ० [हिं० बनाना | पूर्ण रूप से। अच्छी तरह। बनाकर |उदा०-- 
अमित काल मै कीन्ह सजूरी। आजु दीन्ह त्रिधि बति मल्ि मूरी।-- 
तुलसी। 

बनिक[--१० न्‍वणिक। 

बनिज--पु० [सं० वाणिज्य] १ रोजगार। व्यापार। २ व्यापार की 
बस्तु। सौदा। ३. ऐसा असामी जिससे यथेष्ट आर्थिक छाम किया जा 
सके। ४ धनी या सम्पन्न यात्री। (ठग) 
क्रि० प्र०--फंसना । 

बनिजना--स ० [स० वाणिज्य , हि? बनिज-+ना (प्रत्य७) | १ खरीदना 
और बेचना। रोजगार करना। २ मोल लेना। खरीदना। ३ किसी 
को मूर्ख बनाकर कुछ रुपए ठगना। 

अबमिजारा--पु० - बनजारा। 

बनिजारिन[--स्त्री ०  बनजारिन। 

बनिजारी--स्त्री ० - -बनजारिन। 

बनिजी--वि० [स० वणिज ] वाणिज्य-सम्बन्धी । 
पु० धूम-घुमकर सौदा बेचनेवाला व्यापारी। फेरीदार । 

बसित--स्त्री ० [हि० बनना | बानक। बाना। बेश। 

बनिता--स्त्री० [स० बनिता]! स्त्री। औरत। २, जोरू। पत्नी। 
भार्या। 

बनिया--१० [ स० वणिक्‌] [स्त्री० बनियाइन, बनैनीं) १. व्यापार 





बसियाइत 
करनेवाऊा ब्यक्ति। ध्यापारी। वैश्य। २ आंठा, दाल, ममक-मिर्च 
आदि बेचनेवाला दूकानदार। मोदी। ३. लछाक्षणिक अर्थ मे, व्यापारिक 
मनोवृत्तिधाछा फलत. स्वार्थी व्यक्ति । 
बलियाइम---स्त्री ० [० बैनियन | कमीज, कुरते आदि के नीचे पहनने 
का एक तरहू का सिला हुआ कम लबा पहनावा। गजी। 
(स्थ्री० हि० 'बनिया' का स्त्री०। 
बसिस्थत--अव्य० [फा०] किसी की तुलना या मुकाबले में। अपेक्षया। 
जैसे---उस कपडे की बनिस्वत यह कपडा कही अच्छा है। 
बनिहार--प ० [हि० बन +हार (प्रत्य०) अथवा हि? बन्नी |] वह आदमी 
जो कुछ वेतन अधवा उपज का अद्ग लेकर दूसरो की जमीन जोतने, बोने, 
फसल आदि काटने और खेत की रखवाली का काम करता है। 
शनी---स्त्री ० [ हि० बन | ९, वन का एक टुकडा। वनस्थली । २ बगीचा । 
बाटिका । उदा०--महादेव की सी बनी चित्र लेखी |--केदव। 
३ एक प्रकार की कपास । 
सत्री०[हि० बना] १ दुल्हंन। वधू। २ सुन्दरी स्त्री। नायिका | 
पु० >बनिया। 
अनीनी--स्त्री ० [हिं० बनी |ईनी (प्रत्य०)] १ वैश्य जाति की स्त्री। 
बनिये की स्थत्री। 
बनीर--१ ० -वानीर (बेत)। 
बमेठी ---स्त्री ० [ हिं० बने |-स० यप्टि] एक तरह की छूडी जिसके दोनो 
सिरो पर एक एक छट्ट लगा रहता है और जिसका उपयोग मुख्यत' 
पटेबाजी के खेलों में होता है। 
बनेला--प० [देश० | रेशम बनानेबारा एक प्रकार का कीडा। 
वि० बनैला 
घनेया[---वि० [हिं० बनाना | बनानेवाला। 
[बि०--बनैछा। 
बनेल(--वि ० >-बनै ला । 
बनेला--वि० [हि० बस +ऐला (अत्य०) | जगली। वनन्‍्य। 
१० जगली सूअर। 
बनोबास[---१० “बनबास ! 
बनीआ--वि ० हि० बनाना |-औओआ (प्रत्य ०) | १. बना या बनाया हुआ। 
२, कृत्रिसम। बनावटी। 
बनौट]--स्त्री ० - बिनवट | 
बनौटो--वि ० [ हि०बत | औटी (प्रत्य३) | कपास के फूछ का सा। कपासी । 
पु० एक प्रकार का रग जो कपास के रग से मिलता-जुलता है। 
(स्त्री०--बिनवट । 
बनौीरी|--स्त्री ० [हि 
हिमकण । ओला। 
बच्चा---१ ० | हि० बनना या बना] [स्त्री० बन्नी | १. छोक गीतो मे, बर। 
दूल्हा । २ विशेषत बह व्यक्ति जिसका विवाह हो रष्टा हो। ३ विवाह 
के समय में, वर पक्ष की स्त्रियों के द्वारा गाया जानेबाला एक तरह का 
लोकगीत । बनडा। 
बन्नात--स्त्री ० 5बनात (एक तरह का ऊसी रंगीन कपड़ा) | 


बच्ची--वि ० | हिं०्बन | बन में होनेबाला । जैसे---बन्नी खड़िया, वन्नी मिद्ठी 
आदि। 


बन+-जल +ओला ] आकाश से बरसनेवाले 


१ 


वि तट 2 कट कब कक आम हर री मी 33 2 मल लपअब अप 2४ आज पक. र्ककीक कपल अल मील के आज जीव नमक मल 
गज आम मी जज 3 अर] ++- 


न के 


दबा 
स्‍्त्री०[हिं० बन्ना] १ दुल्हिन।२ कस्या जिसका विवाह हो रहा दी । 
स्त्री०(? | १. खेत मे काम करनेवालों को मिलनेवाला खडी फसल का 
कुछ अश। २. उतनी भूमि जिसमे उक्त अश हो। 

बन्हि---स्त्री ० >बहिन (बहिन )। 

बपंस--पु० [हिं० बाप ।-स० अद्ष ] १ पिता की सपत्ति में से पुन्न को मिलने- 
वारा अश। २ वह गुण जो पुत्र को पिता से प्राप्त हुआ मात्रा जाय। 

बप--पु० [सं० वप्तु] बाप। पिता । 
पु०्वप्‌ (शरीर ) | 

अपतिस्मा--प० [अ० बप्टिज्म] नव-जात शिशु अथवा अन्य धर्मावलबी को 
मसीही धर्म मे दीक्षित करते समय होनेवाला एक सस्कार। 

बपना---स ० [स० वपन] वपन करना । बीज बोना । 

बप-मार--वि० [हिं० बाप+मारना] [माव० बपन्‍मारी |] १ जिसने अपने 
पिता का वध किया हो । २ जो अपने पृज्य और बडे व्यक्तियों 
तक का अपकार करने से भी न चुके । बडो तक के सांथ द्रोह या विश्वास- 
घात करनेवाला। 

बपु---पु० [स० वपु] १. शरीर। देह। २. ईश्वर का शरीरधारी छूप। 
अवतार। ३. आकति। रूप। शकलू। 

बपल*---पु० | स० व पृष | देहू। शरीर। 

बपुरा[--वि० बापुरा (बेचारा)। 

बपौती---स्त्री ० [हिं० बाप | औती (प्रत्य०)] १ पिता की ऐसी सपत्ति 
जो पुत्र को उत्तराधिकार के रूप भे मिली हो, मिलने को ही, अथवा उसे 
प्राप्प हो । २ बहू अधिकार जो किसी को अपने पिता तथा पितृ पक्ष 
की संपत्ति पर होता है। 

बप्पा--पु० [ हि? बाप | पिता। बाप। 
पद---अप्पा रे बष्पा - आश्चर्य, दु ख आदि के समय मुंह से निकलनेवाला 
पद । 

बफरना[--अ० [स० विस्फालन] १ अभिमान या गवपर्वक छडने के 
लिए ताल ठोकना था किसी भ्रकार का शब्द करना। २ उत्पात या उपद्रव 
करना । 

बफारा--प्‌ ० [हि० भाष | आरा (भ्त्य०) |१. ओपषधि से युक्त किये गये 
जल को उबालने पर उसमे से निकलनेवाली भाप । ३, उक्त भाष से 
किया जानेवाला सेक। 
क्रि० प्र०--देना ।--लेना। 

३. वे ओषधियाँ जो उक्त कार्य के लिए गरम पानी मे उबाली जाती हैं। 
बफोरी--स्त्री ० [ हि? माप ] भाप से पकाई जानेवाली या पकी हुई बरी । 
[अ० [हिं० बफरना ? | उछलने की किया या भाव | उछाला। 

बबकना--अ० >>बरमकना। (दे०) 
बबर--पु० [अ० ] १ बिल्ली की जाति का एक बिना पूँछवारा वन्य पु 
जो शेर को भी मार डालता है। २ बडा बेर। सिंह। ३ बहु कम्बरू 
जिसपर शेर की खाल की सी घारियाँ बनी हती हैं। 
वि० शेर के साथ विशेषण रूप मे अयुकत होने पर, मयानक और बिकरालू | 
जैसे--बबर शेर। 

बबरी--स्त्री ० [हिं० बवर] १ छटका हुआ बार (विशेष कर धोड़े का) । 

बालों की छट। 
बबा|---पु ० >नवाबा। 


के"; मुको सब्टल>ब>+०>अपणकन . ओबन>+ हल न+ 





ब्बुआ ७२ 














बदनां 





बबुआ--प.० [हि० बाबू ] [स्त्री० बबुआइन, बबुई]१ दामाद और पुत्र | बसकाना--स० [ हिं० बमकना] ऐसा काम करना जिससे कोई बमके। 


के लिए प्यार का भबोधत। (पूरब) २. जमीदार और रईस। रे. 
छोटे लडकों के लिए प्यार का सबोधन। 

बथुई---स्त्री ०[हिं० बबुआ का स्त्री०] १. बेटी। कन्या। २ बड़े 
जमीदार या रईस की लडकी। ३. पति की छोटी बहन। छोटी 
ननद । 

बबुनी--स्त्री ० बबुई। 

बबुर--१० + बबूल। 

बबना--पु० [? | एक प्रकार की छोटी चिडिया जिसका ऊपरी बदन हरा- 
पन लिये सुनहला पीला और दुम गहरी भूरी होती है। इसकी आँखो 
के चारों ओर एक सफेद छल्ला-सा रहता है। 

बबुल--प० [स० बब्यूर] एक असिद्ध कटीला पेड़ जिसकी पतली पतली 
शाखाएँ दतुअन के काम आती हैं। कौकर। 

बबूला[--प ० [दिशा ० | हाथियों के पाँव मे होनेवाला एक प्रकार का फोड़ा । 
वि० समस्त पदो के अन्त मे, उक्त फोडे के समान तना और सूजा 
हुआ। 
पद--आग-बबरा । (दे० ) 
पु०१ -बगूछा। २ -न्बुलबुत। ३ जनबबूला। 

बब्बू--पु० [?] उल्लू (पक्षी)। 
प्‌० [हिं० बाबू ] छोटे बच्चो के लिए प्यार का एक सबोधन। 
(पश्चिम ) 

बभनी [--स्त्री ० - बम्हनी। 

बभूत --स्त्री ० 5१ भमूत। २ -िमूति। 

बच्रवी--स्त्री ० [स० बच्चु+अणू । डीप्‌ ] दुर्गा। 

बस्चु--वि० [स० %/मृ +कु ] १. गहरे भूरे रण का। २ खल्वाट। गजा। 
पु० १. गहरा भूरा रग। २ अग्नि। ३े नेवला। ४ चातक। ५. 
विष्णु। ६ शिव। 

बस्ु-धातु--स्त्री० [स० कमं० स०] १. सोना। स्वर्ण। २ गेरू। 

बल्षु-लोमा (सन)--वि० [स० ब० स०] भूरे बालोवाला। 

बजुबाहन--पु० [स० ब०स०] चित्रागदा के गर्म से उत्पन्न अर्जुन का एक 
पुत्र जो मणिपुर का शासक था। 

बम--पु० [अनु०] १ शितर के उपासकों का वहू 'बम बम' शब्द जिससे 
शिवजी का प्रसन्न होना माना जाता है। 
महा--बम बोलना या बाल जाना शक्ति, घत आदि की समाप्ति 
या अत है जाना। बिलकुल खाली हो जाना। कुछ न रह जाना। 
२ गहनाईवालों का वहू छोटा नगाड़ा, जो बजाते समय बाई ओर 
रहता है। मादा नगाडा। नगडिया। 
पु० |कन्नड बबू बाँस] १ बग्घी, फिटन आदि में आगे की ओर छगा 
हुआ वह लबा बाँस जिसके दोनो ओर थोड़े जोते जाते है। २ इक्के, 
टाग्रे आदि में के वे बॉस या लथोतरे अगर जिनमे घोड़ा जोता है। 
पु ०[अ० बाम्ब] ६. वह विस्फोटक रासायनिक गोला जिसके फूटने से 
घार शब्द होता तथा व्यापक बरबादी और जीव-सहार होता है। २. 
एक तरह की आतिशवाजी जिसमे से जोर का शब्द निकलता है। 

बमकना--अ० [अनु०] १. कुंद्ध होकर जोर से बोलता। २ डीग 


इकना। 


किसी को बमकाने में प्रवृत्त करना। 

बसगीला--पुं० [हि बम+गोला]बम (विस्फोटक तथा रासाधनिक 
गौला)। 
वि०१. आफत का परकाला। २. हो-हल्ला करने वाला। 

जम-चख--स्त्री० [अनु० बम-+चीखना] १- शोरगुल। हल्ला-गुल्ला। 
२ छडाई -झगड़ा। 
क्रि० प्र०--चलना |--चलाता ।--मचना ।--मचाना । 
३. कहा-युनी। 

बसना---स० [स० वमन] १. वमने करना। के करता। २ उगलना। 

बम-पुलिस---१ ०-बपुलिस (सार्वजनिक शीचालय )। 

बस-बाज--वि० [हि० बम -फा० बाज] [माव० बम-बाजी] १. (वायु 
यान) जो बस गिराता हो। २ (व्यक्ति) जो शत्रुओं पर बम फेकता 
हो । 

बस-बाजो--स्त्री० [हि० बम फा० बाजी] बम गिराने या फेफने की 
क्रिया या माव। 

बस-आरी--सत्री० [हिं० बम+-फा० बारीन-"बर्षा] बमो की वर्षा करना। 
बहुत अधिक बम गिराना या फेकना। 

बस-भोला--पु० [हिं० बम+भोला ] महादेव। शिव। 

बस-वर्षक---पु० [हिं० बम +सं० वर्षक ]एक तरह का बहुत बडा हवाई जहाज 
जो बम फेकने के काम आता है। (बॉम्बर) 

बम-वर्षा--स्त्री ० [हि० बम +-वर्षा | बम-बारी। 

बसीठा|--१० --बाँबी (दीमकों की ) | 

ब-मुकाबला---अव्य० [फा०--अ०] १. मुकाबले में। समक्ष। सामने। 
२ तुलना में। अपेक्षया। 

ब-मुश्किल---अव्य० [फा० +-अ० ] कठिनता से। 

ब-सूजिक---अब्य ० [फा०+-अ०] अनुसार। मुताबिक। जैसे--हुँकुम 

बमूजिक। 

बसेल---स्त्री ० [देश ० ] एक प्रकार की मछली। 

बमोट--पु ० “बमीठा (दीमको की बाँबी ) । 

बस्भण---प्‌ ०>-ब्राह्मण । 

बम्हनी--स्त्री ० [स० ब्राह्मण, हिं० बाम्हन] १ छिपकली की तरह का 
एक रेंगनेवाला छोटा पतला कीडा। इसकी पीठ चित्तीदार, काली 
दुम और मुंह लाल चमकीले रग का होता है। २. आँख की पलकों पर 
होनेवाली फुसी! गृहाजनी। बिलनी। ३ वह गाय जिसकी पलकों 
पर के बार झड़ गये हो। ४. ऊख या गन्ने को होनेवाला एक रोग। 
५. हाथी का एक रोग जिसमे दुम सड़-गछकर गिर जाती है। ६ ऐसी 
जमीन जिसकी मिट्टी छाल हो। ७. कुश की जाति का एक तुण। 
वन-कुस । 

बयंड--.० [हिं० गयद-स० गजेन्द्र | हाथी। (डि०) 

बय--स्त्री ०--बय (अवस्था) । 
पु०--बे (विक्रय )। 

बयन --पु० [स० वचन | वाणी। बोली। बात। 

बयना--स० [स० बपन; भ्रा० बयन] खेत से बीज बोना। 
स० [स० वचन] कहनता। 





बनी 


पु०-बैना | 

बयनी--वि ० [हिं० बयन | यौ० के अन्त में; बोलनेवाली। विशेषत” मधुर 
स्वर में बोलनेवाली। जैसे--पिक-बयनी। 

बथर[---१०-- बैर। 

बयल--प्‌ ० [? |सूर्यं। (ढि०) 

बधस--स्त्री ० [स० प्रयष] अवस्था। उमर। 

बयसर---स्त्री ० [देश०] कमखाब बुननेवालों की वह छकड़ी जो उनके 
करघे में गुलने के ऊपर और नीचे लगती है। 

बयसवाला--वि० [स० वयस | हि? वाला] [स्त्री० बयसवाली ] युवक। 
जबान। 

अयस-शिरोससि--पू०  [स० वयस्‌ शिरोमणि] युवावस्था। जवानी। 
यौवन। 

बया--पु ० [सं० बयन- बुनना] पीछे तथा चमकीले साथेवाली एक प्रसिद्ध 
छोटी चिड़िया जो खजूर, ताड, आदि ऊँचे पेड़ों पर बहुत ही कलूापूर्ण 
ढंग से अपना घोंसला बनाती है। 
प्‌ ७ [अ० बागः- बेचनेवाला ] वह जो अनाज तौलने का काम करता 
हो। अनाज तौलनेवाला। तौलया। 

बयाई---स्त्री ० [हि० बया+-आई (भ्रत्य०)]१ बयां का काम या पद। 
२. अन्न आदि तौलने की मजदुरी। तौलाई। 

बयान--प्‌ ० [फा०] १ बात-चीत। २. जिक्र। चर्चा। ३ वृत्तात।हालू। 
४ न्यायारूय में अभियुक्त द्वारा दिया जानेबाला अपना वक्‍सव्य | 
क्रि० प्र०--देना ।->लेना । 

बयाना--प्‌ ० [अ० बे (बिक्री)+फा० आन (प्रत्य०)] वहू धन जो 
किसी वस्तु का खरीददार उसके बेचनेबाले को क्रय-विक्रय की बात 
पक्‍की करने के समय पहले देता है। पेशगी। 
]अ०> बडबडाना। 

बयाबान--प० [फा०] [वि० बयाबानी] १ जगल। २ उजाड़ या 
सुनसान जगह। 

बयाबानी--वि ० [फा०] १. जगली। २ बनवासी। 

बयार--स्त्री ० [स० वायु ] हवा । पवन। 
मुहा०--ययार करता- पा झलकर किसी को हवा पहुँचाना। 
बयार भखना--. प्राणायाम करने के लिए नाक से वायु अंदर खीचना | 
उदा०--ऊधौ हाथ हम कौ बयारि मखिबौ कहो।--रत्नाकर। 

बयारा--पू » [हि० बयार] १. हवा का झोंका। २ अघड़। तूफान। 

वयारि---रत्री ०“ बयार। 

अधारी--स्त्री० बयार (हवा)। 

बपाला--पु० [ स० बाहा|हि० आला] १. दीवार में का वह छेद जिसमे से 
झाँककर उस पार की घटनाएँ या दृश्य देखे जाते है। २ आहूा। 
ताखा। ३. किले की दीवारों पर तोपें रखने के लिए बना हुआ स्थान। 
४, उक्त स्थान के आगे दीवार में बना हुआ वह छेद जिसमे से तोप का 
गोला बाहर जाकर गिरता है। ५. पटे या पाटे हुए स्थान के नीचे 
का खाली स्थान । 

अयासीस--वि० [सं० द्विचत्वारिशतू, प्रा० विचतालीसा] जो गिनती 
मे चालीस से दो अधिक हो । 

पुं० उक्त की सूचक संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है--४२। 
डे--१० 


७३ 





| 


वर 





बयालोसवॉ--वि० [हिं० बयालीस+-वाँ (प्रत्य०)] क्रम, संख्या के 
विचार से बयालीस के स्थान पर पडने या हौनेवाला। 
बयासी--वि० [स० द्वि+अशीलि; प्रा० विअसी] जो गिनती में अस्सी 
से दो अधिक हो। 
पु० उक्त की सूचक सख्या जो अंको में इस प्रकार लिखी जाती है---८२॥। 
बरंग---] ० [वेदा०] मझोले कद का एक जगली पेड़ जिसकी लकड़ी का 
रंग सफेद होता है। पोला। 
पु०[”? | बकतर। कवच। (डिं०) 
बरंगा--पु ० [देश ०) छत पाटते समय धरनों पर रखी जानेवाली पत्थर 
की पटिया या कड़ी की तस्सी। 
बरंगिनी[--स्त्री ०>-वरांगना (सुन्दरी)। 
बर--प ० [स०९/वु (वरण करता)+-अप्‌] १. वह व्यक्ति जिसका 
विवाह हो रहा हो या निश्चित हो चुका हो। वर। 
पद--शर का पासी--विवाह से पहले नहछू के समय का वह पानी जो वर 
को स्‍्तान कराने पर गिरकर बहुता है और जो एक पात्र में एकत्र 
करके कन्या के धर उसे स्नान कराने के लिए भेजा जाता है । 
२ वह आशछीर्वाद-सूचक वचन जो किसी की अभिलाषा, प्रार्थना, 
मनोकामना आदि पुरी करने लिए कहा जाता है। वर। 
क्ि० प्र०--देना ।--माँगना ।--मिलना । 
वि० १ अच्छा। बढिया। २ उत्तम । श्रेष्ठ। 
पु०[स० वट | वट वृक्ष । बरगद। 
पु०[स० बल] १ शक्ति। उदा०प्‌-बर करि कृपा सिंघु उर छाये। 
--पुलसी २ रेखा। लकीर। ३. दृढता था प्रतिज्ञापूर्वक कही हुई बात। 
मुहा०--बर खाँचना -(क) कोई प्रतिज्ञा करने या बात कहने के 
समय अपनी दुंढ़ता सूचित करने के लिए उंगली से जमीन पर रेखा 
खींचता । (ख) किसी काम या बात के लिए जिद या हठ करना । 
पु०[स० वर्ग| १ कपडे या किसी लबी चीज की चौडाई। 
अरज। २ व्यापारिक क्षेत्रो मे किसी तरह या मेल की चीजो में का कोई 
अछग और छोटा वर्ग। जैसे---बनारसी कपडों के व्यवसाय मे लहेंगे, साड़ी 
या साफे का बर। अर्थात्‌ वह क्षेत्र जिसमे केवल लहेंगे, केवल साड़ियाँ 
अथवा केवल साफे आते हैं । 
पु० [देश०] एक प्रकार का कीडा जिसे खाने से पशु मर जाते हैं। 
| अव्य० - 'बरु' (बल्कि या वरन)। 
पु०[फा०] वृक्ष का फल । 
बवि० १. फल से युक्त । सफल। जैसे--किसी की मुराद बर आना, 
अर्थात्‌ मनोकामना सफल होता। २ किसी की तुलना, प्रतियोगिता 
आदि में बढ़कर। श्रेष्ठ। 
सुहा०-- (किसी से) बर आना या पाना--प्रतियोगिता, बल-परीक्षा 
आदि में किसी की बराबरी का ठहरना। जैसे--चालछाकी में तुम उससे 
बर नही सकते (या नहीं पा सकते ) | (किसी से) घर पड़ना बढकर 
या श्रेष्ठ सिद्ध होना । 
अव्य० [सं० बर से फा०] १. ऊपर। जैसे--बर-तर+किसी के 
ऊपर अर्थात्‌ किसी से बढ़कर। २. आगे। जैसे---बर-आमदः--बरामदा। 
३. अरूग। पृथक्‌। जैसे---बर-तरफ। ४. विपरीत या सामने की दिशा 
में। जैसे--बर-अक्स | 


बर-अंग 


बर-अग--स्त्री ० [स० वर । अग ? | योनि। (डि०) 

अरई---प० [हि० बाइ-क्यारी] [स्त्री० बरइन] १ पान की खेती तथा 
व्यापार करनेवाली एक जाति। तमोली। २ इस जाति का कोई 
व्यक्ति 

बरकदाज--प्‌ ० [अ० बक | फा० अदाज़ ] [माव० बरकदाजी ] १. चौकी- 
दार। २ सिपाही। ३े तोपची । 

बरक--रती ० [अ० बर्क | बिजली | विद्युत्‌। 

बरकत--«भ्री ० +०| १ वह शुभ स्थिति जिसमे कोई चीज या चीजें 
इस मात्रा मे उपलब्ध हो कि उनसे आवश्यकताओं की पुति सहज में 
तथा मली-मांति हों जाय। जैसे--(क) घर मे गाय-मेस 
होने पर ही दूध-दही की बरकल होती है । (ख) अब तो रुपए- 
पैसे मे बरकत नहीं रह गई। (ग) ईश्वर तुम्हे रोजगार मे बरकत 
दे। 
मुहा ०-- (किसी से या किसी चीज से ) बरकत, उठना था उठ जाना -+ 
पहले की-सी शुभ स्थिति या सपन्नता न रह जाना। 
२. किसी चीज का बह थोडा सा अश जो हस भावना से बचाकर रख 
लिया जाता है कि इसी मे आगे चलकर और अधिक बृद्धि होगी। जैसे-- 
अब थैली मे बरकत के ११) ही बच रहे हैं, बाकी सब खरच हो गये। 
३ अनग्रहे। जपा। जैसे--यह सब आपके कदमों की ही बरकत है। 
४ मगल-भापित के रूप मे गितते समय एक की सख्या। 
विशेष--प्राय लोग गिनती आरमभ करने पर 'एक' की जगह 'बरकत' 
कहकर तब दो, तीन, चार आदि कहने है । 
५ मगरू--माषित के रूप में अमाव या समाप्ति का सूचक छशब्द। 
जैसे--आज-कल घर मे अनाज (या कपडो) की बरकत ही चल रही है, 
अर्थात्‌ जमाव है, यथेप्ठता नही है। 

बरकती--वि० [० बरकत [ई (प्रत्य०) १ जिसके कारण या जिसमे, 
बरकत हो। बरकतवाला । जैसे---जरा अपना बरकती हाथ लगा दो 
तो रुपा घटेंगे नहीं। २ जो बरकत के रूप में या शुभ माना जाता हो। 
जँसे--बरकती रुपया। 

बरक-वम--स्त्री ० [अ० बक॑ | फा० दम] एक प्रकार की चटनी जो कच्चे 
आम का मूनकर उसके पने में चीनी, मिर्च आदि डालकर बनाई जाती 
है। 

बरकना--अ ० [स० वर्जन] १ अलग या दूर रहना या रखा जाना। 
२ कोई अग्रिय या अद्युम बात घटित न होने पाना। ३ सकट आदि 
से बचने के लिए कही से हटना। ४ बचाया जाता। 
स० >बरकाना। 

बर-करार--वि ० [ फा० बर। अ० करार] १ जिसका अस्तित्व या स्थिति 
बतंमान हा। सकुशल, वतेमान और स्थिर। जैसे---आपकी जिन्दगी 
बर-करार रहे। २ उपस्थित । मौजूद। ३. पुनर्तियुक्त किया हुआ। 
बहाल । 
क्रि० प्र०--राबना ।--रहना। 

बर-काज--प्‌ ० | स० वर । कार्य | शुभ काये। जैसे---मुडन, विवाह आदि 
अवसरों पर हानेवाल कार्य । 

बरकाना--स ० [स० वारण, वारक ] १. कोई अनिष्द अथवा अशध्रिय घटना 
या बात ने होने देना। निवारण करना। बचाना। जैसे--झगडा 


अरश्छा 

बरकाना। २. अपना पीछा छुडाने के लिए किसी को भुलावा देकर 
अलूग करना या दूर रखना। ३े मना करना। रोकना । 

बरख[--पु० >ववर्ष (बरस)। 

बरखना|--अ० >बरसना (वर्षा होना)। 

बरखा---स्त्री० [स० वर्षा] १ आकाश से जछ बरसना। वर्षा। बारिश। 
वृष्टि। २ वर्षा ऋतु। बरसात । 

बरजाना[--स०--बरसाना (वर्षा करना) । 

बरखास [---वि० --बरखास्त । 

बरखास्त--वि० [फा० बरखास्त] |भाव० बरखास्तगी] १- (अधि- 
वेशन, बैठक, समा आदि के सबंध मे) जिसका विसर्जन किया गया या 
हो चुका ही। समाप्त किया हुआ। २ (व्यक्ति) जिसे किसी नौकरी 
या पद से हटा दिया गया हो। पदच्युत । 

बरखास्तगो--स्त्री ० (फा० बरखास्तगी] बरख़ास्त करने या होने की 
अवस्था, क्रिया या माव। 

बर-खिलाफ ---अव्य० [फा० बर | अ० खिलाफ ] उलटे । प्रतिकूल। विपरीत। 

वि० +खिलाफ। 

बरखुरदार--वि० [फा० बरखुर्दार] [भाव० बरखुरदारी| १ सीमाग्य- 
शाली। २ सफल-मनोरध। ३ फला-फूला। सपन्न। 
पु० १ पुत्रा बेटा। २ छोटो के लिए आशीर्वाद सूचक सबोघन। 
विशेष --मूलत बर-खुरदार का शब्दार्थ है--जीविका पर बने रहो, 
अर्थात्‌ खाने-पीने से सुखी रहो। 

बरसखुरदारी--स्त्री ० [फा० बरखुर्दारी] १ बर-खुरदार होने की अवस्था 
या भाव। २ घन-घान्य आदि की यथेष्ठता। सम्पन्नता। ३. आशी- 
वाद के रूप मे, किसी के सौमाग्य तथा सम्पन्नता की कामना। 

बर-गध[-- पु०[स० बर |-गध] सुगधित मसाला। 

बरग--पु० [फा० बर्ग| पत्ता। पत्र। 
[प०--वर्ग। 
पु० वरक। 

बरगद--पु ० [स० बट, हिं० बड] पीपछ, गृलर आदि की जाति का एक 
बड़ा वृक्ष जो भारत में अधिकता से पाया जता है। बड़ का पेड। बट 
वृक्ष। (साथु सतो की क्ृतियों में यहू विश्वास का प्रतीक माना 
गया है।) 

बरगदता--वि० [फा० बरगछत | १ अभागा। हत-माग्य। २ विमुख। 

बरगा--वि० [स० वर्ग] [स्त्री० बरगी] तरह या प्रकार का। जैसे--- 
उसके बरगा और कौन है? 

बरगी ---प० [फा० बरगीर]| १ अश्वपाझू। साईस। २ अध्व। घोडा। 
३, मुगल काले में घोड़े पर सवार होकर शासन व्यवस्था करनेवाला 
सैनिक। 

बरगेल--पु० [देश०| एक प्रकार का लवा (पक्षी) जिसके पजे कुछ 
छोटे होते है। 

बरचर--प्‌ ० | देश ० | देवदार की एक जाति। 

बरचस--प्‌ ० [स० वर्चेस्क ] विष्ठा। मरू। (डि०) 

बरच्छा--१० [स० वर | ईक्षा] कर्या पक्षवार्लों द्वारा वर को वेखकर 
पसद कर तथा बन आदि दंकर वैवाहिक संबध स्थिर करने की एक 
रसम । 





ब्रहछा 


बरछा--पुं० [स० प्रश्यन--काटनेवाला] [स्त्री० अल्पा० बरछी] भाला 
नॉमक अस्त्र | दे० माझा। 

बरछी--स्त्री ० [ हि० बरछा] छोटा बरछा। 

बरफछंत--प० [हिं० बरछा ; ऐत (प्रत्य०)] बरछा धारण करने या चराने 
बाला। माला-बरदार। 

बरजन---प ०. वर्जन (मनाही ) । 

वरजनहार---वि० [हिं० घरजना-+ हार (प्रत्य०) ] मना करने या रोकने- 
वाला! 

बरजना--स ० [स० वर्जन] १. मना करना। रोकना। २ ग्रहण न करना। 
त्यागना। ३ प्रयोग या उपयोग में न छाना। 

अरजति--स्त्री ०-वर्जन (भनाही)। 

बर-जबान --वि/ [फा» बरज़बाँ] जो जबान पर हो अर्थात्‌ रटा हुआ 
हो। कंठस्थ। 

धर-जवासी[>-वि ० बर-जबान । 

बरजस्ता--वि० [फा० बर-जस्त | बात पड़ने पर तुरन्त कहा हुआ। 
बिना पहले से सोचा हुआ (उत्तर, कथन आदि)। 
अध्य० तुरत। फौरन। 

बरजोर--वि० [हिं० बल+फा० जोर] [माव० बर-जोरी] १. प्रबल । 
बलवान। जबरदस्त। २ अत्याचारी । ३ बहुत कठिन या भारी। 
उदा०--को कृपाल बिनु पालि है, बिरुदावलि बर जोर।--तुलसी। 

बर-जोरन--प्‌ ० [स० वर+>पति | हि० जोरना-मिलात] १ विवाह मे 
वर और वधू का गठन्वधन । २. विवाहे। (६०) 
अव्य० जबरदस्ती से। 

बरजोरी--स्त्री ० [ हि. बरजोर] १. बलाल्‌ किया या किसी से कराया 
जानेबाला कोई काम विशेषत कोई अनुचित काम। २ बल-प्रयोग। 
क्रि० वि० जबरदस्ती से। बलपूर्वक। बलात। 

बरठना [---अ० [”? | सडना। 

बरणी[--स्त्री ० [स० वरणीया] कन्या। (राज०) 

बरता--पु० बन्त। 
स्त्री०| स० वर्स | डोरी। रस्सी। उदा० ---डीठि बरत बाँधी अटनु 
चढ़ि धावत न डरात ।--बिहारी। 

बरतसम--प्‌ ० [स० वर्तेन] मिट्ठी, धातु आदि का बना हुआ कोई ऐसा 
आधान जो मुख्यत” खाने-पीने की चीजे रखने के काम आता हो। 
पात्र। जँैसे--कटोरा, गिलास, थाली, लोटा आदि। 
|पु० [स० वर्सन] १. बरतने की क्रिया या भाव। २. बरताव 
या व्यवहार। 

बरतमा--अ ० [स० वत्तेन] १ पारस्परिक सबंध बनाये रखने के लिए 
किसी के साथ आपसदारी का व्यवहार होना। बरताव किया जाना। 
जैसे--माई-बदों या बिरादरी के लोगों से बरतना। २. किसी के 
ऊपर कोई घटना घटित होना । जैसे--जैसी उन पर बरती है, वैसी 
दुश्सन पर भी न बरते। हे. समय आदि के संबंध में, व्यतीत होता। 
गुजरना । जैसे--आज-कल बहुत ही बुरा समय बरत रहा है। ४ उपस्थित 
या कतेंमान रहना। उदा०--छट छूटी बरते ब्रिकराछ।--.कबीर। 
५: खाने-पीने की चीज़ों के संबध में, भोजन के समय छोगो के आगे 
परोसा या रखा जाता। जैसे--दाल बरत गई है (परोसी जा चुकी है) । 


थम वी ली अल जक कक 3 जी कक 





७५ 


बरवा-फरोशी 





स० १. कोई चीज अपने उपयोग, काम या व्यवहार में लाना। 
जैसे---कपड़ा या मकान बरतना। २. दे० 'बरताना'। 
बरतनी--स्त्री० [स० वर्तनी] १. छकड़ी आदि की एक प्रकार की कलम 
जिससे छात्र मिट्ठी, गुलाऊ आदि बिछाकर उस पर अक्षर लिखते हैं 
अथवा तात्रिक यंत्र आदि भरते हैं। २. शब्द लिखने में अक्षरों का 
क्रमा हिज्ज। बर्सनी। (देखे) 
बर-तर--वि० [फा०] [साव० बरतरी] १ श्रेष्ठवर। अधिक अच्छा । 
२. ऊँया। 
बर-तरफ--वि० [फा० बर-अ० तरफ़] [माव० बर-तरफी] १. एक 
ओर। किसारे। अलूग। २. नौकरी, पद आदि से अझग किया या 
हटाया हुआ। बरखास्त किया हुआ। 
बर-तरफो--स्त्री० [फा० बर+अ० तरफ़ी] १. बर-तरफ होने की अवस्था 
या माव। २ पदन्च्युति। 
अरताता--स ० [सं० क्तेन या वितरण] जारी बारी से कोई चीज अथवा 
उसका कुछ अश्य लोगों मे बाँटते चलना। जैसे--सगत में भोजन करने- 
वालों को पूरी बरताना। 
संयो० क्रिण--डालना ।--दैना। 
बरताव--प्‌ं ० [हिं० बरतना का माव०] १ किसी के साथ बरतने की 
किया, ढंग या भाव । २. किसी के साथ क्रिया जानेवाला आचरण 
या व्यवहार। 
बरती--वि० [सं० व्रतिन्‌; हिं० ब्रती] जो ब्रत रखे हुए हो । 
स्त्री०[? ] एक प्रकार का पेड । 
+ स्त्री ० बत्ती 
बरतेल[--प ० [देश०] जुलाहों की वह खूँदी जो करधे की दाहिनी ओर 
रहती है और जिसमे ताने को कसा रखने के लिए रस्सी बी रहती है। 
बरतोर[--पु ०- बाल-तोड़। 
बरदता---अ० दे० बरदाना। 
बरदवान---प्‌ ० [ हिं० बरद+फा० वान (प्रत्य०)] फमखाब बुननेवालों 
के करघे की एक रस्सी जो पगिया में बेंधी रहती है। नथिया' भी 
इसी में बंधी रहती है। 
प्‌ृ०[फा० बादबान] जोर की या तेज हवा। (कह्दार ) 
बरवबाना--स ० [ हिं० बरदाना का प्रे० | बरदाने का काम किसी से कराना । 
बरवा--स्त्री ० [देश ०] दक्षिण मारत में होनेवाली एक प्रकार की रूई। 
पु०[फा० बदे ] गुलाभ। दास। 
पद--अरदा फरोश। (देखें) 
पु०-न्‍बरधा (बेल)। 
बरदाना---स ० [हि० बरधा -बैल] गौ, मेंस आदि पशुओं का गर्भाषान 
कराने के लिए उतकी जाति के नर पशुओ से संभोग या सयोग कराना । 
जोड़ा खिलाना। 
संयो० क्रिया ०--डालना ।--देना । 
अ० गौ, मेस आदि का जोड़ा खाना! 
बरवा-फरोश--पु० [तु० ब्द +-फा० फरोश] [भाव० बरदा-फरोशी ] 
वह व्यक्ति जो गुरामों या दासो का क्रय-विक्रय करता हो। 
अरबा-फरोश्ञी--स्त्री० [फा०] गुलाम या दास खरीदने और बेचने 
का पेशा या व्यवसाय । 








बरवार 





बरदार--वि० [फा०] [भाव० बरदारी] १ उठाने, धारण करने 
या वहत करनेवाला। जैसे--नताज़-बरदार, भाला-बरदार। २ पालन 
करनेवाला। जैसे--फरमा-बरदार। 

बरदारी--स्त्री० [फा०) १. बरदार होने की अवस्था या भाव। 
२ उठाने, धारण करने या वहन करने का काम । 

बरदाइत--स्त्री० [फा०] सहनशीलता। सहन। 

बरदि (या)|---१०--बरघिया। 

बरदुआ--प० [देश०] बरमे की तरह का एक औज़ार जिससे लोहा 
छेदा जाता है। 

बरदौर--पु० [स० वर्द-हिं० और (प्रत्य०) ] 
खाना । 

बरहुू--१प० [स० बलीवद ] बैल। 

बरघा--पु०--बरधा। 

बरघ-मुताग--स्त्री ० [हि० बरघा  मूतना ] वह अकन या रेखा जो 
उसी प्रकार लहस्यिदार हो, जिस प्रकार चलते हुए बैल के मूतने से 
जमीन पर निशान पडता है। गो-मृत्रिका। 

घरधवाना--स ० --बरदवाना । 

बरधा--पु० [स० बलीवदं में का वर्द] बैल। 

बरधाना---स ० ->बरदाना। 
अ०बरदामा । 

बरधिया--पु० [हिं० बरधा] १ वह व्यक्ति जो एक स्थान से दूसरे 
स्थान पर बैलो पर माल ढोकर पहुँचाता हो। २ हलवाहा। 
३ चरवाहा। 

बरधी--पु० [हि० बरधा?] एक प्रकार का चमडा (कदाचित्‌ 
बेल का चमडा) | 

बरनत|--पु ० --वर्ण । 
अव्य० [स० वर्ण] तरह। 
तनु सोहा ।--तुलरी । 
अव्य० वरन्‌ (बल्कि) 

बरन धरम|--पु० दे० 'वर्णाश्रम'। 

बरनन| --१ ० >-वर्णन । 

बरनना[--- स० [स० वर्णन] वर्णन करना। 

बरनर--१० [अ० बनेर] लप, लालटेन आदि का एक उपकरण जिसमे 
बत्ती लगाई जाती है। 

बरना--स ० [स० वरण] १ वरया बध्‌ के रूप मे ग्रहण करना। पति 
या पत्नी के रूप मे रवीकार करना। वरण करना। ब्याहना । २ कोई 
काम करने के लिए किसी को चुनना या ठीक करना। नियुक्त 
करना। ३ दान के रूप मे देना। 
सत्री० [स० वरुणा] काशी के पास की वशणा नाम की नदी। 
पु० [स० वहुण] एक प्रकार का सुन्दर वृक्ष जो प्राय सीधा ऊपर की 
ओर उठा रहता है। बलल्‍ला। बलासी। 
अ०>बलना (जलना)। 
स० बटना (डोरा रस्सी आदि) | 

अरमायरस*--वि० [स० वर्ण] १ अनेक वर्णोँवाला। रग-बिरगा। 
२ अनेक प्रकार का | तरह तरह का। 


गोशाला। मवेशी- 


प्रकार। उदा०--तरुन तमाल बरन 


७६ 


बरफीला तुफास 





बरनाला--पु० [हिं० परनाला] समुद्री जहाज में की वह नाछी जिसमे 
से उसका फालतू पानी निकलकर समुद्र में गिरता है। (लश० ) 

बरति--स्त्री ० [हिं० बरना] बरने अर्थात जलने की अवस्था या भाव। 

बरनी--वि० स्त्री० [स० वरण] वरण की हुई। 
स्त्री० दुल्हिन। उदा०--दुहूँ संकोच सेंकुचित बर बरनी ।--पुलसी। 
| स्त्री ०जच्वरणी | 

बरनेत--रत्री ० [हि० वरनार-वरण करना। एत (प्रत्य॒० )] विवाह 
के मुहर्त से कुछ पहले की एक रसम जिसमे कन्या पक्षवाले वर-पक्ष के 
लोगों को मडप में बुलाकर उनसे गणेश आदि का पूजन कराते है। 

बरपन्मा[--पु० वर्ण । 

बरपटे--वि० [हिं० बर+पटना] (हिसाब) जो पट गया या चुकता 
हो चुका हो। 

बरपा--वि० [फा०] १ जो अपने पैरो पर खडा हो। २ (उत्पात 
या उपद्रव) जो उठ खड़ा हुआ हो। ३ उपस्थित । 

बरफ--स्त्री० [फा० बर्फ] १ हुवा में मिली हुई भाग के अत्यन्त सुक्ष्म 
अणुओ की तह जो वातावरण की ठढक के कारण आकाश में बनती 
और भारी होने के का रण जमीन पर गिरती है। पाला। हिम। तुषपार। 
क्रि० प्र ०--गिरनता ।--पड़ना । 
२ बहुत अधिक ठढक के कारण जमा हुआ पानी जो ठोस और पारदर्शी 
हो जाता है और आघात छगने पर टुकडे-दुकडे हो जाता है। 
क्रि० प्र०--गलता ।--जमना । 
३ कृत्रिम उपायो या रासायनिक क्रियाओं के द्वारा जमा हुआ पानी 
जो बहुत ठढा और ठोस हो जाता है तथा खाने-पीने की चीजे ठढी करने 
के काम आता है। 
क्रि० प्र०--गलना। गलाना।--जमना ।--जेमाना। 
४ उक्त प्रकार से जमाया हुआ दूध, फलो का रस या ऐसी ही और 
कोई चीज । जैसे--मलाई की बरफ। 
वि० जो बरफ के समान ठढा हो। जैमे--सरदी से हाथ बरफ हा गये। 

बरफानी--वि० [फा० बर्फानी] बर्फ से ढका हुआ या युक्त! जैसे-- 
बरफानी तूफान। बरफानी पहाड़। 

बरफिस्तान--पु० [फा० बफ़िस्तान] वह स्थान जहाँ चारो ओर बरफ 
ही बरफ हो। 

बरफी--स्त्री० [फा० बर्फी) १ खोए आदि की बनी एक प्रकार की 
मिठाई जो चौकोर चुकडो के रूप मे कटी हुई होती है और जिसमे 
कभी कभी खोए के साथ और चीजे भी मिली रहती है। जैसे--पिस्ते 
या बादाम की बरफी। २ बुनाई, सिलाई आदि में, चौकौर बनाये 
हुए खड या खने। 
क्रि० प्र०--काटना। 

बरफीदर--वि० [हिं० बरफी +फा० दार (प्रत्य०) | जिसमे बरफी की 
तरह चौकोर खाने बने हो। जैरे--रूईदार अगे में होनेवाी बरफी- 
दार सिलाई। 

बरफौला--वि० [फा० बफ से] [स्त्री० बरफीली] १ जिसमे या 
जिसके साथ बरफ भी हो। २ जो बरफ के योग से या बरफ की तरह 
ठंढा हो। जैसे--बरफीली हवा। 

बरफीला तुफान--पु० [हिं० + अ० ] वह तूफान या बहुत तेज हवा जिसमे 


अरफी -संदेस 





प्राय' बरफ के बहुत छोटे छोटे कण भी मिले रहते हैं। हिम झझावात। 
(ड्लिजर्ड ) 
विशेष--ऐसे तूफान अधिकतर भ्रुवीय प्रदेशों और बरफ से ढके हुए 
पहाडो की चोटियो पर चलते हैं जिनके कारण आस-पास के प्रदेशों मे 
सरदी बहुत बढ जाती है। इनकी गति प्रति घण्टे ५०-६० मील होती 
है और इनमे पड़ने पर किसी को कुछ भी दिखाई नही देता । 

बश्फी-संदेस--पु० [फा० बरफी--ब० सदेदा] एक प्रकार की बगला 
मिठाई। 

बरबंद--वि० [सं० बलवत] (१. बलवानू। ताकतवर। २ 
शाली। ३ उद्दड। उदत। ४ बहुत तेज। प्रवर। प्रचड़। 

बरबट[-..अव्य ०-० बसबंस । 
प०>-बरवट (तिल्‍्ली)। 

बरधट्टा|--१० दे० 'बोडा' (फली)। 

बरबत--१० [भ०] एक तरह का बाजा। 

घरबर--स्त्री ०>बडबड (बकयाद) | 
पु० [अ० बरबेर] [भाव० बर-बरता, बर-बरीयत] १ अफीका का 
एक प्रदेश। २, उक्त प्रदेश का निवासी । 
वि० असभ्य और राक्षसी प्रकृतिवाला। 

बरबरिस्ताम--पु० [अ० बवबेर] अफ्रीका का एक देश। 

बरबरी--स्त्री० [देश०] एक प्रकार की बकरी। 
पु० [अ० बबंर] बरबर देश का निवासी। 

बरबस--अत्य० [स० बल | बण] १ बलपूर्वक। जबरदसती। दुद्ात। 
२ निर्थक। व्यथं। बे-फायदे। 
वि० जिसका कोई वश न चलता हो। लाचार। 

बरवाद--वि० [फा०] [भाव० बरबादी] १ (रचना) जो पूर्ण- 
तथा ध्वस्त हो गई हो। २ (देश) जिसकी अवस्था बहुत ही शोच- 
नीय हो गई हो। ३ (काम) जो चौपट हो गया हो। ४ (व्यक्ति) 
जिसकी सपत्ति उसकेरृहाथ से निकल चुकी हो। जो छुट चुका हो। 

बरबादी--स्त्री० [फा०] बरबाद होने की अवस्था या भाव। तबाही। 
विनाश। 

बरम--पू ० >वर्म (कवच) । 

खरभसन[--- ० वर्मा । 

बर-मला--अव्य० [फा०] १ खुले आम। सबके सामने। २ मन- 
माने ढग या रूप से। जी भरकर। जैसे--किसी को बर-मला खारी- 
खोटी सुनाना। 

बरमहुल--अव्य० [फा०] १ उपयुक्त, ठीक अथवा प्रत्यक्ष अवसर 
या समय पर। २ बदला लेने की दृष्टि से। मेहतोद। 

बरसमा--पु० [देश०] [स्त्री० अल्पा० बरमी] लकडही आदि में छेद 
करने का लोहे का एक प्रसिद्ध औजार। 
पु० [स० ब्रह्म देश०] भारत की पूर्वी सीमा पर बगाल की खारी के 
पूर्व और आसाम, चीन के दक्षिण का एक पहाड़ी प्रदेश | 
पुं०-<वर्म्मा। 

बरमो--वि० [हि० बरमा ज्य्ह्य देश] बरमा-सबधी! बरमा 
का। जैसे--अरमी चावकू। 

पु० बरमा या ब्रह्म देश का निवासी। 


अताप- 


देश 


७ 


बरसना 


स्त्री० बरमा या ब्रह्म देश की भाषा। 
स्त्री० [?] घातु, ऊछकडी आदि में छेद करने का छोटा बरमा। 
स्त्री० [?] गीली नाम का पेड। 

बरम्हबोट--स्त्री० [हि० बरमा (देश) अ० बोटल्नाव] प्राय खालीस 
हाथ लंबी एक प्रकार की नाव। इसका पिछला भाग अगले भाग की 
अपेक्षा अधिक चौडा होता है। 

अरम्हा--पु० १ दे० ब्ह्या। २ 

बरम्हाउ +-पु० -बरम्हाव। 

बरम्हाना--से० [स० ब्रह्म] [भाव० बरम्हाव] (ब्राह्मण का) किसी 
को आशीर्वाद देना। उदा०--तोरन तूर न ताल बर्ज बरम्हावत भाट 
गावत ठाढी |--कैशव। 

बरम्हाव|---पु० [स० ब्रह्म+आवब ट(प्रत्य०)] ६१. ब्राह्मणत्व। 
२ बाह्यण का दिया हुआ आश्षीर्वाद। उदा०--बाएँ हाथ देइ बरम्हाऊ। 
-“जायसी । 

बरराता--अ० नन्यर्राना 

बररे, बररे|---पु०> बर (भिड़)। 

अरवट [--#त्री ० दे० तिलली' (रोग)। 

बरवरू--पु० [देश०] एक प्रकार की भेड। 

धरवह|--पु० [?] मछलियाँ खाकर निर्वाह करनेवाली एक चिड़िया। 

घबरवा--१० -्बरवे। 

बरबे--प० [देश०] एक छद जिसके विषम अर्थात्‌ पहले और तौसरे 
चरणों मे बारह-बारह और सम अर्थात्‌ दूसरे और चौथे चरणों में सात- 
सात मात्राएँ होती हैं। सम चरणों की अतिम चार-चार मात्राओ का 
जगण के रूप मे होना आवश्यक होता है। 

बरष*--पु० >-वर्ष । 

बरषनला]---अ ० ->बरसना । 

बरधा|---स्त्री ० >-वर्षा। 

बरषाना|---स ० >बरसाना । 

अरघासन---पु० [स० वर्षाशन] साल भर की भोजन सामग्री जो एक 
व्यक्ति अथवा एक परिवार के लिए यथेष्ट हो। 

बरस--पु० [स० बर्ष| १ उतना समय जितना पृथ्वी को सूर्य की पूरी 
एक परिक्रमा करने मे छगता है अर्थात्‌ १६५ दिन ५ घटे, ४८ मित्रट 
और ४५ ५१ सेकड का समय। २ ३६५ दिना का समय। अधिवर्ष 
में इसका मान ३६६ दिनो का होता है। ३ विभिन्न पचागो के द्वारा 
नियत ३६५ दिनों का विशिष्ट समय। 
पव--बरस दिन का दिन->ऐसा दिन। (त्योहार आदि) जो साहू में 
एक ही बार आता हो । बड़ा त्यौहार । 
४ बह समय जो एक जन्म-दिन से दूसरे जन्म-दिन तक में पडता है। 
जैसे---इस समय इसका तीसरा वर्ष चल रहा है। 

बरस गाँठ--स्त्री ० [हिं० बरस |-गाँठ] १. वह तिथि या दिन जो किसी 
के जन्म की तिथि या जन्म-दिन के क्रमात्‌ ३६५-३६५ दिनों के उपरात 
पडता है। साल-गिरहे। २ उक्त दिन मनाया जानेवाला उत्सव। 

बरसना--अ० [स० वर्षण] १. बादलों से जल का बूंदों के रूप मे 
गिरना। वर्षा होता। २ वर्षा के जल की तरह ऊपर से कणों या छोटे- 
छोटे टुकडो के रूप मे गिरता। जैसे--मकानों पर से फूल बरसना। 


दे० बरमा। ३ दे० बर्म्मा। 


बरस-वियावर 


३ बहुत अधिक मात्रा, मान या सख्या मे लगातार आना या आता रहता। 
जैसे-- (क) किसी के घर रुपए बरसना, किसी पर लाठियाँ बरसना 
(निरतर लाठियो का प्रहार होना) । 
सुहा ०--- (किसी पर) बरस पड़ना >बहुत अधिक क्रुंद्ध होकर लगातार 
कुछ समय तक डॉटने-डपटने लगना । बहुत कुछ बुरी-भली बातें कहने 
लरूगना। जैसे --तुम तो जरा-सी बात पर नौकरों पर बरस पड़ते हो। 
४. बहुत अच्छी तरह और यथेष्ठ मात्रा से दिखाई देता या खब प्रकट 
होना। जैसे--किसी के चेहरे से शरारत बरसना, किसी जगह शोभा 
बरसना। ५ दांये हुए गल्‍्ले का इस प्रकार हवा मे उड़ाया जाना जिसमे 
दाना-भूसा अलग अलग हो जाय। ओसाया जाना। डाली होना। 

बरस बियावर--वि० स्त्री० [हि० बरस+बियावर (बच्चा देनेवाली ) ] 
हर साल बच्चा देनेवाली (मादा चौपाया)। 

बरसाइत|--स्त्ती ०--ब रसायत । 

बरसाइन]---वि० स्त्री०--बरस-बियावर। 

बरसाऊ--वि० [हिं० बरसना-+-आऊ (प्रत्य०)] बरसनेवाला। वर्षा 
करनेवाला (बादल आदि) । उदा०--हछू के बरसाऊ एक बार तौ 
बरसते ।---सेनापति । 
वि० [हिं० बरसाना] बरसानेवाला। वर्षा करनेवाला। 

बरसात--स्त्री० [स० वर्षा; हिं० बरसना--आत ([प्रत्य०)] [वि० 
बरसाती | ( वह समय जिसमे आकाश से जल बरस रहा हो। जैँसे--- 
बरसात हा रही है, अभी घर से मत सिकछो। २ वर्ष की वह ऋतु 
या मास जिसमे प्राय पानी बरसता रहता है। वर्षाकाल। ३ वर्षा। 

बरसाती--वि० [हिं० बरसात |ई (प्रत्य० )] १ बरमात-सबधी। 
बरसात का। जैस--बरसाती हवा । २ बरमात के दिलों में होने- 
वाला। जैमे--बरसाती तरकारियाँ, बरसाती मेले। 
स्त्री० १ प्लास्टिक, मोमजामे आदि का बना हुआ एक प्रकार का ढीला- 
ढाला कोट जिसे पहनने से शरीर या कपड़ों पर वर्षा के पानी का कोई 
प्रभाव नहीं पठता। २ कोठियों आदि के प्रवेश-द्वार पर बना हुआ वह 
छायादार थोडा-सा स्थान जहाँ सवारियाँ उतारने के लिए गाड़ियाँ 
खड़ी होती हैं। 
प्‌० १ घोड़ों का एक रोग जो प्राय बरसात में होता है। २ प्राय 
बरसात के दिनो मे आँख के नीचे होनेवाला एक प्रकार का घाव। 
३ बरसात के दिनों में पैर की उँगछियों मे होनेवाली एक प्रकार की 
फूसियाँ। ४ चरस नाम का पक्षी) चीनी मोर। 

बरसाना--स ० [हि० बरसना का प्रे०] १ बादलों का जल की वर्षा 
करना। २ वर्षा के जल की तरह लगातार बहुत सी चीजें ऊपर से 
नीचे गिराना। जैसे--फूल बरसाना। ३ बहुत अधिक मात्रा मे 
चारो ओर से प्राप्त करना। ४ अनाज को इस प्रकार हवा 
में गिराना जिससे दाने और भूसा अछूग हो जायेँ। ओसाना। डाली 
देना। 
सयो० कि०--डालना ।--देना। 

बरसायत---स्त्री ० >बरसाइत । 
स्त्री० [स० वठ+सावित्री]) जेठ बदी अमावस जिस दिन स्त्रियाँ 
वट-शावित्री की पूजा करती है। 

बरसावना [--स ० बरसाना। 





बरही-मुल 


बर्रासधा--पु० [हि० बर--ऊपर-+हिं० सीग] वह बैल जिसका एक 
सीग खड़ा और दूसरा सीग नीचे की ओर झुका हुआ हो। मैना ) 
|१०--बारहसिगा | 

बरसी--स्त्री० [हिं० बरस | ई (प्रत्य०)] १. वह तिथि था दिन जो 
फिसी के मरने की तिथि या दिन के ठीक वर्ष-वर्ष बाद पडता हो। 
२ मृत का वाधिक श्राद्ध। 

बरसीला*---वि० [हिं० बरसना | ईला (प्रत्य०)] बरसनेवाला। 

बरसू--पु० [देश०] एक प्रकार का वक्ष । 

बरसोविया--पु० [हिं० बरस +-ओदिया (प्रत्यम०)] बहू नौकर जो 
साल मर तक कोई काम करने के लिए नियुक्त हुआ या किया गया हो । 

बरसोंडी[---स्त्री, [बरस+औडी (प्रत्य०) ] वर्ष के वर्ष दिया जाने- 
वाला कोई कर। 

बरसोंहा*--वि० [हि० बरसना+ऑंहा (प्रत्य०) | [स्त्री०] बरसौही। 
१ बरसनेवाला। २ जो बरसने को हो। 

बरहूँटा--पु० [स० भटाकी] कडवे भटे का पौधा और फल। 

बरह--पु० [फा० बगे] दल। पत्ता। पत्ती। 

बर-हक--वि० [फा०] १ जो धर्म अथवा न्याय की दृष्टि मे बिलकुल 
ठीक हो। २. उचित। वाजिब। 

बरहता--वि० [फ्रा० वहन ] जिसके शरीर पर कोई वम्त्र न हो। 
नगा। नग्न। 

बरहमंड[--१० ज्ञह्याड। 

बरहस--वि० [फा० बरहा] [भाव० बरहमी] १ जिसे क्रोध आ 
गया हो। क्रुद्ध। २ भडका हुआ। उत्तेजित। क्षुब्ध। ३ इघ्र- 
उधर छितरा या बिखरा हुआ । 
पु० बह । 

बरहा--पु ० [हिं० बहुना] [रत्री० अल्पा० बरही ] छोटी नाली विशेषत 
दो भेड़ो के बीच की वह छोटी नाली जिससे खेतो को पानी पहुँचापा 
जाता है। 
पु० [स० वहिं] मोर। 
पु० [हि० बरना->बटना ] मोटा रस्सा। 
पु० [स० वाराह| [स्त्री० भल्पा० बरही] जगली सूजर। 

बरीह--पु० >बरही | 

बरहिया।--स्त्री ० [हि० बारह ? ] पुरानी चाल की एक प्रकार की नाव 
जो बारह हाथ चौडी होती थी। 

बरही--पु० [स० वहि] १ मयूर। मोर। २ साही नामक जगली 
जतु। ३ अग्नि। आग। ४ कुक्कुट। मुरगा। 
स्त्री० [हिं० बारह] १ सतान उत्पन्न हाने से बारहवाँ दिन। 
२ उक्त अवसर पर प्रसूता को कराया जानेवाला स्तान और उसके 
साथ होनेवाला उत्सव। 
स्त्री० [हिं० बरहा ] १ पत्थर आदि भारी बोझ उठाने का मोटा रस्सा। 
२ जछाने की लकडियों का गढठर। ईंधन का बोझ (रस्सी से बंधी 
होने के कारण) । 

बरही पीड़--पु० [स० बहि पीड] मोर के परो का बना हुआ मुकुट। 
मोर-मुकुट । 

अरही-मुल--पु० [स० बहिमुख] देवता। 





बरहोँ ७९ 


बरहीं।---पु० [हि बरती | >च्यरही (सन्तान-जन्म की) । 

बरह्ाना--स ० >्यरम्हाना । 

बरॉडल--पु० [देश०] १ जहाज का वहू रस्सा जो मस्तूल को सीधा 
खड़ा रखने के लिए उसके चारा ओर ऊपरी सिरे से झेकर नीचे तक 
जहाज के भिन्न भिन्न भागों मे बाँबे जाते हैं। बराडा। २ जहाजी 
काम में आनेवाऊा कोई रस्सा। 

बराडा--पू० १ दे० बरामदा। दे० बंडल। 

बरांडो--स्त्री० [अ० बडी ] आइ, सेब आदि के रस से बनाई जानेवाली 
एक तरह की बढ़िया शराब। 

बरा--पु० [स० बरी] उड़द की पीसी हुई दाल का बना हुआ टिकिया 
के आकार का एक प्रकार का पववान्न जो घी या तेल मे पकाकर यो 
ही अथवा दही, इमली के पानी आदि मे डालकर खाया जाता है। बड़ा। 
पु०-बरगद (बट वक्ष ) | 
पु०चबहेटा (बाँह पर पहनने का गहना ) । 

बराई[--स्त्री० [देश०] एक प्रकार का गन्ना। 
स्त्री०-+बडाई। 

बराक--पु० [स० वराक] १ शिव। २ युद्ध। लडाई। 
वि० £ शोचनीय। सोच करने के योग्य। २ अधम। नीच। 
हे पापी। ४ बापुरा। बेचारा। 

बराट--पु० [स० वराठिका] कौडी। 
बि०-वराट । 

अराड़ी---स्त्री ० >बरारी | 

बदात--स्त्री० [स० वरयात्रा] १ विवाह के समय बर के साथ कन्या- 
बालों के यहाँ जानेवाले लोगो का दल या समृह जिसके साथ शोभा के 
छिये बाजे, हाथी, घोड़े आदि भी रहते है। जनेत | 
कि० प्र०--आना।--जाना ।--निकलनता ।--सजना |---सजाना । 
२. एक साथ मिलकर या दल बाँधकर कही जानेवालों का समूह। 

बराती--वि० [हिं० बरात+ई (प्रत्य०)] बरात-सबंधी। 
पु० किसी बरात में सम्मिलित होनेबाला या होनेवाले व्यक्ति। 

बरान कोट--पु० [अ० ब्राउन कोट] १ सिपाहियों के पहनने का 
एक प्रकार का बड़ा तथा ढीला-डाछ्ा ऊनी कोट। २ ओवर 
कोट । 

बराना--स० [स० वारण] १. प्रसंग आने पर भी कोई बात न कहना। 
सतऊूब छिपाकर इधर-उधर की बाते कहना। बचाना। २ बहुत 
सी वस्तुओं या बातों से से किसी एक वस्तु या बात को किसी कारण 
छोड देना। जान-बुझकर अलग करता। बचाना। ३ रक्षा या हिफा- 
जत करना। खँंतो में से चूहे आदि मगाना। 
स० [स० बरण] बहुत सी चीजों से से अपनी इच्छा के अनुसार चीजे 
चुसना। देख-देखकर अलूग करना। घुनना। छाँटना। 
स० [स० वारि] १ सिलाई का पानी एक नाली से दूसरी नाली में 
ले जाना। २ खेतों मे पानी देना। सींचना। 
 स०>-बालना (जलाना) 

बराबर--वि० [फा० वर] १. गुण, महत्त्व, मात्रा, मान, मूल्य, संख्या 
आदि के विचार से जो किसी के तुल्य या समान हो! जो तुलना के 
वियार से न किसी से घटकर और ने किसी से बढ़कर ही हो। समान। 








घरासदा 


जैसे--- (क) दोनों किताबे तौल में बराबर हैं। (ख) कानून की दृष्टि 
में सब लोग बराबर हैं। 
पद---बरावर कार (क) पूरी तरह से तुल्य या समान। जैसे--इसमें 
आटा और चीनी दोनों बराबर के पडते है। (ख) बहुत कुछ तुल्य 
या समान। जंसे--जब छड़का बराबर का हो जाय, तब उसे मारना- 
पीदना नही चाहिए। 
२ (तल) जो ऊँचा-नीचा या खुरदुरा न हो। सम। जैसे--वह 
सारा मैदान बराबर कर दो। ३. जैसा होता हो या होना चाहिए, 
बसा ही । उपयुक्त और ठीक। ४. (ऋण या देन) जो चुका दिया 
गया हो। चुकता किया हुआ। ५. जिसका अत या समाप्ति कर दी 
गई हो। जैसे---सारा काम बराबर करके तब यहाँ से उठना। 
मुहा०-- (कोई चीज) बराबर करना-नसमाप्त कर देना। अंत कर 
देना। न रहने देता। जैसे--उन्होंने दो ही चार बरस मे बड़ों की सारी 
सम्पत्ति बराबर कर दी। 
६ जिसके अमाव, त्रुटि, दोष आदि की पूति या सशोघधन कर दिया 
गया हो। जैसे---गड़ढे बराबर करना। 
क्रि० वि० १ ब्रिना रुके हुए। लगातार। निरतर। जैसे--बराबर 
आगे बढते रहना चाहिए। २. एक ही पक्ति या सीध मे। जैसे--- 
सड़क के दोनो तरफ बराबर पेड़ रंगे हैं। ३ सदा। हमेशा। जैसे--- 
हमारे यहाँ तो बराबर ऐसा ही होता आया है। ४ पादर्य म। बगल 
में। जैसे--दुश्मन की कब्र तेरे बराबर बनायेगे।---दाग। ५. बिना 
किसी परिवर्तन, विकृति आदि के! ६ साथ-साथ। जैसे--भीड़ 
में हमारे बराबर रहना; इधर-उधर मत हो जाना। ७ किसी से समान 
दूरी पर। समानान्तर। जैसे--इसी के बराबर एक और रेखा खीचो। 

बराबरी--स्त्री० [हिं० बराबर ।-ई (प्रत्य०)] १ बराबर होने की 
अवस्था या माव। समानता। लुल्यता। 
पद---बरावरी से -अशपत्र, राज-कऋण, विनिमय आदि की दर के 
सर्बंध में अकित, नियत या वास्तेबिक मूल्य पर। (ऐंट पार) 
२ गुण, रूप, शक्ति आदि की तुल्यता या सादुश्य । ३ वह स्थिति जिसमे 
प्रतियोगिता, स्पर्धा आदि के कारण किसी का अनुकरण करने, अथवा 
उसके तुल्य या समान बनने का प्रयत्न किया जाता है। मुकाबला। 
जैसे--यह तो बडे आदमी हैं, तुम उनकी क्‍या बराबरी करोगे? 
४. कुइती, खेल आदि के परिणाम की वह स्थिति जिसमे दोनो पक्ष न तो 
एक दूसरे को हरा ही सके हों और न एक दूसरे से हारे ही हों। 

बरासद--वि० [फा०] १. जो बाहर निकला हुआ हों। बाहर आया 
हुआ। सामने आया हुआ। २ (चुरा या छिपाकर रखा हुआ पदार्थ) 
किसी के घर से दूंढकर बाहर निकाला या सामने छाया हुआ। 
जैसे--किसी के यहाँ से चोरी या चोर-बाजारी का माल बरामद होना । 
सत्री० १ बाहर जानेवाला मारू। निर्ग्रात। २. प्राप्य धन की होने- 
बाली वसूली। ३. दे० 'गग-बरार। 

अरासदगी--स्त्री० [फा०] १. बरामद होने अर्थात्‌ बाहर आने की 
किया या भाव। २. खोये या चोरी गये हुए माल का किसी के पास से 
निकाल कर प्राप्त किया जाना। ३. विदेशों को माऊछ मेजने की क्रिया 
या भाव। निर्यात करता। 


बरासबा--प ० [फा० बरासद.] १. मकानों में वह छाया हुआ लंबा 


बराम्हन 


सेंकरा भाग जो कुछ आगे या बाहर निकला रहता है। बारजा। छज्जा। 
२ ओसारा। दालहान। 

बराम्हन|--१ ० - ब्राह्मण । 

बराय--अव्य० [फा०] बास्ते। लिए। निमित्त। जैसे--बराय नाम-> 
नाम-मात्र के लिए। 
अव्य०- बराह। 

बरायन-- पूं० [स० बर |-आयन (प्रत्य०)] लोहे का वह छल्ला जो 
ब्याह के समय दूल्हे के हाथ में पहनाया जाता है। 

बरार--१० [फा०] वह चदा जो गाँवो मे हर धर से लिया जाता 
हो। 
वि० [फा०] १. लानेवाला। २. किसी के द्वारा लाया हुआ। जैसे-- 
गग-बरार जमीन! 
पू० [देश०] एक प्रकार का जंगली जानवर। 

बरारक--प्‌ ० [डि०] हीरा। 

बरारी--स्त्री० [स० वरारी] सपूर्ण जाति की एक रागिनी जो दोपहर 
मे गाई जाती है। कोई कोई इसे मैरव राग की रागिनी मानते हैं। 
स्त्री० [हिं० बरार प्रदेश] बरार या खानदेश मे होनेवाली एक 
प्रकार की रूई। 

बरारी हयाम---पु० [स०] सपूर्ण जाति का एक सकर राग जिसमे सब 
शुद्ध स्वर रूगते है। 

बराव--प.० [हिं० बराना +आव ([प्रत्य०) ] बराने अर्थात्‌ बचकर रहने 
की क्रिया या भाव। परहेज। जैसे--घर में किसी को चेचक निकलने 
पर कई तरह के बराव करने पडते है। 

बरास--पू० [स० पोतास ? ] एक तरह का अत्यधिक सुगधित कपुर। 
भीमसेनी कपूर। 
पु० [अ० ब्रेस] जहाज में पाल की वह रस्सी जिससे पाल का रुख 
घुमाया जाता है। 

बराहु--क्रिं० वि० [फा०] १ मागे या रास्ते से। २ जरिये से । 
द्वारा। ३ के तौर पर। के रूप मे । जैसे--बराह मेहरबानी रास्ता 
दे दे। ४ के विचार से। जैसे---बराह इसाफ--इसाफ के विचार 
से। 
प० -वराह। 

बराहुसन|--प ०- ब्राह्मण । 

बराहिल-- १० [?| करिन्दा। गुमाइता। (पूरब) 

बराही--स्त्री ० [देश०] एक प्रकार की घटिया ऊख। 

+ स्त्री० -वाराही। 

अरिआ--वि०- बलवान। 

बरिआई[--स्त्री० [हि० बरियार] १ बलवान होने की अवस्था 
या भाव। शक्तिमत्ता। २ बल-प्रयोग। जबरदस्ती। 
अव्य० १ बलपूर्वक। जबरदस्ती। २ विवशता के कारण अथवा 
स्वय को न रोक सकने पर। उदा०--कहत देव हरषत बरिआई।-- 
तुलसी | ॒ 
| स्त्री० - बडाई। 

बरिआत | --- स्त्री ० - बरात। 

बरिच्छा|--- १०-बरच्छा। 











बदला 








निनिनिनीन-+ ने ५ >3००५-०«-«+-०५-००---..--०+..० +--०-->+नलनना “मा पड जन आल के मा. ब 


बरिबड--वि० [स० बलवत] १ बलवान। बली। २. प्रचड। विकट। 
३ प्रतापशाली | 
बरियाई---स्त्री ० -बरिआई। 
[अव्य ० --बरिआई। 

बरियात|--स्त्री ०बरात | 

बरियार--वि० [हिं० बल +आर (प्रत्य०) ] [स्त्री०, माव० बरियारी] 
बल में जो किसी से अधिक हो। बली। 

बरियारा---१० [स० बला] दे० “बनमेथी' (पौघा)। 

बरियाल--प१० [देश०] एक प्रकार का पतला बाँस। बाँसी। 

बरिल]-- १० [छििं० बडा, बरा] पकौडी या बडे की तरह का एक पक- 
बान। 

बरिलना--१ ० [देश०] एक तरह की क्षारयुक्त मिट्टी। सज्जी। सज्जी- 
खार। 

बरिषना |--अ० - बरसना। 

बरिषा]-- स्त्री ० वर्षा। 

बरिष्ठ---वि ० -..वरिए्ठ । 

बरिस!---१ ०--बरस | 

बरी--स्त्री० [स० वरी; प्रा० बडी] १ गोरू टिकिया। बटी। 
२ उडद, मूंग आदि की पीठी आदि की बडी। ३ भट्टी में फूंक हुए एक 
तरह के ककड जिन्हे बुझा तथा पीटकर दीवारों भादि की गोंडाई और 
पलस्तर के लिए मसाला तैयार किया जाता है। 
सत्री० [स० वर दूल्हा] गहने, कपडे, मेवे और मिठाइयाँ जो दूल्हे 
की ओर से दुलहिन के यहाँ मेजी जाती है। 
सत्री० [देश०] एक प्रकार की घास जिसके दाने बाजरे मे मिल्गकर 
राजपूताने की ओर गरीब लोग खाते हैं । 
वि० [फा०] १. अभियोग, दोष आदि से छूटा हुआ । बरी। मुक्त। 
२ निर्दोष। बेकसूर। ३. अरूग। पृथक । ४ आज़ाद। स्वतत्र। 
[ वि०--बली (बलवान) । 

बरीस|[--१ ०- बरस। 

बद--अव्य० [स० वरज”-श्रेष्ठ, मला] १. भले ही। ऐसा हो जाय तो 
हो जाय। चाहे। २. वरन्‌। बल्कि। 

बर्आ--प्‌ ० [स० वटुक, प्रा० बड़ुअ] १ जिसका यज्ञोपवीत तो हो 
गया हो, पर जो अभी तक गृहस्थ न हुआ हो। ब्रह्मचारी। बटु। २ 
उपनयन या यज्ञोपवीत के समय गाये जानेबाले गीत। ३ 
उपनयन या यज्ञोपवीत नामक सस्कार । ५. ब्राह्मण का बालक | 
५ पढ़ो-लिखा और पुरोहिताई करनेवाला ब्राह्मण । 
पु० [हिं० बरना] मूंज के छिलके की बनी हुई बद्धी जिससे डलियाँ 
आदि बनाई जाती है। 

बरुक [--अव्य ० - बढ | 

बरुन---प्‌ ०--वरुण । 

बरना--पु ०--बरना (वक्ष )। 
स्त्री०--वरुणा (नदी)। 

बदनी--स्त्री० [देश०] १ वट-वृक्ष की जटा । (पूरण) 
+स्त्री०--बरौनी। 

बरला[---१ ०--बल्ला (लबा काठ )। 


भदजा 


बंदवा[---प्‌ ०>-बरुआ | 

बकथ--प्‌ ०-८ वरूथा 

बकथी--स्त्री० [स० वह्थ] एक नदी जो सई और गोमती के बीच 
में है। 

बरेंडा--स्त्री० [स० वरडक-न्‍्गोला, गोल रूकडी] [स्त्री० अल्पा० 
बरेडी] ६ छाजन के नीचे रूम्बाई के बल लगी हुई लूकडी । बलीडा। 
२ खपरैल या छाजन के बीचवाला सबसे ऊँचा भाग । 

बरे-अब्य ०» [स०५/बल, हि बर] १ जोर से। २. ऊंचे स्वर से। 
बलपुर्वक। ३ जबरदस्ती। ४. बदले में। ५. निमित्त। लिए। 
बास्ते। 

बरेखी--स्त्री ० [हिं० बाँह ।-रखना] बाँह पर पहनने का एक गहना । 
सत्री० [हिं० वर | रक्षा] विवाह-सबंध निदिचत और स्थिर करने 
के लिए बर या कन्या देखना। विवाह की ठहरौनी। 

बरेच्छा--प्‌ ०--बरच्छा । 

बरेजा--पु ० [स० बाटिका, प्रा० बाडिअ] पान का भीटा। 

अरेठा(--प्‌ ० [स० वरिष्ठ ?] धोबी। 

बरेत---पु०:- बरेंता। 

बरेता--पु० [हि० वरना, बटना +एत (प्रत्य०) | 
बरेती | सन का मोटा रस्सा। नार। 

बरेदी|--प१ ० [देश०] चरवाहा। 

बरेषो--रत्नी० बरेखी। 

बरेहा[--पु० बरेडा। 

बरं--हत्री० [हिं० बार बाल | १ आल की जड़ का पतरूा रेशा। 
(रगरेज) २ एक प्रकार की घास । 

बरोफक--पु० |हि० बर-रोकना] १ विवाह-संबध निश्चित होने के 
पहले होनेवालआ एक कृत्य। विशेष दे० बरच्छा'। २ वह धन जो 
उक्त अवसर पर कन्या-पक्ष की तरफ से वर-पक्षवालो को दिया 
जाता है। 
अव्य० [फा० ब +हिं० रोक] बिना किसी रोक-टोक या बाघा के । 
*पृ० [स० बछौक | सेना। 

बरोज[--स्त्री० |[स० बट।ज] बरगद की जटा। बरोह। 

बरठा--पु० [|स० द्वार |कीष्ठ; हि० बार।कोठा] १ 
पीरी। 
पव--बरोठे का चार - विवाह के समय होनेयाली द्वार-पूजा । 
२, दीवानखाना। बैठक । 

घरीक्षा---१० [देश० | बह खेत जिसमे पिछली फसल कपास की हुई हो। 

अरोबर[---वि०- बराबर । 

बरोह--स्त्री० [स० वा |-रोह आनेवाऊा ] बरगद के पेड के ऊपर की 
डालियों में टंगे हुए सूत या रस्सी के जैसा बहू अंग जो क्रमशः नीचे की 
ओर झ्ुकता तथा जमीन पर पहुँचकर जम जाता तथा नये वृक्ष का रूप 
धारण करता है। 

बरोही--अव्य ० [हिं० बर-बरलू| १. किसी के बल या आधार पर । 
२ बलपूर्वक। 

बरोछी--स्त्री० [हिं० बार+आओोछना ] वह कूंची जिसमे सूअर के बाल 
लगाये गये हो। 

४>-१ ९ 


स्त्री० अल्पा० 


ड्योढी । 


<१ै 


38४०-४४ जज ल्परक, 


बर्यरक 


ने अजनननन्‍ीनन+ जल ऑल मल कक मल 2 ््कू् चना जब ब* 


बरौखा--पु० [हिं० बड़ा+-ऊ्ख ] एक प्रकार का बड़ा गन्ना। 

बरोठा---पु ० >बरोठा । 

बरौनी--स्त्री० [सं० बरण>ठॉकना] पलकों के आगे के बालों की 
पक्ति। 

बरौरी--स्ज्री० [हिं० बडी-बंरी| बड़ी या बरी नाम का पकवान । 

बर्क--स्त्री० [अ० बर्क] बिजली। विद्युत। 
वि० १. बहुत जल्दी काम करनेवाछा। तेज । २. (पाठ) जो इतना 
कठस्थ हो कि तुरन्त कहा या सुनाया जा सके। 

बर्कत|-- स्त्री ० >बरकत। 

उर्कर--प्‌ू ० [सं० वर्कर] १ बकरा। २. पशु का बच्चा। ३ हँसी- 
मजाक। 

बर्की---वि० [अ० बर्की] बर्क अर्थात्‌ बिजरी-सबंधी। विद्युत्‌ का । 

बर्लास्त---वि० [माव० बर्खास्तगी |--बरखास्त। 

बगगं--पु० [फा०] दल। पत्ता। पत्ती। 

बर्छा---प्‌ ०-"बरछा। 

बजे *---वि० [स० वर या वये] अपने वर्ग में श्रेष्ठ । उदा०--श्यास 
आदि कवि बर्ज बखानी |--तुलूसी 

बर्जना---स ० >-बरजना। 

बर्णन--पु ० वर्णन । 

बर्णना--स० [हिं० वर्णन] वर्णन करना। बयान करना। 

बरती--पु०>-ब्रत । 

बरलेन--पु ०--बरतन | 

बर्तंना---स ० --बरतना। 

बर्ताव---१ ०--बरताव । 

बर्द--पु० [स० वलूद] बैंल। 

बर्देवानी--स्त्री ० [ बर्दवान (स्थान)] पुरानी चाल की एक प्रकार की 
तलवार जो कदाचित्‌ बर्दवान में बनती थी। 

बर्दाइत---स्त्री ०“बरदाश्त । 

बन [--7 ०>-बर्ण । 

बर्न्प--वि ० -वर्ण्य । 

बर्फ--पु० 5 बरफ । 
विशेष-- बर्फ' के समी विकारी रूपो के लिए दे० 'बरफ' के विफारी 
रूप। 

बर्बेट---प० [स०९/बब (गति)+-अटन्‌ | राजमाष । 

बर्वटी--स्त्री० [सं० बबंट+डीप्‌] १ राजभाष। २ वेश्या। 

बर्धर---पु० [स०५/बबूं (जाना)+अरन्‌ ? ] १ प्राचीन काल में, आयों 
से भिन्न कोई व्यक्ति। २ उत्तर काल मे कोई ऐसा व्यक्ति जिसमें 
आर्यों के से गुण न हो, बल्कि जो असम्य, कर और हिसक हो। जंगली 
व्यक्ति। ३ जगली जातियों का नृत्य। ४ अस्त्रो आदि की झ्षकार। 
५. सगीत मे, कर्ताठकी पद्धति का एक राग। ६ घुँघराले बारू। 
७. एक तरह का पौवा। ८. एक तरह की मछली । ९. एक तरह का 
कीड़ा । 
वि० [भाव० बर्बरता] १. जो असम्य, क्र, जंगली और हिंसक हो। 
२. उद्धत। उद्ृड। ३. घृंघराऊला (बार) । 

बबं रक--प० [सं०] एक प्रकार का नक्षत्र जिसे शीत चन्दन मी कहते है । 


बर्बरता 


बब्ंरता--स्त्री० [स० बबर+तल -+ टापु] १ बबंर अर्थात्‌ परम 
असम्य, क्र तथा हिंसक होने की अवस्था या भाव | २. बर्बर व्यक्ति 
का कोई विशिष्ट आचरण या कार्य। 

बबंरा--स्त्री० [स० बर्बर+टापू] १ बर्बरी । बन-तुलसी। २ एक 
प्रकार की मकक्‍्लखी। २ एक प्राचीन नदी । 

अबंरी--स्त्री० [सं० बबेर | डीप| १ बन छुलसी | २ ईगुर। सिदूर। 
३. पीछा चन्दन। 

बर्रा|--पु०- बरें। 
पु० [हि बरता] रस्सा-कशी । 

बर्शक--वि० [अ० बर्रक] १ जगमगाता हुआ। चमकीला। 
२. बहुत उजला। स्फंद।३ वेगवान्‌। तेज। ४ चतुर। चाछाक। 
५ जिसका पूरी तरह से अभ्यास किया गया हो । ६ कंठरथ | 
मुखाग्र । 

बर्राता--अ० [अनु० बर बर] १ बर बर या बड बड़ करना | व्यर्थ 
बोलना। बकना। २ नींद भें पड़े पट्ठे व्यर्थ की बाते करना। 

बरें--पु० [स० वरण] १ मधु-मक्खियो की तरह छत्ते बनाकर रहते- 
वाला एक तरह का भौरे के आकार-प्रकार का डक मारनेवाला कीडा 
जो उडते समय मूं-भूं शब्द फरता रहता है। मिड । २ दे० 'कुसूम। 

घरो--पु० [देश०| एक प्रकार की चिछ्िया। 

बर्सात--सत्री० बरसात। 

बहुँ--प्‌० - वहे (मोर का पख) । 

बहाँ--प «< वहीं (मोर)। 

बलंद---वि० [फा०) १. उच्च। ऊँचा। २ महान्‌। 

बलदी--स्त्री० [फा०] १ ऊंचाई। २. महत्ता। 

बलधरा--स्त्री० [स०] भीमसेन की पत्नी। (महाभारत) 

बलबी---स्त्रो ० [देश०] एक प्रकार का पेड जिसके फल खट्ट होते है 
और अचार के काम आते है। २ उक्त पेड़ का फल। 

बल---प० [स०९“बल (जीवन देना) “अन्‌)| १ वह शारीरिक तत्त्व 
जिसके सहारे हम चलते-फिरते और सब काम करते है। यह वस्तुत. 
हमारी शक्ति का कार्यकारी रूप है, और चीजे उठाना, खीचना, ढके- 
लना, फैकना आदि काम इसी के आधार पर होत है। 
मुहा ०--बल बाँधना विशेष प्रयत्न करना। जोर छगाना। उदा०- 
जनि बल बाधि बढ़ावहु छीति ।--सूर । बल भरना -जोर या ताकत 
दिखाना या लगाना। 
२ उकन का बह व्यावहारिक रूप जिससे दूसरो को दबासा, परिचालित 
क्रिया अथवा बश में रखा जाता है। ३ राज्य या शासन के 
सस्त्र सैनिकों आदि का वर्ग जिसकी सहायता से युद्ध, रक्षा, शाति- 
स्थापन आदि कार्य होते हैं। (फोसे, उक्त तीनो अर्थों मे) 
४ शरीर। ५ पुरुष का वीये । ६ ऐसा परकीय आधार या आश्रय 
जिसके सहारे अपने बूते या शक्ति से बढ़कर कोई काम किया जाता 
है। जैसे---तुम तो उन्हीं के बछ पर बढ़-बढ़कर बाते कर रहे 
हो। 
पद--किसी के बल -किसी के आसरे या सहारे से । जसे--हाथ के बल 
उठना, पैरो के बल बंठना । 
७ पहलू। पाश्व। जैसे--दाहिने (या बाएँ) बल लेटना। 


८३ 


बैल 


पुृ० [स० बल | १ बलराम। बलदेव। २ फीआ। ३ एक 
राक्षस का नाम। ४ बमुना नामक वक्ष | 

पु० [स० बलि--झुररी, मरोड या वलय| १ वह घ॒ुमाब, उबकर या 
फेरा जो किसी रूचीली या नरम चीज के बढने या मरोड़ने से बीच 
बीच में पड जाता है। ऐठन । मरोइ।! जैसे--रस्सी जल गई, पर 
उसके बल नहीं गये । 

क्रि० प्र०--डालना |--देना |-- निकालना । 

मुहा०--बल खानाः-(क) बटने या घुमाये जाने में घृमावदार हो 
जाना । ऐठा जाना। (ख) कुचित या टेढा होता। बल देना (क) 
ऐठना । मरोडना। (ख) बटना। जैसे---डोरी या रस्सी में बल देना। 
२. किसी चीज को थो ही अथवा किसी दूसरी चीज के चारों ओर धुमाने 
पर हर बार पडनेवाला चक्‍कर या फेरा। लपेट। जैस--रस्सी के 
दो बल डाल दो तो गठरी मजबूती से बँघ जायगी। 

क्ि० प्र०--डालना |--देना। 

३ गोलाई लिये हुए वह घुमाव या चक्कर जो लहरो के रूप भे दूर तक 
चला गया हो। ८ ऐसा अभिम,न जिसके कारण मन्‌षण्ण सरल भाव से 
आचरण या व्यवहार न करता हो। जैसे--मुझसे दाग हांकांग नी मैं 
तुम्हारा सारा बल निकाल दूंगा । 

मुहा ०---बल की लेना --घमड करना | इतराना। 

५ ऐसा अमाव, त्रुटि या दोष जिसके कारण कोई चीज ठोक तरह से 
काम न करती हो। जैसे--न जाने इस घडी में क्या बल है कि यह रोज 
एक दो बार बद हो जाती है । 

क्ि० प्र०--निकालना ।--पडना। 

६ कपड़ो आदि में पडनेवाली सिलूवट । शिक्तन ! जेसे--इस काट 
में दो जगह बल पड़ता है; इसे ठीक कर दो। ७ वह अवस्था जिसमें 
कोई चीज सीधी न रहकर बीच में या और कही कुछ सक, देव सा लचक 
जाती है। लूचक । 

भुहा ०-- (कि्सो चीज का) बल खाना बीच में ने कही कुछ टेटा 
होकर किसी ओर थोडा मुड़ जाना | झुकना। रूचकना । जैसे-- 
कमानी का दबने पर बल खाना । (शरोर का) बल खान। कामछता, 
दुबंछता, सुकुमारता आदि के कारण अथवा भाव-मगी सूचक रूप में 
शरीर के किसी अग का बीच में से कुछ रूचकना। जैसे--चलने से 
कमर या हँसने में गरदन का बल खाना। 

८ सहसा झटका छगने पर शरीर के अन्दर की किसी नस के कुछ 
इधर-उधर हो जाने की वह स्थिति जिसमे उस नस के ऊपरी स्थान पर 
कुछ पीड़ा होती है। जैसे---आज सबेरे सोकर उठने (या झककर 
लोटा उठाने) के समय कमर में बल पड गया है। 

क्ि० प्र०--पडना। 

९ अतर। फरक | जैसे--हमारे और तुम्हारे हिसाब मे ५) का बल है। 
करि० प्र०--निकलना |--पडना। 

सुहा ०--बल खाना या सहूता--हानि सहना। जैगे--चलों, 4 पाँच 
रुपए हम ही बल खायें। 

सत्री०--बाल (अनाज की ) । 

पु० हिं० बाल का सक्षिप्त रूप जो उसे योगिक पदो के आरभ मे प्राप्त 
होता है। जैसे--बल-तोड़ । 


सलक 





नम 


बलक---प ० [स०] स्वप्न, विशेषतत आधी रात के बाद आनेवाल्ला स्वप्त। 
पु० [हिं० बलकता] बलकने की अवस्था, क्रिया या भाव ! वि० 
दे० बलकना'। 

बल-कटी---स्त्री ० [हि० बाल (अताज की ) +काटना | मुसरूमानी राज्य- 
काल में फसल काटने के समय किसानों आदि से उगाही जानेवाली 
कर की किस्त । 

बलकना--अ० [भअन्‌ ०] १ उबलना । उफान भाना। खौलता। 
२ आवेश या उमग में आना । ३. उभड़ना। 

वलकर--वि० [स० ष० त०] [स्त्री० बलकारी] १ बल देनेवाला। 
२ बल बढ़ानेवाला। 
प्‌० अस्थि। हड्डी। 

बलकल--प्‌ ०->वल्कल (छारू) । 

घलकाता--स ० [ हिं. बरकना ] १. उब्बालना । खौलाना। 
२ उत्तेजित करना । उमाढता । ३. उमंग में छाना | उदा०--- 
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा |--तुलूसी । 

बल-कास---वि० [स०] बल या शणक्ित प्राप्त करने का इच्छुक | 

बलकुआ--- प्‌० [देश०] एक तरह का बाँस। 

बलक्ष--वि० [स० $/बल-+-क्विपू, बलू,/अक्ष्‌+घ्‌] ए्वेत। सफेंद। 
प्‌ ० मर्फद रग। 

बरूख--प्‌० [फा० बलख ] अफगानिस्तान का एक प्राचीन नगर। 

बलगम--प० [अ०] [वि० बलगमी] नाक, मूँह आदि मे से निकलते- 
वाला एक तरह का लसीछा गाढा पदार्थ। कफ। इलेष्मा । 

बलगमी--वि० [फा०] १. बलगम-सबधी। २. कफ-प्रधान (प्रकृति) ! 
३. कफजन्य अर्थात्‌ बलगम के कारण होनेवाला। 

बलगर--वि० [हि० बल+गर] १ बलवात। २ दुृढ। पक्‍का। मजबूत 

बलचक्र--१० [स० मध्य० स०] १ राज्या २ राजकीय शझासन। 
३ सेना। 

बलज--प्‌० [स० बल१/जन (पैदा होना)+ड] १ अन्न की राशि । 
२ अन्न की फसल। ३ खेत। ४ नगर का मुख्य द्वार। ५. दरवाजा। 
हार) ६ युद्ध) लड़ाई । 
बि० बल से उत्पन्न। बलजात। 

बलजा--स्त्री० [स० बलज +टाप्‌] ९ पृथ्वी। २ सुदर स्त्री। ३. 
एक तरह की जूही और उसकी कली। ४. रस्सी। 

बल-तोड़--पु ० -बारू-तोड । 

बलद--पु ० [स० बल,/दा (देना) क] १. बैछ। २ जीवक नामक 
वृक्ष। ३ बह गृश्याग्नि जिससे पौष्टिक कर्म किये जाते थे । 
वि० बल देनेवाला । 

बल-वर्दाक--प१० [स० प० त०] प्राचीन मारत में एक प्रकार का सैनिक 
अधिकारी । 

बरूबवाऊ*--पु०> बलदेव (बलरास ) । 

बलविया---पु ० [हि० बलद- बैल] १. बैल आदि चरानेवाला। चरवाहा। 
२. बनजारा । 

बलदेबव--१० [स० बल+/दिव्‌ू+-अच्‌] १, बरूराम। २. बायु। 

बलन--पु० [स०५/बल (जीवन) - ल्युट----अन] बलवान्‌ बनाते की 
क्रिया। बल देना या बढ़ाना। 





< ३ 





अर्पत्रा 


बलना--अ० [स० बहँण या ज्वलन] १. जलना। २ किसी चीज का 
इस प्रकार जलना कि उसमे से लपट या लौ निकले। जैसे--आग या 
दीआ बलना । 

बल-नीति--स्त्री० [स० ष० त०] १ आधुनिक राजनीति में वह त्रीति 
जिसके अनुसार काई राष्ट्र सैतिक-बल के प्रयोग या सहायता से अपना बल, 
प्रभाव, हित आदि बढ़ाने का प्रयत्त करता रहता है। २ प्रतियोगियों 
की तुलना में अपना बल या शक्ति बढ़ाते चलने की चाल या तीति। 
(पावर-पॉलिटिक्स ) 

बल-नेह---१० [हि० बल- नेह] एक प्रकार का सकर राग जो रामकली, 
श्याम, पूर्वी, सुदरी, गृणकली और गाघार से मिलकर बना है। 

बल-पति--प्‌ ० [स० ष० त०] ६ सेनापति। २ इद्र। 

बसू-परीक्षा--स्त्री० [स० ष० त०] १. वह क्रिया जिससे किसी का बरू 
जाना जाता हो। २ विरोधी दलों या वर्गों मे होनेवाला बहू ढव्व जो 
बलपूर्वक एक दूसरे को दबाने अथवा एक दूसरे से अपनी बात मनवाने 
के लिए होता है। (शोडाउन) 

बल-पुएछक--प० [स० ब० स०| कौआ। 

बल-पूर्वक--अव्य ० [स० ब० स०, कप्‌] १. बल ऊगाकर। शक्ति-पूर्वक। 
२ किसी की इच्छा के विरुद्ध और अपने बल का प्रयोग करते हुए। 
बल।त्‌। जबरदस्ती। 

बल-पृष्ठक--पु० [स० ब० स०,-कप्‌ ] रोह (मछली )। 

बल-प्रयोग--प० [स०] १ किसी को उसकी इच्छा के विदद्ध कोई कार्य 
करने के लिए क्षक्ति का क्रिया जानेवाला प्रयोग । (कोअसंन) 
२ अनुचित दबाव। 

बल-प्रसू---स्ती  [स० घ० त ०] बलराम की माता, रोहिणी। 

बलबलाता--अ० [अनु० बरबरलू| [भाव० बलबलाहट ] १. जूू अथवा 
किसी तरल पदार्थ का उबलते समय बल-बल करना। २ ऊँट का 
बलबलरू शब्द करना । 
(अ०>बिलबिलाना । 
अ० >बड़बडाना । 

बलबलराहट--स्त्री ० [हि० बलबलछाना] बलबलाने से होनेवाला शब्द । 
[स्त्री ०+बिलबिलाहट। 
+ स्त्री ०-बडबडाहट । 

बलबीज--पु० [स० बला-बीज | कघी के बीज । 

बलबीर--प० [हि० बल (--बलराम)-वीर (-ल्‍माई)] बलराम के 
भाई श्रीकृष्ण 

बलबता--१० [हि० बल | बता] १ बल तथा बिसात या सामर्थ्य 
जो किसी दृष्कर काम के सपादन के लिए आवश्यक हीते हैं। २ झारी- 
रिक शक्ति और आर्थिक सपन्नता का समाहार। 

बखूभ--पु० [स० बल३/भा (वमक) +क] एक प्रकार का विषैका 
कीड़ा । 

बलभद्ड--पु० [सं० बल | अचू, बल-भद्र, कर्मं० स०] १ बलदेब जी का 
एक नाम। २ लोधघ का पेड। ३. नील गाय | ४ पुराणानुसार 
एक पर्वत । 

बलसब्रा--स्त्री० [स० बलभद्व+टाप] १. कुमारी कन्या । २. बाब- 
माण लता। ३. नील गाय। 





सलभी 


कोठरी या कमरा । ऊपर का खड। चौबारा। 

बलस--प० [स० वल्लछम] प्रियतम। पति। बालम। 

बलमीक--पु० - वल्मीक (बाँबी) । 

मल-मुख्य--पु० [सं० स० त०] सेतानायक । 

बरूय--१० - वलूय । 

बलूया *+---स्त्री ० -- वलूय । 

बरूराम--प० [सं०६/रम्‌ (रमण) + घत्र, बल-राम, ब० स०] श्रीकृष्ण- 
चन्द्र के बडे माई जो राहिणी से उत्पन्न थे । बलदेव । 

बलल--पृ० [स० बल+/ला (लेना)+क] १ बलराम। २ इंद्र । 

बलवड*--वि० [स० बलवत] बलवान । 

बलवत---वि० [स० बलवत्‌] बलवान । ताकतवर । 

बघलबत्‌--वि० [सं० बल | मतुप] (ऐसा विधान या नियम) जो चलन मे 
हो और इसी लिए जो अपना बल प्रदर्शित कर रहा हो। (इन-फोर्स ) 
| अव्य० बलपूरवेक ) बलातू । 

बरूयती--वि० स्त्री० [स० बलवत्‌ +डीब्‌ | जो बहुत अधिक प्रबल हो 
और जिसे रोफा या मिटाया न जा सकता हो। जैसे--बलवती 
इच्छा। 

बलवत्ता--स्त्री० [स० बलवत्‌--तल - टाप्‌] १. बलवान होने की 
अवस्था या भाव | २ श्रेष्ठता । 

बल-वर्धक--वि० [स० ष० त०] बल बढानेवाला। 

बरू-वर्धन--पु० [स० ष० त०] बल या शक्ति बढ़ाने का काम। 

बल-वर्धो--वि ० ->बलवर्धक । 

बरूवा--पु० [फा० बल्व ] १. दो दलो या सप्रदायो मे होनेवाला वह उग्र 
संघर्ष जिसमे मार-काट, अग्निकाड आदि उपद्रव भी होते है। २ 
बगावत । विद्रोह । 

बलवाई--पु० [फा० बलवा+ई (प्रत्य०)] १- बलवा करनेवाला । 
२. विद्रोही। बागी। 

बलवान (न)--वि० [स० बल-+मत्‌प्‌, बत्व] [स्त्री० बलवती, भाव० 
बलवत्ता | १ जिसमे अत्यधिक बल हो। शक्तिशाली | २ पुष्ट। 
मजबूत । बलिष्ठ। 

बलबार|[--- वि० बलवान । 

बलघीर--प्‌ ०- बलवीर। 

बल-ध्यसन--पु० [स० ष० त०] सेना की हार। सैनिक पराजय। 

बलशाली (लिन )--वि० [स० बल३/शरू (आप्ति)- णिति] [स्त्री० 
बलणालिनी | बलवान्‌ । बली । 

बरू-शील--वि० [सं० ब० स० | बलवान । 

बलसुम--वि० [हि० बालू |? ] (जमीन) जिसमें बालू हों। बलुआ | 

अलसुदन---पू० [स० बरू-/सूद्‌ (नाश) -+णिच+ल्यु--अन] १. इन्द्र 
२ विष्णु। 

बलू-स्थिति---स्त्री० [स० ष० त०] सैनिक शिविर। छावनी । 

बलहन्‌---पु० [स० बल५/हन्‌ (मारना)+क्विप| १. इस्द्र। २. कफ। 
इलेष्मा । 

बलहा--वि० [सं० बलहन्‌] १. बल अर्थात्‌ शक्ति का नाश करनेवाला। 
२. बल अर्थात्‌ सेना का नाश करनेवाला । 


८ड 
बसूभी--स्त्रो० [स० वलूमि] मकान की सबसे ऊपरवाली छत पर की बरू-होन---वि० [सं० तृ० त०] जिसमे बल न हो । अशक्त । दाक्ति- 


सलाधात 


हीन। 

बला--स्त्री० [स० बल |अच्‌ - टाप] १ बरियारा नामक क्षूप। 
२ बैंद्यक मे पौधो का एक वर्ग जिसके अतर्गत ये चार पौधे है--बला 
या बरियारा, महाबला या सहदेई, अतिबला या बॉगनी और नागबला 
या गेंगरेन । ३. वह क्रिया या विद्या जिसके बल से युद्धक्षेत्र से 
योद्धाओ को मूख-प्यास नहीं लगती थी। ४. दक्ष प्रजापति की एक 
कन्या। ५. नाटकों में छोटी बहन के लिर संबोधन-सूचक शब्द। 
६ पृथ्वी। ७ लक्ष्मी। ८ जैनो के अनुसार एक देवी जो वर्तमान 
अवसपिणी के सज्नहवे अहेत्‌ के उपदेशो का प्रचार करनेवाली कही गई 
है। 
स्त्री० [अ० | १. कोई ऐसा काम, चीज या बात जो बहुत अधिक कष्ट- 
दायक हो और जिससे सहज में छूटकारा न मिल सकता हो। आपत्ति! 
विपत्ति। सकट। २ कोई ऐसा काम, चीज या बात जो अनिष्टकारक 
या कष्टप्रद होने के कारण बहुत ही अप्रिय तथा घृणित मानी जाती हो 
या जिससे लोग हर तरह से बचना चाहते हो। जैसे---वियोगियों के लिए 
चाँदनी रात (या बरसात) भी एक बला ही होती है । ३ बहुत ही 
अप्रिय, घुणित, तुच्छ या हेय वस्तु । जैसे--यह कहाँ की बला तुम अपने 
साथ लगा छाये । 
पद--बला कार (क) बहुत अधिक तीक् या प्रबल । जैसे--आज ता 
तरकारी (या दाल) मे बला की मिरचे पडी हैं। (व) बहुत ही उम्र, 
प्रचंड, भीषण या विकट । जैमे--धह तो बला का छडाका निवला । 
बला से “कोई चिता नहीं। कुछ परवाह नहीं। जैसे--वह जाता है 
तो जाय, हमारी बला से । हमारी बला ऐसा करें हम कभी ऐसा 
नहीं कर सकते । 
सुहा ०--- (किसी की ) बलाएँ लेना-+किसी के शिर के पास दोनों हाथ 
ले जाकर धीरे-धीरे उसके दोनो पाश्वों पर से नीचे की ओर छाना जो 
इस बात का सूचक होता है कि तुम्हारे सब कष्ट या विपत्तिया हम अपने 
ऊपर लेते है। (स्त्रियों का शुम-चितना सूचक एक अभिचार या टोटका ) 
४ भूत-प्रेत आदि अथवा उनके कारण होनेवाला उपद्रव या बाधा। 
(स्त्रियाँ) जैसे--उसे तो कोई बला लगी है । 

बलाइ---स्त्री ०--बला (विपत्ति) । 

बलाक--प ० [स० बल+/अक (जाना) | अच |] [स्त्री० बलाका, बला- 
किका] १. बक। बगला। २. एक राजा जो भागवत के अनुसार पुर 
का पुत्र और जक्लु का पौत्र था। ३ एक राक्षस का ताम। 

बलाका--स्त्री० [सं० बलाक +टाप्‌] १ मादा बंगला । बगली। २. 
बगलो की पक्तति। ३ पश्रेयसी | ४ कामुक स्त्री। ५ नृत्य में एक 
प्रकार की गति। 

बलाकिका--स्त्री ० [स० बलाक |-कन्‌+टापू, इत्त | १ मादा बगला। 
बलाका। २ बगल़ो की एक जाति। 

बराप्र---पु० [स० बल-अग्न, ष० त०] १. सेसा का अगछा माग। २. 
सेनापति। 
वि० बलवान । शक्तिशाली। 

बलाघात---१० [स० बल । आघात, तृ० त०] १. किसी काम, चीज 
या बात पर साधारण से कुछ अधिक वक लगाने या जोर देने की क्रिया 


5 
् 


बलांद 





या भाव। (स्ट्रेस) २. मनोभाव, विचार आदि प्रकट करते समय उनकी 

आवश्यकता, उपयोगिता, महत्त्त आदि की ओर ध्यान दिलाने के लिए 

उन पर डाला जानेबाला जोर। (एमर्फसिस) ३. दे० 'रवराघात । 

बलाद--१० [स० बल4/अट (जाना) +अच्‌ | मूंग। 

अलादु्--वि० [स० बल-आदय, तृ० त०] बलवान्‌ । 
प्‌ ० उरद। माष। 

बलातू---अव्य ० [स०बरू-/अत्‌ (निरन्तर गमन) |-क्विप ] १. घल-पूर्वक । 
जबरदस्ती से। बल से। २ हठ-पूर्वक। हठात्‌। 

बलातकार--प्‌ ० स० बछात्‌+/कू (करना) | घन्न्‌] १. बछान या हूठ- 
पूर्वक कोई काम करना। विशेषत किसी या दूसरो की इच्छा के विरुद्ध 
कीई काम करना। २ पुरुष द्वारा किसी पर-स्त्री की इच्छा के विरुद्ध 
बलपूर्वक धमकाकर या छलपुर्वक किया जानेवाला सभोग। (रेप) 
३ स्मृति मे, महाजन का ऋणी को अपने यहाँ रीककर तथा मार- 
पीटकर पावना वसूछ करता। 

बखात्कारित--भु० क्रृ०- बलात्कृत। 

बलात्कृत--भ० क०[स८ बरात्‌+/कू (करना) |-कत| १ जिसके साथ 
बलात्कार विया गया हो। २ जिससे बलपूर्वक या जबरदस्ती कोई 
काम कराया गया हो। 

बलात्मिशा--रत्री ० [स० बल-आत्मन, ब० स०,+कप | टापू, इत्व] 
हाथी-गंड नाम का पौधा। 

बलाधिक--वि ० [सं० स॒० त०] [माव० बलाधिक्य] अधिक बलवाला। 

बलाभिवरण--- १० [स० बल-अधिकरण, ष० त०] सैनिक कार्रवाई। 

बलाधिकुत--प१० [स० बरू-अधिकृत, ष० त०] सेना-विभाग का प्रत्मान 
अधिकारी । 

बलाध्गक्ष--पु० [स० बल-अध्यक्ष, ष० त०] सेना का अध्यक्ष । सेनापति। 

बराना[--स ० बुलाना। 

बलानुज--प्‌ ० [स० बल-अनुज, ष०्त० ] बलराम के छोटे भाई श्रीकृष्ण । 

बलान्वित---मू ० क० [स० बलू-अन्वित, तृण्त०] १ बल से युक्‍त किया 
हुआ। २ बली। बलशाली। 

बला पंचक--पु० [स० ष० त०| वैद्यक में बला, अतिबला, नागबला, 
महाबला और राजबला नाम की पाँच ओषधियों का समुदाय । 

बलाबल-प्‌ ० [स० ढू० स० ] किसी मे होनेवाले बल और निर्बेछता दोनो 
का यांग | जैसे--पहले अपने बलाबल का विचार करके काम मे 
हाथ लगाना चाहिए। 

ब्रलामोटा--स्त्री ० [स० बल | आ३/मुट्‌ (मर्दन) | अच्‌ । टाप्‌| नाग- 
दमनी नाम की ओपधि। 

घलाय--पु० [स० बल-अय, प० त० ] बरुना नामक वृक्ष । बच्चा। बलास। 
स्त्री० [अ० बला] १ आपत्ति। विपत्ति। संकट । २ कष्टदायक 
चीज या बात । दे० बला'। ३ एक प्रकार का रोग जिसमे हाथ की 
किसी उंगली के सिरे पर गाँठ निकल आती है था ऐसा फोड़ा हो जाता 
है जो उँगली टेढ़ी कर देता है। 

बलाराति--प्‌ ० [स० बल-आराति, ष० त०|१. इंद्र। २ विष्णु । 

बलालक--पु ० [स० बल4/अल् (पर्याप्त) +प्वुल---अक ] जलआँवला। 

बलावलेप---पु ० | सं० बकू-अवलेप, तृ० त० ] ६ अपने सम्बन्ध में यह कहना 
कि मुझमे बहुत अधिक बरू है। २, अभिमान। घमड। 





बलि-कर 








बलाह--पु० [सं० बरल३/अश्‌ | अगू|! कफ। रे. क्षय । 

बलास--पु० [सं०बऊू-/अस्‌ (फेकना) :अण] १ कफ। २. कफ के बढने से 
होनेवाला एक रोग जिसमें गले और फेफडे मे सूजन और पीड़ा होती है। 
प्‌ ० [स० बला ] बदना नाम का पीधा। 

बलासी (सिन्‌)--वि० [स० बरास- इनि] बलास अर्थात्‌ क्षय (रोग) 
से पीडित । 
प्‌ ०[सं० बलास ] बरुता या बन्ना नाम का पौधा । 

बरूाहक--प्‌ ० [ स० बल-। आ।/हा (छोडना ) +बवनू---अक ] १. बादल। 
भेघ। २ सात प्रकार के बादलों मे से एक प्रकार के बादल जो' प्ररुय 
के समय छाते है। ३ मोथा। ४. श्रीकृष्ण के रथ के एक घोड़े का 
नाम। ५ सुश्रुत के अनुसार दर्वीकर साँपों का एक भेद या बर्ग। ६. 
एक तरह का बगला। ७ कुश ढीप का एक पवेत। 

बलूाहर--प्‌ ० | देश ०] १ मछओ या धीवरों की एक जाति। २. गाँव 
का चौकीदार । 

बलाही--प्‌ ० [?]१ चमडा कमानेवाला व्यक्ति। २ चमडे का व्यव- 
साय करनेबाला-व्यक्ति । 

बलिदस--प ० [स० बलि३/दम (दमन करना) -खज, मुम्‌] विष्णु 

बलि--प्‌ ० [स०९/बल (देना) “इन |]! प्राचीन भारत में (क) भूमि 
की उपज का वह छठा अश जो मूस्वामी प्रतिवर्ष राजा को देता था। 
राजकर। (ख) वह कर जो राजा अपने धार्मिक हृत्यों के लिए प्रजा 
से लेता था। २ वह अश था पदार्थ जो किसी देवता के लिए अलग किया 
गया हो या निकारूकर रखा गया हो। ३ देवताओ के आगे रखा जाने- 
बाछा भोजन। नैवेश। मोग। ४ देवताओं पर चढ़ाई जानेवाली 
चीजे। चढावा। ५ देवताओं के पूजन की सामग्री। ६ वह पशु 
जो किसी देवता या अलौकिक शक्ति को प्रम्नन्न तथा मतुष्ट करने के 
लिए उसके सामने या उसके उद्देश्य से मारा जाता हो । 
क्रि० प्र०---चढाना ।--देना। 
२ बह स्थिति जिसमे कोई व्यक्ति अपने प्राण या शरीर तक किसी काम, 
बात या व्यक्ति के लिए पूर्ण रूप से अपित कर देता है। 
मुहा ०-- (किसी पर) बलि जाना किसीके महस्वत, मान आदि का 
ध्यान करते हुए अपने आपकी उस पर निछावर करना। बलिद्दारी 
होना। उदा०--तात जाऊं बलि वेगि नहाहू ।---सुरूसी । 
८ पच महायज्ञों में से मृत यज्ञ नामक चौथा महायज्ञ। ९ उपहार। 
मेंट। १०. खाने-पीने की चीज। खाद्य सामग्री। ११ चंतर का डडा। 
१२ आठवे मन्वन्तर में होनेवाले इंद्र का नाम। १३ प्रहकाद का 
पौच्च और विरीचन का पत्र जो दैत्यो का राजा था, जिसे विष्णु ने वामन 
अवतार धारण करके छलपूर्वक बॉध लिया था और ले जाकर पाताल 
में रख दिया था। 
सत्री० १ शरीर के चमड़े पर पडनेवाली झुररी। २ बछ। शिकन। 
हे एक प्रकार का फोड़ा जो गुदावते के पास अर्थ आदि रोगों में 
उत्पन्न होता है। ४ बवासीर का मसा। 
स्त्री ० [स० बला छोटी बहन] सखी। उदा०--ए बलि ऐसे बलम को 
विविध भाँति बलि जाऊँ।--पद्मेकर । 

शलि-कर-- वि० [स० बलि+/कु (करना) ! अच]१ बलि चढ़ानेबाला । 
२. कर या राजस्व देनेवाला। रे. शरीर मे भ्रियाँ उत्पन्न करनेबाला । 


बलि-कस (न) 


बलि-कर्म (न्‌)--प ० [स० ष० त०] बलि देसे या चढाने का काम। 

बलित--म+ ० [हि० बलि] (पशु) जो बलि चढाया गया हो । 

बलि-दान--प० [स० प०त० ] [वि० बलिदानी १ देवताओं आवि को प्रसन्न 
करने के लिए उनके उद्देश्य से किसी पशु का किया जानेवारा वध । 
२ किसी उद्देश्य या बात की सिद्धि के लिए अपने प्राण तक दे देना । 
जैसे--देश सेवा के लिए अपने आपको बलिदान करना। 
पइ--बलिदान का बकरा ऐसा व्यक्ति जिस पर किसी काम या बात का 
व्यर्थ ही सारा अपराध या दोष लाद दिया जाय / और तब उसे पूरा पूरा 
देड दिया जाय। (प्राय अपने आपको उस अपराध या दोष का भागी 
बनने से बचाने के लिए और दूसरे को उसका भागी बनाने के लिए) । 

बलिवानो--वि० [स० बलिदान] १ बलिदान-सबधी। बलिदान का। 
जै ।--पलिदानी परम्परा, बलिदानी बकरा । २ बलिदान करने या 
चहान॑बाला | 
स्प्री० बलिदान। 

बलिद्रिट (()--१० [स० बलि+/ द्विष (वैर करना) | क्विप्‌] विष्णु। 

बलिष्वसी (सिन)--प० [स० बलि;/घ्वस (नाश )-+णिनि] विष्णु। 

बल-नदन--प० [स० ष० त०] बाणासुर । 

बलि-पशु--पृ७ | स० मध्य० स०] वह पशु जो यज्ञ आदि मे अथवा किसी 
देवता का समुप्ट तथा प्रसन्न करने के लिए उसके नाम पर मारा जाता हो। 

बलि-पुष्ट -- प५ | तृ८ त०] कौआ। 

बलि-प्रदान--प्‌ ० [स० प० त०]- बलि-दान। 

बलि-प्रिय--पु ० | स० बलि+/ प्री - क| १. लोध का पेड। २ कौआ। 

बलि-बधन--प ० [स० बलि;/बध्‌ ( बांधना) -। णिच्‌-युच्‌--अन] विष्णु, 
जिन्होंने राजा बढ को बांधा था ॥ 

बलिभुष्‌ (जु)--प्‌ ० [स० बलि)” मज्‌ ; क्विपू] कौआ। 

बलि भुज्‌ --पु० [स० ] बलि-मुक्‌ का वह रूप जो उसे सम्बोधन कारक में 
प्रयुक्त हाने पर प्राप्स होता है। उदा०--किन्‍्तु कौन पा सकता, बलिमुज्‌ 
अमिट कामना पर जय।--पत। 

बलिभूत--वि० [स० बलि, “मु (मरण करना ) +क्विप, तुकू] १ बलि 
अर्थात राज-कर देनेवाला। २ अधीनस्थ। 

बलिभाजी (जिन्‌)---पु ० [स० बलि,/मुज्‌ (खाना) +णिनि] कौआ । 

बलि-मदिर--प / [प० त० ] राजा बलि के रहने का स्थान, पाताल-छोक। 

बलि-मुख--पू ० | ब० स०] बन्दर । 

बलिवदे---प्‌ ०- बलोवर्द। 

बलि-वेशम (न्‌)--प्‌ ० [प० त०] - बलि-मदिर । 

बलि-वेश्वदेव--१ ० [कर्म० स० | पच महायज्ञों मे से मुतयज्ञ नाम का चौथा 
महायज । 

बलिश--प१० |भ० बलि;/“गो (पना करना) ! क| मछली फेंसाने की 
कटिया। बयी। 

बल्िप्ठ---वि० [स बलिन्‌ इष्ठन्‌] जो सबसे अधिक बलवान्‌ हो। 
१०७ ऊट। 

बलिष्णु--।० [स०१/वलछू (सवरण)  इष्णुच] अपमानित। 

बलिहर ण--१ ० |प० त० ] सब प्रकार के जीवो को बलि देना। 

बलिहारता- -स ० [हिं० बलि | हारना] कोई चीज किसी पर से निछावर 
करना। जैसे--जान बलिहारना। 


बलोची 


बलिहारी--स्त्री० [हि० बलि +हारना] बलिहारते अर्थात्‌ नछावर करने 
की क्रिया या भाव। कुर्बान जाना। 
मुहा०--बलिहारी जाना-- निछावर होता । बलछिहारी लेना-बलाएँ 
लेना। (दे० 'बला' के अतर्गत)। 
पद--बलिहारी है--मै इतना मोहित या प्रसन्न हैँ कि अपने को 
निछावर करता हूं। वाह-वाह ! क्‍या बात है। 

बलिहुत--वि० [सं० बलि(/हू (हरण करना) । क्विपू, तुक] १ बलिया 
मेंट छानेवाला। २ कर देनेबाला। 
पु० राजा। 

बलोंडा[77-० [स० वरडक] १ छाजन के नीचे लबाई के बल लगी हुई 
लकडी। बरेडा। २ सतों की परिभाषा मे, ज्ञान की उच्च अवस्था। 

बली (लिन्‌)--वि० [स० बल | इनि,] बलवान । बलवाला। पराक्रमी। 
पु० १ मेंसा। २ साँड। ३. ऊँट। ४. सूअर। ५ बलूराम। 
पु० ६. सेनिक। ७ कफ। “. एक तरह की चमली। 
स्त्री० [हि०्बल] १. बल। शित। सिखूवट। ३. त्वचा पर पडनेवाली 
झुर्री। 

बलीक--प्‌ ० [स०] छप्पर का किनारा। 

बलीन---प१ ० [स० बल+-ख---ईन | ब्रिच्छू। 
वि०ज््वलवात। 

बलीना--स्त्री ० [यू० फैलना] एक प्रकार की छेल मछली। 

बलीबेठक--स्त्री ०[ हिं० बली । बैठक ] एक प्रकार की बैठक (कसरत) 
जिसमे जघे पर भार देकर उठना-बैठना पड़ता है। 

बलोमुख--7 ० [स० ब० स०] बदर। 

बलीवर्द---प्‌ ० [स०९/व्‌-| क्विप्‌+वर, ई | वर, द्वू० स०, ईवर 4/दा । क, 
बलिन्‌-ईवर्द, कमं० स०] १. साॉड। २. बैल। 

बलुआ--वि० [हिं० बालू | [स्त्री० बलुई | (स्थान) जिसकी मिट्टी मे बालू 
भी मिला हुआ हो। 
पु० रेतीली जमीन । 

बलच--प ० --बलोच। 

बलूजलिस्तान--पु० -- बलोचिस्तान । 

बलूची--प्‌ ०--बलोच । 

बलूत--प्‌ ० [अ०] ठढ़ श्रदेशों मे होनेवाला माजूफल की जाति का एक 
पेड । 

बलूल---वि० [स० बरू-+-ऊचू--ऊदड | बलवान्‌। 

बलूला(--पु ० >॑बुलबुला । 

बले[--पु ० वलय | 

बलेथा---स्त्री ० [अ० बला, हिं० बलाय] बछला। बलाय। 
मुहा०--- (किसी की) बलंया होनाः-दे० 'बला'के अन्तर्गत 'बलाए 
लेना । 

बलोअ--पु० आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर में बसनेवाली एक योत्वा 
मुसलमान जाति। 

बलोचिश्तान--१० [फा०] आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर का 
एक प्रदेश । 

बलोची---पु० [हि० बलोच | बलोचिस्तान का निवासी । 
स्त्री० बलोचिस्तान की बोली | 





डः बल़ोच जाति का। 
अल्करू---पु० दे० 'बल्कलू । 
बल्कस--पु० [स० बल्क५/अस्‌ (फेंकना ) + अचू, शक ० पररूप] आसव की 
सलछट | 
बल्कि---अव्य ० [फा० ] एक अव्यय जिसका प्रयोग यह आशंय सूचित करने 
के लिए होता है कि --ऐसा नही इसके स्थान पर ,. । प्रत्युत। 
वरन्‌। जैसे --मै नही, बल्कि आप ही वही चले जायेँ। 
बल्व--पु०[ अ०]१ छ्षीतों की नली का अधिक चौडा भाग। २ पतले 
शीशे का एक उपकरण जो बिजली के योग से चमकने और प्रकाश करने 
छगता है। ल्टटू। 
बल्य--वि० [स० बल--यत्‌] बरूकारक। शाक्ति-वर्घक । 
पु० वीरय। शुक्र । 
बल्था--स्त्री० [स० बल्य+टाप) १ अतिबला। २. अश्वर्गंधा। ३. 
प्रसारिणी । ४. चगोनी। 
बल्‍ल---पु० -वल्छ। 
बल्लकी---7त्री ० - बल्‍्लकी । 
बललभ--पु ० >>वललभ । 
बहलम---पु० [स० बल, हि० बलल्‍ला] १ मोटा छड। २ लरूकडी का 
बड़ा और मोठा डडा। बल्‍ला। ३. डडा। सोटा। ४. बह सुनहला या 
रुपहला डड्गा जिसे प्रतिहारी या सोबदार राजाओ या बड़े आदमियों 
के आगे आगे शोमा के लिए लेकर बलरूते थे और जो अब भी बरातो 
आदि के साथ लेकर चरूते हैं। 
पद---आसा-बललस । 
५, बरछा। भारा। 
बलल्‍्लमटर--पु० [अ० वालटियर के अनुकरण पर हिं० बल्‍्लम से] १. 
स्वेच्छापूर्वक सेना मे भरती होनेवाल्ा सैनिक। २. दे० 'स्वयसेवक' । 
बल्लम नोक---वि० [हि०] १ जिसकी नोक या अगला सिरा बल्‍्लकम के 
फल की तरह नुकीला हो। २ बहुत ही चुमनेवाला, तीखा या पैना । 
जैसे---0ुमने भी खूब बल्लम नोक सवाल किया। 
बल्लमस-बरदार--१० [ हि? बल्‍्छलम+फा० बर्दार] वह नौकर जो राजाओ 
की सवारी या बरात के साथ हाथ मे बललम लेकर चलता हो। 
बहलरी--सस्त्री ०“ बल्लरी। 
बल्‍लव--पु० [सं०९/बल्ल (छिपाना) +घज्‌, बल्‍्ल१/वा (गसन)-+-क] 
[स्त्री० बल्लवी] १ चरवाहा। २ भीम का उस समय का कृत्रिस 
नाम जब बह राजा विराट के यहाँ रसोइया था। ३. उक्त के आधार 
पर, रसोइया। 
बलल्‍ला--पु० [स० अल्ल>जलट्ठा या डंडा] [स्त्री० अल्पा० बल्‍ली] 
१ लबी, सीधी और मोटी लकड़ी या हुट्ठा जिसका उपयोग छर्ते 
आदि पाटने और मकान बनाने के समय पाइट आदि बाँघने के लिए 
होता है। २. मोटा डडा। ३. भाव खेने का डंडा या चाँस! ४ गेंद 
के खेल में छोटे इंडे के आकार का काठ का वहू चपटा दुकड़ा जिससे 
गेंद पर आघात करते हैं। (बट) 
पव--गेंद-बल्ला । 
पु० [स० बरूय ] गोबर की सुलाई हुई गोल टिकिया जो होली जलने 
के समय उसमें डाछी जाती है। 








बस्छारी--स्त्री ० देश० | सम्पूर्ण जाति की एक रागिती जिसमें केवल 
कोमल गाघार छूगता है। 

बल्लि[--स्त्री ०-बल्ली (रूता)। 

बल्ली--स्त्री ० [हिं० बल्‍ला| १ छकडी का लबा छोटा टुकडा। छोटा 
बल्लका। २. नाव खेने का बास। 
स्त्री० >बल्ली (लता) | 

बल्व---पु ० [सं०] गणित ज्योतिष में, एक करण का नाम। 

बल्बरू--प्‌ ० [स० ] इल्बल नामक दैत्य का पुत्र जिसका वध बतराम ने 
किया था। 

बर्बेड्ना[--अ० [स० व्यावर्तन; ध्रा० व्यावद्रन |व्यर्थ इधर-उधर घुमना। 
मारा-मारा फिरना। 

बवंडर--प ० [स० वायु-मंडल? | १ हवा का बह तेज झोका जो चक्‍कर 
खाता हुआ चलता है और जिसमे पड़ी हुई घूल खप के रूप मे ऊपर 
उठती हुई दिखाई पडती है। चक्रवात। बगूछा। 
क्रि० प्र०--उठता।--चबलना | 
२ आँघी। तूफान। ३. व्यर्थ का बहुत बडा उपद्रव । 
कि० प्र०--खड़ा होना। 

बबड़ा(---१ ०-- बवढर। 

बवड़ियाना[---अ ० “>बवंडना (मटकना ) । 

बव--पु० [सं०] गणित ज्योतिष से, एक करण का नाम। 

बवधूरा|--पु०-बवडर (बगूला)। 

अबन--१० १ >>वपन। २. “वमन। 

बवमा--स० [सवपत | १. जमने के लिए जमीन पर बीज झाछूता । बोना। 
२. छितराना। बिखेरना। 
अ० छितराना। बिखरना। 
पृ०--बौना (बासन)। 

बबरा*---वि० [स्त्री० बचरी]- बावला (पागल)। उदा०-- आसनु 
पवकनु दूरि कर बवरे।- कबीर। 

बवाला-- १० +वबाल। (देखे) 

बवासीर--स्त्री ० [अ० बवासिर | गुर्देद्रिय मे मस्से निकलसे का एफ रोग 
जो खूनी और बादी दो प्रकार का हाता है। (पाइल्‍स ) 

बदार---प्‌ ० (अ० ] भनुष्य। आदमी । 

बदारी--वि० [ अ०] [माव० बशरीयत] मनुष्य-सबथी। 

बरहारीयत--स्त्री ० [ अ० ] आदमीयत | मनुष्यत्व। 

बहतें कि---अव्य ० [अ०] शर्त यह है कि। 

बशिष्ट---पु ० >-वह्षिष्ट । 

बचीर---वि० [अ० ] शुमभ सवाद सुनामेवाला। 

बशीरी--प्‌ ० [अ० वशीर ] एक प्रकार का बारीक रेशमी कपडा। 

बत्कय--वि० [स० १/मस्क्‌ (जाना) | अयनू, स--ब, पृषो०, सू०--ष] 
१. (बछड़ा) जो काफी बड़ा हो गया हों। २. हड्ढा-कट्टा । 
दृष्ट-पुष्ट । 

बब्कयणी--स्त्री ० [सं० बष्कय--हनि +-छीप, न--ण ] बहू गाय जिसको 
बच्चा दिये बहुत समय हो गया हो। बकेना। 

बसंत--२० [सं० क्संत] [बि० बसती | बसत ऋतु। 
प्रद--उल्स बसंत--निरा या बहुत बड़ा मूर्ख । 





बसंत-बहार 


जो बसत और बहार के योग से बनता है। 
बसंत सुस।री---पुृ० [स० वसत ! मुर्खी | सगीत मे एक प्रकार का राग। 
बसतर | --प्‌ृ०  बसदर (अग्नि)। 
घसता--पु ० [स० वसन्‍्त | मूरे रंग की एक प्रकार की चिडिया। 
पु० [स० वास | कही बसने या रहनेवारा। निवासी । 
बसती--वि० [है० बसंत] १ यसत ऋतु-सवधी । २ बसत ऋतु में 
होनेबाला । ३, सरसों के फुल की तरह का । पीछा । जैसे--बसती 
सेहरा। 
पू० १ सरसों के फूछ की तरह का चमकदार और खलता पीछा 
रग। (कॉम) २ पीछा केबडा। 
स्त्री० एक प्रकार की चेचक या माता (रोग) । 
बसदर--प्‌ ० | स० वैश्वानर ] अभ्नि । आग। 
घस--अव्य ० [फा०] १ यथेष्ट है कि । पर्याप्त है कि। जैसे--बस इतनी 
ही दया चाहिए। २ समाप्ति का सूचक एक अन्यय। जैसे---अब 
बस करोगे सा नहीं | ३ इतना मात्र केबछूे। सिर्फ 
वि० १ यथवषट। पर्याप्त। २ समाप्त। खतम। 
पु०[स० वद्य | १ अधिकार या शवित। जैसे---(क) यह हमारे 
बस की बात नही है। (ख) वह तो अब पूरी तरह से तुम्हारे बस में 
है। 
महा ०-- (किसी फी) बस करना दे० नीचे 'बस में करना। 
(किसों के आगे या सामने ) बस चलना - किरी के मुकाबले मे अधिकार 
या शक्षित का काम करता। जैसे--ईश्वर की इच्छा के आगे किसी 
का बस नहीं चलता। 
मुहा ०--- (किसी की ) बस से करता या लाना किसी की इस प्रकार अपने 
अभिकार में लेना कि वह अपनी इच्छा के अनुसार कोर्ड काम न कर सके। 
स्त्नी० [० ओमनी बस का स॑ ध्षप्त रूप] प्राय किसी नगर की सीमा 
के अदर किसी निश्चितत पथ पर ललने बाली बडी मोटर गाडी जो 
थाडी-बोड़ी दूरी पर सवारिया उतारती तथा चढाती चलती है। 
बसकर '---ति० |स० वशीकर | [स्त्री० बसकरी ] १ कसी को अपने वश 
में कर लेनेवाला | वशीकर। २ परम आकर्षक और मनोहर । उदा०--- 
बसुधा की बसकरी मधु रता सुध्रा पगी बतरानि। -रहीम। 
बसता--स्त्री ० [स० वास | बसा हुआ स्थान। बस्ती। 


स्त्री० वस्लु। 
बसतर|--पु० बस्त्र। 
बसति।--स्ज्री ०. बस्ती । 


इसदेवा[--पु० [स० बासुदेव |] एक जाति जो भीख माँगने का पेशा करती 
है । 

बसन--पु ० [स० वस्‌--प्रम करता] स्त्री का पति। स्वामी। उदा०-- 
बसन हीन नहिं सोह सुरा र, | तुलसी। 

बसना--स ० [स० वसन निवास करना] १. जीव-जन्तुओ, पक्षियों 
आदि का बिझ गा घोसला बनाकर अथवा मनुप्यो का गुफा, झोपड़ी, 
मकान आदि बनाकर उसमे निवास करना या रहना। जैसे---किसी 
समय यहाँ जगली जानवर बसते थ, पर अब तो यहाँ मनृप्प बस गये 
है। २ घर, नगर या किसी प्रकार के स्थान की ऐसी स्थिति से होना 


बसत-बहार--१० [स० वसन्‍्त | हि० बहार ] एक प्रकार का सकर राग 


८८ 


लिन >> लक+जतण--। 


दबसाना 





निजता चनाधजओिलन, अन्‍न्‍नन जन-- 








कि उसमे प्राणी या मनृष्य निवास करते हो। जैसे--यह गाँव पहले 
तो उजड़ चका था, पर अब यह धीरे-घीरे फिर से बसने छगा है। 
हे धर या मकान के संबंध में कुदुबियो और घन-धान्य से मरा-यूरा 
और खुखपूर्ण होना। जैसे--चाहे किसी का घर बसे या उजड़, तुम 
तो मौज करते रहो। 
सुहा०-- (किसी का ) घर घबसना -(क) विवाह होने पर धर में गहिणी 
या पत्नी का आना | जैसे---पर-साल उसकी नौकरी छगी थी, इस साल 
घर भी बस गया। (ख) घर धन-घान्य और बाल-बच्च। से भरा-पुरा 
या युक्त होना। जैसे--पहले तो घर मे पति-पत्मी दो ही आदमी थे, पर 
अब बाल-बच्चे हो जाने से उनका घर बस गया है। (फिसी का घर में ) 
बसना- किसी का अपने घर मे रहकर गृहर्थी के कर्तव्यों पत्र सुखपुर्वक 
निर्वाह और पालन करना । जैसे--यह औरत तो चार दिन भी घर में नहीं 
बसेगी , अर्थात्‌ू-घर छोडकर (किसी के साथ या यो ही) कही निकल 
जायगी। उदा ०--ना रद का उपदेस सुनि, कहहु बसेउ का गह। --]छसी | 
४ कुछ समय तक कही अवस्थान करना। टिकना। टहूरनो। जैसे--- 
हम तो रमते राम है, जहाँ जी चाहा,वही दस-पाँच दिन बसा गये। ५ 
लाक्षणिक रूप मे किसी चीज, बात या व्यक्ति का ध्यान या वि्तार मन में 
दृढ़तापू्वंक जमना या बैठना। जैसे---(क) तुम्हारी बात मर गन में 
बस गई है। (ख) उनके मन में तो भगवान्‌ की मकति बसा हरई है। 
सयो० क्रि०--जाना। 
विशेष---हस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग मन के सिवा जआारा। + राबध 
में भी होता है। जैसे--तुम्हारी सूरत मेरी आंखों में बर्सी हुई है। 
६ स्थित होना। ७ बैठना। (ब्ब०) 
अ० [हिं० बासना (गध से युक्त करना) का अ० | किया सस्यु को 
किसी प्रकार की गध या वास से युक्‍त होना। महक से भरता। बासा 
जाना। ज॑से--(क) इत्र से बसे हुए कपडे या (सिर के) थ।5। (रा) 
गुलाब से बसी हुई गंडेरियाँ या रेवडियाँ। 
पु०[स० वसन | ( वह कपडा जिसमे कोई वस्तु लपेटकर रखी जाथ। 
वेप्ठन। बेठना। जैसे--बही-खाते का बसना। २ वह थैला जिसमे 
दुकानदार अपने बठखरे आदि रखते है। ३. टाट आदि की बह गाली- 
दार थैली जिसमे रुपए आदि भरकर रखे जाते है। ४ बढ़ काटठो जहाँ 
ऋण आदि देने का कार-बार होता है। 
पु०5 बासन (बरतन )। 

बसनि--स्त्री ० | हि० वसना |] निवास । वास। 

बसर--स्त्री ० [फा०] १. जीवन-निर्वाहू। २ गुजारा। निवाह। 

बसवार--- पू ० [स० वास- गध ] छीोक। बघार। 

बसबाप--पु० [हि० बसना | स० बास| १. निवास। रहता। २ ढग। 
रहन-सहन। ठहरने या रहने का धुभीता । 
|पु०-विश्वास। 

बसह---१० [स० वृषभ, प्रा० बसह] बैल। 

बर्साँधा---वि० | हिं"्बास --गन्ध | बासा या सुगधित किया हुआ। सुवासित । 

बसा--स्त्री० [देश० ] १. बरें। भिड। २, एक प्रकार की मछली। 
स्त्री०--वसा (चरबी)। 

बसात--स्त्री ० -बिसात। 

बसाना---स० [हि० बसना' का स०] १. व्यक्ति के सम्बन्ध मे रहने 


बसीएल 

के किंग घर अथवा जीवन-निर्वाह के लिए उचित माथन या सुभीते 
दैना। जैसे---शरणाथियों को बसाने के लिए सरकार को बहत॑ अधिक 
घन व्यय करना पड़ा है। २ स्थान के सम्बन्ध मे, नये घर आदि बनाकर 
अथवा गाँव या बस्तियाँ बनाकर उनसे लोगो को स्थिर रूप से रखने की 
व्यवस्था करना। ३. घर-गृहस्थी या जीवन-यापन के साधनों से युक्त 
करना। 
मुहा ०-- (अपना) घर बसाना -- (क) विवाह करके पत्नी को घर 
में छाना। (स्र) गहस्थी की सब सामग्री इस प्रकार एकत्र करना कि 
कुटुब के सब लोग सुख से रह सके। (किसो का) घर बसाना किसी 
का विवाह करा देना | 
४ अस्थायी रूप से किसी को कही टिकाने था ठहराने की 
व्यवस्था करना। (क्व०) जेसे--इन यात्रियों को दो दिन के लिए 
अपने यहा बसा लो। उदा०--नूपुर जनि मुनिवर कल-हंसनि, रे 
नीड दे बह बसायो ।--तु ऊसी । ५ स्थिति में लाना स्थान देना | उदा ० -- 
सुनि के सुक सो हृदय बसायौ ।--सूर। ६ छाक्षणिक रूग मे,किसी बात या 
व्यक्ति का ध्यान अथवा विचार अपने मन में दृढ़तापूर्वंक स्थित करना। 
जैमे--यदि आपका उपदेश हृदय में बसा लोगे तो तुम्हारा बहुत बडा 
कल्याण होगा। ७ स्थापित करना। रखना। ७ बैंठाना। (क्व०) 
स० [हि० बास | ना ([प्रत्य०)] वास अर्थात्‌ गध से युक्त करना। 
जैसे---फूलो से तेल बसाना। 
[अ० -वसना (गंध से युक्त होना )। 
[अ० [स० बश | अधिकार, जोर या वद्य चलना। शक्ति या सामर्थ्य 
का काम देना अथवा सफल सिद्ध होना। उदा०--मिला रहे और ना 
मिले तासो कहा बसाय |--कबीर । 

बसारत--स्त्री ० [+०] १ देखने की शक्ति । दृष्टि। २ 
गा समझने की शक्ति। समझ। 

घसाव--प्‌ ० | हि" बसना 4 आव ( प्रत्य० ) |असने की अवस्था, क्रिया या 
भाव। निवास । जैसे--बसाव शहर का, खेत नहर का ।---कहा ० । 

बसिओऔरा[--प ० [हि० बासी| १ वर्ष की कुछ विशिष्ट तिथियाँ जिनमे 
रित्रियाँ बासी भोजन खाती और बासी पानी पीती है। बासी। २ 
बह भोजन जो उक्त तिथियों मे खाने के लिए एक दिन पहले बनाकर 
रख लिया जाता है। ३. बासी खाने की प्रथा। 

बसिया--स्त्री ०5 बासी । 
स्त्री०- बद्यी । 

बसियाना---अ० [हिं० बासी, या बसिया ै ना (प्रत्य०) | बासी हो जाना। 
स॒० किसी चीज को रखकर बासी करना । 
अ०[हिं० बास] बास अर्थात्‌ गध से युक्त होना । 

बमिष्द| - १०- वसिष्ठ। 

स्सीकत--स्त्री ० [ हि? बसना | १. बसने की क्रिया या भाव । २ वसने 
का स्थान। ३ बस्ती। आबादी। 

ससीफर]---वि ० -- वक्षीकर । 

बसीकरना---१०--वक्षीकरण । 

ब्रसीगत---स्त्री ०--बसीकत । 

बस्ीठ--पु ० [सं० अवसूष्ट] १. दूत। २ पैयम्भर। ३ गाँव का मुखिया । 
४, हर में का जुआठा। 

जल ररे 


किन कण एप 


अनुभव करने 








बसौंधी 


बसीठी--स्त्री ० [हि० बसीठ] बसीठ होने की अवस्था या भाव। दूत का 
पद या भाव। 

बसीत--प्‌ ० [अ० | जहाज पर का एक यत्र जिसमे सूर्य का अक्षाश जाना 
जाता है। क्रमान। 

बसीता--7१०१. बस्ती। २ >बसाव। उदा०--जुद्ध जुरे दुर-जोधन 
सों कह्टि कौन करे जमछोक बसीतो ।--केशवब । 

बसीना|---प. ० [हि० बंसला ] बसने की क्रिया या माव। 

बसीला--वि० [ हि बास>गघ | १ बास अर्थात्‌ गन्ध से युक्त । २ 
दुर्गंध युक्त । बदबूदार। 

बसु--प्‌ ०- वेसु। 

बसुकला--स्त्री ० - बसुकला (वर्ण वृत्त)। 

बसुदेव--प्‌ ०--वसुदेव । 

बसुधा--स्त्री ०--वसुधा । 

बसमति---स्त्री ०-- वसुमती । 

बसुरी|---स्त्री ० -- बॉसुरी । 

बसुला- -१ ०- बसूला। 

बसुली--स्त्री ० ! बसूली । २ --बाँसुरी। 

बसु-- प.० वसु । 

बसुला--प्‌ ० [स० वाशी+ र (प्रत्य०) ] [स्त्री अल्पा० बसूली | बढइयों 
का एक प्रसिद्ध औजार जिससे ये छूकडी छीलते और गढते 
है । 

बसुछी--स्त्री ० [हिं० वसूछा] १ छोटा बसूछा। २ 
एक औजार जिसमे वे ईटे गढ़ते या तोडते हैं। 
स्त्री० वसूली । 

बर्सेंडा'--प० [हिं० बाँस डा (प्रत्य०) ] 
पतला बाँस। 

बसेधा--वि० [हि० बास - गध] [स्त्री० बसेधी ] १ बसाय्रा अर्थात्‌ गंध 
या वास से युक्त किया हुआ । २ खुशबूदार। सुगधित। 

बसेढ[--पु० [हि० बसना] १ बसने या रहने की जगह। २, दे० 
बसेरा'। 

बसेरा--प० [हि० बसनता] १ बहू स्थान जहाँ रहकर यात्री रात 
ब्रिताते है। मार्ग मे टिकने की जगह। २ वह स्थान जहाँ ठहरकर 
चिड़ियाँ रात बिताती है। 
मुहा ०--बसे रा लेना-रात बिताने के लिए कही टिफना या ठहरना। 
वि० विश्राम करने के लिए कही टिकने या ठहरनेवाला । 

बसेरी[--वि० [हिं० बसेरा] १ बसेरा लेनेवाला। २ निवारी। 

बश्लेधा(---वि ० --बसेधा । 

बसेया!--वि० [हिं० बसना] बसनेवाला। रहनेवाला। 
वि० [हि० बसाना] बसानेवाछा। बसवैया। 

बसश्बास--पु० [स० वास- आवास | १. निवास। २. निव्रासरथान। 
रहने की जगह। 

बर्सौधी---स्त्री ० [हि० बास +औघधी] अत्यधिक खौलाये हुए दूध का 
बहू लच्छेदार रूप जिसमे दूध का अश कम और मछाई का अजय अधिक 
होता है लथा जिसमे चीनी, मेबरा आदि मी मिलाया गया हांता है। 
रबड़ी। 











तीन ननननना 


राजपोरों का 


[स्त्री० अन्गा० बसेडी] 


बस्टे ९० 


बस्ट---पू ० [अ०] बिन्न-कला और मूर्तिन्‍कला मे वह चित्र या वह मूर्ति, 
जिसमे किसी व्यक्ति के मुख और छाती के ऊपर के माग की 
आकृति बनाई गई हो। 

बस्त--प१० [स०३/वस्त्‌ (याचना करना) ; धञज्‌] १ सूये। २ बकरा; 

बस्तर[--प ०- वस्त्र (कपड़ा) । 

घस्ताबु--प१० [र० वस्त-अब, प० त०] बकरे का मृत्र। 

बस्ता--पू ० [फा० बरत ] १ कपई का वह चोकोर टुकड़ा जिसमे 
कागज के मट्ठे, बही-खाते और पुस्तक आदि बाधकर रखते है। बठन। 
२ इस प्रकार बँधी हुई पुरतक या कागज-पत्र। 
क्रि० प्र ०--बांधना। 
३, थैले या बेठन की तरह का वह उपकरण जिसमे विद्यार्थी अपनी 
पुस्तक रखकर विद्यालय ले जाता है। जैसे--सब लडके अपना 
अपना बस्ता खोले । 
मुहा ०--बस्ता बाँधना उठाने या चलने की तैयारी कर पुम्तके आदि 
बस्ते में बाँध या रखकर चलने को तैयार होना । 

घस्ताजिन--प० [स० वस्त-अजिन, ष० त०] बकरे की खाल। 

अस्तार--पु० [फा० बस्त | एक में बँधी हुई बहुत-सी वस्तुओं का समूह । 
मुट्ठा। पुलिदा। 

पस्ति---+त्री ० वस्ति। 

बस्सती--स्त्री० [२० वसति] १ बहुत से मनुष्यों का एक जगह घर 
बनाकर रहने का माव। आबादी। निवास । २ वह स्थान जहाँ 
बहुत से छोग घर बनाकर एक साथ रहते हों। 
क्रि० प्र०--बंसता ।--बसाना । 

बस्तु--स्त्री ०5 वस्तु । 

बस्त्र---प_ ० - वरत्र। 

बस्य--वि० वध्य। 

बस्साना--अ० [स० वास] बास अर्थात दुर्गध से युक्त होना। 

बहेंगा---पु० [हि० बढंगी का पु०] बडी बेंहगी। 

बहेंगी--स्त्री० [स० विहृगिका] तराजू की तरह का एक प्रसिद्ध ढाँचा 
जिसके दोना पलड़ो मे बोझ रखकर ढोया जाता है। 

बहक--स्त्री० [हि अहकना | १ बहकने की अवस्था, क्रिया या माव। 
२ पथ-भ्रष्ट होने की अवस्था या माव। ३ बहुत बढ़-बढकर और 
व्यर्थ कही जानेवाली बाते । ४ केवल शब्दों के ध्वनि-सादुश्य के आधार 
पर बिना समझे बुझे या अनुमान से कही हुई कोई बहुत बडी श्रमपूर्ण 
और हास्यास्पद बात । (हाउलर ) जैसे---मथुरा नगरी केकेयी की दासी 
मन्थरा के नाम पर बसी है। 

बहकना--अ० [?] १ पालतू पशुओं के सबंध मे, गुस्से, हुठ आदि के 
कारण सीधा मार्ग छोड़कर गलत मांगे की ओर प्रवृत्त होना । २ 
व्यक्तियों के सबंध में, दूसरों के मुलावे मे आकर अथवा उनकी देखा- 
देखी परथश्रप्ट होना। ३. आवेश या मद में चूर होना। 
मुहा ०--बहकी बहकी बालें करना -आवेश में आकर पागलों की-सी 
या बढ़ी-चढी बाते करना। 
४ ठीक लक्ष्य या रथान पर न जाकर दूसरी ओर या जगह जा पड़ना। 
चकना। जैसे--किसी पर वार करते रामय लाठी या हाथ बहकना। 

बहकाता---स० [हिं० बहकना का स०] १ किसी की बहकने मे प्रवृत्त 


धहनां 


करना। २ ऐसा काम करगा जिससे कोई बहक॑, और ठीक रास्ता 
छोडकर पथ-भष्ट हो। चकमा या मुलाबा देना। 
सयो० क्रि०--देना। 
३ दे० 'बहुलाना'। 

बहुकावट--स्त्री ० - -बहुकावा । 

बहकावा--पु० [हिं० बहकाना] १ बहाकाने की क्रिया या भाव) २ 
ऐसी बात जो किसी को बहकाने के उद्देन्स से कही जाब। सुलावा। 
क्रि० प्र०--देनां। 

चहड़--प० [देश०] एक प्रकार का छद जिसके प्रत्यक्ष जसर्ण में २१ 
मात्राएं और अन्त में जगण होता है। 

बहुतोल--स्त्री० [हिं० बहता+-ओल (प्रत्य०) ] पानी बहने की माली। 

बहुत्त--वि० [स० द्विसप्तति, प्रा० बहतरि] जो कम या गितनों के 
विचार से सत्तर से दो अधिक हो । 
पु० उक्त की सूचक सख्या जो इस प्रकार लिखी जाता है->--०२। 

बह्सरवॉा--वि० [हिं० बहुत्तर "वा (प्रयय०)) [री बहरारवी] 
जो क्रम या गिनती मे इकहत्तर वस्तुओो के पाछे अति बहार के 
स्थान पर पड़ । 

बहुदुरा--पु० [देश०] चने, धान आदि की फसल के पा का कांटने- 
वाला एक प्रकार का कीड़ा। 

बहुन--स्त्री ० [सं० मगिनी, प्रा० बह़िणी] १ किसी व्यतिर (था जीव) 
के सबंध के विचार से वहू स्त्री (या मादा जीव) जा उसी के 
माता-पिता की सतान हो अथवा सताने के तुल्य हो। « उक्त 
अथवा उक्त की समवयस्क स्त्री के लिए प्रयुयत रोन॥ाठा सवोधन। 
प्‌ ० वहन । 

बहता---भ० [स० बहन | १ द्रव पदार्थ का धारा के रूप म कर्सी नीच 
तथ की ओर चलना या बड़ता। प्रवाहित दाना। जैी--सत अहना, 
जल बहना। 
सुहा०--बहती गगा में हाथ धानाउ-किसी ऐसे अर था शास में, 
जिससे और लोग भी लाभ उठा रह हो, अनायास सहज मे छा मे उठाना। 
(कही कही ऐसे अवसरों पर हाथ धोना' की जगए 'पाव परगरना' 
का मी प्रयोग होता है।) 
२ उक्त प्रकार की धारा मे पडकर उसके साथ लागे चलना था बना । 
जैसे--नदी में नाव बहना। 
सयो० क्रि०--चलना। 
३ किसी आधार या पात्र मे पूरी तरह से भर जाने पर वरल पदार्थ 
का इधर-उधर चलना। जैसे--घोर बर्षाक कारण ताकाद का बहना | 
४ किसी घन पदार्थ का गझकर या अपना आधार छाड़।२ द्रव रूप 
में किसी ओर चलना। जैसे--फोडा बहता, मोमबती बहूता। 
विशेष--इस अर्थ मे इस शब्द का प्रयोग उस पदाथे के लिए #। होता 
है जो निकलता है और इस आधार के सबंध में भी होता है (जसम से 
वह निकलता है। जैसे---(क) फोड़ा बहना; और (ख) फाईे में से 
मवाद बहना। 
५. अधिक मात्रा या मान में निरतर किसी ओर गतिशील होना । जैसे-- 
हवा बहना। ६ नियत या नियमित स्थान से हटकर दूर होना या 
हुसरे रास्ते पर चलना या जाना। जेसे--(क) पहनी हुई घोती था 


बहनापा ९ 


जजजिजत- न» नकननन्‍शनी-ना-झजण+ हनी ओीज चशि+ तपाऊजयाे ४ 


पाजामा बहुना, अर्थात्‌ नीचे खिसकना। (ख़) गोल में से कबूतर 
बहुना। (भ) हुवा में पतंग बहना। ७. विशेष आवेग के कारण 
खूब खुलकर किसी ओर प्रवृत्त होना। उदा०--अपनौ चौड़ सारि उन 
लीन्हू, तू काहे अब वृथा बहै री | --सूर। 
मुहा०--अहकर खूब खुछकर। मनमाने ढंग से या निस्सकोच 
होकर। उदा०-- ताही सो रसाल बाल बहि के बैराई है।--मारतेन्दु । 
८, पूर्दश्षाग्रस्त होकर इधर-उधर घृमना। मारा-मारा फिरना। उदा०- 
कब छगि फिरिह़ो दीन बह्यो ।--सूर। 
पमड़ाए-- महा फिरसा--किसी वस्तु की इतनी अधिकता होना कि उसका 
आदर घट जाय या विशेष मुल्य न रह जाय। जैसे---आज-कल 
बाजारों मे अमरूद (या आम) बहे फिरते है। 
९ व्यक्षि' का आचरण अ्रष्ट या कुमार्गी होना। सन्‍्मार्ग से च्युत 
होता। जैसे---यहू छड़का तो बहू चला। १० पशुओं का 
गर्भचाव होना । अडाना । जैसे--गाय या भेस का बहना। 
८१ गक्षियों का अधिक था प्राय अड़े देता। जैसे---कबूत री या मुरगी 
का बहता। 
इ--ह॥ हा जोए ऐसे वर और मादा पह-पक्षियों का जोडा 
जिससे साधारण से बहुत अधिक अडे निकलते हों। 
१५ घत का व्यर्थ के कामों में या बहुत अधिक व्यय होना। जैसे--- 
साठ भर में उनके बीस हजार रुपए बह गये। १३ किसी चीज या 
बात का नप्ट , गठित या बिक्षस होना। उदा०--(क) सुक सनकादि 
साल मन गोरे, ध्यानिन ध्यान बह्यो--सूर। (ख) निज दिव्य जन- 
पद की कहा चिर चेतना बह बह गई ।--मैथिलीशरण | १४. आधात 
या पहार के लिए शस्त्र या हाथ का ऊपर उठता। उदा०--बहूहि न 
हाश रिसि छाती ।--तुलूसी । 
#सयू० १ पने ऊपर भार रखना या लछादना। ढोना। उदा०-- 
गहि बटि मरठ पचहु निज स्वार्थ, जम को दंड सकह्यो।---कबीर। 
२ पशुओं वा कोर्ड चीज खीचकर ले चछना। उदा०--श्वेत तुरग 
बह़े रथ कोठी ।--रघुराज। ३ अपने उत्तरदायित्व, महृत्त्त आदि 
का भ्यान रबकर किसी बात का निर्वाह या पालन करना। उदा०--- 
मीरी के प्रम॒ हरि अबिनासी, छाज ब्रिरद की बहौ।--मीराँ। ४ 
कोई चीज अपने शरीर पर धारण करना। पहनना। जैसे--कवच 
या कुडल बहना। 
स० [स० वध] वध करना। मार डालना। वधना। 
।स््री० [6० बहन] 'बहुन' के लिए सबोधनकारक रूप। जैसे--नता 
बहना, रिसा मत कहो । 
स॒० दे० 'बाहना। 
बहनापा--7. ० [हिं० बह़त | आपा (प्रत्य०) ] स्त्रियों का वह पारस्परिक 
सम्बन्ध जिसमे ब॑ एक दूसरी की बहन ते होने पर भी ठीक बहनों का-सा 
व्यवहार करती है। स्त्रियों मे बहनों की तरह का होनेवाला पारस्परिक 
संबब । 
क्रि० प्र०--जोंडना ।- - लगाना । 
बहनाया *- -प०- -बहनापा | 
बहनी--स्त्री० [प्विं० बहना] १. 
वह गगरी जिसमे कोल्हू में से रस निकलकर इकट्ठा होता है। 


कक 
++02+५ 


पानी आदि बहने की नाली। २. 


१ 


| 
| 
। 


बहुरिया 


७२०७ हे अन्‍ननिननलजलओ, $+ ० कफ पइधनजिनजिनज तल: 


| स्त्री ० बहन । 
$क्त्री० वह (आग)। 

बहूतु "--प० [स० वाहन] सवारी। 
प्‌ ०>बहुन । 

बहुनेली--रत्री ० [हिं० बहन | एली (प्रत्य०)] स्त्री की वृष्टि से वह 
दूसरी स्त्री जिससे उसका बहनों का-सा सबंध हो। बनाई, मानी 
हुई या मुँह-बोली बहन । 

बहनोई--प. ० [स० मगिनीपति] सबंध के विचार से किसी की बहन 
का पति। 

बहुनोली[---स्त्री ० - ्बहनेली । 

बहुनीता|---१ ० [हिं० बहुन +औता ] बहन का लडका। भाँजा। उदा०-- 
स्वयं अपने बहुनौते की परिचर्या करना चाहती थी ।--चुन्दाबन लाल 
बर्मा। 

बहुनौरा[--प० [हिं० बहन | औरा (प्रत्य०)] १ संबंध के विचार 
से किसी की बहन का घर। बहन का ससुराल। २ बहनोंई अथवा 
उसके परिवार से होनेवाला सबंध । 

बहुबहा--वि० [माव० बहवही] +बेहतू (बहने अर्थात्‌ इधर उधर 
व्यर्थ घृममेवाला। 

बहबही--स्त्री० [हिं० बहबहा ] १. व्यथे इधर-उधर घूमते रहने की 
क्रिया या भाव। २. उपद्रव । ३. नटखटी। ४ शरारत। 

बहम--अव्य० [फा० बाहम] १ साथ। सग। २ एक दूसरे के साथ 
या प्रति। परस्पर । 

बहूमन| ---१ ०>आह्यण । 

बहर---१ ० [अ० बह] १. बहुत बडा जलाशय या नदी। २ समुद्र। 
३. उर्दू-फारसी कविताओं का कोई छन्द | जैसे--इस बहर मे मैंने 
मी एक गजल लिखी है। 
अव्य० [फा० ब+हर] १. हर एक। प्रत्येक। 
से। हर तरह से। जैसे---बहूर हाऊल--प्रत्येक दक्शा में । 

बहरना(--१ जबहुरता। २. >बहूराना। 

बहूरा--वि० [सं० बधिर, प्रा० बहिर] [स्त्री० बहरी, भाव० बहरा- 
पन] १. जिसे कानों से सुनाई न पडता हो। जिसकी श्रवण-शक्ति 
नष्ट हो गई हो। २ किसी की बात पर ध्यान न देनेवाला । 
मुहा०--बहूरा बनना: जान-बूझकर किसी की सुनी बात अनसुनी 
करना। 

बहूराना[--१० [हिं० बाहर] किस नगर या बस्ती की सीमा पर 
अथवा उससे बाहरवारू भाग या मुहल्छा । 
स० १. बाहर करना या तिकाछना । २ (नाव आदि) किनारे 
से दूर और घार की तरफ ले जाता। 
अ० १. बाहर होना। निकलना। २. अछग या दूर होना । 
स० [हिं० मुलाना] १. बहलछाना। २. सुनकर भी अन-सुनी 
करनता। टारू मठोल करना। बहुलाना। उद!|०---जबहीं मैं बरजति 
हरि सर्गाह तब ही तब बहुरायों |--सूर। रे. बहकाना। ४. फुसलाता | 

बहरिया--१० [हिं० बाहर |इया ([प्रत्य०)] वलल्‍लम सप्रदाय के 
मंदिरों के छोटे कर्मचारी जो प्रायः मंडप के बाहर ही रहते हैं । 
| वि०“न्‍्वाहरी । 


२. हर प्रकार 


बहुरियाना 


बहुरियाना --स० [हिं० बाहर | इयाना (प्रत्य०)] १. बाहर करना 
या हटाना। २ (नाव आदि) किनारे से दूर करके घारा की ओर 
ले जाना। 3. अहूग या जदा करना। 
अ० १ बाहर की ओर होना। २ (नाव का) किनारे से दूर हटना। 
३ अलग या जूदा होना। 

बहुरी--स्त्री० [अ०] एक प्रकार की जिकारी चिड़िया जिसका रूप 
रग और स्वभाव बाज़ का-सा होता है, पर आकार छोटा होता है। 
वि० [हि बाहर | ई (प्रत्य०) | बाहरी। 
पद--बहरी अलग (और या तरफ) - तगर के बाहर या बस्ती से कुछ 
दूरी पर का वह एकात और 'रमणीक स्थान जहाँ लोग प्राय सैर-सपाटे 
के लिए जाते है। 

बहुरू--प्‌ृ० [देश०| मत्य प्रदेश, बरार और मदरारा में होनेवाला एक 
प्रकार का मझोला पेठ जिसकी छकड़ी सुन्दर चमकीली और मसजबत 
होती है। 
[वि० बहरा। 

बहरूप--प/ [हिं० बहु ' रूप] १ बलों का व्यवसाय करनंवाला 
व्यक्ति । २ एक जाति जो बेलो का व्यवसाय करती है। 

बहुरूपिया--7_्‌ ० - बहापिया । 

बहला--स्त्री ०- बहली (गाडी)। 

बहलया >-अ० [हि० बहलाना का अ० ] १ ऊबे, थके, खाली बैठे 
या दु खी व्यक्ति अथवा उसके मन का मनोरजक या रमणीक वस्तुओं 
से परचना या कुछ समय के लिए प्रसन्न और शञात होना । २ झझट- 
बखेटे, चिता आदि की बात भूलकर मन का किसी दूसरी ओर लगना , 
और फछुत कुछ स्प्रस्थ गा हुछका अनुभव करना। जैसे--दिन भर 
काम करने के बाद सध्या को थोडा टहुल लेने से मन बहल जाता है। 
सयो० क्रि०--जाना। 

बहलवान--पु ० [ हि० बहल या बहली ; वान (प्रत्य०) ] बहल या बहली 
हांकनेबाला । 

बहुलाना--स ० [फा० बहार - अच्छी या ठीक दशा मे] १ कष्ट, राग, 
बिरक्ति आदि की दक्शा में दु खी या चिन्तित को इधर-उधर की बातों 
में ठ्गाकर प्रसप्न, शात या सुखी करने का प्रयत्न करना। जैसे-- 
बीमारी के दिनो में पडा पडा मै ताश खेलकर मन बहला लेता था। 
२ झट या बखेठे की बातो से अलग रहकर मन की चिताएं दूर करने 
का प्रयत्त करना। मनारजक कामो, चीजों या बातो से मन पर पडा 
हेआ भार हलका करना। ३ किसी एक काम या बात में छूगा हुआ 
मत उस उद्देष्य से किसी दूसरे काम या बात में ऊमाना कि झिथिलता 
दूर हैं जाय और प्रफल्छता आ जाय। जै॑से--बह हर एलबार 
को मन बहलान के लिए बगीचे चले जाया करते है। ४ इधर-उधर 
की आगे करके किसी को मुलावा देते हुए उसका ध्यान या मन दूसरी ओर 
लगाना। जैसे--रोते हुए छडके को बहुलाने के लिए उसे खिलौना देना। 
सयो० क्रिः--देना | 

बहलाव--प० [हि० बहुलना| ! 
मन-बहलाव। मनोरजन। 

बहलाबा--पु० १ बहलाव। २ 

बहुलिया] --पु० -बहेलिया। 


बहलाने की क्रिया या भाव। २ 


बहकावा। 


र्रे 


क्‍ 


बहाता 


(स्त्री ० -बहली। 

बहली--स्त्री० [रा० वाह्माली या वह्याली| बैलो द्वारा खीची जाने- 
वाली एक तरह की पुरानी चाल की सवारी गाडी । 

बहुल्‍ला--वि० [फा० बहाल] आनदित। खुश । 

पु० आनद। खुशी। 

० [अ० बहस] १ ऐसा तऊँ-वितर्क या बात-चीत जिसमे 
दा पक्ष अपना अपना मत ठीक सिद्ठ करने का प्रयत्न करते हो। तर्क, 
युक्तित आदि के हारा होनेबाला खडन-मठन। 
पद-- बहस-मुबआहसा । 

२ उक्त के फलस्वरूप होतेवाली होड़ । उदा०--मोहिं तुम्हे बाढी 

बहस को जीते जदुराज। अपने अपने विरद की दूँ नियाहै छाज ।-- 

बिहारी। ३ न्यायारूय मे, मुकदमे भे